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12 Oct 2020
9 Mar 2020
अब न होली की लपटें न ढफ की थाप पर नागिन डांस
पहले
जैसी होली का उत्सव अब कहां बचा है। होली डांडा रोपण के दिन से ही फाग का राग शुरू हो जाता था और होली दहन तक
चलता था। पूरी रात नाचते गाते थे। डफ की थाप पर नागिन
डांस करते थे। महिलाएं होली के गीत गाया करती थी। अब न
तो होली का डांडा गड़ता है न कोई
फाग का राग गाता है और न कोई नृत्य करता है। बस होली के दिन डीजे बजा लेते हैं और
नाच लेते हैं। डीजे
पर भी सिर्फ छोरे-छापरे थिरक लेते हैं।
पहले मोहल्ले
के सारे टाबर दिन ढलते ही एक जगह इकट्ठे हो जाते थे और स्वाँग निकालने का कार्यक्रम
बनाते थे। रोज घर-घर जाकर स्वाँग दिखाते थे। बड़े-बुजुर्ग एक-दो रुपया देकर आशीर्वाद देते थे।
उन रुपयों की मिठाइयां खाते थे। आज के टाबर स्वाँग जानते ही नहीं। यह तो रंग-गुलाल लगाने का अभिप्राय भी नहीं जानते हैं। बस एक-दूसरे की देखा देखी को देखकर लगा देते हैं।
अपने स्मार्टफोन से सेल्फी ले लेते हैं और सोशल मीडिया पर टांक देते हैं।
लोग
रात्रि को लुकाछिपी का खेल खेलते थे और लोगों की बाड़ उठा लाते थे। होलिका टिब्बा लाकर पटक देते थे।
लेकिन बाड़
का मालिक चू नहीं करता था। अब यह सब बीते दिनों की
बात हो गई। तभी
आज होली की लपटें ज्यादा ऊपर नहीं उठती हैं। जबकि पहले
एक गांव कि होली की लपटें दूसरे गांव में दिख जाती थी।
क्योंकि भर भोलिए और लकड़ियों
का ढेर लग जाता था। अब ढेर तो लगता नहीं हैं और लपटें
उठती नहीं है। पहले पूरे गांव की एक ही जगह होली होती थी और अब ढाणी-ढाणी में होली मंगलने लगी है।
होली
दहन के बाद बच्चे बड़े बुजुर्ग सब घर-घर जाकर एक-दूसरे के गले मिलते थे। शिकवे-गिले दूर
भगाते थे। अपनों से बड़ों के चरण स्पर्श करके आशीर्वाद लेते थे। अब तो पड़ोसी के
नहीं जाते हैं। बस व्हाट्सएप पर ही आशीर्वाद आदान-प्रदान कर लेते हैं। धुलेंडी के दिन रंग ही नहीं लगाते थे। बल्कि कीचड़ तक उड़ेल
देते थे। देवर-भाभी और जीजा-साली तो एक-दूसरे के मुंह में रंग ठुस देते थे और चेहरे पर कालिख पोत देते थे। आज कालिख पोत
दे तो कलह हो जाए। मोहनलाल मौर्य
9 May 2019
आखिर महिलाओं के साथ उत्पीडऩ कब तक?
थानागाजी
गैंगरेप की घटना निर्भया कांड से भी बड़ी है। इस घटना ने पूरे देश को हिलाकर रख
दिया है। हर कोई स्तब्ध है। घर से बाइक पर सवार होकर निकले दंपत्ति को
घर से थोड़ी दूर आगे ही दुहार चौगान मार्ग पर दो बाइकों
पर सवार पांच युवकों ने उनके आगे बाइक लगाकर पहले तो
उनके साथ मारपीट की बाद में सड़क से दूर रेत के ऊंचे
टीलों के बीच में ले जाकर दोनों के कपड़े उतार दिए। फिर
पति को बंधक बनाकर उसकी आंखों
के सामने ही पत्नी के साथ बारी-बारी से 6 बार बलात्कार करके अपनी दरिंदगी का मोबाइल से वीडियो तक बना लिया। उस समय
दंपत्ति खूब चीखें,पुकारे भी,मगर दरिंदे बहुत ही शातिर थे, उनको ऐसे ऊंचे रेत के
टीलों बीच में ले गए थे, जहां से उनकी चीख-पुकार टीलों से
बाहर निकली नहीं पाई। दरिंदों ने ढाई घंटे तक दरिंदगी की।
26 अप्रैल
की घटना का मामला 2 मई को दर्ज होता है। वो तब,जब पीड़ित 30 अप्रैल को
पुलिस अधीक्षक के समक्ष पेश होते हैं और आपबीती बताते हैं। पुलिस
अधीक्षक के निर्देश पर थानागाजी की पुलिस गुपचुप में मामला तो दर्ज कर लेती है,लेकिन चुनाव का हवाला देकर मामले को 5 दिन तक दबाए
रखती है। यहाँ पर कई सवाल खड़े होते हैं। आखिरकार पुलिस
मामले को 5 दिन तक क्यों दबाए रखी?
तत्परता से अपेक्षित कार्रवाई क्यों नहीं की गई? इस घटना का चुनाव से क्या संबंध था? क्या किसी राजनीतिक षड्यंत्र के तहत मामले को दबाया गया था? अच्छा पुलिस तो नींद से तब जगी,जब दरिंदों ने अपनी दरिंदगी का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया था।
जनता के आक्रोश के बाद आनन-फानन में पुलिस की 14 टीम गठित की
जाती हैं। अभी तक तीन आरोपी गिरफ्तार हुए हैं। जबकि मुख्य आरोपी अभी तक पुलिस के हाथ नहीं लगे हैं।
इसी क्षेत्र
में इससे पूर्व भी इस तरह की घटनाएं हो चुकी हैं। इस गैंगरेप के दूसरे दिन ही एक
और गैंगरेप का मामला सामने आया है। यह भी थाना अधिकारी के पास 2
दिन पहले आ गया था। लेकिन इस मामले को भी दबा दिया गया। हालांकि
इसके मुख्य आरोपी को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। यहां पर पुलिस की कार्य
प्रणाली पर प्रश्न उठते हैं और सरकार भी सवालों के घेरे में घिरती है। हालांकि
थानागाजी गैंगरेप मामले में एसपी ने थाना अधिकारी को निलंबित कर दिया और एसपी को
सरकार ने एपीओ कर दिया है। लेकिन क्या थाना अधिकारी को निलंबित और एसपी को एपीओ
करने से पुलिस की कार्यप्रणाली पर प्रभाव पड़ेगा।
इस
घटना को लेकर जनता में इतना आक्रोश है कि मुख्य आरोपी अतिशीघ्र गिरफ्तार नहीं किए
गए तो देश में जगह-जगह आंदोलन होने की पूरी आशंका है। लेकिन एक अहम सवाल
खड़ा होता है कि इस तरह गैंगरेप की घटनाएं आखिर कब तक
होती रहेगी। कब तक ऐसे वहशी दरिंदे हमारी बहन-बेटियों को नोचते रहेंगे। आखिर कठोर कानून के बावजूद भी इस तरह के अपराधियों के हौसले बुलंद क्यों हैं? क्यों आए
दिन मासूम बच्चियों के साथ दुष्कर्म होते हैं? इन सब के पीछ आखिरकार
जिम्मेदार कौन है? आखिर महिलाओं की सुरक्षा किसके भरोसे हैं।
आज समूचे
देश में ऐसी कोई जगह नहीं बची होगी। जहां छेड़छाड़,लूटपाट,दुष्कर्म व हत्या की घटना घटित नहीं हुई हो।
विकृत प्रवृत्ति के भेडि़ए अपनी हवस पूरी करने के लिए,मासूमों
को भी नहीं छोड़ते। शायद ही ऐसा कोई दिन होगा। जिस दिन देश के किसी कोने से यौन
हिंसा की खबरें अखबारों में नहीं आई हो। अखबारों में तो वे ही
हेडलाइन होती है। जिनका मामला पुलिस में दर्ज हो जाता है या फिर सोशल मीडिया पर वायरल हो जाती हैं। महिलाओं से जुड़ी बहुत सी जघन्य घटनाएं तो सामाजिक प्रतिष्ठा के कारण
उजागर ही नहीं हो पाती है। परिजन मामले को इसलिए दबा लेते हैं कि समाज में हमारी
प्रतिष्ठा पर प्रश्नवाचक नहीं लग जाए। या फिर समाज के रसूखदार कोर्ट कचहरी में जाने से पहले ही मामले को दबा देते हैं। कई बार बलात्कार जैसी वीभत्स घटनाएं अपराधियों के भय के कारण भी उजागर नहीं हो पाती है। क्योंकि अपराधी
अपराध करके इस तरह से डराते धमकाते हैं कि पीड़ित सहम जाते हैं।
सच पूछिए तो आज महिलाओं का घर से निकलना
दुश्वर हो गया है। स्वयं या घर के
कामकाज के लिए,महिलाएं घर बाहर
निकलती ही हैं पर, महिलाओं को घर से बाहर निकलते ही,यही भय रहता हैं। कहीं उनके साथ कोई विकृत अनहोनी नहीं हो जाएं। यह खौफ तब
तक बना रहता है। जब तक वे घर वापस नहीं आ जाएं। परिजन भी चिंतित रहते हैं। अपनी
बेटी,बहु सही सलामत घर पहुंच जाती हैं। तब जाकर परिजन राहत
की सांस लेते हैं। अगले दिन फिर यह प्रक्रिया रहती है। महिलाओं का अकेले बाहर
निकलना किसी खतरे से कम नहीं। वहशी इसी फिराक में रहते हैं। वे कभी भी और कहीं भी
हमला कर सकते हैं। रात सुरक्षित है नहीं। लेकिन दिन का भी कोई भरोसा नहीं।
यदि
राजस्थान में अपराधों की घटनाओं के आंकड़ो पर बात की जाए तो राष्ट्रीय अपराध
रिकॉर्ड ब्यूरो की वर्ष 2016 की रिपोर्ट के
अनुसार राजस्थान में दुष्कर्म के 3656 मामले दर्ज किए गए। इन
आंकड़ों के साथ राजस्थान का स्थान देश में चौथे नंबर पर रहा। यदि नाबालिक बच्चियों
के यौन शोषण के आंकड़ों पर प्रकाश डाला जाए तो यह आंकड़े चौंका देने वाले हैं। वर्ष 2015
से 2017 के बीच 3 वर्षों
में राजस्थान में 3897 बच्चियों के साथ रेप की वारदातें
हुईं। इन आंकड़ों के मान से प्रतिदिन तीन नाबालिक बच्चियां यौन अपराध की पीड़ा को सह
रहीं हैं। बलात्कार के उम्रवार उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक करीब चालीस प्रतिशत
बच्चियां 14 साल तक की उम्र में बलात्कार का दंश झेल रही
हैं। वहीं 1877 घटनाएं शारीरिक शोषण की भी दर्ज हुई हैं। 18
फीसदी मामलें ऐसे भी हैं जिनमें पुलिस अपराधियों को न पकड़ पाने के
कारण चालान पेश ही नहीं कर पाई,जिसके चलते वे अपराध के बाद
भी मुक्त हैं। समाज में महिलाओं के साथ अपराध होना चिंता का विषय है लेकिन अपराध
होने के पश्चात पुलिस की कार्यप्रणाली तथा सजा मिलने में देरी उससे भी बड़ी चिंता
की बात हैं। जब तक पुलिस की कार्यप्रणाली में तेजी नहीं आएगी अपराधियों में कानून
व्यवस्था का भय नहीं बन पाएगा, आवश्यकता तो कानूनी प्रक्रिया
में तेजी की भी हैं।
प्रत्येक चुनाव में महिला
सुरक्षा को लेकर बड़ी-बड़ी बातें
की जाती है। मगर वे बातें चुनावी शोरगुल में ही घुल मिलकर रह जाती हैं। सरकार
महिला सुरक्षा की मुनादी तो खूब करती है। लेकिन जब किसी महिला पर अत्याचार होता है
तो चुप्पी साध लेती है। देश में कानून हैं। मगर कानून के रखवाले गहरी नींद में सोए
रहते हैं।
दिल्ली
के निर्भया कांड के बाद उम्मीद की किरण निकली थी। लेकिन वह भी धीरे-धीरे विलुप्त
हो गई। सरकार महिलाओं के संदर्भ में कानून बनाती रहती हैं। लेकिन जिस कानून की
महती आवश्कता है। शायद वह आज तक बना ही नहीं। अगर देश में सख्त कानूनी प्रक्रिया
होती तो निर्भया कांड ही नहीं होता। अपराधियों का दुस्साहस प्रतिदिन बढ़ता जा रहा।
इस दुस्साहस की प्रवृत्ति को रोकना ही होगा। आखिरकार महिलाएं ही अत्याचार की शिकार
क्यों होती हैं? जिस पुरूष प्रधान की
जन्म जननी नारी है,वहीं पुरूष नारी के साथ उत्पीडऩ क्यों
करता है?
महिला
सशक्तिकरण की पहल तब सार्थक होगी। जब देश में महिलाओं पर किसी भी तरह का उत्पीडऩ
नहीं होगा। नारी के पिछे चलने वाला अपराध बोध। पीछा करना छोड़ देगा। तब सही मायने
में महिला सशक्तिकरण चरितार्थ होगी। दकियानूसी जंजीरों से तो महिलाएं स्वतंत्र हो
गई। मगर पुरूषों की संशय दृष्टि से स्वतंत्र नहीं हुई। समाज के कई ठेकेदार महिलाओं के पहनावे पर किचड़
उछालते हैं। पहनावे को जिम्मेदार ठहराना कतई उचित नहीं है। प्राचीन काल में तो
कपड़े ही नहीं थे। पेड़ पत्तों की छाल बांधकर अपने शरीर की हिफाजत करती थी। तब
महिलाएं सुरक्षित थी। आज सुरक्षित क्यों नहीं? यह बुनियादी
सवाल आज भी कायम है। इस तकनीकी युग में ही नारी सुरक्षित नहीं,फिर कब होंगी?अब वक्त आ गया है नारी की सुरक्षा करने
का। नारी भावनात्मक पहलुओं की कोमल अभिव्यक्ति है, जिसमें
उसका स्वतंत्र भाव समर्पित रूप से समाया हुआ है।
-
मोहनलाल
मौर्य
17 Mar 2018
अंतिम मैसेज ‘बिलकुल’ लिखकर ‘वलेस’ कुल को छोड़कर चल बसे व्यंग्यकार सुशील सिद्धार्थ
मोहनलाल मौर्य
उत्तर प्रदेश के सीतापुर
के भीरा,बिसवां में 2 जुलाई 1958 को जन्में प्रख्यात व्यंग्यकार सुशील सिद्धार्थ का
शनिवार सुबह निधन हो गया। 60 वर्ष की उम्र में इस तरह से चले जाना व्यंग्य जगत में
शोक की लहर दौड़ गई। उनके निधन की खबर जिसने भी सुनी विश्वास नहीं हुआ कि अद्भुत
व्यक्तित्व के धनी अप्रत्याशित अलविदा कैसे हो गए। मैं खुद स्तब्ध हूं।
नए-पुराने,नवोदित स्थापित
व्यंग्कारों को एक मंच पर लाने के लिए वे अहर्नशि आमादा रहते थे। इसके लिए उन्होंने
22 जुलाई 2015 को वलेस (व्यंग्य लेखक समिति) के नाम से वाट्सऐप ग्रुप बनाया था।
जिससे मुझ जैसे नवोदित से लेकर समकालीन व्यंग्य शिरोमणि पद्मश्री ज्ञान
चतुर्वेदी सहित बहरहाल 61 सदस्य है। इस ग्रप में वे नित्य व्यंग्य में नवाचार एवं
आगामी योजनाओं पर प्रकाश डालते रहते थे तथा व्यंग्यकारों की प्रकाशित,अप्रकाशित व्यंग्य
रचनाओं पर बेबाक टिप्पणी देकर उन्हें अवगत करवाते थे। व्यंग्य विधा में उनके
अमूल्य योगदान को कभी भूलाया नहीं जा सकता है। वे व्यंग्य पर बहुत बारीक से अपना
वक्तव्य रखते थे तथा सदैव व्यंग्य के संदर्भ में समर्पित रहते थे। नवोदितों व्यंग्यकारों
के तो वे एक तरह से भगवान ही थे। क्योंकि नवोदितों पर उनका विशेष फोक्स रहता था।
वलेस ग्रुप में सबसे पहले
वरिष्ठ व्यंग्यकार अंजनी चौहान का मैसेज आया सुशील सिद्धार्थ नहीं रहे। ये
देखकर तमाम वलेसी स्तब्ध रह गए। वलेस ग्रुप में वरिष्ठ व्यंग्यकार निर्मल
गुप्त की एक पोस्ट के नीचे बीती रात 8.53 पर अंतिम मैसेज ‘बिलकुल’ लिखकर ‘वलेस’
कुल को छोड़कर चल बसे। इससे पूर्व उन्होंने ‘सुदर्शन जी अपने व्यंग्य का टेक्स्ट
लगाओं’ लिखा था। और फेसबुक पर उनकी अंतिम पोस्ट ‘लिखे जा रहे व्यंग्य आखेट का
अंश’ था तथा ‘आखेट’ नाम से उनका नवीनतम व्यंग्य सग्रंह प्रकाशन की तैयारी में है।
जिसमें इकलातीस व्यंग्य हैं। जिसका आवरण सुशील सिद्धार्थ ने सोशल मीडिया पर पोस्ट
किया था।
वे मेरे सबसे प्रिय व्यंग्यकार
नहीं अपितु मेरे गुरु भी थे,जो कि मुझे समय-समय पर मार्गदर्शित करते रहते थे। उनसे
मेरा जुड़ाव फेसबुक के जरिए हुआ था। वलेस ग्रुप में जुड़ने के बाद तो अक्सर
वार्तालाप होती रहती थी। उनके साक्षात दर्शन 23 दिसम्बर 2017 को प्रथम ज्ञान
चतुर्वेदी सम्मान के अवसर पर भोपाल के स्वराज भवन में हुए थे। जिसमें खासतौर से
उन्होंने आमंत्रित किया था। और में इस कार्यक्रम मैं सबसे पहले आने वाले आगंतुक
के रूप में उपस्थित हुआ था। वहां दो दिन तक उनके साथ रहा। उनके साथ बिताए वे पल हरपल
याद रहेंगे।
साधारण सादगी से सराबोर सुशील
सिद्धार्थ की अब तक प्रीति न करियों कोय, मो सम कौन, व्यंग्य संग्रह में नारद की
चिंता,मालिश महापुराण,हाशिये का राग,सुशील सिद्धार्थ के चुनिंदा व्यंग्य,राग लन्तरानी,दो
अवधी कविता संग्रह। इनके अलावा इनके संपादन में पंच प्रपंच, व्यंग्य बत्तीसी,श्रीलाल
शुक्ल संचयिता,मैत्रेयी पुष्पा रचना संचयन,नये नवेले व्यंग्य,व हिंदी कहानी का
युवा परिदृश्य (तीन खंड) आदि किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं।
साहित्य क्षेत्र में
सुशील सिद्धार्थ का नाम जाना पहचान था। खासतौर पर व्यंग्य विधा में। वे किसी
परिचय का मोहताज नहीं थे। उनका परिचय देना सूर्य को दीपक दिखाना है। हाल ही में
उनको कोटा में व्यंग्यश्री सम्मान से नवाजा गया था। इससे पूर्व वे हिंदी संस्थान
उत्तर प्रदेश से दो बार व्यंग्य में और दो बार अवधी कविता के नामित पुरस्कारों
से सम्मानित हो चुके हैं। इनके अलावा लखनऊ से अवधी शिखर सम्मान,भोपाल से स्पंदन
आलोचना सम्मान,और दिल्ली से शरद जोशी से सम्मान से नवाजे जा चुके हैं। उनको मेरे
तरफ से भावभीनी श्रद्धांजलि।
24 Feb 2018
सारथी बालिका अभियान एक सार्थक पहल
चर्चित तथा दबंग आईपीएस पंकज
चौधरी ने की पहल
मोहनलाल मौर्य
एक रिपोर्ट के मुताबिक राजस्थान में वर्ष 2015 में 2215 महिला पुलिसकर्मी सूबे के 861 थानों पर तैनात थी। वही सूबे में होने वाले
महिलाओं के खिलाफ अपराध पर दृष्टि डालें, तो पुराने आंकडे ही चौंकाते है। फ़िर ऐसे में आज के परिवेश में महिला सुरक्षा
की सूबे में क्या स्थिति होगी, इसका अंदाजा 2012
के आंकड़ों से
लगाया जा सकता है। सूबे में 2012 में बलात्कार के दो हज़ार से अधिक मामले दर्ज हुए, तो 2014 में लगभग 3800। ऐसे में राज्य पुलिस औऱ स्टेट क्राइम
रिकॉर्ड ब्यूरो की सार्थक पहल सारथी अभियान बालिकओं को पुलिस के क्षेत्र में आने
के लिए प्रोत्साहित करने का बेहतर जरिया हो सकता है। जो जयपुर में महिला दिवस के
मौके पर चर्चित, दबंग आईपीएस अधिकारी पंकज चौधरी के नेतृत्व में शुरू होगा। इस
सारथी अभियान का मुख्य उद्देश्य बालिकाओं को पुलिस प्रशिक्षण देना है। जिसमें
अनुमान के मुताबिक सूबे की लाखों महिलाएं और बालिकाएं हिस्सेदारी लेंगी। यह सारथी
टीम जहां पुलिस बल के कार्यों के बारे में इस अभियान के माध्यम से समझाएगी। वहीं
सूबे के लोगों औऱ पुलिस बल के बीच सामंजस्य स्थापित करने का कार्य भी करेंगी।
इसके साथ 2014 की रिपोर्ट के मुताबिक देश में महिला
पुलिसकर्मियों की संख्या काफी कम है। जो चिंताजनक स्थिति बयां करती है। 2014 की रिपोर्ट के अनुसार देश में कुल 17,22,786 पुलिस कर्मियों में से महिला पुलिस कर्मियों
की संख्या सिर्फ़ 6.11
फीसदी है। फ़िर
ऐसे में महिला सशक्तिकरण की बात धरातल पर कैसे आ सकती है। विचारणीय तब यह स्थिति
ओर व्यापक हो जाती है,
जब पता चलता है, महाराष्ट्र के साथ ओड़िशा, मध्यप्रदेश, तमिलनाडु,
राजस्थान, गुजरात, सिक्किम,
झारखण्ड औऱ
त्रिपुरा जैसे राज्यों में महिलाओं के लिए 30 फ़ीसद या उससे अधिक का पद आरक्षित है। फ़िर हमारी रहनुमाई व्यवस्था इस बात का
आंकलन क्यों नहीं करती,
कि क्या कारण
है। जिसकी वज़ह से महिलाओं की संख्या इतनी पुलिस बल में कम क्यों है। जो महिलाएं
खुद पुलिस में है,
वो जब ख़ुद मानती
है,
कि महिलाएं
पुलिस बल में भर्ती नहीं होना चाहतीं, तो इसका कारण सरकारें पता क्यों नहीं करती। पुलिस में कार्यरत महिलाओं के बीच
किए जाने वाले सर्वे में यह निष्कर्ष निकलता रहता है, कि महिलाएं पुलिस बल में भर्ती होने से इसलिए
कतराती है,
क्योंकि उन्हें
टॉयलेट जैसी मूलभूत सुविधा के अभाव आदि का सामना करना पड़ता है। इसके साथ अन्य कारण
भी महिलाओं को पुलिसकर्मी बनने से रोकते हैं। साथ में महिला पुलिसकर्मियों को
लैंगिक भेदभाव का सामना करना पड़ता है। तो अगर राजस्थान के जयपुर से महिलाओं और
बालिकाओं को पुलिस प्रशिक्षण देने की शुरुआत आगामी 8 मार्च से हो रहीं है। तो
क्यों न सूबे से ही ऐसी अलख निकले जिससे देश भर में पुलिस बल में महिलाओं की
संख्या बढ़ाई जा सकें। अगर महिलाओं की संख्या बढ़ेगी, तो महिलाओं के प्रति अपराध भी कम होंगे, साथ में सूबे की आधी आबादी को अपने आप पर घटित आपबीती सुनाने में दिक्कत। तो
अगर सारथी अभियान के माध्यम से सीधा संवाद अवाम से स्थापित करवाने का माध्यम
लड़कियां बनेगी,
तो उनको ज्ञान
तो पुलिस भर्ती की बारीकियों का भी मिलना चाहिए, लेकिन अगर सारथी पहल के माध्यम से लाखों लड़कियां औऱ महिलाएं वालेंटियर्स के
रूप में पुलिस और लोगों से जुड़ेंगी, तो यह भी सूबे की आधी आबादी के लिए गर्व की बात है। सारथी टीम व इसके संरक्षक
दबंग आईपीएस पंकज चौधरी न सिर्फ प्रशंसा के पात्र है बल्कि एक नये युग का आगाज भी
करने वाले है।
29 Jan 2018
मां आखिर मां होती है!
मोहनलाल मौर्य
बच्चा ठोकर खाकर गिर जाए
तो मां सौ काम छोड़कर उठाने दौड़ती है। भागकर उठाती है और सीने से लगा लेती है।
देखती है कहीं चोट तो नहीं आई। संतान के खरोंच भी आ जाए तो मां का दिल दहल उठता
है। मां की ममता निर्मल है। दया,करूणा की सागर है। मां आखिर मां होती है। चाहे सौतेली मां
हो। चाहे धरती मां हो। मां का वात्सल्य अपनी संतान पर सदैव न्यौछावर रहता है। मां आखिर मां होती है
धरती मां भी धरती पुत्र
से अगाथ प्रेम करती है। जिस तरह मां बच्चे को नौ महिने कोख में पालती है और जन्म
देती है। उसी तरह धरती मां भी धरती पुत्र की फसल को अपनी कोख में पाल-पोसकर बड़ी
करती है। धरती मां फसल बुवाई से लेकर कटाई तक। फसल की उसी तरह देखभाल करती है। जिस
तरह एक मां अपने नवजात बच्चे की करती है। जब बच्चा रोता है तो मां उसे स्तनपान
कराती है। उसे लोरी सुनाती है और जब बच्चा सो जाता है तो अपने गृहस्थी के कार्यों
में जुट जाती है। इसी तरह धरती मां फसल को प्यास लगती है,तो पानी पिलाती
है। भूख लगती है,तो खाद पदार्थ से
पेट भरती है। आड़ी-तिरछी पड़ जाती है,तो आहिस्ता-आहिस्ता उठाती है और अपने आंचल में लपेटकर रखती
है। मां के आंचल तले फसल भी को भी सुकून का अहसास होता है।
लेकिन जब अतिवृष्टि,ओलावृष्टि,अकाल से फसल चौपट
होती है। तब धरती मां का कलेजा मुंह में आ जाता है। अपनी आंखों के सामने चौपट होती
फसल और पुत्र की हालात देखकर धरती मां भी,अपनी मां की तरह विलाप में डूब जाती है। धरतीपुत्र चौपट हुई
फसल की खातिर मुआवजे की मांग करता है,तो या तो गोली खानी पड़ती है या फिर लाठी चार्ज से भेंट
होती है। यह देखकर मां पर क्या बीतती है। यह तो मां ही जानती है। मां आखिर मां
होती है। मां आखिर मां होती है
अपने आंखों के सम्मुख
पुत्र को तड़फता देखकर किस मां का कलेजा नहीं फटेगा। फिर यह तो धरती पुत्र है,जो कड़ी मेहनत
करके हमारे लिए अनाज पैदा करता है। बेचारा दिन-रात जागता है और फिर भी फसल का भाव
न्यूनतम मिलता है। न्यूनतम भाव से खुद की पूर्ति नहीं होती। सेठ-साहूकार और बैंक
का कर्ज कैसे चूकता करें। ऐसी स्थिति में साल दर साल कर्ज पर कर्ज चढ़ता रहता है
और एक दिन धरती पुत्र कर्ज तले दब जाता है। कर्ज तले दबे पुत्र को मां निकल नहीं
पाती है। यह मलाल मां के सीने में ताउम्र दबा रहता है।
धरतीपुत्र भी खुशहाल
जिंदगी जीना चाहता है। पर कर्ज का भार उठा नहीं पाता है। खुदकुशी का रास्ता जब वह
अपनाता है। तब धरती मां खून की आंसू रोती है। मां की सेवा-सत्कार करने वाला बेटा,जब आत्महत्या
करता है या कर्ज तले दबकर मरता है,तो उस मां पर क्या गुजरती है। उस मां से बेहतर कौन जानता
होगा। मां आखिर मां होती है।
5 Sept 2017
कभी नहीं घटे,शिक्षक का आदर-सत्कार
शिक्षक का
नाम मन-मस्तिष्क में आते ही हमारे समाज में एक अलग रूपरेखा निर्मित हो जाती है।
शिक्षक समाज, देश का पथप्रदर्शक होता है। एक शिक्षक देश को बना सकता है, तो देश का विनाश भी कर सकता है। देश का भविष्य कैसा होगा, यह शिक्षकों के हाथों में समाहित होता है। गुरु का स्थान
हमारे पुरातन संस्कृति में भगवान से बढ़कर बताया गया है। तभी तो यह उक्ति प्रचलित
है, गुरु गोविंद दो खड़े, काके लागु
पाय,बलिहारी गुरु आपसे गोविंद देऊ बताए।शिक्षक घर,परिवार,समाज में
आदरणीय व सम्माननीय स्थान रखता है। माता-पिता के बाद शिक्षक ही बच्चों के भविष्य
का निर्माण करता है। छात्रों को अच्छे संस्कार से अवगत कराता है। एक गुरु की तुलना
हम एक कुम्हार और जौहरी से कर सकते हैं। जिस प्रकार एक कुम्हार बिखरी हुई मिट्टी
को समायोजित करते हुए उसे घड़े का आकार देता है, वहीं काम एक
शिक्षक समाज और देश के लिए करता है। बड़ों के प्रति आदर-सत्कार व सेवा-भावना
की प्रेरणा शिक्षक से ही मिलती हैं। एक शिक्षक की दृष्टि में सभी छात्र समान
होते हैं, और वह सभी का भला चाहता है। वह अपने शिष्यों को सही-गलत व
अच्छे-बुरे की पहचान करवाते हुए उनकी नींव मजबूत करता हैं और उन्हें एक साचे में ढालकर
कामयाबी की सीढ़ी तक पहुंचाता हैं। ताकि वे अपने मंजिल तक पहुंच जाएं। किताबी
ज्ञान के साथ नैतिकता की शिक्षा देकर अच्छे चरित्र का निर्माण करता है।
शिक्षक की तुलना उस संचालक से की जा सकती है,जिसके बिना
जीवन रूपी गाड़ी का कोई औचित्य नहीं। जिस प्रकार महंगी से महंगी गाड़ी, बिना संचालक के बैलगाड़ी के समतुल्य है, उसी तरह बिना गुरु के जीवन का कोई सार्थक मूल्य नहीं। लेकिन
वर्तमान परिवेश में शिक्षा जगत व्यापार बन गया है। गुरु-शिष्य के बीच वे संबंध अब
नही रहे, जो गुरुकुल परम्परा या प्राचीन समय में थे। आज के कई शिष्य
तो अपने शिक्षक के चरण छूने में भी शर्म महसूस करते हैं, तो कई शिक्षक भी अपने छात्रों का शारीरिक और मानसिक शोषण
करते हैं। दूसरे अर्थों में आज गुरु-शिष्य की वास्तविक परिकल्पना ही नज़र नहीं आती।
शिक्षक भी जब शिष्य के स्तर पर आकर छात्रों से व्यवहार करने लगते हैं, फिर उनकी व्यवहारिकता और प्रभावित होने लगती है। आज अगर गुरु-शिष्य
का संबंध मात्र किताबी ज्ञान तक सीमित रह गया है। तो यह रवायत भी सही नहीं है।
सभ्य समाज में गुरु को ईश्वर से भी बड़ा माना गया हैं। वह परम्परा समाज से गुम
नहीं होनी चाहिए। एकलव्य ने द्रोणाचार्य को अपना गुरु मानकर उनकी मूर्ति को अपने
सक्षम रख धनुर्विद्या सीखी, लेकिन आज न द्रोण जैसे शिक्षक है, और न ही एकलव्य जैसे छात्र। आज तो छात्र शिक्षा को खरीदी
जाने वाली वस्तु, और शिक्षक ने शिक्षा को व्यवसाय बना दिया है। किंतु इन सब
के इतर आज भी हमारे समाज में ऐसे शिक्षक हैं। जिन्होंने हमेशा समाज के सामने एक
अनुकरणीय मिशाल पेश किया है। जिनकी हम जितनी सराहना करें, वह कम ही होगी।
देश के द्वितीय राष्ट्रपति डा.सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्म
दिवस के उपलक्ष्य में मनाया जाने वाला शिक्षक दिवस हर वर्ष 5 सितम्बर को एक पर्व की तरह
मनाया जाता है। जो शिक्षक समुदाय की गरिमा को बढ़ाता है। भारत में प्राचीन काल से
ही गुरु-शिष्य की परम्परा चली आ रही है। जो आज भी विद्यमान है। लेकिन अब धन के बल
पर शिक्षा लेने और देने का कारोबार फल-फूल रहा है। जिसमें ज्ञान अर्जित नहीं होता,बल्कि परीक्षा में उत्तीर्ण
होने के फार्मूलों के साथ रटाया जा रहा है। बदलते समय के मुताबिक जरूरत किताबी ज्ञान
के साथ व्यवहारिक,सुसंस्कारी,मनोवैज्ञानिक ज्ञान की शिक्षा
देने की है। जिससे आज के छात्र में भारतीय सभ्यता और संस्कृति का भी
अंतर्भाव रहे। इसके अलावा
शिक्षक दिवस पर अपने टीचर को गुलाब का पुष्प या कोई उपहार देने से बढ़कर हैं, आज की छात्र पीढ़ी उनका आदर-सम्मान
करें, और उनके द्वारा बताएं गए मार्ग
पर चले। तब शिक्षक दिवस मनाने का महत्त्व अधिक सार्थक सिद्ध होगा। क्योंकि टीचर का
संबंध केवल शिक्षा तक ही सीमित नहीं है। बल्कि वह तो हर मोड़ पर अपने शिष्य का हाथ
थामने के लिए आमादा रहता है।
जहां कहीं भी शिष्य विचलित
होता है या अपनी राह से भटकर दूसरी राह पर चलने लगता है। तब टीचर को बहुत दुख होता
है। क्योंकि उसके द्वारा,जो बीज
रोपकर पौधा धीरे-धीरे पेड़ बनने के लिए आमादा था। वह पेड़ बनने से पूर्व टूटने के
कगार होता है तब सबसे ज्यादा दुख टीचर को ही होता है। इसी स्थिति में
उसी पथ पर वापस लाले के लिए शिष्य को अपने पास बुलाता है और समझाता है। जीवन में
आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है और यह एक शिक्षक का कर्तव्य भी है। कई बार शिक्षक अपने शिष्यों
को डांट-फटकार देता है, तो कई छात्र कुपित हो जाते हैं। छात्र कुपित होने की बजाय
यह जानने की कोशिश करें कि उसने क्या गलती की है? जो टीचर ने मुझे डांटा है। साथ
ही साथ आज गुरु- शिष्य की परम्परा को पुनर्जन्म की आवश्यकता भी है,जिससे समाज को सही दिशा मिल
सके। शिक्षा मात्र पठन और पाठन का जरिया न रहकर, आपसी स्नेह, और विचारों के प्रवाह की धारा
बन सके, जो आज टूटता दिख रहा है। उसे
टूटने से बचाया जाए।
6 Jun 2017
पर्यावरण संरक्षित खुद के बदलने से संभव
हर वर्ष पांच जून को हम
विश्व पर्यावरण दिवस मनाते हैं और पर्यावरण के प्रति चिंता जाहिर करते हैं।
विचार-विमर्श करते हैं। लोगों में जागरूता लाने के लिए रैलियां निकालते हैं। लेकिन
खुद इस दिन के अगले दिन ही भूल जाते हैं। जबकि बचाव और बदलाव खुद के बदलने से ही
संभव है। जब तक खुद आगे आकर पहल नहीं करेगें तो दूसरा कैसे करेंगा। यह सोचनीय और
विचारणीय प्रश्र है। जिसका उत्तर किसी ओर के पास नहीं है। बल्कि खुद के पास ही है।
लेकिन हमारी मानसिकता होती है कि मेरे अकेले से क्या होगा? यह सोचकर कदम
पीछे रख लेते हैं। लेकिन अब हमें कदम आगे बढ़ना होगा है। प्रकृति ने हमको जीवन
दिया। जीने का अधिकार दिया है। हमारे साथ उन तमाम जीव-जन्तुओं को भी जीवन दिया है,जो प्रकृति पर ही
निर्भर हैं। पर समझ से परे है कि मनुष्य को पता भी है कि पर्यावरण है तो जीवन है।
उसके बावजूद भी अपने स्वार्थ की खातिर प्रकृति से खिलवाड़ कर रहा है। प्रकृति से
खिलवाड़ करना खुद पर कुठाराघात करना हैं। अब भी वक्त हैं बिगड़ते पर्यावरण को
संरक्षित करने का। अगर अब भी नहीं चेते तो समझों विनाश भी नजदीक ही है।
आज हम बिगड़ते पर्यावरण
के कारण,जो संकट झेल रहे
हैं। उनसे हम सब अच्छी तरह से वाकिफ हैं। जल रसातल में पहुंच गया। पीने योग्य पानी
नहीं बचा है। वायु दूषित हो रही है। श्वास लेने भी लकलीफ होती। स्वार्थलिप्सा की
कुल्हाड़ी पेड़-पौधों पर इस कधर चल रही है कि जंगल के जंगल विलुप्त हो रहे हैं।
जीवनदायिनी नदियां मिटने के कगार पर हैं। पहाड़ ध्वस्त हो गए है। ग्लोबल वार्मिंग
बढ़ता जा रहा है। इत्ता ही नहीं विकास के नाम पर भी पर्यावरण का विनाश हो रहा है।
विकास की राह में जो भी पर्यावरण संसाधन आ रहे हैं उन्हें बचाने के बजाय उनका
नेस्तनाबूद कर रहे हैं। जबकि जल,जंगल,नदियां,पहाड़ के बिना जीवन अधूरा है।
रोजमर्रा के कार्यों में
हम ऐसे कृत्य करते हैं,जिससे पर्यावरण
दूषित होता है। घर का कूड़ा-कचरा पड़ोसी की ओर सरका देते और पड़ोसी अपनी ओर सरका
देता है। जिससे मृदा प्रदूषण फैलता है और मक्खी,मच्छर पनपते हैं। अपने आस-पास मच्छर पनपने का
अभिप्राय है,मलेरिया,डेंगू,चिकनगुनिया,जैसी जानलेवा
बीमारियों को बढ़ावा देना। पड़ोसी की ओर कूड़ा-कचरा सरकाने की बजाय अपना एवं अपने
आस-पास कूड़े के लगे ढेर को जला दे। जिससे अपने आस-पास स्वच्छता होगी और प्रदूषण
भी नहीं फैलेगा। हम सब करने लग जाए,तो पर्यावरण कितना संरक्षित हो सकता है। इसका
आकलन आप खुद कर सकते हैं।
इसी तरह पॉलिथीन के बढ़ते
प्रभाव पर नियंत्रण करना होगा। क्योंकि हम साग,सब्जी,फल व अन्य वस्तुओं के साथ जो पॉलिथीन ला रहे हैं। उसी
पॉलिथीन का बहुतायत में दुरुपयोग होता है। हम सामान तो रख लेते हैं और पॉलिथीन को
घर से बाहर फेंक देते हैं। जो पर्यावरण के साथ-साथ पशुओं के लिए भी नुकसान दायक
है। यह नष्ट न होने की वजह से भूमि की उर्वरता क्षमता को भी कम करती है। इसके
जलाने से निकलने वाली धुआं ओजोन परत को क्षति पहुंचा रही है। जिससे ग्लोबल वार्मिग
एक बड़ा कारण है। इसके कचरे के जलाने से कार्बन मोनोऑक्साइड व कार्बन डाईऑक्साइड
जैसी विषैली गैस उत्सर्जित होती हैं। अगर पॉलिथीन का पूर्णतया उपयोग बंद हो जाए तो
पर्यावरण तो संरक्षित होगा ही,साथ में पॉलिथीने से होने वाला दुष्प्रभावों से भी बचाव
होगा।
आज सबसे महत्ती आवश्यकता
है बहुतायत में पेड़-पौधे लगाने की। क्योंकि जितने अधिक पेड़-पौधे होंगे। उतना ही
पर्यावरण संरक्षित होगा। इसके लिए हमें कुछ अलहदा करना होगा। जैसे कि जन्मदिन,शादी में उपहार
के साथ एक पौधा देने की रवायत भी बना ले तो आने वाले समय में पर्यावरण को बचाया जा
सकता है। उपहार में मिले पौधे को लगाना और उसकी देखभाल करना एक बच्चे के पालन-पोषण
के समतुल्य है। एक पौधे का ख्याल भी अपने बच्चे की तरह करेंगे तो वह पौधा एक दिन
पेड़ का रूप धारण करके हमें वह सब प्रदान करेंगा। जिसकी हमें अपेक्षा रहती है।
बहुतायत पेड़-पौधे होंगे तो हमें शुद्ध वायु मिलेगी। समय पर बारिश होगी। समय पर
बारिश होगी तो जल स्तर ऊपर उठेगा। पेड़-पौधे लगाना और उनकी रक्षा करना मनुष्य के
हाथ में ही है। इसमें लागत और श्रम की आवश्यकता नहीं होती है। बस समय पर देखभाल
करनी होती है।
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