4 Jan 2017

स्ट्रीट लाइट का फ्यूज चिंतन

लो एक-दूसरे से पूछ रहे हैं। फ्यूज कैसे हुईकिसी ने फ्यूज कर दिया या फिर अपने आप हो गई। फ्यूज हुई है या खराब। अभी तक इसका पुष्टिकरण होना शेष है। अभी तो फ्यूज ही मानकर चल रहे हैं। उस दिन भी इस तरह की बात हो रही थी। जिस दिन विद्युत पोल के संग रिश्ता जुड़ा था। तब भी सब अपना-अपना राग अपनी-अपनी ढपली बजा रहे थे। वह भी रहित लय,सुर,ताल मिलाए। एक जनाब! कह रहा था कि लाइट की रोशनी चहंूओर फैले। इस तरह से मुंह करना। दूसरा कह रहा था कि इसकी रोशनी सिर्फ ओर सिर्फ रोड़ पर आनी चाहिए। नेताजी कह रहा था कि भैया इस तरह से लगाओं की इसकी रोशनी से सबके घर रोशन हो जाएं। इन सबकी बात सुनकर स्ट्रीट लाइट लगाने वाला कन्फ्यूज हो गया था। बड़ी मुश्किल से लगाकर गया था,बेचारा।

लो जी! अध्यक्ष जी गए। यह कहकर किसी ने सबका ध्यान खींचा। अध्यक्ष जी ने आते ही समिति के एक सदस्य से पूछा-‘अरे,भाई! चाय-नाश्ते की व्यवस्था  की है या नहीं। अगर नहीं की है,तो पहले चाय-नाश्ता लेकर आओं।’ एक महाशय बोला- ‘स्ट्रीट लाइट फ्यूज नहीं हुई है,फ्यूज की गई है।’ किसने की है फ्यूज। यह भी तुम जानते होंगे। किसी ने उससे पूछ लिया। उसने उत्तर दिया-‘मुझे क्या पताकिसने की है फ्यूज। मुझे ऐसा प्रतीत हुआ है। इसलिए बोल दिया भाई! वरना मुझे क्या लेना-देना?’ यह सुनकर एक बंधु बोला-‘भाई साहब! लेना-देना कैसे नहीं हैक्या तुम मोहल्ले के वासी नहीं हो?’ इतना सुनकर वह निरूत्तर हो गया।

अल्पाहार के बाद फिर से बैठक प्रारम्भ हुई। इस बार अध्यक्ष जी ने अनुशासनात्मक रवैया अपनाया। हाथ-जोडक़र निवेदन किया और कहा-‘एक-एक आदमी से राय-मशवरा किया जाएंगा। सबके सुझाव रजिस्टर में अंकित किए जाएंगे। उसके उपरांत ही अंतिम निर्णय लेंगे। आपकी क्या राय है?’ सब एक स्वर में बोले यह ठीक है। किसी ने तर्क दिया तो किसी ने विर्तक दिया। एक महाशय ने अपना ही दुखड़ा रो दिया। पत्नी से हुई अनबन की कहानी सुना दिया। स्ट्रीट लाइट फ्यूज क्या हुईउसकी पत्नी ने उसका जीना हराम कर रखा है। बोलता है स्ट्रीट लाइट जलती थी,तो मेरे आंगन में रोशनी खिलती थी। जिससे हमारे एकाध बल्ब जलने से बच जाते थे और लाइट की बचत होती थी। यह सुनकर लोगों को हंसी गई। लेकिन एक नवयुवक ताव में आकर बोला-‘अध्यक्ष जी! भाषण-बाजी ही होती रहेगी। या फिर स्ट्रीट लाइट को दुरुस्त कराने की भी सोचेंगे।अध्यक्ष जी बड़ी शालीनता से बोले-‘भैया धैर्य रखों। उस संदर्भ में ही मीटिंग की है।अध्यक्ष जी की बात पूर्ण भी नहीं हुई थी कि  एक प्रश्न उछलकर आया। ‘लगता है होना-जाना तो कुछ है नहीं। स्ट्रीट लाइट को फ्यूज ही रहने दो। फ्यूज रहने से कम-से-कम मक्खी-मच्छर तो नहीं होंगे।
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15 Dec 2016

लक्ष्‍मी एक जगह कहां टिकी है ?


एक हजार  500 का नोट नोट नहीं। उनका अन्नदाता था। जो आठ तारीख को चल बसा। प्रधान सेवक कि लीला है,जो बैंक के ग्रास में समा गए। इन दोनों के जाने से इनके परिवार में सन्नाटा छाया हुआ।10,20,50,100 रूपए की स्थिति दयनीय हो गई। यह भी क्या करें नियति का  फैसला तो सिर छुकाकर स्वीकार करना ही पड़ता है। विधि का विधान व नियति के निर्णय से भला कोई बचा है,जो यह बचते। इन्होंने जो त्याग व बलिदान किया है। वह स्मरणीय रहेगा।

पर 1000  5000 की आत्मा को चिर शान्ति तबी मिलेगी। जब इनकी बिरादरी के वे नोट,जो तिजोरी,अलमारी में बंद हैं और वे बैंकलोक तक नहीं पहुंचे हैं। उनकी आत्मा भटक सकती हैं। वे भूत पिशाच बन सकते हैं। फिर यह उन्हीं पर मंडराएंगे। जिन्होंने बैंकलोक नहीं पहुंचाया। पड़ोसी वर्माजी के पास भी एक दशक से 1000 जाति का 786 नामक नोट रखा था। आपातकाल में भी उपयोग नहीं किया। वर्माजी का बाप मरा,तब 1000रूपए की सक्त आवश्यकता थी। पर,वर्माजी ने पूजाघर से बाहर नहीं निकाला। वर्माजी बताते है कि 786 का नोट शुभदायक रहता है। लेकिन आठ तारीख को यहीं शुभदायक नोट दुखदायकता में बदल गया। वर्माजी दुखद तो हुए, पर,उन्होंने पूरे अदब से बैंकलोक पहुंचाया,ताकि उसकी आत्मा को चिर शान्ति मिले। कोई कालाधन कहकर बदनाम नहीं करें। अगर उसे शांति नहीं मिलेगी,तो पता नहीं उसकी आत्‍मा कहां कहां भटकेगी और किस किस को परेशान करेगी । क्‍या पता नए वाले गुलाबी नोट पर ही जा चढ़े।
सृष्टि का नियम है। जो जहां से आया है, वह वहीं जाएंगा। फिर इतना कोलाहल क्योंकतार में हुज्जत क्योंइनके जाने के गम में वे दुखी क्योंलगता है ये लक्ष्मी के परम भक्त है। पर इन भक्तों को कौन बताए कि लक्ष्मी तो चंचल है। एक जगह कहां टिकती है। कभी यहां तो कभी वहां। तिजोरी,अलमारी में इसका भी दम घुटता है। अगरबत्ती की सुवास से इसके नुथने फूल जाते हैं।

तू सोच मत। तर्क-वितर्क मत कर। जा और जाकर लाइन में लग। इनदिनों वहां लक्ष्मी के दशर्न ही नहीं हो रहे, बल्कि ज्ञानदेवी भी अपना ज्ञान प्रवाह कर रही है।  तू भी अपना ज्ञान आदान-प्रदान कर और ज्ञानदेवी का परम भक्त होने का अहसास करा। हो सकता हैतेरे ज्ञान प्रवाह से किसी के ज्ञान चक्षु खुल जाए। तेरा नम्बर उससे पहले आ जाए। एटीएम देव की कृपा हो जाए। यहां कुछ नहीं है,जो है वह लाइन में है। हो सकता बचपन में पिछड़ा,तेरा मित्र ही मिल जाए। सोनम गुप्ता बेवफा है’ वह लडक़ी ही दिख जाए। अब तू यहीं बक-बक करता रहेगा या फिर जाकर लाइन में भी लगेगा। अब ओर विलंब मत कर। जाकर लाइन में लग जा। लाइन में तुझे जो सुकून मिलेगा, वह किसी धार्मिक स्‍थल पर जाने से भी नहीं मिलेगा। जा सुख का आनंद ले।

11 Dec 2016

मेरे अरमान कब पूरे होंगे

बस,बहुत हो गया। अब और सहन नहीं होता। यह भी कोई जीना है। जिसमें ऐशो-आराम हराम है। न मद्यपान न धूम्रपान है। सिर्फ सुनसान है। दो दिन की जिंदगी और चार दिन की चांदनी है। दो दिन तो आने-जाने में निकल जाते हैं। एक दिन आने का और एक दिन जाने का। बची चार दिन की चांदनी। वे भी इधर-उधर के कार्यों में यूं ही कट जाती हैं। यह वक्तव्य मेरे परम मित्र बिट्टू का है। एकाध दिन से वह कुछ इस तरह के दुखड़े गा रहा हैं। कहता है कि यार! लोग खुले आसमान तले उन्मुक्त उड़ रहे हैं। उन्हें देखकर मेरा भी मन करता है। उनकी तरह उड़ान भरने का। जब भी उड़ान भरने को आमादा होता हूं,तो घरवाले पर पकड़ लेते हैं। फडफ़ड़ाता हूं,तो पर काटने दौड़ते हैं। बात-बात पर नसीहत देते हैं। नहीं कहीं जाने देते है और ना कुछ ऐसा-वैसा खाने-पीने देते हैं। यहां,वहां जाने से बीमार हो जाएंगा। यह,वह खाने-पीने से पेट खराब हो जाएंगा। इस तरह के प्रवचन सुनाते हैं। अब तू ही बता,जो व्यक्ति बीमार ही होगा। वह घर बैठे भी होगा। नहीं होगा,तो कहीं पर भी आने-जाने से नहीं होगा। इसी तरह पेट खराब होना होगा,तो ऐसा-वैसा खाना-पीना खाएं बिना भी होगा। शरीर तो नश्वर है। क्रिया-प्रतिक्रिया तो होती रहती है।

देश कब का स्वतंत्र हो गया। पर,मेरी स्वतंत्रता पर अब भी आपका आधिपत्य है। जबकि मैं तो 18 उम्र भी क्रॉस कर गया हूं और मुझे वोट डालने का अधिकार भी मिल गया है। निर्वाचन आयोग द्वारा जारी बाकायदा पहचान पत्र भी है। जब सरकार ने सरकार चुनने का अधिकार दे दिया। तो घरवाले क्यों नहीं समझतेलडक़े के भी कुछ अरमान है। जिन पर मोहर लगाने का अधिकार खुद के हैं। मेरे अरमानों का प्रचार-प्रसार नहीं करने दे,तो कम से कम गोपनीयता पर ही ठप्पा लगा दे। जिससे मेरी जीत तो सुनिश्चित हो जाएंगी। मन में मन मसोस कर जीने का खयाल तो बार-बार नहीं आएंगा। मैं भी तो आज का नवयुवक हूं। और आज के नवयुवकों की तरह़ जीना मेरा भी आधिपत्य है। ये दिल फैशन,हेयर स्टाइल,स्मार्ट मोबाइल मांगता है। बाइक होतो सोने में सुहाग है। यहीं तो पर्सनल्टी के साधन हैं। जिनके उपयोग से बेहतरीन पर्सनल्टी दिखती है। आज के युग में जो दिखता है,वहीं बिकता है। जिस दिन यह सब प्राप्त हो गया। उस दिन से मेरा भी फेसबुक,वाट्सएप,ट्विटर,इंस्टाग्राम पर अकाउंट होगा। नये-नये फेंरड्स होंगे। रोज अलग-अलग ऐंगल से सेल्फी लेकर अपलोड करूंगा। पर,क्या मेरे अरमान पूरे होंगेकहते है कि सच्चा मित्र वहीं है,जो अपने मित्र की भावनाओं को समझे। हो सके तो उन्हें पूर्ण करने की कोशिश भी करें।
 

मैंने बिट्टू से कहा-देख भाई! बात ऐसी है। तेरी इच्छाओं की पूर्ति संभव है।’ कैसे संभव हैउसने उत्कंठातुरता से पूछा। मैंने कहा- तेरे अरमानों का विधेयक’ घरवालों के सदन में रख। जब विचार-विमर्श हो,तब पक्ष-विपक्ष पर नजर रख। कौन तेरे पक्ष में है और कौन विपक्ष में है। अगर विपक्ष का पलड़ा भारी है,तो पहले उसका वजन कम कर। जब पक्ष का बहुमत पूर्ण हो जाए। तब अपने अरमानों का विधेयक’ सदन में रख और पास करवा ले।’ मित्र यह सुनकर चकित रह गया। बोला यार! वाह! क्या बात कहीं है। मैंने तो यह सोचा ही नहीं था। शुभ कार्य में देरी क्योंआज ही श्रीगणेश करता हूं। अक्सर हम सबके घरवालों की सदन शाम को बैठती हैं। वह भी भोजन के वक्त। क्योंकि इस वक्त सब विराजमान रहते हैं। यहीं सुअवसर होता है,कहने-सुनने और घर,गृहस्थी संबंधी योजनाओं पर विचार-विमर्श करने का। इसी समय घर के नियम,कानून बनते-बिगड़ते हैं। फेरबदल होता है। जिसको जो कहना होता है,वह कहता है। जिसको सुनना होता है,वह चुपचाप सुनता है। जो नहीं कहता है और नहीं सुनता है। वह भोजन करके खिसक लेता है। ऐसा पारिवारिक सदन में ही होता है। क्योंकि यहां दल रहित सरकार होती है। पर,पक्ष-विपक्ष यहां भी होता है।



बिट्टू ने यह सोचकर अपने अरमानों का विधेयक’ सदन में रखा। इस बहाने पक्ष-विपक्ष का बहुमत भी ज्ञात हो जाएंगा। और मेरा विधेयक’ भी पास हो जाएंगा। एक बार तो सबके-सब उसकी तरफ कौतूहल भरी निगाहों से देखें। पहले तो गृहस्वामी ने बात को टालने की कोशिश की। पर,किसी ने दबे स्वर में उसकी मांग जायज बता दी। बस,फिर क्या था?बहस आरंभ हो गई। पक्ष पास करवाने पर जोर देना लगा और विपक्ष स्थगित करवाने पर अड़ गया। जैसे-तैसे करके निम्न सदन में पास हो गया। पर,उच्च सदन में आकर रूक गया। इस सदन में पूर्ण बहुमत नहीं होने से वहीं का वहीं अटका है। बिट्टू मन मसोकर कर कह रहा है कि आखिरकार मेरे अरमान कब पूरे होंगेतुम्हारे पक्ष-प्रतिपक्ष के चक्कर में मुझे क्यों घसीट रहे हो। खुद के मतलब का कोई विधेयक होतो,आनन-फानन में पारित कर लेते हो। कानों-कान किसी को खबर तक नहीं लगने देते हो। क्या यहीं तुम्हारा कानून,कायदा हैमेरी बारी आती है,तो पक्ष-विपक्ष में बंट जाते हो। और मैं तुम्हारा मुंह ताकता रह जाता हूं। आखिरकार मेरा कसूर क्या हैयह तो बताओं! भगवान जानें, बेचारे बिट़टू  के अरमान कब पूरे होंगे

30 Nov 2016

दो हजार का नोट और मेरी दिनचर्या- दैनिक जनवाणी

                     दो हजार का नोट और मेरी दिनचर्या

सुबह जल्दी जगा। बैंक खुलने से पहले लाइन में लगा। तब कहीं जाकर नम्बर आया। कड़ी मशक्कत
से एकमात्र दो हजार का नव नूतन नोट ही मिल पाया। पहले तो सेल्फी ली। फिर उसे लेकर दुकान पर भागा। आवश्यक सामान खरीदने हेतु! ताकि यह गुल्लक में जाएं और वहां से कट-पीटकर सौ-सौ के नोट हाथ में आए। सोचा तो यहीं था। पर, दुकानदार ने दो हजार के नोट की शक्ल देखते ही मना कर दिया। मना तो किया,जो किया। सुझाव और दे दिया। भाई! या तो पूरे दो हजार का सामान ले। या फिर छुट्टे लेकर आ।
वहां से मैं मन मसोस कर चला आया। क्योंकि सुबह से कुछ भी नहीं खाया था। बर्गर खाने का मन हुआ। पर, बर्गर वाले ने बर्गर खिलाने से पहले ही पूछ लिया। छुट्टे तो हैं ना!मैंने कहा- दो हजार का नोट है।’  यह सुनते ही उसने बर्गर जैसा मुंह बना लिया। यहां से सीधा सब्जीमंडी पहुंचा। यहां भी वहीं आलम था। पेट में चूहे कूद रहे थे,यह भी मुझे मालूम था। कचौरी खाने  को जी ललचाने लगा। यहां मैंने चतुराई दिखाई। उसने पूछा- छुट्टे तो हैं ना!मैंने कहा- हां जी! है। आप तो कचौरी दीजिए।उसने कचौरी की प्लेट हाथ में थमाते हुए कहा- पेमेंट कीजिए।मैंने दो हजार का नोट थमाते हुए कहा-यह लीजिए।दो हजार के नोट को देखते कहा-कचौरी वापस कीजिए और यहां से चलते बनिए।
वहां से मैं मुंह लटकाय आ गया। हजामत किए हुए कई दिन हो गए थे। सोचा, क्यों ना दाढ़ी ही करवालु। खाली सीट देखकर उस पर बैठ गया। नाई बोला-पहले सामने जो लिखा हुआ है। उसे पढय़े,फिर बैठए।मैंने गर्दन घुमाई और सामने जो लिखा था,उसे पढ़ा। अभी हम दो हजार व पांच सौ का नया नोट नहीं ले रहे हैं। कृपया हमारी मजबूरी समझए।यह पढक़र मैं चुपचाप ही नाई की दुकान से बाहर आ गया।
चाय पीने की तलब लगी। पर,समस्या वहीं थी। मैंने सोचा,जो होगा सो देखा जाएंगा। चाय तो पीनी है ही। उसने गर्मा-गर्म चाय पिलाई। चाय पीकर मुझे राहत आयी। पर,जब पैसे देने की बारी आयी,तो वह दो हजार को नोट देखकर चाय की तरह उबलने लगा। मैंने उससे कहा-भाई! गर्म क्यों हो रहे हो? पैसे दे तो रहा हूं।वह शांत होते हुए बोला-पैसे तो दे रहे हो। पर, मैं तुम्हे 1995  रूपए कहां से दूं।यह तो शुक्र है,एनवक्त पर पड़ोसी वर्माजी आ गए। और उन्होंने चाय का भुगतान कर दिया।
चाय की दुकान से बाहर निकला ही था कि चप्पल ने धोखा दे दिया। एक चप्पल हाथ में और एक पैर में थी। लडख़ड़ाता हुआ डॉक्टर मोची के पास पहुंचा। इलाज करवाने हेतु। उसने तुरंत दुरुस्त कर दिया। मैंने कहा-कितने रूपए देने है।वह बोला- दो रूपए दे दीजिए भाई!मैं बोला- दो रूपए तो नहीं है। दो हजार का नोट है।मोची बोला- गरीब आदमी के साथ क्यों मजाक कर रहे हो,भाई! नहीं है,तो बाद में दे देना।यह सुनते मैं वहां खिसक लिया। और दो हजार के नोट के चक्कर में दो रूपय उधार छोड़ आया।