Showing posts with label Satire. Show all posts
Showing posts with label Satire. Show all posts

5 Mar 2023

कहो तो रंगलाल कितने गोले रंग

रंगलाल पर पिछली बार मोहल्ले के सारे छोरे टूट पड़े थे। गनीमत रही कि उसके शरीर का एक भी अंग नहीं टूटा। अगर टूट जाता तो टूटकर पड़ने वालों की खैर नहीं थी। खैर छोड़िए। टूटकर पड़ने का कारण उसके रंग-गुलाल छीनकर उसी को रंगने का था। जिसमें कामयाब भी हुए। उसे उसी के रंग-गुलाल से सराबोर करने के बाद ही उसके ऊपर से उठे। रंगलाल रंग-गुलाल से इतना सराबोर हो गया था कि कई दिनों तक होली के रंग छुड़ाने पर भी नहीं छूटे। रंगलाल अपने आपको लूटा हुआ महसूस करने लगा। जबकि रंग-गुलाल के सिवाय रंगलाल का कुछ भी नहीं लूटा गया था।

लेकिन रंगलाल पिछली बार की भड़ास निकालने के लिए अबकी बार टूटकर पड़ने वालों को ढूंढ-ढूंढकर सूचीबद्ध कर लिया हैं। वे तो होली पर टोली के संग टूटकर पड़े थे और यह एक-एक करके सबके साथ बगैर टूटकर पड़े ही होली की होली खेलेगा और भड़ास की भड़ास निकालेगा।


इस तरह से खेलेगा कि किसी के बाप को भी पता नहीं चलेगा होली खेल रहा है या फिर भड़ास निकाल रहा है।गले लगाकर गले पड़ेगा। थोड़ी सी गुलाल लगाने के लिए कहेगा और मुट्ठीभर लगाएगा। एक हाथ से गालों पर और दूसरे से बालों पर लगाएगा। जब तक बंदा रंग-गुलाल से सराबोर नहीं हो जाएगा। तब तक उसका पिंड नहीं छोड़ेगा।

अच्छा सूचीबद्ध वाले हाथ नहीं लगे,तो ऐसा नहीं है कि भड़ास नहीं निकालेगा। गतवर्ष की भरपाई तो इसी वर्ष करके ही रहेगा। जो मिल गया,वही सही। बस मन से भड़ास निकलनी चाहिए और तन पर रंग-गुलाल चढ़नी चाहिए। फिर चाहे सामने कोई भी हो। यही रंगलाल की हार्दिक इच्छा है। जिसे पूरी करने के लिए पुरजोर से लगा हुआ है। लेकिन अकेला कोई मिल नहीं रहा है। सब के सब टोली के संग होली खेल रहे हैं। टोली वालों के साथ खेलने पर अच्छे-अच्छों की रंग गुलाल फीकी पड़ जाती है। ट्रैफिक हवलदार से बचकर निकल सकते हैं,पर होली पर टोली वालों के सामने आने के बाद बचकर निकलना नामुमकिन है। इनके सम्मुख कोई समझदारी दिखाता है,तो वे कीचड़ को भी गुलाल समझकर उसके चेहरे पर पोत देते हैं। उनका मानना है कि कीचड़ में कमल खिल सकता है,तो कीचड़ से होली खेलने में बुराई क्या है।

एकाध के साथ होली ही खेल सकते हैं। उनके साथ भड़ास निकाले तो मन की भड़ास भाड़ में घुस जाए और तन पर खुद की ही रंग-गुलाल चढ़ जाए। यह कोई भी नहीं चाहता है कि खुद की रंग-गुलाल खुद के लगे। सब दूसरों के लगाने की फिराक में रहते हैं।

रंगलाल की भड़ास की प्यास बढ़ती जा रही थी और पजामे की जेबों में भरी गुलाल घटती जा रही थी। होली तो खेल रहा था पर भड़ास निकाल नहीं पा रहा था। मौका नहीं मिल रहा था और मौका मिल रहा था,तो कोई भी छोरा अकेला नहीं मिल रहा था। यकायक सूचीबद्ध वाला ही एक छोरा मिल गया। जिसे देखकर चेहरे पर छाई मायूसी उड गई। उस छोरे के चेहरे पर ही नहीं,बल्कि पूरे पर इतनी गुलाल उड़ेल दी कि गौर से देखने पर भी उसके घर वाले भी पहचान नहीं पाए।

वहां से आगे बढ़ा तो जो निशाने पर थे,उनमें से एक पर निशाना साधा। लेकिन निशाना चूक गया और किसी और के लग गया। लग गया तो भड़ास रंग-गुलाल में बदल गई। बुरा न मानो होली है कहकर उसे भी अच्छी तरह से रंग दिया। जब रंग गुलाल जिसके लगाना चाहते हैं और उसके नहीं लगती है तथा इसके उसके या किसी अन्य के लग जाती है। तभी होली खेलने का असली मजा आता है। मजा आता है तो भड़ास चुपके से खिसक लेती है। 

दरअसल होली पर्व पर आप समझ रहे हो,उस तरह के भड़ास नहीं होती है। इस भड़ास में तो एक अजीब सी मिठास होती है। जिसे खाना तो कोई नहीं चाहता है। लेकिन खानी पड़ जाती है। नहीं खाए तो लोग बुरा मान जाते हैं। होली पर बुरा मानना अच्छा नहीं रहता है। इसलिए सब इस अजीब सी भड़ास की मिठास को मिल बांटकर खाते हैं और खिलाते हैं।

मोहनलाल मौर्य 

19 Jul 2022

मुँह पर ताला,जबान का बोलबाला

मनुष्य नामक प्राणी के मुख में जीवनयापन करने वाली जबान ही है,जो कि व्यक्ति के व्यक्तित्व से परिचित करवाती है। उसकी उपलब्धियां और खामियां बताती है। उसके चरित्र का सर्टिफिकेट दिखाती है। मगर कई जबान अपने ही मुख पर मुक्की खाने के लिए कभी भी और कहीं पर भी फिसल जाती है। न समय देखती हैं और न माहौल। बस इन्हें तो लात घूसे और मुक्के खाने से मतलब रहता है। यह सुनहरा अवसर जहाँ कहीं पर भी मिल जाए वहीं पर अग्रणी रहती हैं। अस्पताल में भर्ती होने लायक मार मिल जाए तो अपने आप को इतनी खुशनसीब समझती हैं,जैसे सोने पे सुहागा मिल गया हो। 


कई तो ऐसी है कि एक बार फिसलने के बाद संभलने की ही नहीं सोचती है। फिसलती ही चली जाती है। जब तक अपने मानव मालिक की हड्डी पसली एक नहीं हो जाती उससे पहले ब्रेक नहीं लगाती हैं। यह अपने प्राणी के प्राणों की भी परवाह नहीं करती हैं। अनाप-शनाप बोलती हुई वहाँ तक पहुँच जाती हैं। जिसकी सपने में भी कभी कल्पना नहीं की होती है। यह कई दिनों का कोटा एक ही दिन में पूरा करने के लक्ष्य में रहती हैं। इसलिए यह ऐसी जगह पर कि फिसलती हैं,जहाँ पर भीड़भाड़ होती है। जब इनसे भीड़ भिड़ने लगती हैतब यह अपने सशक्त हथियार अपशब्दों का उपयोग करके अपना लक्ष्य प्राप्त कर ही लेती हैं।

कई जबान कतरनी की तरह कितनी तेज चलती है कि रिश्ता नाम के धागे तक को काट देती है। जबकि भली-भांति जानती हैं कि एक बार धागा कट गया तो फिर वह गाँठ के माध्यम से ही जुड़ता है। गाँठ पड़ने के बाद में धागे में लगी गाँठ को कितना ही छिपा लो। वह दिखाई देती ही है।मगर इनके लिए धागा कटे या कटने के बाद गाँठ पड़े या फिर गाँठ खुलेऐसी जबाने तब तक अपनी स्पीड कम नहीं करती हैंजब तक रिश्ता नाम का धागा खुद टूटने पर मजबूर नहीं हो जाए।  

कई जबाने ऐसी भी हैं जो कि मुँह में होने के बावजूद भी दिखाई नहीं देती हैं। अदृश्य रहती हैं। मगर इन्हें पहचाना बहुत ही आसान है। जहाँ कहीं पर भी लोग यह कहते हुए दिख जाएमुँह में जबान नहीं है क्याइसके बाद में भी प्रत्युत्तर नहीं मिले। निरुत्तर मिले तो समझ लीजिए वही अदृश्य जबान है। परंतु ऐसी जबाने कतिपय ही बची हुई है। अधुनातन में तो अपने सगे बाप से जबान लड़ाने वाली जबानों का बोलबाला हैं। एक जमाना था बाप के सामने थोड़ी सी भी जबान बाहर निकल जाती थी तो बाप उसकी जबान खींच लेता था। मगर आज जबान संभाल कर बात कर कहने वाले या तो चुप्पी साध लेते हैं या फिर उस पर ऐसी लगाम लगाते हैं कि उसकी जबान को लकवा ही मार जाता है।

12 Jul 2022

हाइट ने छीनी बाइट


मेरी हाइट छ फिट छ इंच है। न एक इंच कम और न ज्यादा है। चाहे इंची टेप से नापकर देख लीजिए। रत्ती भर भी फर्क नहीं मिलेगा। आप सोच रहे होंगे,मैं नाप-तौलकर क्यों बता रहा हूं। इसलिए बता रहा हूं कि मैं अपनी हाइट से परेशान हूं। मेरा जीना दूभर कर रखा है। उसकी वजह से लोग मुझे लंबू कहते हैं।

कई बार तो घरवाली भी मखौल उड़ाने लग जाती है। कहती है कि तुम में और विद्युत खंभे में ज्यादा फर्क नहीं है। तुम चलते-फिरते हो और वह एक जगह खड़ा रहता है। अगर तुम एक फुट छोटे होते,तो अच्छा रहता। तुम्हारी सूरत देखने के लिए दूरबीन की जरूरत न पड़ती।

अब मैं एक फुट कम कैसे होऊं। मार्केट में हाइट बढ़ाने के कैप्सूल तो किस्म-किस्म के मौजूद हैं। मगर हाइट घटाने वाला एक भी नहीं है। अगर होता तो मैं अवश्य लेता। साइड इफेक्ट की भी परवाह नहीं करता। भविष्य में हाइट कम करने का कोई कैप्सूल आएगा,तो मैं लेकर ही रहूंगा। उसकी कीमत चाहे जो भी हो।

घर में जो भी सामान ऊंचाई पर रखा है न,उसे उतारने के लिए सब मुझे ही बुलाते हैं। नहीं जाता हूं,तो कहते हैं कि हम तेरे जितने कद्दावर होते,तो आसमान में छेद कर देते। इक तू है कि सामान नीचे उतारने के लिए नखरे करता है। तुझे इसलिए कहते हैं,तू बगैर एड़ी ऊंची किए कोई भी सामान आसानी से उतार देता है। भगवान ने तुझे यह हाइट दी है,लोगों की सहायता के लिए दी है। इस पर इतना गर्व मत किया कर। मैं कैसे बताऊं कि मुझे अपनी हाइट पर गर्व नहीं,बल्कि शर्मिंदगी है। 

जिनके दरवाजों की ऊंचाई मेरी हाइट से कम है,उनमें प्रवेश करते समय अक्सर मेरा सिर टकरा जाता है। एकाध बार तो चोट भी आ चुकी है।  उस समय लोग यही कहते हैं कि दिखता नहीं है क्या? झुक नहीं सकता क्या? कईयों के दरवाजे तो इतने छोटे हैं कि झुकने के बावजूद भी बच नहीं पाता हूं। चोट सीधी ललाट पर लगती है। सच पूछिए तो दरवाजों से टकराना आए दिन की घटना हो गई है। अब कोई इसे गंभीरता से नहीं लेता है। कोई लेगा भी क्यों? उनका माथा थोड़ी फूटता हैं। मेरा फूटता है। मुझे लेना चाहिए। मैं गंभीरता से लेकर करूं क्या? मेरी हाइट की वजह से तो लोग अपने घरों के दरवाजे बदलने से रहे। 

मैं जब भी बस या रेल में यात्रा करता हूं,तो मेरी हाइट देखकर,वे यात्री तो मुझे कह ही देते हैं,जिनके हाथ एड़ी ऊंची करने के बावजूद भी वहां तक नहीं पहुंच पाते हैं,जहां पर सामान रखना होता है या रखे हुए को उतारना होता है। भाई साहब! हमारा ये बैग ऊपर रख दीजिए। भैया वो सूटकेस नीचे उतार दीजिए। जब मैं नहीं रखता हूं और नहीं उतारता हूं न,तब वे यात्री मन ही मन में बड़बड़ाते हुए कहते हैं कि भगवान ने हमसे थोड़ी सी ज्यादा हाइट क्या दे दी। अपने आप को न जाने  क्‍या समझ रहा है।  

एक बार एक पत्रकार ने मेरी बाइट लेनी चाही,पर हाइट की वजह से ले नहीं पाया। बेचारा इतना छोटा था कि दोनों हाथ ऊपर करने के बावजूद भी उसका कैमरा मेरे चेहरे तक नहीं पहुंच पाया। उस समय हम दोनों को अपनी-अपनी हाइट पर बहुत गुस्सा आया। उसे कम गुस्सा आया होगा पर मुझे ज्यादा आया। अपनी-अपनी हाइट को लेकर हम दोनों विवश थे। मुझे पहली बार टीवी पर आने का और उसे पहली बार किसी व्यंग्यकार की बाइट लेने का अवसर हाइट ने छीन लिया। 
------------------------------------

26 Jun 2022

अनुभवी को प्राथमिकता

मुझे यह कहकर साक्षात्‍कार से बाहर की राह दिखा दी कि न तो अनुभव है और न ही अनुभव प्रमाण पत्र है। हम अनुभवी को ही प्राथमिकता देते हैं। दुख बाहर किए जाने का नहीं है। बाहर तो कई बार मुझे यार-दोस्‍तों ने भी कर दिया हैं। कई बार कुपित होकर पिताजी ने बाहर कर दिया है । बाहर करना था तो कह देते,तुम्‍हारे पास अप्रोच नहीं है। तुम्‍हारे पास कोई सोर्स नहीं है। तुम्‍हारे पास फलाना नहीं है। तुम्‍हारे पास डिमका नहीं है। ये क्‍या बात हुई कि तुम्‍हारे पास अनुभव नहीं हैअरे,अनुभव तो मि‍त्रोंमित्रों के पास भी नहीं था। फिर भी हवा में उड़े की नहीं। और ऐसा उड़े कि परिंदे भी जिंदगी भर में जितना नहीं उड़े कि वे पाँच साल में उतने उड़ लिए।

अनुभव को प्रमाण कि क्‍या जरूरत हैअनुभव तो मेरे अंदर कूट-कूट के भरा है। यकीन न हो तो कूट-कूट कर देख लो। सैम्‍पल लेकर देख लो भाईरक्‍त का,मांस का,मज्‍जा का। बोटी-बोटी से अनुभव टपेगा। अंग-अंग से फड़क उठेगा। इसके बाद भी अगर प्रमाण लेना ही है तो एक कागज के टुकड़े पर लिखे ढाई आखर के प्रमाण से क्‍या लेनाइस तरह के प्रमाण के प्रमाण पत्र तो रद्दी के भाव में बहुत मिल जाते हैं। लेना ही है तो कुछ दिन अवसर देकर लीजिए। फिर मेरा प्रायोगिक अनुभव देखकर अपने आप आभास हो जाएंगा।https://vyangyalekh.blogspot.com/

जब पैदा हुआ,बड़ा हुआ,अपने आस-पास देखा तो अनुभव मिला। क्‍या मालिया कर्जे से डूबता छोड़ अनुभव लेकर पैदा हुआ थाउससे सीखा कि ऋण लेकर घी पीना चाहिए। फिर देश-दुनिया देखी। सीखा कि पाँव पूजाने का अनुभव। जरूरत पड़ी तो पाँव उखाड़ने का अनुभव भी पाया। धवल धारियों से सीखा कि वक्‍त जरूरत पड़ने पर किस तरह पलटी मारी जाती है। पलटी मारकर किस तरह बाजी जीती जाती है। गधे को बाप बनाने का हुनर तो अब पुराना हो गया। आजकल तो मैं इतना सीख गया हूँ कि शेर को बच्‍चा बना सकता हूँ। हाथी को पहाड़ के नीचे ला सकता हूँ। ऊँट को पहाड़ पर ले जा सकता हूँ। उखड़े को गाड़ सकता हूँ। गाड़े को उखाड़ सकता हूँ। इतना सर्वतोमुखी सम्‍पन्‍नता के बाद भी बाहर कर देना कैसे हजम होगीबताओं भलाआज के हालात में और देश में जीने के लिए ऐसे अनुभवों की दरकार है या नहींएक बार मौका देकर तो देखे,दम नहीं,खम देखें,पाँच सितारा बुंलदी न देखा दो तो सच्‍चा भारतीय नहीं। आप तो धार देखें,चाहे तो उधार देखें,और एक बार सेवा का मौका दे।vyangyalekh

मुझे पच्‍चीस तीस प्रतिशत अनुभव तो पुश्‍तैनी विरासत से मिला है। पच्‍चीस प्रतिशत संघर्ष करके अर्जित किया है और चौदह प्रतिशत साक्षात्‍कार देते रहने से हो गया है। कुलयोग किया जाए तो चौंसठ प्रतिशत होता है। मुझे मालूम है,आज के युग में चौंसठ प्रतिशत की कोई वैल्‍यू नहीं। इसलिए शेष छत्‍तीस प्रतिशत के लिए भी प्रयासरत हूँ। वैसे देखा जाए तो छत्‍तीस प्रतिशत वाले नब्‍बे,पचानवे प्रतिशत वालों पर हुक्‍म चलाते हैं। साथ में वे ही अनुभव के आधार पर देश चला रहे हैं। और नब्‍बे,पचानवे वाले उनकी हाँ में हाँ और ना में ना मिलाकर भागीदारी निभा रहे हैं। अनुभव के आधार पर तो झोलाछाप डॉक्‍टर क्‍लीनिक चला रहे हैं। बिना लाइसेंस धारी  मोटरसाईकल से लेकर ट्रक तक दौड़ा रहे हैं और ट्रैफिक पुलिस वाले उनका बाल भी बांका नहीं कर पाते। एक मैं हूँ,जिसे चौंसठ प्रतिशत अनुभवी होते हुए भी बाहर की राह दिखा दी जाती है। बताओंक्‍या यह सही है?

जब बाहर निकला तो सोचा,मतलब अनुभव पाया कि अब मैं धक्‍के नहीं खाऊंगा। धक्‍के देकर आगे बढ़ना होगा। जिंदगी इतनी सरल नहीं बाबू कि सारी जिंदगी धक्‍के खाते रहो। देखना अब मेरे अनुभव का कमाल। ऐसा धमाल मचाऊंगा कि देखकर सब ढंग रह जाएंगे। जिन्‍होंने बाहर की राह दिखाई है न वे भी देखकर दांतों तले उँगली चबाते रह जाएंगे। vyangyalekh

https://vyangyalekh.blogspot.com/

गड़े मुर्दें उखाड़ने वाला गुड्डू

गुड्डू गड़े मुर्दे उखाड़ने में पीएचडी है। आए दिन किसी ना किसी के उखाड़ता रहता है और सुर्खियों में बना रहता है। उसे सुर्ख़ियों से उतना ही प्यार है। जितना हीर-रांझा और लैला-मजनू को था। सुर्खियों में बने रहने के लिए सौ साल पुरांने को भी नहीं छोड़ता है। उसे भी उखाड़कर उछाल देता है। पुराने से पुराने का उछाल उसी तरह से उछलता है। जिस तरह से शेयर बाजार का सेंसेक्स उछलता है। क्या है कि नए गड़े मुर्दे उखाड़ने पर उतनी टीआरपी नहीं मिलती है। जितनी पुराने को उखाड़ने पर मिलती है। vyangyalekh


अपनी टीआरपी बढ़ाने के लिए,गुड्डू नित्य नयों के बजाय पुराने से पुराने गड़े मुर्दे खोजता रहता हैं। जैसे ही हाथ लगा फेसबुक पर लाइव आकर उछालने लग जाता है। लाइव के दौरान बीच-बीच में शेयर करने की अपील अवश्य करता रहता है। ताकि उखाड़े गए मुर्दे से ज्यादा से ज्यादा लोग वाकिफ हो सके और अच्छी खासी टीआरपी मिलती रहे। क्या है कि फेसबुक लाइव की जितनी ज्यादा शेयर होती है। उतनी ही ज्यादा कमेंट्स बॉक्स में डिबेट चल रही होती है। मगर यहाँ पर टीवी की तरह डिबेट नहीं होती है। एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाकर डिबेट पूरी कर ली। यहाँ पर तो बहुत तीखी नोकझोंक होती है। विचारों की तलवारे तन जाती हैं। ज्ञान बांटने की होड़ लग जाती है। अज्ञानी भी ज्ञान बांटकर वाहवाही लूट लेता है।अमर्यादित भाषा पर कोई प्रतिबंध नहीं होता है। गाली-गलौज देने की पूरी छूट होती है। जरूरी नहीं सवाल का जवाब ही मिले। जवाब के बदले में गाली भी मिल सकती है।vyangyalekh

गुड्डू गड़े मुर्दों पर इतना शोध करता रहता है कि उसके व्हाट्सएप पर भी किसी ना किसी उखाड़े मुर्दे के छायाचित्र की ही डीपी लगी हुई होती है। उसका लक्ष्य हैं,गड़े मुर्दे उखाड़ने का वर्ल्ड रिकॉर्ड अपने नाम करना। इसके लिए चाहे अपनों के ही क्यूँ नहीं उखाड़ने पड़े। उन्हें भी जड़ से उखाड़कर,उन्हें पछाड़ देगा,जो इस प्रतिस्पर्धा में है। मगर अभी तो दूसरों के ही बहुत से केस पेंडिंग पड़े हैं। उनको उखाड़ने के लिए समय नहीं है। क्या है कि गुड्डू ऐरे-गैरे,नत्थू-खैरे गड़े मुर्दे नहीं उखाड़ता है। उनको उखाड़ता है,जो चर्चा का विषय बने। जिनके जरिए खुद बिना प्रचारित ही चर्चित हो जाए। vyangyalekh

आपको यकीन नहीं होगा,उसकी फेसबुक वॉल एक से बढ़कर एक गड़े मुर्दों की पोस्ट से भरी पड़ी है। जिन्हें देखकर कोई चकित रह जाता है तो कोई कुपित हो जाता है। मगर यूट्यूब पर तो ऐसे-ऐसे मुर्दे अपलोड किए हुई है। जिन्हें देखकर हर कोई अवाक रह जाता है। इंस्टाग्राम पर तो ऐसी-ऐसी मुँह बोलती फोटो अपलोड करता है। जिन्हें देखकर आँखें फटी की फटी रह जाती है। उसके टि्वटर पर लिखे को पढ़करवह व्यक्ति अवश्य सतर्क हो जाता है। जिसको हमेशा यह भय रहता है कि कहीं कभी अपने गड़े मुर्दे नहीं उखाड़ दे।vyangyalekh

यह कोई भी नहीं चाहता है कि कोई उनके गडे़ मुर्दे उखाड़े। क्योंकि उखड़ने के बाद फिर से नया गड्ढा खोदकर दबाना पूर्व की भाँति जितना आसान नहीं है। गुपचुप में गड्ढा खोदकर दबा दिया और किसी को कानों कान खबर ही नहीं लगी। उखड़ने के तत्पश्चात दबाना तो दूर,उखड़े हुए को सँभालना ही बहुत मुश्किल हो जाता है। क्योंकि उस समय उनके सामाजिक वातावरण में लोक निंदा की हवा घुली हुई होती। जिसमें श्वास लेना भी दुश्वार होता है। ऐसी स्थिति अपने आप को संभाले या फिर उखाड़े गए को संभाले। vyangyalekh

दरअसल में गड़े मुर्दे उखाड़ना भी आसान नहीं है। बहुत ही जोखिमपूर्ण है। थोड़ी सी लापरवाही के कारण वाहवाही की जगह हाय-हाय में परिवर्तन होते देर नहीं लगती है। सावधानीपूर्वक होकर उखाड़ना होता है। ताकि परिजनों को बुरा नहीं लगे। फिर भी कई बार उन्हें इतना बुरा लगता है कि वे खुद उखड़ जाते हैं। उस समय उन्हें सँभालना बहुत मुश्किल हो जाता है। कई बार तो कहासुनी होकर रह जाती है और कई बार मरने-मारने पर उतारू हो जाते हैं। लेकिन गुड्डू तो गड़े मुर्दे उखाड़ने में पीएचडी है न इसलिए हर बार बच निकलता है।vyangyalekh

12 Jun 2022

एक वक्‍ता का वक्‍तव्‍य

एक कार्यक्रम में एक वक्ता ने सभागार में उपस्थित लोगों को कुछ इस तरह से संबोधित किया। आज के भव्य कार्यक्रम के मुख्य अतिथि महोदय तथा विशिष्ट अतिथिगण। पितातुल्य बुजुर्गों,माताएंबहनों और भाइयों तथा प्यारे बच्चों। मैं यहाँ कोई भाषण देने नहीं आया हूँ। मुझे आता भी नहीं है। मैं ज्यादा तो कुछ नहीं कहूंगा। बस इतना ही कहूंगा...। 

मेरे समझ में नहीं आया कि बुजुर्ग तो पितातुल्य और माताएं मातातुल्य नहीं। बहिने सिर्फ बहिने ही। उनके लिए तुल्य जैसा कोई शब्द नहीं। भाइयों के लिए भाइयों ठीक-ठाक था। लेकिन वहाँ उपस्थित सभी बच्चे प्यारे तो नहीं थे। कुछेक शरारती भी थे,जो उसको दिख भी रहे थे। फिर भी उनको संबोधित नहीं किया। सिर्फ प्यारे बच्चे ही बोला। शुक्र है कि शरारती बच्चों ने ध्यानपूर्वक नहीं सुना। अगर सुन लेते तो तालियां बजाकर ही बता देते कि हम किस टाइप के शरारती हैं। 

मैं यहाँ भाषण देने नहीं आया हूँ। अगर कोई उस समय उसे पूछ लेता कि मंच पर भाषण देने नहीं आए,तो किस लिए आए हो। राशन देने के लिए। क्या जवाब देता।  यह तो गनीमत है कि किसी ने पूछा नहीं। या फिर जिसके लिए आया था। वो बताने चाहिए था। अमुक काम के लिए आया हूँ। उसने कहा कि मुझे भाषण देना भी नहीं आता है। फिर लंबा-चौड़ा भाषण कैसे पेल दिया। शुक्र है कि जैसे-तैसे श्रोतागणों ने झेल लिया। अन्यथा वो भी तालियां बजाकर बता देते। अगर किसी भी वक्ता के वक्तव्य पर आवश्यकता से ज्यादा तालियां बजने लगती हैं,तो उसको समझ जाना चाहिए कि श्रोता सुनना नहीं चाहते हैं। लेकिन फिर भी वक्ता बकता रहता है।

आगे उसने कहा कि ज्यादा कुछ नहीं कहूंगा। जबकि कहा बहुत ही ज्यादा। जब ज्यादा ही कहना था,तो बस इतना ही कहूंगा क्यों कहा। यूँ कह सकता था कि कम नहीं ज्यादा ही कहूंगा। उसके कहने पर कौन सा टैक्स लग रहा था या जीएसटी लग रही थी। ज्यादा कहने से क्या श्रोता उठकर चल देते या सो जाते। वो तो जहां पर थे,वहीं पर रहते। ज्यादा कहने पर ज्यादा से ज्यादा एकाध उठकर चल देता। एकाध के चले जाने से पांडाल खाली नहीं हो जाता। सृष्टि का नियम है कि एक जाता है तो दूसरा आता भी है।

जब उसने कहा कि यह मेरे व्यक्तिगत विचार है। आपसे साझा कर रहा हूँ। अगर उसके विचार व्यक्तिगत ही थे,तो फिर सार्वजनिक क्यों किया। व्यक्तिगत ही रखता। सीधे-सीधे यूं ही कह देता कि यह मेरे सार्वजनिक विचार है। जिन्हें आपके सम्मुख रख रहा हूँ। अच्छे लगे तो प्रचार-प्रसार करना और बुरे लगे तो मुझे सूचित करना। 

उसने विचार देने के बाद में विचार वापस लिया। कहा कि मैं अपने विचार वापस लेता हूँ। जबकि उसको पता होना चाहिए विचार कमान से निकले तीर की तरह होता है,जो एक बार निकलने के बाद कभी वापस नहीं होता है। उसने ध्यान से देखा नहीं,वापस मांगने पर एक भी श्रोता ने वापस नहीं किया। सबने अपनी पॉकेट में रख लिया था।

उसने अपना उद्बोधन कुछ इस तरह से समापन किया। समय को देखते हुए बस यहीं पर अपनी वाणी को विराम देता हूँ। आपने मुझे बोलने का अवसर दिया और ध्यानपूर्वक सुनने के लिए दिल से धन्यवाद। अगर उसने समय को देखा ही होता तो दो वक्ताओं के समय को नहीं खाता। उसे किसी ने भी बोलने का अवसर नहीं दिया। बल्कि खुद ने लिया था। खुशामद के जरिए। ध्यानपूर्वक किसी ने भी नहीं सुना। ज्ञान की बात कहता तो अवश्य सुनते। बेमतलब की बातें कह रहा था।

 

--


भक्त की तलाश

भजनी ने चेले-चाटी परखकर देख लिए। चमचे भी आज़मा लिए। अब भक्त रखना चाहता है। उसका कहना है कि चेले और चमचे में भक्त ही अग्रगामी है। बलशाली है। आज्ञाकारी है। परोपकारी है। आभारी है। झूठ को सच और सच को झूठ मानने वाला प्राणी है। और इन दिनों चेलों और चमचों से ज्यादा सुर्खियाँ बटोर रहे हैं।

लेकिन भजनी को भक्त ढूँढे नहीं मिल रहा। जबकि उसको भक्त या उसके जैसे लोगों की सख्त जरूरत है। लग रहा है कि अगर भजनी को वक्त रहते  भक्त नहीं मिला,तो उसकी जमानत ज़ब्त हो जाएगी। ज़ब्त हो गई,तो उसका रक्तचाप बढ़ जाएगा। बढ़ गया,तो उसे आग बबूला होने से कोई रोक नहीं सकता। और उस दौरान वह कब सातवें आसमान पर पहुँच जाता हैउसे पता ही नहीं रहता है। पहुँचने के बाद आपा खो बैठता है। बैठने के बाद उसके मुख से न जाने क्या-क्या निकल जाता है। जिन्हें सुनकर लोग भड़क जाते हैं। भीड़-भड़क्का हो जाता है। हाहाकार से गगन  गुंजायमान हो उठता है। कई बार तो ब्रेकिंग न्यूज़ तक बन जाती है। जिसे देखकर लोग सड़क पर उतर आते हैं। माफी माँगने पर विवश करते हैं। और कई बार माँगनी भी पड़ जाती हैं।

यह सब घटित नहीं हो इसीलिए भजनी भक्त की तलाश में है। उसका मानना है कि ऐसे वक्त पर भक्त ही काम आता है। वही है,जो कि घटना घटित होने से पहले ही बता देता है। उसने बताया कि भक्त इतना सशक्त होता है कि अपना रक्त बहाने से भी नहीं घबराता है। जबकि चेले और चमचे रक्तदान करने से ही हिचकिचाते हैं। आजकल के चेले तो केले की तरह हो गई हैं,जो कि पकने से पहले ही बिकने के लिए बाजार में आ जाते हैं। चमचे फटे-पुराने गमछे की तरह हो गए हैं,जो कि किसी कामकाज के नहीं हैं । 

भजनी का कहना है कि मुझे ऐसा भक्त चाहिए,जिसके नेता पर कीचड़ उछालने पर,भक्त दलदल में फंसा हुआ भी उसके लिए मरने-मारने पर उतारू हो जाता है। उसकी अनुपस्थिति में भी उसकी जय-जयकार करता रहता है। जिंदाबाद के नारे लगाकर जिंदा रखे रखता है। अपने नेता को नेता नहीं,देवता समझता है। विकास पुरुष कहकर संबोधित करता है। अपनी बात पर अडिग रहता है। अकड़ने पर अड़ियल बनते देर नहीं करता है। विरोधियों के सामने सीना तानकर डटे रहता है। उनके सवाल का जवाब न देकर,उन्हीं से सवाल करने में माहिर होता है। विपत्ति में भी आपत्ति नहीं करता है। सदैव प्रसन्न रहता है।

भजनी का तो यह तक कहना है कि जिस दिन मुझे इस तरह का भक्त मिल गया न जगत से लड़ने की जरूरत नहीं। फिर जगत से भिड़ने के लिए भक्त ही काफी है। वही कार्यों में खामियाँ निकालने वालों को ख़ामोश करेगा। आरोप-प्रत्यारोप लगाने वालों को सबक सिखाएगा। सलाखों के पीछे धकेलेगा। धरना-प्रदर्शन करेगा। पुतला फूंकेगा। सोशल मीडिया पर भड़ास निकालेगा। अखबार की हेडलाइन और टीवी की ब्रेकिंग न्यूज़ बनने पर बौखलाएगा।

लेकिन भजनी को किसी ने बताया है कि भक्त मिलता नहीं है,बल्कि बनता है और वह भी बनाने से नहीं,अपने आप बन लेता है। जब भजनी ने बताने वाले से पूछा कि अपने आप कैसे बनता हैतो बताने वाले ने बताया कि आँखों में धूल झोंक करजनता को सपने दिखा। मन की बात कर,मगर अपने मन की मत बता। अपने आपको फकीर कह,पर रहे राजा की तरह। लोक लुभावने वायदे कर,किंतु पूरे मत कर। जहां कहीं भी जाए,वहीं बाहें फैलाकर लोगों को गले लगा। और इतनी झूठ बोल कि लोग तुझे एक नंबर का झूठा कहने लग जाए। फिर देखिए,व्यक्ति भक्त नहीं,अंधभक्त बन जाएगा। एक बार जो अंधभक्त बन गया न फिर वह आँख मूंदकर विश्वास नहीं करें तो कहना। तू जो कहेगा और जो करेगा,उसे ही सही कहेगा। तेरे को कोई गलत साबित करने की कोशिश भी करेगा तो वह कतई सहन नहीं करेगा। विरोध करेगा। उसने भजनी को जो भी बातें बताई है नउन पर मंथन जारी है।

मोहनलाल मौर्य 

 


7 Feb 2021

अफसर का सर प्रेम

वह अफसर है। उसे सर बहुत प्रिय है। सर उसके अफसर और सरनेम में भी समाहित है। उसका सरनेम सरासर है और सरासर में तो एक बार नहीं,दो बार सर है। जिसके आगे-पीछे सर ही सर  हो। वह तो सरकार से भी सर कहलवा सकता है। क्योंकि,सरकार भी सर है तो ही है। सरकार में ‘सर’ नहीं हो,तो अकेली ‘कार’ से सरकार कभी नहीं बने। ‘कार’ तो हर किसी के पास होती है। लोगों के पास लग्जरी कार तक होती हैं। फिर भी उनको सरकार का सौभाग्य प्राप्त नहीं होता है। ऐसा भी नहीं है कि वो प्रयास नहीं करते हैं। प्रयास तो खूब करते हैं,पर सफल नहीं पाते हैं। सफल वही हो पाते हैं,जिनके पास ‘सर’ और ‘कार’ दोनों होते हैं। जिसके पास सरकार होती है या सरकार में होता है। उसका रुतबा असरदार होता है। असरदार इसलिए असरदार होता है क्योंकि उसमें सर है। सर नहीं हो तो अदार ही रह जाए। अदार कोई अर्थ ही नहीं निकलता है। जिसका कोई अर्थ ही नहीं,वह व्यर्थ है।

उसे सर कहकर उसके सिर पर बैठ जाओ। उसके कक्ष में,उसके सम्मुख रखी कुर्सियों पर पसरकर बैठ जाओ,मना नहीं करेगा। मुस्कुराते हुए बातचीत करेगा। उस समय आपको आभासी नहीं होगा कि मैं अफसर के सामने बैठा हूँ। ऐसा महसूस होगा कि मैं तो अपने किसी परिचित के पास आया हुआ हूँ और उससे सुख-दुख की बतला रहा हूँ। उस वक्त यह मत समझ बैठिए कि अफसर तो बहुत ही अच्छा है। अच्छा-वच्छा कुछ नहीं है। यह तो अफसर को सर कहने का कमाल है। 

सच पूछिए तो वह अफसर ही सर सुनने के लिए बना है। सर सुने बगैर तो वह एक पल भी नहीं रह सकता है। उसकी सुप्रभात और शुभरात्रि ही सर सुनने के बाद होती है। वह सर सुनकर मन ही मन में इतना प्रसन्न होता है कि जैसे कि कोई लॉटरी निकलने पर होता है।

उस अफसर की ऑफिस में उसके सिवाय अन्य किसी भी कर्मचारी को कोई सर कह देता है न तो उसके सिर दर्द हो जाता है। उसका कहना है कि ऑफिस में जो सर्वोच्च पद पर आसीन होता हैं,वही सर होता है। बाकी के अधीनस्थ तो अपने-अपने पदों के नाम से ही संबोधित किए जाते हैं। यह जिसका कहना है,वही ऑफिस में सर्वोच्च पद पर आसीन है। यानी कि वही सर है। अगर किसी ने किसी बाबू को सर कह दिया और अफसर ने सुन लिया तो उस व्यक्ति का काम आसानी से हो जाए,संभवतःसंभव नहीं। कई चक्कर काटने पड़ेंगे। अनुनय-विनय करना पड़ेगा।

हाँ,जिसने बाबू को बाबूजी कह दिया और अफसर ने सुन लिया तो उसका काम तत्काल प्रभाव से हो जाता है। उसकी फाइल में किसी दस्तावेज की कमी होने के बावजूद भी फाइल अटकती-भटकती नहीं,बल्कि सीधी अफसर की टेबल पर पहुँच जाती। जिसने अफसर के हर प्रश्न का जवाब यस सर और नो सर में दिया न उसके दस्तावेजों पर तो बगैर देखें व पढ़े हस्ताक्षर कर देता है। 

 

वह अफसर हाजिर हो या गैरहाजिर हो। उसके परिसर में दिनभर सर गुंजायमान रहता है। इसलिए नहीं कि परिसर शब्द में सर है,बल्कि इसलिए रहता है कि परिसर में अफसर हैं। वह हर उस अवसर का पूरा लाभ उठाता है,जिसमें सर होता है। वैसे अवसर में भी सर है। वह दूध भी तभी पीता है,जब उसमें केसर होता है। क्योंकि केसर में सर है। उसे घुसर-पुसर करने वाले लोग बहुत पसंद है। पसंद इसलिए हैं कि घुसर-पुसर में एक बार नहीं,बल्कि दो बार सर है। इसी तरह उसे प्रोफ़ेसर,अनाउंसर व फ्रीलांसर लोग भी बहुत पसंद है। यह लोग भी इसीलिए पसंद है कि उनमें सर समाहित है। वह डांस डांसर का ही देखता है। देखने की वजह सर ही है। स्त्रियों की नाक में नकबेसर व गले में नवसर कैसे भी हो। नए हो या पुराने हो। महँगे हो या सस्ते हो। उन दोनों आभूषणों की तारीफ किए बगैर नहीं रहता है। अगर उन दोनों आभूषणों के नाम में सर नहीं हो न,तो वह कभी तारीफ नहीं करें। 

उस अफसर को चैसर का खेल और टसर के कपड़े इसलिए पसंद है कि उनके नाम में सर है। उसके बगीचे में सबसे ज्यादा नागकेसर के वृक्ष है। वो भी इसीलिए है कि उनके नाम में भी सर है। उसे सर से इतना प्यार-प्रेम है कि वह उस बीमारी से ग्रस्त हैं,जिसके नाम में सर है। वह कैंसर से पीड़ित है।

 


 

19 Jul 2020

Saavan and frog


Every day the cuckoo is saying cuckoo, that the spring has come, get out of the house and look at the all-round greenery. But nobody is listening to him. All are entangled in their respective actions in such a way that they are not listening to their loved ones. Even when a cuckoo starts crying in people's ears, they will not listen. Because nowadays people are more fond of earrings than Karnapriya.
Now peacocks are dancing not only in the jungle but also on the roof of houses. People are even calling people after drinking. Come and see our dance. Still people are not watching their dance. Perhaps this is why people are not able to feel like Mayur. As long as the human mind is not like a peacock, he does not even enjoy the sawn bhads.
Forever the frogs enter the homes of the savannahs to tell them that it is their beauty that does not suit you. But there is no human being that is not living without a twist. When you see, then it keeps on talking. Whereas frogs tend to tread in the rainy season.
In Saavan Bhadas, Nag-Nagin dances by telling them that in marriage, people imitate us and dance on the ground and dance on the ground, and they do not dance the serpent. The way we are doing it does not happen. But people are scared to see their dance and away from them. Whereas serpent-nagins dance not to dance, but to teach serpent dance.
In the month of Sawan Bhadas, the clouds do not show their mercy, but they show themselves the way they show them, and sometimes showers. We are far from obliged, but we also do self-interest. Perhaps this is why the clouds are not kind to us soon. Despite the thunder, they will not rain thinking of this, we are kind to them and it is people that do not exist.

The wind that blows in the month of Sawan Bhadas to the wind blowers will be able to convince them that it is better to fly in the wind, do your tasks only by keeping a foot on the ground. Otherwise, you will fall down from the pit, neither will you sink inside the ground. But people don't understand that. There is no fear of talking in the air and building an air fort.
In the months of the monsoon months, the dampness that comes in the house-hallway also teaches us that nothing happens by building luxurious houses. Periodic repairs are also very important. It is the dampness that compels us to repair. If the damp does not come, then we do not look at the walls. Who does not ignore the seals even during the rainy days, nor does his house remain dashed.
Similarly, coming to the river and drain, it tells us that nothing is kept in anger. Anger is the destruction of ourselves and others like us. Once devastated, it takes years to recover. But we are not able to control our anger even after seeing the river and rivulets.
Mohanlal maurya