21 Nov 2018

ऑफर की लीला


अजी सुनते हो! जरा इधर आइएगा और देखिएगा। आज तो कमाल हो गया! ऐसा सुनहरा ऑफर आया है,जो पहले कभी नहीं आया। श्रीमती के हाथ में अखबार देखकर आंखें फटी रह गई। जो कल तक अखबार पर एक नजर तक नहीं मारती थी। आज  बड़े गौर से एक-एक पन्ने को देख रही है।
मैंने पूछा क्यों चिल्ला रही हो। वह बोली,‘चिल्ला नहीं रही हूं,आप रोज अखबार बांचते हैं। आपने तो बताया नहीं, पर मैंने खुद देख लिया’ ऑफर की लीला
श्रीमती ने एक साड़ी के विज्ञापन पर उंगली रखते हुए कहा,‘यह देखो। विशेष छूट के साथ आकर्षक इनाम और लकी ड्रा अलग से। पहले आइए और पहले पाइए। ऐसा सुनहरा मौका हाथ से निकलने जाए। ऑफर सीमित समय के लिए। शर्तें लागू। अब चलो शॉपिंग करने चलते हैं।
यह फेस्टिवल सीजन है और सीजन में इस तरह की विशेष छूट नहीं लूट होती है। तुम्हारे पास तो एक से बढ़कर एक साड़ी है। फिर कभी देख लेंगे।
फिर कभी नहीं। अभी और इसी वक्त। इतना सुनहरा ऑफर पता नहीं फिर कब आएगा और आएगा भी या नहीं। टालमटोल करने की कोशिश मत करो और जल्दी से तैयार हो जाओ।
ऑफर का क्या है। आते-जाते रहते हैं। शायद कल इससे भी बढ़िया ऑफर जाए।
ऐसे ऑफर बार-बार नहीं आते। एक तो दो साड़ी की खरीद पर एक साड़ी मुफ्त में मिल रही है। ऊपर से सुनिश्चित उपहार अलग से है। हो सकता है ढेर सारे उपहारों की सौगात में से पहला हमारे नाम निकल आए। आप किस्मत तो आजमाते हो नहीं। इसलिए आपको क्या पता, ऑफर किस चिड़िया का नाम है।
अब तुम्हें कैसे समझाऊंअपनी जिद पर अड़ी हो। समझती तो हो नहीं। हर त्योहार पर इस तरह के ऑफर खूब आते हैं और लोग खूब ठगे भी जाते हैं।
मेरे साथ चलना है,तो चलो,मुझे समझाओ मत। मैं अच्छी तरह से समझती हूं। तुम्हें चलना तो है नहीं और मुझे बरगलाने की कोशिश कर रहे हो।
मैं तो कहीं भी नहीं जा रहा हूं। तुम्हें जाना है, तो जाओ।
यह तो मुझे पहले ही पता था कि आप मेरे साथ नहीं चलोगे। यह कहकर वह तैयार होकर चल दी। मैं भी उसके पीछे-पीछे चल दिया। श्रीमती जी आगे-आगे और मैं पीछे-पीछे। वह उसी दुकान पर गई,जिसका अखबार में छपे विज्ञापन में नाम था। 
जाते ही श्रीमती जी ने ऑफर के बारे में पूछा। ऑफर का नाम सुनकर दुकानदार मुस्कुराया और कहा,‘बैठिए बहन जी! यह लो पानी पीजिए।दुकानदार एक से बढ़कर एक साड़ी दिखाता है और हर साड़ी का अलग ऑफर बताता है। हर साड़ी पर अलग ऑफर सुनकर श्रीमती दुविधा में पड़ गई। उनके पल्ले कुछ पड़ ही नहीं रहा था कि फायदा हो कहां रहा है। उलझन सुलझाने के लिए मुझे फोन लगाया और बोली,‘अजी सुनते हो! यहां तो ऑफर की भरमार है। आप जाइए न।
मैंने कहा था ,त्योहार का समय है। ऑफर की भरमार तो होगी ही। अब तुम ही समझो इन ऑफरों की लीला। जल्दी करो, कहीं तुम्हारा ऑफर निकल जाए।कहकर मैंने फोन काट दिया। 


18 Nov 2018

भगत जी, भभूत और भूतनी


भगत जी कि शनिवार की रात भूत-भूतनियों के नाम रहती है। रात को वह उनका साक्षात साक्षात्‍कार लेते हैं। साक्षात्‍कार में अजब-गजब प्रश्न पूछे जाते हैं। अक्‍सर भूत बयानों पर कायम रहते हैं,लेकिन भूतनियां वचन देकर मुकर जाती हैं। भक्‍तगण बताते है कि भगत जी ने ना जाने कितनी भूत-भूतनियों को जीने की राह दिखाई है। उनमें से कई तो अच्छी ज़िंदगी भी जी रही होंगे। लेकिन, पहली बार एक ऐसी भूतनी आई,जो साक्षात्कार देने के बजाय विरोध पर उतर गई। भगत जी को ललकार रही थी। दो-दो हाथ करने के लिए हाथ-पैर पीट रही थी। भगत जी की  वर्षों की तपस्‍या  से बनी प्रतिष्ठा की इमारत को गिराने पर तुली थी। हालाँकि, भगत जी इससे पहले भी तममा भूतनियों को काबू कर चके थे। वे तमाम हथकंड़े जानते हैं,लेकिन इसके आगे सारे हथकंड़े ठंडे पड़ गए।
भगत जीभभूत और भूतनी
भगत जी ने एड़ी से चोटी तक तंत्र-मंत्र फूँक मारे,फिर भी  उसके विरोध के स्वर कम नहीं हुए। दाँत कटकटाते हुए कह रही थी‘तूने या समाज ने यह जो तामझाम खड़ा कर रखा है। इसके आगे समाज झुकता होगा। मैं झुकने वाली नहीं हूँ। अपनी ताकत किसी और को दिखाना। तेरे प्रति लोगों के मन में इज्जत होगी,लेकिन मेरे मन नहीं है। तू क्या समझता है?तेरी गीदड़ धमकियों से डर जाऊंगी। अबे मैं  कोई साधारण भूतनी नहीं,बल्कि नंदन वन की बाघिन भूतनी हूँ। इसलिए दहाड़-दहाड़कर कह रही हूँ। मुझसे पंगा मत ले। वरना गंगा भेज दूंगी।’
भगत जी पहली बार डरे हुए लग रहे थे,लेकिन आभास नहीं हो। इसलिए डराते हुए बोले‘तू मुझे क्या गंगा भेजेगी? तू रूक जरा! तूझे अभी गंगासागर के लोटे में समेटे देता हूं। यह सुनकर भूतनी और भड़क गई,‘बोली ऐसी धमकियां न दे वर्ना अभी तेरे चेले चपाटी और भक्तगणों के सामने तेरा कच्चा चिट्ठा खोलती हूँ।’   
भगत जी भावुकता में बोल दिए‘चल खोल,मेरी पॉल।’  यह सुनकर वह हँसने लगी। आँखों की पुतली चढ़ाते हुए बोली,‘सब के सब कान खोलकर सुन लो। जिसे तुम भगत जी कहते हो। यह कोई और नहीं बल्कि तुम्‍हारे मन के डर का धंधा बनाने वाला व्‍यापारी है। जब भी कोई मरता है। ये खुश होता है। रात को श्मशान में जाकर जश्न मनाता है। दिनभर तुम्‍हारे मन के डर टटोलता है और रात को तुम्‍हें,तुम्‍हारे ही डर से डरता है। यह किसी भूत-भूतनी को मुक्ति नहीं देता है। बल्कि यह तो तुम्‍हारें अंदर के भूत-भूतनियों को तुम्‍हारे सामने लाता है,तुम्‍हें डराता है। यही इसका धंधा है। भूतनी कुछ और बोलती उससे पहले ही अचानक भगत जी को कुछ होने लगा,जैसे भगत जी में भूत आ रहा हो, लोग कुछ समझ पाते उससे पहले भगत जी अपने भूत के साथ अपनी धूनी-भभूत सब छोड़-छाड़ के सर पर पैर रखकर भागते नजर आ रहे थे।

28 Oct 2018

मेरे अरमान कब पूरे होंगें


बस,बहुत हो गया। अब और सहन नहीं होता। यह भी कोई जीना है। जिसमें ऐशों-आराम हराम है। न मद्यपान न धूम्रपान है। सिर्फ सुनसान है। दो दिन की जिंदगी और चार दिन की चाँदनी है। दो दिन तो आने-जाने में निकल जाते हैं। एक दिन आने का और एक दिन जाने का। बची चार दिन की चाँदनी। एक दिन की चाँदनी जिंदगी की भागादौड़ी में और दूसरे दिन की माथाफोड़ी में। तीसरे दिन की हारी-बीमारी में और चौथे दिन की श्मशान की क्यारी में निकल जाती हैं।
लोग खुले आसमान तले उन्मुक्त उड़ रहे हैं। उन्हें देखकर मेरा भी मन करता है। उनकी मानिंद उड़ान भरने का। जब भी उड़ान भरने को आमादा होता हूँ तो घरवाले पर पकड़ लेते हैं। फड़फड़ाता हूँ तो पर काटने दौड़ते हैं। बात-बात पर नसीहत देते हैं। ना ही कहीं जाने देते हैं और ना कुछ खाने-पीने देते हैं।
देश कब का स्वतंत्र हो गया। पर मेरी स्वतंत्रता पर अब भी आधिपत्य है। जबकि मैं तो अठारह की उम्र भी क्रॉस कर गया हूं और मुझे वोट डालने का अधिकार भी मिल गया है। निर्वाचन आयोग द्वारा जारी बाकायदा पहचान पत्र भी है। जब सरकार ने सरकार चुनने का अधिकार दे दिया तो घरवाले क्यों नहीं समझतेलड़के के भी कुछ अरमान हैं। जिन पर मोहर लगाने का अधिकार खुद का है।
मैं भी तो आज का नवयुवक हूं और आज के नवयुवकों की तरह जीना मेरा भी अधिकार है। ये दिल फैशन,हेयर स्टाइल,स्मानर्टफोन मांगता है। बाइक हो तो सोने में सुहागा है। यही तो पर्सनालिटी के साधन हैं। जिनके उपयोग से बेहतरीन पर्सनालिटी दिखती है। आज के युग में जो दिखता है वही बिकता है। जिस दिन यह सब प्राप्त हो गया। उस दिन से मेरा भी फेसबुक,वाट्सएपट्विटरइंस्टाग्राम पर अकाउंट होगा। नए-नए फ्रेंड्स होंगे। रोज अलग-अलग एंगल से सेल्फी लेकर अपलोड करूंगा। लाइक,कमेंट्स बटोरूंगा। पर यह तो तब होगा ना जब मेरे अरमान पूरे होंगे।
अकसर हम सबके घर वालों की सदन शाम को बैठती है। वह भी भोजन के वक्त। क्योंकि इस वक्त सबके वक्तबव्यघ का मत आ जाता हैं। यहीं सुअवसर होता है कहने-सुनने और घर,गृहस्थी संबंधी योजनाएं बनाने का। इसी समय घर के नियम व कानून बनते-बिगड़ते हैं। फेरबदल होता है। जिसको जो कहना होता है वह कहता है। जिसको सुनना होता है वह चुपचाप सुनता है। जो नहीं कहता है और नहीं सुनता है। वह भोजन करके खिसक लेता है। ऐसा पारिवारिक सदन में ही होता है। क्योंकि यहाँ दल रहित सरकार होती है। पर पक्ष-विपक्ष यहाँ भी होता है।
काफी सोच-समझकर मैंने अपने अरमानों का विधेयक सदन में रखा। एक बार तो सबके-सब मेरी तरफ कौतुहल भरी निगाहों से देखें। पहले तो गृहस्वामी ने बात को टालने की कोशिश की। पर किसी ने दबे स्वर में मेरी मांग जायज बता दी। फिर क्या थाबहस आरंभ हो गई। पक्ष पास करवाने पर जोर देना लगा और विपक्ष स्थगित करवाने पर अड़ गया। जैसे-तैसे करके निम्न सदन में पास हो गया। पर उच्च सदन में आकर रुक गया। इस सदन में पूर्ण बहुमत नहीं होने से वहीं का वहीं अटका है।
यहीं हालात उन जनहित विधेयकों के साथ होती है,जो मेरे साथ हो रही है। मैं पूछना चाहता हूँ। मेरे सदन के मुखिया से। तुम्हारे पक्ष-प्रतिपक्ष के चक्कर में मुझे क्यों घसीट रहे होखुद के मतलब का कोई विधेयक होता है तो आनन-फानन में पारित कर लेते हो। कानों-कान किसी को खबर तक नहीं होने देते हो। मेरी बारी आती है तो पक्ष-विपक्ष में बंट जाते हो। ये भेदभाव क्यूँ  क्या यही तुम्हारा कानून-कायदा हैआखिरकार मेरा कसूर क्या हैयह तो बताओं!

7 Oct 2018

कड़ाही नहीं चाहती लड़ाई


कदाचित ही ऐसा कोई घर होगा,जहाँ दो बर्तन परस्पर नहीं टकराते होंगे। पुरानी कहावत भी है कि घर में दो बर्तन होंगे,तो टकराएंगे भी। अक्सर नहीं,तो यदाकदा टकराते होंगे। चकला-बेलन नहीं,तो कटोरी-कटोरी लड़ती होंगी। चिमटा चमचा भिड़ जाते होंगे। थाली प्लेट में तकरार हो जाती होगी। और नहीं तो चम्मच ही टाँग अड़ा देती होगी। नोकझोंक तो बड़े से बड़े घरों के बर्तनों में भी हो जाती है। यह भी सच है कि कई घरों के बर्तनों में सुबह कलह तो शाम को सुलह भी हो जाती हैं।
मेरे पड़ोसी के बर्तन ब्रांडेड होते हुए भी अक्सर टकराते रहते हैं। टकराएंगे तो बजेंगे भी। बजेंगे तो आवाज भी होगी। आवाज होगी तो अडोसी-पड़ोसी भी सुनेंगे। सुनेंगे तो अच्छी-बुरी बातों के संग झूमेंगे भी। झूमेंगे तो गाएंगे भी। फिर चाहे सुर बेसुर ही क्यों ना निकलेतब तक गाते रहेंगे, जब तक आवाज ब्रांडेड के ब्रांड एंबेसडर के कानों तक नहीं पहुँच जाएं। ब्रांड एंबेसडर के कानों तक पहुँचाने का अभिप्राय है कि आपने जिस तरह से इश्तहार में बताया था वैसा नहीं निकला। बतौर गारंटी पीरियड में ही चमक में धमक पड़ रही है। तुम्हारे सभ्य व संस्कार धातु से निर्मित बर्तन को समझाने के डिटर्जेंट से मांजते हैं तो कुपित दाग छोड़ने लगते है।
जिसके बर्तन हैं,उसे कतई गिला-शिकवा नहीं। उसके पड़ोसी इसी चिंता में सूखे जा रहे हैं कि ब्रांडेड,सभ्य व  संस्कार की धातु से निर्मित होने के बावजूद भी बर्तन अक्सर क्यों टकराते व बजते रहते हैंआपसी टकराव की वजह क्या हैबेवजह भेजा फ्राई करने वाले पड़ोसी से अच्छा पड़ोसी वही है,जो अपनी वजह के बजाय पड़ोसी की वजह को ढूंढने में लगा रहता है। यह तो हम भी  जानते हैं बेवजह क्यों बजेंगेकोई ना कोई वजह है तभी तो उनकी चम्मच भी कड़ाही  पर हावी हो जाती है। जबकि कड़ाही आग में जलकर सब बर्तनों का पेट भरती है। फिर भी उनके सारे बर्तन उसी को कोसते रहते हैं। बुरा-भला कहते हैं। इस कड़ाही से तीन और बड़ी कड़ाही हैं,उन्हें कोई कुछ नहीं कहता। यह उनके घर की सबसे छोटी कड़ाही है। आकार-विकार में नहीं। उम्र में छोटी है।
जब से यह आई है,आएदिन गृह युद्ध होता ही रहता है। पर जहाँ से यह आई है,उनके सात पीढ़ी में भी बुराई की 'बू' तक नहीं और इसके सिर पर रोज बुराई का ठीकरा फूटता है। सब्जी जल गई तोसब्जी में पानी ज्यादा हो गया तो,चमचे ने अपना काम ढंग से नहीं किया तो ठीकरा इसी के माथे पर फूटेगा। गनीमत यह है कि कड़ाही लड़ाई नहीं चाहती। अन्यथा अब से पहले रक्त की नदियाँ बह जाती और न जाने कितने ही शूरवीर बर्तन शहीद हो जाते हैं।
कड़ाही को अड़ोसन-पड़ोसन बहकाती भी खूब हैं। अच्छे- खासे लोहे से निर्मित है। फिर भी जुल्म-सितम सह रही है। घुटन भरी जिंदगी जी रही है। यह भी कोई जीना है। बगावत के बाण प्रक्षेपित क्यों नहीं करतीऐसी भी क्या मजबूरी हैजुबानी जंग भी नहीं लड़ती। तेरी जगह हम हो तो जुबानी जंग के दौरान ऐसी बुरी-बुरी गालियों की गोली दागे कि सामने वाले की जुबान लकवा खा जाए। गली-मोहल्ले के तवों से तो यह तक सुना है कि कड़ाही  में ही खोट है। इसीलिए खरी-खोटी सुनती रहती है। 
दरअसल में या तो यह बहुत समझदार है या फिर एक नंबर की बेवकूफ है। बहकाने के बावजूद भी नहीं बहती और ना ही वजह जगजाहिर करती है। बस सुनकर मुस्कुराकर चल देती है। यह इसकी मजबूरी है या खूबी। यह भी रहस्यमय है। इतना बहकाने पर इसकी जगह ओर कोई होती तो अब से पहले सारा कच्चा चिट्ठा खोल देती और मरने मारने पर उतारू हो जाती। भगवान जाने यह किस लोहे की बनी है,जो कि इतना सितम सहने के बावजूद भी कभी लाल-पीली नहीं होती। बस मुस्कुराती रहती है।
कड़ाही  के साथ अक्सर होने वाली लड़ाई की वजह उस दिन सामने आ ही गई। जिस दिन पूरा मोहल्ला इकट्ठा हो गया था और हाथापाई में कड़ाही  का एक हाथ फैक्चर हो गया था। कड़ाही  की सगाई में दहेज नाम का जो ऑफर बताया गया था। वह पूरा नहीं मिला था। इसी वजह से कड़ाही साथ लड़ाई होती हैं। जब उसकी सास के श्रीमुख से यह वजह जगजाहिर हुई तो सब आश्चर्यचकित रह गए। क्योंकि यह वह परिवार हैं,जो कि दहेज न लेने-देने का ढिंढोरा पीटना रहता है। 

19 Sept 2018

भलाई है पत्‍नी से मांगने में क्षमा


सुबह-सुबह ही पत्नी बोली,‘बहुत दिन हो गए मुझे उंगुली पर नचाते हुए। अब मैं बताती हूं। उंगुली पर कैसे नचाते हैकैसे हुकम चलाते हैजरा पास तो आओं।’  उसमे अचानक मां दुर्गा का स्वरूप देखकर,उसके समीप जाने की हिम्‍मत ही नहीं हुई। पता नहीं क्या कर बैठेपत्नी के हाथ में झाडू देखकर शेर की तरह दहाडऩे वाले म्याऊॅ बन जाते हैं। बाहर दादागिरी दिखाने वालेसत्‍यों’ को भी पत्‍नी के आगे मियामियाते हुए देखा है। मेरी तो औकात ही क्या हैजो उसके पास चला जाऊं। पास में चला भी जाता। लेकिन उसके हाथ में झाडू था।
मैं सोच रहा हूं कि मेरी पत्नी की तरह सब भारतीय पत्नियों ने जिस दिन झाडू उठा ली। तब क्या होगाक्या पति ‘हमें पत्नियों से बचाओं’ की तख्ती लिए जन आंदोलन करेंगे। सडक़ पर उतरेंगे। जंतर-मंतर पर धरना देंगे। संसद का घेराव करेंगे।हमें पत्नियों से बचाओं’ हम शामत में है। कहते हुए अपनी बात रखेंगे। धरना-प्रदर्शन कर शाम को घर जाएंगे तो पत्नियां कहेंगी। आए गए हमारे खिलाफ आंदोलन करके। क्या हुआकुछ हुआ। कुछ नहीं होगा। जैसे प्रश्नों की बौछार से पतियों को सराबोर कर देंगी। फिर पति निरुत्तर खड़े रहेंगे। पस्त होकर कहेंगे। तुम्हें जो करना है,करो। लेकिन झाडू मत उठाओं। बेलन मत फेंको। जोर से मत बोलों। पड़ोसी सुन लेगादेख लेगा। आखिर मेरी भी कुछ इज्जत है। खैर यह सब छोड़ो।
मुझे तो अपनी पत्नी से बचने की जुगत सोचना है। इस वक्त उससे कैसे बचाव किया जाएउसके समीप चला तो जाऊं पर,पता नहीं वह क्या फेंक मारे। घर में हर वस्तु का जित्ता उसे पता है उतना मुझे नहीं है। क्योंकि दिन-रात घर,बाहर का कार्य तो वहीं करती है। सुबह पांच बजे उठती है और बारह बजे सोती है। रसोई की तो हर चीज से अच्छी तरह से वाकिफ है। चिमटा,चकला,बेलन,झाडू फेंककर मारने में तो उसका निशाना कभी चूकता ही नहीं है। यह तो मेरी किस्मत अच्छी है कि हर बार मैं बाल-बाल बच जाता हूं। लेकिन इस बार बचने का कोई चांस दिखाई नहीं दे रहा है। सिवाह क्षमा मांगने के। चलो क्षमा मांग कर ही देख लेता हूं। कहते है कि क्षमा मांगना सबसे बड़ी बहादुरी होती। और जब जान बचाने की बात आए तो माफी मांगने में हर्ज ही क्‍या है?
मैं डरता हुआ पत्नी से क्षमा मांगने गया। उसने कहा-अब तब तो मैं यह समझती रही कि भारतीय पत्नियां मेरी तरह ही होगी। पर कल पड़ोसन ने मेरे ज्ञानचक्षु खोल दिए। अब तुम्हें मैं बताती हूं कि पत्नी पर हुकम कैसे चलाते हैएक बार पास में आओं।’ मैंने कहा-देवी! मैं क्षमा चाहता हूं। आज के बाद मैं तुम्हें कुछ नहीं कहूंगा। तुम्हें,जो करना है करो। लेकिन पडोसन से मिल-झोल कम रखिएंगा।

18 Sept 2018

अहा! जिंदगी (दैनिक भास्कर) 09 सितम्बर 2018

अहा! जिंदगी (दैनिक भास्‍कर )09 सितम्‍बर 2018  


आनंदक्रीडा में बीता बचपन


मैं जन्‍म से ही दुबला-पतला था। इसकी पुष्टि उस फोटू से होती है,जो मेरे शैशवकाल की एकमात्र फोटू है। जिसमें मेरी मां और दादाजी कुरसी पर बैठी हुई हैं और मैं मां की गोद में बैठा हुआ शायद कैमरे की ओर निहार रहा हूं। उस वक्‍त मेरी उम्र यहीं कोई साल-डेढ़ साल की रही होगी। मां बताती है कि मैं इतना कमजोर पैदा हुआ था कि अड़ोसी-पड़ोसी यह कहते थे कि यह छोरा तो मुश्किल ही जी पाए। कहते है कि मां की ममता तथा मां के दूध में वह ताकत होती है कि वह निर्बल को भी बलवान बना देती है। इसी ताकत ने मुझे शक्ति प्रदान की और मैं आठवें या नौवें म‍हीनें में ही ठुमक-ठुमक कर चलने लगा।
दस-ग्‍यारह माह की उम्र में एक रोज आंगन में खेलते-खेलते छत पर जा पहुंचा। और वहीं खेलने में मशगूल हो गया। जब मां को मेरा ख्‍याल आया तो मैं नदारद था। इर्द-गिर्द देखा। नहीं मिला। सोचा यहीं-कहीं खेल रहा होगा। गृहस्‍थी के कामकाज में जुट गई। घंटा आध घंटा बाद फिर ख्‍याल आया तो कहीं नहीं दिखा। फिर मां घर से बाहर निकली। अड़ोसी-पड़ोसियों से पूछा। मोहल्‍ले में ढूंढ़ा। लेकिन कहीं नहीं मिला। हताश होकर मां घर लौट आई। एकाएक मां की नज़र मुझे पर गई और मुझे छत पर देखकर आंखे फटी की फटी रह गई। छत पर कैसे चढ़ा? कब चढ़ा? जैसे प्रश्‍न मां के मन में ही कौंधने लगे। मां ने बताया कि उस वक्‍त मैं घबरा गई थी। पकड़ने जाऊं और मुझे देखकर भागने ना लग जाए। अगर भागने लगा तो नीचे आ गिरेगा। यहीं सोचकर मां घबरा गई थी। मां ने सूझबूझ से काम लिया। बिना पदचाप किए धीरे-धीरे छत पर जा पहुंची। पीछे से मुझे जकड़ लिया। जैसे-तैसे गोद में उठाकर मुझे नीचे लेकर आई। तब मां ने राहत की सांस ली। इस घटना के बाद मां ने कभी भी मुझे ओझल नहीं होने दिया।

शैशवकाल के बाद बाल्‍यकाल में मैंने आनंदक्रीड़ा का आनंद लिया। उछलकूद,लम्‍बीकूद,रस्‍सीकूद तो यह मानों कि आंख मूंदकर कूदी। साईकल का टायर दौड़ाने में अग्रगामी था। स्‍कूल की छूट्टी के दिन तो साईकल के टायर की खूब पिटाई करता था। दिनभर हम सब टायर ही पिटने में लगे रहते थे। ये देखकर पिताजी कुपित हो जाते थे। हाथ से टायर छीनकर छप्‍पर पर प्रक्षेपित कर देते थे। और नसीहत से छोली भर देते थे। पढ़ता-लिखता तो है नहीं और दिनभर टायर पिटता रहता है। कमबख्‍त कहीं का। उस वक्‍त तो मैं पिटाई के डर के मारे चुपचाप पढ़ने बैठ जाता था। जैसे ही पिताजी इधर-उधर हुए कि छप्‍पर पर से टायर को उतारने के लिए उतावला रहता था। जैसे ही मौका मिलता उतार लेता था। छप्‍पर पर चढ़ने उतरने में मददगार नीम का पेड़ था। जो‍ कि छप्‍पर के पास मौजूद था। 
एक बार तो मैं बाल-बाल ही बचा। हुआ यूं कि नीम की जिस डाली को पकड़कर छप्‍पर पर उतर रहा था वह डाली टूट गई और मैं सीधे नीचे आ थमा। गनीमत यह रही कि मुझे खंरोच तक नहीं आई। अन्‍यथा खंरोच पर मरहम पट्टी की जगह पापाजी से फटकार की मरहम पट्टी बांधनी पड़ती। और टायर छप्‍पर के बजाया कुंए में प्रक्षेपित होता। या फिर कई दिनों तक टायर पिटने से महरूम होना पड़ता।
गिल्‍ली डंडा,लुका-छिपी,सतोलिया,कंचा भी बारी-बारी से खेलता था। यह सब खेल मेरे प्रिय खेल थे। कंचा खेलने में तो मैं उस्‍ताद था। मकर संक्रांति के दिनों में तो पेंट की दोनों जेब कंचों से भरी रहती थी। पतंगबाज़ी का तो इत्‍ता उन्‍माद था कि कठाके की सर्दी में भी पेंच लड़ाने में पहुंच जाता था। यह देखकर कठाके की सर्दी भी छुमंतर हो लेती थी। शहरों की मानिंद हम छत पर पेंच नहीं लड़ाते थे। खेत खलियानों में ही पतंग की डोर खींचते थे। एक बार घर से पतंग लेकर निकल गए तो शाम को ही वापस लौटते थे।

बचपन में खेलते-कूदते खेत-खलियानों में घूमते वक्‍त नीम व पीपल के पेड़ के कोटर से तोते के बच्‍चे पकड़कर घर ले आता था। कभी पिल्‍ला पकड़कर ले आता था। लेकिन कोई भी तोता का बच्‍चा सप्‍ताह भर से ज्‍यादा दिन का मेहमान नहीं रहा। नहीं रहने के पीछे दो ही कारण थे। पहला- बिल्‍ली नहीं रहने देती थी। पकड़कर खा जाती थी। दूसरा कारण था कि खुद खा पीकर फुर्र हो जाते थे। ऐसा भी नहीं था कि उनके रहने की जगह असुरक्षित थी। बाकायदा तूली का पिंजरा बनाकर पिंजरा प्रवेश करवाता था। उस में रहने-सहने से लेकर दाना-पानी की उत्‍तम व्‍यवस्‍था करता था। फिर भी उन्‍हें पिंजरा रास नहीं आता था और जैसे-तैसे पिंजरे से निकलकर फुर्र हो जाते थे। उस वक्‍त बालमन को ये थोड़ी पता था कि उन्‍मुक्‍त पंछी पिंजरे में नहीं रहते। वे तो गगन तले उन्‍मुक्‍त उड़ते हैं और बिना किसी भेदभाव,मनमुटाव,जाति-धर्म से अलहदा किसी भी मंदिर-मस्जिद में अपना आशियाना बनाकर मिल-झुलकर साथ-साथ रहते हैं।
पिल्‍लों को तो मैं देशी घी के बने लड्डू खिलाता था। लेकिन वे भी खा-पीकर चलते बनते थे। मैंने एक काला पिल्‍ला पाला था,जो खा-पीकर नहीं भागा। भागता कैसे? उसको मैंने देशी घी के लड्डू ही नहीं खिलाया। बल्कि अपने साथ अपने बिस्‍तर पर सुलाता था। एक दिन उसे देखकर एक बालमित्र बोला। बालकपन में बालमित्र ही होता है। ‘ये पिल्‍ला तो बहुत सुंदर है। लेकिन ये ओर भी सुंदर दिख सकता’ मैंने पूछा-‘कैसे?’ वह बोला-‘इसके दोनों कान आधे काट दो। फिर देखना।­­’ ये सुनकर मैं बोला-‘पिल्‍ले के कुछ हो गया तो।’ वह बोला-‘कुछ नहीं होगा।’ उस वक्‍त बालमित्र से बालमन ने सवाल किया। ‘कान काटेंगा कौन?’ यह सुनकर बालमित्र तपाक से बोला-‘अपन दोनों ही काट देंगे। ऐसा करना तू तो पकड़ लेना और मैं काट दूंगा।’ मैं बोला-‘ठीक है।’ हम दोनों पिल्‍ले को लेकर खेतों में चले गए। उसने एक कान तो काट दिया था। दूसरा कान आधे से कम कटा होगा कि बा‍लमित्र को काटकर भाग गया। दोनों के दोंनों उसके पीछे-पीछे भागे भी काफी दूर तक लेकिन पकड़ में ही नहीं आया। कुछेक दिन तो कहीं भी दिखाई नहीं दिया। एक दिन अवारों कुत्‍तों के झुंड में नज़र आया तो मैंने पकड़ने की कोशिश की लेकिन हाथ नहीं आया। जब भी कहीं भी मिलता तो मुझे देखते ही दुम दबाकर भाग जाता था। मुझे ऐसा लगता है शायद उस दिन के बाद उसे भय हो गया कहीं पकड़कर कान नहीं काट ले। वह जब त‍क जीवित रहा मोहल्‍लें में रहा और अधकटा कान लटकता ही रहा। जब भी मैं उसे देखता तो मुझे बहुत दुख होता और बालमित्र पर गुस्‍सा भी आता। उस वक्‍त भी यहीं सोचता था और आज भी कि उस दिन बालमित्र की बात टाल देता तो पिल्‍ला इस तरह दुम दबाकर नहीं भागता। बल्कि दुम हिलाता हुआ आता।

एक किस्‍सा तब का है। जब मैं सातवीं कक्षा में पढ़ता था और गणतंत्र दिवस की तैयारी हेतु एक दिन पूर्व शाला गणवेश के प्रेस करना था। उन दिनों कोयले की प्रेस का प्रचलन था। होने को तो इलेक्‍ट्रॉनिक प्रेस भी थी। लेकिन कोयले की प्रेस खुद के नहीं तो अड़ोसी-पड़ोसी के अवश्‍य मिल ही जाती थी। लेकिन उस दिन मुझे किसी के भी प्रेस नहीं मिली। तब मेरे दिमगा में आइडिया आया कि क्‍यों ना थाली में कोयले सुलगाकर प्रेस किया जाए। मैं बिना समय गंवाहे प्रेस करने में जुट गया। जैसे ही शर्ट पर थाली रखी शर्ट थाली के चिपक गई। उस दिन मैं बहुत रोया। रोया इसलिए कि मास्‍साब ने कहा था कि जो भी विद्यार्थी यूनिफार्म नहीं पहनकार आएंगा। उसकी अगले दिन अच्‍छे से धुनाई होगी। इस भय के कारण में गणतंत्र दिवस के दिन ही नहीं। बल्कि उसके अगले दिन भी स्‍कूल नहीं गया। इस तरह के बचपन उन तमाम लम्‍हों को आज याद करते हैं तो वे दिन ताजा हो जाते हैं और मन कहता वे दिन वापस लौट आए तो कितना मजा आए।

यहां बात लेखनी की करे तों मेरे लेखन की शुरूआत तब से हुई जब मैं ग्‍यारहवीं में पढ़ता था। तब मैंने अपने समाज के एक पाक्षिक अखबार में ‘राजनीति का भंवरा’ शीर्षक से कविता भेजी। लेकिन वह तो छपी नहीं और किसी ओर की कविता मेरे नाम से प्रकाशित हो गई। मुझे बधाई भी प्राप्‍त हुई। वह कविता भी छपी। लेकिन काफी दिनों बाद में। इसके बाद लम्‍बे अंतराल तक कुछ भी नहीं लिखा। अक्‍टुम्‍बर 2011 से मैंने समाज के ही पाक्षिक अखबार रघुवंशी रक्षक प‍त्र‍िका के लिए सामाजिक खबरें एवं सामाजिक उत्‍थान एवं सामाजिक करूतियों पर आलेख लिखने लगा। इन्‍हें दिनों से यदा-कदा राजस्‍थान पत्र‍िका एवं डेली न्‍यूज के पाठक पीठ में भी छपने लगा। 10 फरवरी 2015 को दैनिक जनवाणी में मेरी पहली व्‍यंग्‍य रचना ‘सम्‍मान समारोह में‍ शिरकत’ प्रकाशित हुई और इसके बाद में साल भर के लिए अंतराल का ताला लग गया। इस अंतराल में तीन कहानी अवश्‍य छपी। लेकिन व्‍यंग्‍य आलेख नहीं छपे। मैं अनवरत व्‍यंग्‍य लिखता रहा। न छपने पर कभी भी हताश नहीं हुआ। इस दौरान फेसबुक के जरिए मेरी मित्रता श्री निर्मल गुप्‍त सरजी हुई और उन्‍होंने मेरा मार्गदर्शन किया। जिनकों मैं अपना व्‍यंग्‍य गुरु मानता भी हूं। इन्‍हीं के शुभ आशीष से 16 मार्च 2016 को दैनिक ट्रि‍ब्‍यून में छपी व्‍यंग्‍य रचना के बाद लम्‍बा अन्‍तराल नहीं लगा। 




29 Aug 2018

मोबाइल की माहिमा


देखा भाईकमाल हो गया। कल का छोरा सब पर भारी हो गया। रामदुलारी भी पढ़-लिखकर कुछ ना कर पाई। जो उस छोरे ने कर दिखाया है। उसे देखकर मेरी तो आँखे ही फटी की फटी रह गई। इत्‍ती सी उम्र में इत्‍ता नॉलेज। वह भी बिना गए कॉलेज। और एक तुम हो जिससे कॉलेज पास आउट होने के बाद भी नॉलेज नहीं आई।
जरा हमें भी तो बताए रामदुलारी के बापू। किसने? राई के नौ पहाड़ कर दिया। जिसका इत्‍ता बखान कर रहे हो।’ मैंने पूछा। क्‍या है कि गाँव के छोटे-बड़े ग्‍यारसी लाल काका को रामदुलारी का बापू कहकर बुलाते हैं। सबके सामने छोटे-बड़ों से अलहदा आदरसूचक को काका निरादर ना समझ ले,इसीलिए मैंने रामदुलारी का बापू कहकर ही सम्‍बोधित किया। अकेले में तो काका कहकर ही सत्‍कार करता हूँ।
अरे! क्‍या बताए बेटा और क्‍या ना बताएं? अरेवह लल्‍लू का छोरा नहीं है क्‍या? उसकी उम्र में हमें तो ढंग से चड्डी भी नहीं पहनी आती थी। अर्धनग्‍न घूमते थे और दिनभर खेलने में मगन रहते थे। और उसे देखों! दुनिया भर के गेम बैठे-बैठे ही ऐसे खेल लेता है जैसे साँप सीढ़ी खेल रहा हो। वह जो गेम खेलता हैं। अगर वे ओलंपिक में होते तो अब से पहले सारे मेडल उसकी झोली में होते तथा गोल्‍ड मेडल तो उसी के नाम होता।’  
यह सुनकर मैं बोला,‘काकाक्‍यूँ मासूम बच्‍चे को झाड़ पर चढ़ा रहे हो? वह और गेम। उसे तो ढंग से गेमों का नेम भी नहीं पता। क्रिकेट,फूटबॉल,बॉलीवाल,बैंडमैंटिन,खेल है या मनोरंजन के साधन। ये भी नहीं जानता। वह तो घर की देहरी ही नहीं लांघता। लक्ष्‍मण रेखा के अंदर ही बंदर की तरह उछलता रहता है।
उसे बंदर समझकर परिहास का पात्र मत समझए। रावण ने भी हनुमानजी को बंदर समझा था। लेकिन जब हनुमानजी ने लंका में डंका बजाया तो सबके तोते उड़ गए थे। ये बंदर भी ना अंदर ही अंदर मोबाइल में किसी ना किसी गेम का गेम बजा रहा होता है।
काका के मुँह से यह सुनकर मेरी हँसी नहीं रुकी। मुश्किल से नियंत्रण करते हुए बोला,‘काका तुम भी ना कमाल करते हो।­’ 
काका बोला,‘मैंने क्‍या कमाल कर दियामैंने तो आँखों देखी लाइव का टेलिकास्‍ट किया है।’ 
मुझे लगता है,काका! तुम्‍हारे पास आज का संगी-साथी स्‍मार्टफोन नहीं है। होता तो तुम्‍हें ज्ञात होता।­’ 
अरे! मोबाइल तो मेरे पास एंड्रॉइड है,पर मुझसे तो ससुरे का लॉक भी दूसरे प्रयास में खुलता है।
तभी तो आपको इल्‍म नहीं है। लल्‍लू का छोरा तो फिर भी अनाड़ी है। लक्ष्‍मी की छोरी और मांगेलाल का छोरा तो  मंजे हुए खिलाड़ी हैं। आपको क्‍या पता?अपने मोहल्‍ले के अक्‍कू-नक्‍कू,चिंटू-पिंटू,रिया-दिव्‍या,बंटी-बबली तो इनके भी बाप हैं। ये तो मोबाइल में गेम नहीं बल्कि अपलोड से लेकर डाउनलोड तक करने में उस्‍ताद हैं।
बाप रे बाप! तुने तो मेरे आँखे खोल दी। मैं तो अनभिज्ञता में उसकी प्रशंसा का झंडा लहरा रहा था। मैं समझा लल्‍लू के छोरे में ही टैलेंटे है। मुझे क्‍या पता?आज के बच्‍चे  स्‍मार्टफोन की तरह स्‍मार्टनैस हैं। मल्‍टी टैलेंटेड हैं।
काका! आजकल के बच्‍चें कच्‍चे नहीं हैं। पक्‍के पकाए आम हैं। मोबाइल चलाने में तो परचम लहराए हुए हैं। जो बच्‍चे उठते-बैठते,सोते-जागते,खाते-पीते मोबाइल के उँगली करते रहते हैं,वे तो मोबाइल के हर एक एप्प को अच्‍छी तरह से चेकअप ना करले उससे पहले सुपुर्द नहीं करते। डिसचार्ज अवस्‍था में भी उससे छेड़छाड़ करे बिना नहीं रहते हैं। क्‍योंकि वे जानते है कि अभी तो सांस चल रही है। और जब तक मोबाइल में सांस है तब तक आस है।
अच्‍छा तो इसीलिए लल्‍लू छोरे को मोबाइल चलता देखकर प्रमुदित होता है।
काका! बच्‍चे को सारे दिन मोबाइल में उँगली करता देखकर माँ-बाप का खिलखिलाना। बच्‍चे के बचपन पर कुठाराघात करना है। सुरम्‍य सृष्टि को निहारने वाली दृष्टि को समय से पूर्व चश्‍में में गिरफ्त करना हैं। मोबाइल से होने वाली नोमोफोबिया जैसी बीमारियों को न्‍योता देना हैं।
यह सुनकर काका हँसने लगा। ‘भला मोबाइल से भी बीमारी होती है क्‍या? मोबाइल में तो दुनिया समाई हुई हैं। जिसे लोग तो दिनभर गर्दन झुकाकर टकटकी लगाए देखते रहते हैं। परसों ही गुलाब की लुगाई की लोकेशन मोबाइल ने ही बताई थी। जिसके साथ गुल खिलाने के लिए भागी थी उसको साथ में पकड़वाया था। जो सबकी खोज-खबर रखता है। भला उससे बीमारी कैसे होगी?
मैंने बोला,'अब तुम्‍हें कैसे समझाऊं? मोबाइल की बीमारी तो रामदुलारी ही बता देगी।
ये सुनकर काका फिर से हँसने लगे। ‘रामदुलारी ओर उसे मोबाइल की जानकारी। उसे जानकारी होती तो वह मुझे जरूर बताती। पहले प्रयास में लॉक खोलने का हुनर सीखाती। वह पारंगत होती तो मैं लल्‍लू को देखकर किंकर्तव्‍यविमूढ़ क्‍यों होतालल्‍लू की मानिंद प्रमुदित होता।
अरे,काका! तुम ना मजे ले रहे हो। रामदुलारी ओर उसे ना हो मोबाइल की जानकारी। ये तो सरासर झूठ है। उसने तो फेसबुक पर मचा रखी धूम है। फेसबुक की दीवानी को यूं ना कहों अज्ञानी। बुरा मान जाएंगी रामदुलारी। लाड़ली है तुम्‍हारी। सच में कमाल तो रामदुलारी ने किया है। रोज मिलनी वाली वन जीबी का हर रोज पूरा इस्‍तेमाल किया है। जिस दिन वन जीबी से भी पार नहीं पड़ी तो हॉटस्‍पॉट से उधार लिया है। अब तो आपका सीना गर्व से फूल गया होगा। और एक पते की बात और बताओं काकादरअसल में रोज मिलनी वाली वन जीबी ने तो अज्ञानी को भी ज्ञानी बना दिया है।
इस बार काका गंभीर होते हुए बोले,‘तुम्‍हारे मुताबिक रामदुलारी को जानकारी होते हुए भी मुझे कुछ ना बताई। यहाँ तक की लॉक खोलना भी नहीं सिखाई। आज उसकी खैर नहीं। लेकिन मोबाइल से होने वाली यह नोमोफोबिया कौनसी बीमारी हैइसके बारे में आज से पहले कभी नहीं सुना। क्‍या टीबी,कैंसर से भी खतरनाक है। यह नोमोफोबिया है क्‍या भला? ’
काका को समझाना तो टेढ़ी खीर है। फिर भी प्रयास किया। मैंने उनसे पूछा ‘ काका! तुम मोबाइल के बगैर कितनी देर रह सकते हो।
काका बोला,‘ मोबाइल के बिना तो एक पल भी जीना मुहाल लगता है। मैं तो रात को भी बगल में रखकर सोता हूँ। बाथरूम भी जाता हूँ तो साथ ले जाता हूँ। आज के युग में मोबाइल ही तो सुख-दुख का संगी-साथी है। जैसा कि कुछ देर पहले तुमने ही बताया था।
इतना सुनते ही मेरे मुँह से तत्काल से निकल गया।‘ जो तुमने बताया वे नोमोफोबिया के ही लक्षण है।’ यह सुनकर काका चलते बने।

19 Aug 2018

मृत्युभोज की लपटें


मुर्दे की राख ठंडी भी नहीं हुई थी। मृत्युभोज की लपटें उठने लगी। उठती लपटों को बुझाने के बजाय सुलगाने लगे। लपटें श्मशान से घर तक आ गई। परिजनों को चपेट में लेने लगी। मृतक की पत्नी बेसुध थी। बच्चे विलाप में डूबे हुए थे। मृत्युभोज की लपटे छूते ही तिलमिला उठे। समाज बोल उठा,‘यह लपटें तो सहनी पड़ेगी। आज नहीं तो कल। इनसे बचना मुश्किल है। हर हाल में सहना होगा। बहरहाल सह लिया तो हर तरह से बच जाओगे।’

सांत्वना देने आए नाते-रिश्तेदारों ने भी समाज के वक्तव्य को विहित बताया। अपने वक्तव्य से चेताया भी। यहाँ हस्तियों को कब तक रखेंगेइन्हें गंगा में विसर्जित करनी होंगी। तभी मृतकी आत्मा को आत्मशांति मिलेगी। नहीं तो भूत-प्रेत बन जाएगा। भूत-प्रेत बन गया तो तुम्हें ही हैरान करेगा। मानते हैं इस वक्त लपटे तीव्र है पर जब तक सहन नहीं करोगे। तब तक धधकती रहेगी। बुझेगी नहीं। बल्कि बाद में तो समाज तानो का केरोसिन डालकर ज्यादा दहकाता रहेगा। उस वक्त तिलमिलाओगे ही नही। तड़पोगे भी। बाद में एक दिन चुपचाप सहन भी करोगे। तो अभी कर लो। मृत्युभोज भारी बोझ है। लंबे समय तक उठाए रखना मूर्खता है। इस बोझ को तो तेरहवीं पर ही उतार देना चाहिए। जो तेरहवीं पर नहीं उतारते हैं। वे इस के बोझ तले दबकर मर भी जाते हैं। कई मर भी गए हैं। जो इस बोझ तले दबकर मरते हैं,वे बोझ पर बोझ छोड़ जाते हैं। जो फिर पीछे वालो से उतारने से भी नहीं उतरता। इसलिए ज्यादा सोच-विचार मत करो,सहन कर लो।
सबकी सुनकर मृतक की पत्नी साड़ी के पल्लू से आँसू पोंछती हुई बोली,‘सहन कैसे करेसहने के लिए पैसा चाहिए। पैसा है नहीं। जो था मृतक की बीमारी में लग गया। एकमात्र पचास हजार की एफडी बची है,जो बच्चों के भविष्य को संवारने में काम आएगी। एफडी तुड़वाकर सहन कर लिया तो बच्चों का भविष्य चौपट हो जाएगा। जब बच्चे काबिल होंगे। तब सहन कर लेंगे। बहरहाल तो मृत्युभोज की उठती लपटों पर पानी डालिए। हमें बचाइए। यहीं हमारे प्रति तुम्हारी सांत्वना होगी।’
उसकी संवेदना पर किसी ने भी सांत्वना की बाल्टी से पानी नहीं डाला। मरने वाला मर कर भी नहीं मरा था। बस उसका शरीर पंचतत्व में विलीन हुआ था। मर गया होता तो मृत्युभोज की लपटें नहीं उठती। पता नहीं कब और किसकी मृत्यु पर यह लपटे उठी थी,जो आज तक नहीं बुझ पाई है। लपटे बेकाबू होने लगी। काबू में करने के लिए परिजनों ने संवेदना के पानी से भरी मटकिया उड़ेलने लगे। फिर भी मृत्युभोज की लपटें बुझी नहीं। बल्कि ज्यादा दहकने लगी। दहकती हुई चारों तरफ फैल गई। बचना मुश्किल था। अपनी आगोश में ले उससे पहले ही एफडी व कर्ज की फायर ब्रिगेड से नियंत्रण किया। 

यह देखकर खामोश हस्तियां भी हंसने लगी। बोली,‘यह कैसी रवायत है? हमें गंगा में विसर्जित करने के लिए इस तरह तामझाम। कुटुंब सहित गंगा स्नान। मृत्युभोज के नाम पर सामूहिक भोज। जिसमें एक से बढ़कर एक पकवान। मेहमानों को स्मृति भेट। जानवर भी अपने साथी के मरने पर वियोग करते हैं और यहाँ मनुष्य अपने सगे-संबंधी के मरने पर भोज करने पर तुले हैं। खुशी के मौके पर तो मिठाइयां चलती है पर मरने पर शर्मनाक है। यह व्यर्थ खर्च नहीं तो और क्या है? यह तो पीड़ादायक कुरीति है।’

पर हस्तियों की सुनने वाला कौन था? वे तो मटकी के अंदर थी। ऊपर से मुँह सफेद कपड़े से  बंधा हुआ था। बाहर तो आवाज ही नहीं पहुँची होगी। जिस दिन मटकी के मुँह पर से सफेद कपड़ा हट गया। खुद हस्तियां ही मृत्युभोज पर प्रतिबंध लगा देंगी। अंततः अस्थियां गंगा में विसर्जित की गई और तेरहवीं पर मृत्युभोज होकर ही रहा।