21 Nov 2018

ऑफर की लीला


अजी सुनते हो! जरा इधर आइएगा और देखिएगा। आज तो कमाल हो गया! ऐसा सुनहरा ऑफर आया है,जो पहले कभी नहीं आया। श्रीमती के हाथ में अखबार देखकर आंखें फटी रह गई। जो कल तक अखबार पर एक नजर तक नहीं मारती थी। आज  बड़े गौर से एक-एक पन्ने को देख रही है।
मैंने पूछा क्यों चिल्ला रही हो। वह बोली,‘चिल्ला नहीं रही हूं,आप रोज अखबार बांचते हैं। आपने तो बताया नहीं, पर मैंने खुद देख लिया’ ऑफर की लीला
श्रीमती ने एक साड़ी के विज्ञापन पर उंगली रखते हुए कहा,‘यह देखो। विशेष छूट के साथ आकर्षक इनाम और लकी ड्रा अलग से। पहले आइए और पहले पाइए। ऐसा सुनहरा मौका हाथ से निकलने जाए। ऑफर सीमित समय के लिए। शर्तें लागू। अब चलो शॉपिंग करने चलते हैं।
यह फेस्टिवल सीजन है और सीजन में इस तरह की विशेष छूट नहीं लूट होती है। तुम्हारे पास तो एक से बढ़कर एक साड़ी है। फिर कभी देख लेंगे।
फिर कभी नहीं। अभी और इसी वक्त। इतना सुनहरा ऑफर पता नहीं फिर कब आएगा और आएगा भी या नहीं। टालमटोल करने की कोशिश मत करो और जल्दी से तैयार हो जाओ।
ऑफर का क्या है। आते-जाते रहते हैं। शायद कल इससे भी बढ़िया ऑफर जाए।
ऐसे ऑफर बार-बार नहीं आते। एक तो दो साड़ी की खरीद पर एक साड़ी मुफ्त में मिल रही है। ऊपर से सुनिश्चित उपहार अलग से है। हो सकता है ढेर सारे उपहारों की सौगात में से पहला हमारे नाम निकल आए। आप किस्मत तो आजमाते हो नहीं। इसलिए आपको क्या पता, ऑफर किस चिड़िया का नाम है।
अब तुम्हें कैसे समझाऊंअपनी जिद पर अड़ी हो। समझती तो हो नहीं। हर त्योहार पर इस तरह के ऑफर खूब आते हैं और लोग खूब ठगे भी जाते हैं।
मेरे साथ चलना है,तो चलो,मुझे समझाओ मत। मैं अच्छी तरह से समझती हूं। तुम्हें चलना तो है नहीं और मुझे बरगलाने की कोशिश कर रहे हो।
मैं तो कहीं भी नहीं जा रहा हूं। तुम्हें जाना है, तो जाओ।
यह तो मुझे पहले ही पता था कि आप मेरे साथ नहीं चलोगे। यह कहकर वह तैयार होकर चल दी। मैं भी उसके पीछे-पीछे चल दिया। श्रीमती जी आगे-आगे और मैं पीछे-पीछे। वह उसी दुकान पर गई,जिसका अखबार में छपे विज्ञापन में नाम था। 
जाते ही श्रीमती जी ने ऑफर के बारे में पूछा। ऑफर का नाम सुनकर दुकानदार मुस्कुराया और कहा,‘बैठिए बहन जी! यह लो पानी पीजिए।दुकानदार एक से बढ़कर एक साड़ी दिखाता है और हर साड़ी का अलग ऑफर बताता है। हर साड़ी पर अलग ऑफर सुनकर श्रीमती दुविधा में पड़ गई। उनके पल्ले कुछ पड़ ही नहीं रहा था कि फायदा हो कहां रहा है। उलझन सुलझाने के लिए मुझे फोन लगाया और बोली,‘अजी सुनते हो! यहां तो ऑफर की भरमार है। आप जाइए न।
मैंने कहा था ,त्योहार का समय है। ऑफर की भरमार तो होगी ही। अब तुम ही समझो इन ऑफरों की लीला। जल्दी करो, कहीं तुम्हारा ऑफर निकल जाए।कहकर मैंने फोन काट दिया। 


18 Nov 2018

भगत जी, भभूत और भूतनी


भगत जी कि शनिवार की रात भूत-भूतनियों के नाम रहती है। रात को वह उनका साक्षात साक्षात्‍कार लेते हैं। साक्षात्‍कार में अजब-गजब प्रश्न पूछे जाते हैं। अक्‍सर भूत बयानों पर कायम रहते हैं,लेकिन भूतनियां वचन देकर मुकर जाती हैं। भक्‍तगण बताते है कि भगत जी ने ना जाने कितनी भूत-भूतनियों को जीने की राह दिखाई है। उनमें से कई तो अच्छी ज़िंदगी भी जी रही होंगे। लेकिन, पहली बार एक ऐसी भूतनी आई,जो साक्षात्कार देने के बजाय विरोध पर उतर गई। भगत जी को ललकार रही थी। दो-दो हाथ करने के लिए हाथ-पैर पीट रही थी। भगत जी की  वर्षों की तपस्‍या  से बनी प्रतिष्ठा की इमारत को गिराने पर तुली थी। हालाँकि, भगत जी इससे पहले भी तममा भूतनियों को काबू कर चके थे। वे तमाम हथकंड़े जानते हैं,लेकिन इसके आगे सारे हथकंड़े ठंडे पड़ गए।
भगत जीभभूत और भूतनी
भगत जी ने एड़ी से चोटी तक तंत्र-मंत्र फूँक मारे,फिर भी  उसके विरोध के स्वर कम नहीं हुए। दाँत कटकटाते हुए कह रही थी‘तूने या समाज ने यह जो तामझाम खड़ा कर रखा है। इसके आगे समाज झुकता होगा। मैं झुकने वाली नहीं हूँ। अपनी ताकत किसी और को दिखाना। तेरे प्रति लोगों के मन में इज्जत होगी,लेकिन मेरे मन नहीं है। तू क्या समझता है?तेरी गीदड़ धमकियों से डर जाऊंगी। अबे मैं  कोई साधारण भूतनी नहीं,बल्कि नंदन वन की बाघिन भूतनी हूँ। इसलिए दहाड़-दहाड़कर कह रही हूँ। मुझसे पंगा मत ले। वरना गंगा भेज दूंगी।’
भगत जी पहली बार डरे हुए लग रहे थे,लेकिन आभास नहीं हो। इसलिए डराते हुए बोले‘तू मुझे क्या गंगा भेजेगी? तू रूक जरा! तूझे अभी गंगासागर के लोटे में समेटे देता हूं। यह सुनकर भूतनी और भड़क गई,‘बोली ऐसी धमकियां न दे वर्ना अभी तेरे चेले चपाटी और भक्तगणों के सामने तेरा कच्चा चिट्ठा खोलती हूँ।’   
भगत जी भावुकता में बोल दिए‘चल खोल,मेरी पॉल।’  यह सुनकर वह हँसने लगी। आँखों की पुतली चढ़ाते हुए बोली,‘सब के सब कान खोलकर सुन लो। जिसे तुम भगत जी कहते हो। यह कोई और नहीं बल्कि तुम्‍हारे मन के डर का धंधा बनाने वाला व्‍यापारी है। जब भी कोई मरता है। ये खुश होता है। रात को श्मशान में जाकर जश्न मनाता है। दिनभर तुम्‍हारे मन के डर टटोलता है और रात को तुम्‍हें,तुम्‍हारे ही डर से डरता है। यह किसी भूत-भूतनी को मुक्ति नहीं देता है। बल्कि यह तो तुम्‍हारें अंदर के भूत-भूतनियों को तुम्‍हारे सामने लाता है,तुम्‍हें डराता है। यही इसका धंधा है। भूतनी कुछ और बोलती उससे पहले ही अचानक भगत जी को कुछ होने लगा,जैसे भगत जी में भूत आ रहा हो, लोग कुछ समझ पाते उससे पहले भगत जी अपने भूत के साथ अपनी धूनी-भभूत सब छोड़-छाड़ के सर पर पैर रखकर भागते नजर आ रहे थे।

28 Oct 2018

मेरे अरमान कब पूरे होंगें


बस,बहुत हो गया। अब और सहन नहीं होता। यह भी कोई जीना है। जिसमें ऐशों-आराम हराम है। न मद्यपान न धूम्रपान है। सिर्फ सुनसान है। दो दिन की जिंदगी और चार दिन की चाँदनी है। दो दिन तो आने-जाने में निकल जाते हैं। एक दिन आने का और एक दिन जाने का। बची चार दिन की चाँदनी। एक दिन की चाँदनी जिंदगी की भागादौड़ी में और दूसरे दिन की माथाफोड़ी में। तीसरे दिन की हारी-बीमारी में और चौथे दिन की श्मशान की क्यारी में निकल जाती हैं।
लोग खुले आसमान तले उन्मुक्त उड़ रहे हैं। उन्हें देखकर मेरा भी मन करता है। उनकी मानिंद उड़ान भरने का। जब भी उड़ान भरने को आमादा होता हूँ तो घरवाले पर पकड़ लेते हैं। फड़फड़ाता हूँ तो पर काटने दौड़ते हैं। बात-बात पर नसीहत देते हैं। ना ही कहीं जाने देते हैं और ना कुछ खाने-पीने देते हैं।
देश कब का स्वतंत्र हो गया। पर मेरी स्वतंत्रता पर अब भी आधिपत्य है। जबकि मैं तो अठारह की उम्र भी क्रॉस कर गया हूं और मुझे वोट डालने का अधिकार भी मिल गया है। निर्वाचन आयोग द्वारा जारी बाकायदा पहचान पत्र भी है। जब सरकार ने सरकार चुनने का अधिकार दे दिया तो घरवाले क्यों नहीं समझतेलड़के के भी कुछ अरमान हैं। जिन पर मोहर लगाने का अधिकार खुद का है।
मैं भी तो आज का नवयुवक हूं और आज के नवयुवकों की तरह जीना मेरा भी अधिकार है। ये दिल फैशन,हेयर स्टाइल,स्मानर्टफोन मांगता है। बाइक हो तो सोने में सुहागा है। यही तो पर्सनालिटी के साधन हैं। जिनके उपयोग से बेहतरीन पर्सनालिटी दिखती है। आज के युग में जो दिखता है वही बिकता है। जिस दिन यह सब प्राप्त हो गया। उस दिन से मेरा भी फेसबुक,वाट्सएपट्विटरइंस्टाग्राम पर अकाउंट होगा। नए-नए फ्रेंड्स होंगे। रोज अलग-अलग एंगल से सेल्फी लेकर अपलोड करूंगा। लाइक,कमेंट्स बटोरूंगा। पर यह तो तब होगा ना जब मेरे अरमान पूरे होंगे।
अकसर हम सबके घर वालों की सदन शाम को बैठती है। वह भी भोजन के वक्त। क्योंकि इस वक्त सबके वक्तबव्यघ का मत आ जाता हैं। यहीं सुअवसर होता है कहने-सुनने और घर,गृहस्थी संबंधी योजनाएं बनाने का। इसी समय घर के नियम व कानून बनते-बिगड़ते हैं। फेरबदल होता है। जिसको जो कहना होता है वह कहता है। जिसको सुनना होता है वह चुपचाप सुनता है। जो नहीं कहता है और नहीं सुनता है। वह भोजन करके खिसक लेता है। ऐसा पारिवारिक सदन में ही होता है। क्योंकि यहाँ दल रहित सरकार होती है। पर पक्ष-विपक्ष यहाँ भी होता है।
काफी सोच-समझकर मैंने अपने अरमानों का विधेयक सदन में रखा। एक बार तो सबके-सब मेरी तरफ कौतुहल भरी निगाहों से देखें। पहले तो गृहस्वामी ने बात को टालने की कोशिश की। पर किसी ने दबे स्वर में मेरी मांग जायज बता दी। फिर क्या थाबहस आरंभ हो गई। पक्ष पास करवाने पर जोर देना लगा और विपक्ष स्थगित करवाने पर अड़ गया। जैसे-तैसे करके निम्न सदन में पास हो गया। पर उच्च सदन में आकर रुक गया। इस सदन में पूर्ण बहुमत नहीं होने से वहीं का वहीं अटका है।
यहीं हालात उन जनहित विधेयकों के साथ होती है,जो मेरे साथ हो रही है। मैं पूछना चाहता हूँ। मेरे सदन के मुखिया से। तुम्हारे पक्ष-प्रतिपक्ष के चक्कर में मुझे क्यों घसीट रहे होखुद के मतलब का कोई विधेयक होता है तो आनन-फानन में पारित कर लेते हो। कानों-कान किसी को खबर तक नहीं होने देते हो। मेरी बारी आती है तो पक्ष-विपक्ष में बंट जाते हो। ये भेदभाव क्यूँ  क्या यही तुम्हारा कानून-कायदा हैआखिरकार मेरा कसूर क्या हैयह तो बताओं!

7 Oct 2018

कड़ाही नहीं चाहती लड़ाई


कदाचित ही ऐसा कोई घर होगा,जहाँ दो बर्तन परस्पर नहीं टकराते होंगे। पुरानी कहावत भी है कि घर में दो बर्तन होंगे,तो टकराएंगे भी। अक्सर नहीं,तो यदाकदा टकराते होंगे। चकला-बेलन नहीं,तो कटोरी-कटोरी लड़ती होंगी। चिमटा चमचा भिड़ जाते होंगे। थाली प्लेट में तकरार हो जाती होगी। और नहीं तो चम्मच ही टाँग अड़ा देती होगी। नोकझोंक तो बड़े से बड़े घरों के बर्तनों में भी हो जाती है। यह भी सच है कि कई घरों के बर्तनों में सुबह कलह तो शाम को सुलह भी हो जाती हैं।
मेरे पड़ोसी के बर्तन ब्रांडेड होते हुए भी अक्सर टकराते रहते हैं। टकराएंगे तो बजेंगे भी। बजेंगे तो आवाज भी होगी। आवाज होगी तो अडोसी-पड़ोसी भी सुनेंगे। सुनेंगे तो अच्छी-बुरी बातों के संग झूमेंगे भी। झूमेंगे तो गाएंगे भी। फिर चाहे सुर बेसुर ही क्यों ना निकलेतब तक गाते रहेंगे, जब तक आवाज ब्रांडेड के ब्रांड एंबेसडर के कानों तक नहीं पहुँच जाएं। ब्रांड एंबेसडर के कानों तक पहुँचाने का अभिप्राय है कि आपने जिस तरह से इश्तहार में बताया था वैसा नहीं निकला। बतौर गारंटी पीरियड में ही चमक में धमक पड़ रही है। तुम्हारे सभ्य व संस्कार धातु से निर्मित बर्तन को समझाने के डिटर्जेंट से मांजते हैं तो कुपित दाग छोड़ने लगते है।
जिसके बर्तन हैं,उसे कतई गिला-शिकवा नहीं। उसके पड़ोसी इसी चिंता में सूखे जा रहे हैं कि ब्रांडेड,सभ्य व  संस्कार की धातु से निर्मित होने के बावजूद भी बर्तन अक्सर क्यों टकराते व बजते रहते हैंआपसी टकराव की वजह क्या हैबेवजह भेजा फ्राई करने वाले पड़ोसी से अच्छा पड़ोसी वही है,जो अपनी वजह के बजाय पड़ोसी की वजह को ढूंढने में लगा रहता है। यह तो हम भी  जानते हैं बेवजह क्यों बजेंगेकोई ना कोई वजह है तभी तो उनकी चम्मच भी कड़ाही  पर हावी हो जाती है। जबकि कड़ाही आग में जलकर सब बर्तनों का पेट भरती है। फिर भी उनके सारे बर्तन उसी को कोसते रहते हैं। बुरा-भला कहते हैं। इस कड़ाही से तीन और बड़ी कड़ाही हैं,उन्हें कोई कुछ नहीं कहता। यह उनके घर की सबसे छोटी कड़ाही है। आकार-विकार में नहीं। उम्र में छोटी है।
जब से यह आई है,आएदिन गृह युद्ध होता ही रहता है। पर जहाँ से यह आई है,उनके सात पीढ़ी में भी बुराई की 'बू' तक नहीं और इसके सिर पर रोज बुराई का ठीकरा फूटता है। सब्जी जल गई तोसब्जी में पानी ज्यादा हो गया तो,चमचे ने अपना काम ढंग से नहीं किया तो ठीकरा इसी के माथे पर फूटेगा। गनीमत यह है कि कड़ाही लड़ाई नहीं चाहती। अन्यथा अब से पहले रक्त की नदियाँ बह जाती और न जाने कितने ही शूरवीर बर्तन शहीद हो जाते हैं।
कड़ाही को अड़ोसन-पड़ोसन बहकाती भी खूब हैं। अच्छे- खासे लोहे से निर्मित है। फिर भी जुल्म-सितम सह रही है। घुटन भरी जिंदगी जी रही है। यह भी कोई जीना है। बगावत के बाण प्रक्षेपित क्यों नहीं करतीऐसी भी क्या मजबूरी हैजुबानी जंग भी नहीं लड़ती। तेरी जगह हम हो तो जुबानी जंग के दौरान ऐसी बुरी-बुरी गालियों की गोली दागे कि सामने वाले की जुबान लकवा खा जाए। गली-मोहल्ले के तवों से तो यह तक सुना है कि कड़ाही  में ही खोट है। इसीलिए खरी-खोटी सुनती रहती है। 
दरअसल में या तो यह बहुत समझदार है या फिर एक नंबर की बेवकूफ है। बहकाने के बावजूद भी नहीं बहती और ना ही वजह जगजाहिर करती है। बस सुनकर मुस्कुराकर चल देती है। यह इसकी मजबूरी है या खूबी। यह भी रहस्यमय है। इतना बहकाने पर इसकी जगह ओर कोई होती तो अब से पहले सारा कच्चा चिट्ठा खोल देती और मरने मारने पर उतारू हो जाती। भगवान जाने यह किस लोहे की बनी है,जो कि इतना सितम सहने के बावजूद भी कभी लाल-पीली नहीं होती। बस मुस्कुराती रहती है।
कड़ाही  के साथ अक्सर होने वाली लड़ाई की वजह उस दिन सामने आ ही गई। जिस दिन पूरा मोहल्ला इकट्ठा हो गया था और हाथापाई में कड़ाही  का एक हाथ फैक्चर हो गया था। कड़ाही  की सगाई में दहेज नाम का जो ऑफर बताया गया था। वह पूरा नहीं मिला था। इसी वजह से कड़ाही साथ लड़ाई होती हैं। जब उसकी सास के श्रीमुख से यह वजह जगजाहिर हुई तो सब आश्चर्यचकित रह गए। क्योंकि यह वह परिवार हैं,जो कि दहेज न लेने-देने का ढिंढोरा पीटना रहता है।