14 Apr 2018

रामभरोस का भरोसा रामभरोसे


कई लोग इत्ते भरोसे के साथ यकीन दिलाते हैं कि आपका अमुख कार्य। अमुख तारीख को सुनिश्चित हो जाएंगा। यह सुनकर हम भी सुनिश्चित की चादर ओढ़कर सो जाते हैं। सुनिश्चित की अवधि समीप आने पर हमारी आंखे खुलती हैं तो सुनिश्चित की चादर अनिश्चित में समेटी हुई मिलती है। अनिश्चित में समेटी हुई चादर को आप हम तो दोबारा ओढ़ना मुनासिब नहीं समझते। पर मित्र ! रामभरोस अनिश्चित में समेटी हुई चादर को भी फैलाकर दुबारा ओढ़ लेता है। अब रामभरोस को कौन समझाए? वह किसी कि मानता भी तो नहीं। कहता है,बेचारे की कुछ मजबूरी रही होगी। वह तो तकरार में भी इनकार नहीं करता। इनकार ही किया है। इकरार तो यथावत है। इकरार है तो भरोसा भरसक है। इसे क्या मालूम? ऐनवक्त पर मना करने पर वहीं स्थिति होती है। जो चुनाव में नेताजी की ऐनवक्त पर टिकट कटने पर होती है। 
रामभरोस का भरोसा रामभरोसे
कहते है कि जिस पर भरोसा होता है। वहीं मुसीबत में काम आता है। लेकिन भरोसा देकर ऐनवक्त पर टालमटोल कर जाना। मुसीबत में एक ओर मुसीबत झेलना मजबूर करना है। फिर एक ओर एक मुसीबत मिलकर ग्‍यारह का काम करती हैं। मौका मिलने पर काम भी तमाम कर देती है। मुसीबत यहां तो आती नहीं और आती है जल्दी सी जाती नहीं। खुद तो आती है,जो आती है,अपने संग मानिसक तनाव और गृहक्लेश भी साथ लाती है। जेल से कैदी का बाहर निकलता आसान है पर  मुसीबत से निकलना मुश्किल है। मुसीबत तो मुसीबत है।
रामभरोस का जिस पर भरोसा कायम है। उसे रामभरोस के नाम में,जो ­‘राम’ है उसमें मर्यादा पुरुषोत्तम ­‘राम’ तो नजर आता है। पर राम के पीछे जुड़ा ‘भरोस’ में भरोसा दिखाई नहीं देता। वह सोचता होगा। जिसका नाम ही राम के भरोसे है यानी रामभरोस है। उस पर क्या भरोसा करें? विश्वास कुमार होतो। कम से कम नाम पर तो विश्वास रहता है। फिर चाहे वह नाममात्र का ही विश्वास कुमार क्यूं ना हो। इसमें रामभरोस का दोष थोड़ी है। मां-बाप दोषी है। जिन्होंन ऐसा नाम रखा। मां-बाप भी क्यूं दोषी है? दोषी तो ज्योतिषी है। ज्योतिषी भी क्यूं दोषी? वह तो पंचाग के मुताबिक चलता है। दोषी तो ग्रह है जिसमें इसका जन्म हुआ था। ग्रहों का भी क्या दोष है? दोष तो तुला राशि का है जिसने यह नाम प्रदान किया। इसमें तुला राशि का भी क्या दोष है? तुला राशि ने थोड़ी कहा था कि रामभरोस ही नाम रखना। तुला में रामभरोस के अलावा ओर भी अनेकानेक नाम थे। उनमें से भरोसा लायक नाम रख लेते। खैर,छोड़ों।
रामभरोस ऐसा क्या करें? उसका जिस पर भरोसा है। वह भी उस पर भरोसा कर ले। आप ही कोई सुझाव दीजिए। हो सकता है,आपका सुझाव। उसके दिमाग में घुस जाए और वह भरोसा कर ले। एक भाई साहब! ने बहुत अच्छा सुझाव दिया। भरोसा तो भरोसा है। करें ना करें उसकी मर्जी। इसमें आप-हम क्या कर सकते है सरजी। आप भी किसी के भरोसे आश्वस्त है तो जान लीजिए भाई साहब का सुझाव शाश्वत है। इसके बावजूद भी भरोसा करते हैं तो जिम्मेवारी खुद की होगी। एक दूसरे भाई साहब ने सुझाव दिया- भरोसे पर दुनिया कायम है। भरोसा है तो सब कुछ है। अन्यथा कुछ भी नहीं। सुझाव तो इनका भी वाजिब है। ऐतबार ही है,जिसकी बुनियाद पर रिश्तों की इमारत टिकी हुई है। अन्यथा कब की ध्वस्त हो गई होती। ऐतबार नहीं होता तो प्रेमी-प्रेमियों में प्रेम ही नहीं होता। प्रेम नहीं होता तो प्रेमी-प्रेमिका नहीं होती। ऐतबार है तो प्रेम है और प्रेम है तो प्रेमी-प्रेमिका है।
रामभरोस जिस पर अटूट भरोसा करता है। उसने मुझे बताया कि अधुनातन में भरोसा रहा ही कहां? जो निहायत कम बचा हुआ है। उसके भी स्वार्थ की दीमक लग गई है। जो भरोसे को धीरे-धीरे चट कर रही है। जिस पर खुद से ज्यादा विश्वास है। वहीं विश्वास का गला दबा रहा। इसीलिए तो भाई भाई से आंखे नहीं मिला रहा है। उसी ने आगे बताया कि भाई साहब ! होने को तो भरोसा तो भरसक होता है। लेकिन जिस पर भरोसा होता है। वहीं विश्वासघात निकल आए तो इसमें भरोसा भी क्या करे? रही बात रामभरोस की,जिसका नाम ही रामभरोस है। उस पर भरोसा करना भी रामभरोसे ही है।


4 Apr 2018

मूर्ख नहीं डेढ़ गुणा समझदार


मोहनलाल मौर्य
आप भले ही उसे मूर्ख समझते होंगे। वह तो अपने आपको समझदार समझता है। समझता क्या है? समझदार है। उसका अभिनय देखकर मूर्ख समझना आपकी ही मूर्खता हैं। वह तो मूर्खता के नेपथ्य में अभिनयचातुर्य है। मूर्खता ही उसका पेशा है और वह अपने पेशे में सिद्धहस्‍त है। सच में मूर्खता का अभिनय तो कोई उससे ही सीखे। सीखे नहीं तो देखे अवश्‍य। किस तरह मूर्खता का अभिनय करता है। मूर्ख नहीं डेढ़ गुणा समझदार

वह निरुत्तर रहता है। लेकिन उसके निरुत्तर में प्रत्युत्तर होता है। अब आप सोच रहें होंगे प्रत्‍युत्‍तर होता है तो देता क्‍यूं नहीं? क्‍योंकि वह आपको ही मूर्ख समझता है। इसलिए प्रत्‍युत्‍तर नहीं देता। आपको विश्‍वास नहीं होगा। एक दफा उसने मुझे बताया था कि उस मूर्ख के मुंह लगना मूर्खता है। यह सुनकर एक बार तो मैं भी हक्‍का-बक्‍का रह गया। आप उसे मूर्ख समझते है और वह आपको। समझ में नहीं आता कि आप दोनों में से मूर्ख कौन है और ज्ञानी कौन है? वह या आप। वह लगता नहीं और आप होंगे नहीं। आप अपने आपको समझदार जो समझते हो। इस असमंजस से मैं खुद असमंजस में हूं। खैर छोडों।
कहीं आप मुझे भी तो मूर्ख नहीं समझ रहे है। कुछ लोग मूर्खो जैसी वार्ता करने वालों को भी मूर्ख समझ लेते हैं। आपने ज्ञानी जनों से सुना भी होगा। देखों कैसी मूर्खो जैसी बात कर रहा हैं। आप मुझे भी मूर्ख समझ रहे है तो ठीक ही समझ रहे है। क्‍योंकि मूर्ख से कोई जल्‍दी सी उलझता नहीं है। उलझता है तो गुत्थी झुलझती नहीं। इसलिए मेरी तो मूर्खता में ही समझदारी है। मूर्खता में समझदारी का फायदा एक नहीं,अनेक है। एक तो ज्‍यादा माथापच्‍ची नहीं करनी पड़ती है। दूसरा अपना काम आसानी से हो जाता है। और किसी को संदेह भी नहीं होता कि बंदा मूर्ख नहीं समझदार है।
आप जिसे मूर्ख समझते होना उसे ही देख लो। आपसे अपना स्वार्थ नि:स्वार्थ करवाना उसकी फितरत है। चेहरे पर भोलापन और जुबान में मिठापन नैसर्गिक लगे ऐसे बोल बोलता है,जो उसका हुनर है। अजीबोगरीब वार्ता कर अपना उल्लू सीधा करना उसकी मूर्खता नहीं,चालाकी है। अब तो आप समझ गए ना कि वह मूर्ख नहीं है। बल्कि मूर्खता के नेपथ्‍य में डेढ़ गुणा समझदार है। अब भी आपको यकीन नहीं हुआ है तो ऐसा कीजिए खुद ही उसकी मूर्खता की तहकीकात कीजिए। अपने आप ही आभास हो जाएंगा।
आप जैसे समझदार को क्‍या समझाए? फिर भी एक बात अवश्‍य ध्‍यान रखएंगा। जिसमें आपकी भलाई है। अपनी समझदारी अपने पास ही रखिये। कहीं ओर काम आएंगी। यहां ही व्यर्थ कर दी तो कहीं ओर किससे काम चलाओंगे। क्‍योंकि समझदार होना तो बनता है पर समझदारी दिखाना कहां चलता है। जहां चलता है वहां चलाए। किंतु देखकर चलाए। कहीं कोई चालान नहीं काट दे। चालान कट गया तो समझ लो जुर्माना भरना ही पड़ेगा। और समझदारी दिखाने का जुर्माना बहुत महंगा पड़ता है। अब भी आपको समझ में नहीं आई तो कभी आएंगी भी नहीं।

25 Mar 2018

आपकी अंतिम यात्रा मंगलमय हो


प्रिय मित्र,
               सप्रेम नमस्‍ते।

इंटरनेट के युग में भारतीय डाक सेवा से आपका पत्र प्राप्‍त हुआ। बड़ी प्रसन्‍नता हुई। आपने पत्र में लिखा कि मैं परलोक की सैर करना चाहता हूं। उसके लिए क्‍या करना होगा? प्रिय मित्र! मित्र होने के नाते मैं आपको बता दू कि परलोक की सैर कोई सैर-सपाटा नहीं हैं कि आप घुम-फिरकर वापस घर लौट आए। यह जिंदगी की अंतिम यात्रा है,जो एक ना एक दिन हम सभी को करनी होती है। यहीं एकमात्र ऐसी यात्रा है जिसमें यात्री का किराया भत्‍ता यात्री से वहन नहीं किया जाता है। और ना ही यात्रा में यात्री को किसी भी तरह की सुविधा से महरूम होने दिया जाता है। कर्मफल के मुताबिक वे तमाम सुविधाएं प्रदान की जाती है जिनका यात्री हकदार है। किसी कारणवंश सुविधाएं नहीं भी मिले तब भी दुखी होने की जरूरत नहीं हैं। परलोक के मुख्‍य प्रबंधक यमराज के द्वारा बिना कहे-सुने ही अपने आप ही व्‍यवस्‍था हो जाती है।

इस यात्रा कि और यात्राओं की तरह पूर्व तैयारी नहीं करनी होती हैं और ना ही पूर्व में रिजर्वेशन करवाने की जरूरत है। जिस दिन की यात्रा होती है,उसी दिन तत्‍काल में टिकट तथा सीट मिल जाती है। ना ही किसी तरह के सामान की जरूरत हैं। इहलोक से परलोक चलने वाली गाड़ी भारतीय रेल की तरह नहीं है,अपने निर्धारित समय से चलती है। एक सेकण्‍ड भी लेट नहीं होती है। इस गाड़ी में यात्री को भारतीय रेल के यात्रि‍यों की तरह हिदायत नहीं दी जाती है कि सहयात्री से किसी भी तरह का खान-पीन नहीं करें। इसमें आप  किसी भी सहयात्री के साथ खान-पीन कर सकते है। खूब मौज-मस्‍ती कीजिए। जो मन में आए कीजिए। किसी तरह की कोई रोक-टोक नहीं है। बेरोकटोक है। लेकिन सहयात्री का सौभाग्‍य हर किसी के भाग्‍य में नहीं होता। यह तो किसी भाग्‍यशाली यात्री को ही प्राप्‍त होता है।

ये मित्र! एक बार फिर से बता रहा हूं कि परलोक की यात्रा करना आपके हाथ में नहीं। और यात्राओं की तरह नहीं है कि टिकट विंडों पर गए। लाइन में लगे। टिकट कटवाया और यात्रा के लिए चल दिए। इस यात्रा की यात्रा तो अचानक होती है। इसलिए इसकी चिंता अभी से मत कीजिए। चिंता से उनमुक्‍त हो जाए और जिंदगी का आनंद लीजिए। इसके बावजूद भी परलोक की यात्रा करना चाहते है तो जाने से पहले एक ओर बात बता दू कि किसी भी निजी या अजीज को कुछ भी मत बताकर जाना। चुपचाप ही निकल जाना। तब तो आपकी यात्रा मंगलमय होगी। बताकर गए तो पिछे वालों पर तलवार लटकती रहेंगी। किसी से लेनदेन होतो चुकती कर जाना। अन्‍यथा पिछे वालों पर ब्‍याज की गाज गर्जती रहेंगी। मोहमाया में फंसे हुए पेंचों को निकालकर जाना। अन्‍यथा पेंच यात्रा में बाधा उत्‍पन्‍न कर सकते हैं।

आपके जाने के बाद बहुत सी सामाजिक रवायत होगी। जिनमें दकियानूसी ज्‍यादा होगी। उनकी आपको जरा भी फिक्र नहीं करनी है। जिन्‍हें फिक्र करनी हैं,वे अपने आप कर लेगे। बारह दिन तक तो करते भी हैं। तेरहवें दिन फिक्र मुक्‍त हो जाते हैं। लिखने को तो और भी बहुत कुछ बाकी रह गया हैं। लेकिन इन्‍हीं कामनाओं के साथ आपकी अंतिम यात्रा मंगलमय हो।
                                                                   - आपका मित्र

17 Mar 2018

अंतिम मैसेज ‘बिलकुल’ लिखकर ‘वलेस’ कुल को छोड़कर चल बसे व्‍यंग्‍यकार सुशील सिद्धार्थ



मोहनलाल मौर्य  
उत्‍तर प्रदेश के सीतापुर के भीरा,बिसवां में 2 जुलाई 1958 को जन्‍में प्रख्‍यात व्‍यंग्‍यकार सुशील सिद्धार्थ का शनिवार सुबह निधन हो गया। 60 वर्ष की उम्र में इस तरह से चले जाना व्‍यंग्‍य जगत में शोक की लहर दौड़ गई। उनके निधन की खबर जिसने भी सुनी विश्‍वास नहीं हुआ कि अद्भुत व्‍यक्तित्‍व के धनी अप्रत्‍याशित अलविदा कैसे हो गए। मैं खुद स्‍तब्‍ध हूं।


नए-पुराने,नवोदित स्‍थापित व्‍यंग्‍कारों को एक मंच पर लाने के लिए वे अ‍हर्नशि आमादा रहते थे। इसके लिए उन्‍होंने 22 जुलाई 2015 को वलेस (व्‍यंग्‍य लेखक समिति) के नाम से वाट्सऐप ग्रुप बनाया था। जिससे मुझ जैसे नवोदित से लेकर समकालीन व्‍यंग्‍य शिरोमणि पद्मश्री ज्ञान चतुर्वेदी सहित बहरहाल 61 सदस्‍य है। इस ग्रप में वे नित्‍य व्‍यंग्‍य में नवाचार एवं आगामी योजनाओं पर प्रकाश डालते रहते थे तथा व्‍यंग्‍यकारों की प्रकाशित,अप्रकाशित व्‍यंग्‍य रचनाओं पर बेबाक टिप्‍पणी देकर उन्‍हें अवगत करवाते थे। व्‍यंग्‍य विधा में उनके अमूल्‍य योगदान को कभी भूलाया नहीं जा सकता है। वे व्‍यंग्‍य पर बहुत बारीक से अपना वक्‍तव्‍य रखते थे तथा सदैव व्‍यंग्‍य के संदर्भ में समर्पित रहते थे। नवोदितों व्‍यंग्‍यकारों के तो वे एक तरह से भगवान ही थे। क्‍योंकि नवोदितों पर उनका विशेष फोक्‍स रहता था।


वलेस ग्रुप में सबसे पहले वरिष्‍ठ व्‍यंग्‍यकार अं‍जनी चौहान का मैसेज आया सुशील सिद्धार्थ नहीं रहे। ये देखकर तमाम वलेसी स्‍तब्‍ध रह गए। वलेस ग्रुप में वरिष्‍ठ व्‍यंग्‍यकार निर्मल गुप्‍त की एक पोस्‍ट के नीचे बीती रात 8.53 पर अंतिम मैसेज ‘बिलकुल’ लिखकर ‘वलेस’ कुल को छोड़कर चल बसे। इससे पूर्व उन्‍होंने ‘सुदर्शन जी अपने व्‍यंग्‍य का टेक्‍स्‍ट लगाओं’ लिखा था। और फेसबुक पर उनकी अंतिम पोस्‍ट ‘लिखे जा रहे व्‍यंग्‍य आखेट का अंश’ था तथा ‘आखेट’ नाम से उनका नवीनतम व्‍यंग्‍य सग्रंह प्रकाशन की तैयारी में है। जिसमें इकलातीस व्‍यंग्‍य हैं। जिसका आवरण सुशील सिद्धार्थ ने सोशल मीडिया पर पोस्‍ट किया था।


वे मेरे सबसे प्रिय व्‍यंग्‍यकार नहीं अपितु मेरे गुरु भी थे,जो कि मुझे समय-समय पर मार्गदर्शित करते रहते थे। उनसे मेरा जुड़ाव फेसबुक के जरिए हुआ था। वलेस ग्रुप में जुड़ने के बाद तो अक्‍सर वार्तालाप होती रहती थी। उनके साक्षात दर्शन 23 दिसम्‍बर 2017 को प्रथम ज्ञान चतुर्वेदी सम्‍मान के अवसर पर भोपाल के स्‍वराज भवन में हुए थे। जिसमें खासतौर से उन्‍होंने आमंत्रि‍त किया था। और में इस कार्यक्रम मैं सबसे पहले आने वाले आगंतुक के रूप में उपस्थित हुआ था। वहां दो दिन तक उनके साथ रहा। उनके साथ बिताए वे पल हरपल याद रहेंगे।


साधारण सादगी से सराबोर सुशील सिद्धार्थ की अब तक प्रीति न करियों कोय, मो सम कौन, व्‍यंग्‍य संग्रह में नारद की चिंता,मालिश महापुराण,हाशिये का राग,सुशील सिद्धार्थ के चुनिंदा व्‍यंग्‍य,राग लन्‍तरानी,दो अवधी कविता संग्रह। इनके अलावा इनके संपादन में पंच प्रपंच, व्‍यंग्‍य बत्‍तीसी,श्रीलाल शुक्‍ल संचयिता,मैत्रेयी पुष्‍पा रचना संचयन,नये नवेले व्‍यंग्‍य,व हिंदी कहानी का युवा परिदृश्‍य (तीन खंड) आदि किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं।


साहित्‍य क्षेत्र में सुशील सिद्धार्थ का नाम जाना पहचान था। खासतौर पर व्‍यंग्‍य विधा में। वे किसी परिचय का मोहताज नहीं थे। उनका परिचय देना सूर्य को दीपक दिखाना है। हाल ही में उनको कोटा में व्‍यंग्‍यश्री सम्‍मान से नवाजा गया था। इससे पूर्व वे हिंदी संस्‍थान उत्‍तर प्रदेश से दो बार व्‍यंग्‍य में और दो बार अ‍वधी कविता के नामित पुरस्‍कारों से सम्‍मानित हो चुके हैं। इनके अलावा लखनऊ से अवधी शिखर सम्‍मान,भोपाल से स्‍पंदन आलोचना सम्‍मान,और दिल्‍ली से शरद जोशी से सम्‍मान से नवाजे जा चुके हैं। उनको मेरे तरफ से भावभीनी श्रद्धांजलि।

1 Mar 2018

होली की होली, भड़ास की भड़ास

मोहनलाल मौर्य

वह ‘बुरा न मानों होली है’ कहता हुआ घर से निकला है। रंग-गुलाल हाथ में हैं तथा मन में भड़ास की भावना है। वह जिस पर रंग-गुलाल लगाकर भड़ास निकालने के फिराक में है उस पर भी कोई ना कोई भड़ास निकालने के लिए आतुर है। वह भी कह देगा, ‘बुरा न मानों होली है।’होली पर्व पर होता भी ऐसा ही है। जिसके रंग-गुलाल लगाना चाहते हैं,उसके तो लगता नहीं। किसी ओर के लग जाता है। होली खेलने का मजा भी तभी आता है जब इसके उसके रंग लगता है। फिर मजे-मजे में भड़ास तो स्वत: ही निकल जाती है।  होली की होली भड़ास की भड़ास

भड़ास निकालने वाले का सलीका अलहदा होता है। उसकी विशेषता हस्तकौशल में परिपूर्ण होता है,उसके हाथों में अपेक्षाकृत ज्यादा रंग-गुलाल होता है। पहले आलिंगन प्रवृत्ति अपनाता है। उसके उपरांत होली खेलते-खेलते भड़ास निकाल लेता है। अपनी भड़ास पूर्ण नहीं हो। जब तक रंग-गुलाल लगाता रहता हैं। किसके रंग-गुलाल लगाना है और किससे नहीं। यह नहीं देखता,जो मिल गया वहीं सही। अलबत्ता कई बार विपरीत हो जाता है। सेर को सवा सेर मिल जाता है। जब सेर सवा सेर से मुखातिब होता है। तब भड़ास तो भाड़ में घुस जाती है और दोनों रंग-गुलाल की बौछार से सराबोर हो जाते हैं। फिर होली खेलते-खेलते हमजोली हो जाते हैं। 

हमजोली मिलकर टोली बनाते हैं। टोली बनाकर हल्ला-गुल्ला करते हुए घर-घर होली खेलने जाते हैं। होली पर टोली की टोली आती देखकर जो दरवाजा बंद कर लेता है। उसको रंगने के लिए अपने-अपने हथकंडे अपनाते हैं। जिसका हथकंडा लगा गया और दरवाजा खुल गया। वह दरवाजा खुलते ही रंग-गुलाल लगाता है और भड़ास निकालने वाला रंग-गुलाल की आड़ में होली खेलते-खेलते भड़ास भी निकाल लेता है।

मन की भड़ास निकालने का सुअवसर होली पर्व पर जो मिलता है। ऐसा अवसर ओर दिन कहां मिलता हैमन से भड़ास निकल जाती है और तन पर रंग-गुलाल चढ़ जाती है। मन-तन की अभिलाषा पूर्ण हो जाती है। जो प्राय: हो नहीं पाती। मन की अभिलाषा पूर्ण होती है तो तन की नहीं होती और तन की होती है तो मन की नहीं होती। जब मन-तन की अभिलाषा एक साथ पूर्ण होती है। तब उसके लिए वह दिन होली दिवाली से कम नहीं होता। जब दिन ही होली का मिल रहा है तो वह अभिलाषा पूर्ण क्यों नहीं करेगावह तो अवश्य करेगा। सालभर से वह इसी दिन के इंतजार में तो रहता है। कब होली आए और कब भड़ास निकालु।

टोली के संग होली का आनंद


मोहनलाल मौर्य
मुझे तो अकेले होली खेलना कतई पसंद नहीं है। मैं घर से अकेला होली खेलने निकलता हूं तो घर से निकलते ही दबोच लेते हैं। टोली की टोली तैनात जो रहती हैं। गत वर्ष सीना तानकर होली दंगल में उतरा था। पर जो हाल हुआ था वह मैं ही जानता हूं। होली दंगल में उतरते ही ऐसी पटकनी दी कि चारों खाने चित आया। रंग-गुलाल से सराबोर होकर घर आया और आकर आईने में चेहरा देखा तो आईना भी मुझ पर हस रहा था। जो ओर दिनों खामोश रहता था। आईने से झूठ भी नहीं बोल सकता। उसे सब पता रहता है। वह वहीं बताता है जो खुद देखता है और आईना ही तो है,जो सच बोलता है। खैर,छोड़ों। होली पर्व ऐसा तो होता आया है। पर जो टोली बनाकर होली खेलने में मजा आता है वह भला अकेले में कहां आता हैटोली के संग होली  का आनंद
होली पर टोली अनायास ही बन जाती है। टोली बनते ही पूरी की पूरी टोली जिस गली से निकलती है तो अच्छे-अच्छों की रंग-गुलाल फीकी पड़ जाती है। बंदा सोचता रह जाता है कि किसके रंग-गुलाल लगाऊं और किसके नहीं लगाऊं। वह एक के लगाएंगा तो उस पर पूरी-पूरी टोली हमला कर देती हैं। इसलिए बचकर निकलना ही मुनासिब समझता है। पर उसका बचना नामुनासिब है। ट्रैफिक हवलदार से बचकर निकल सकते हैं। पर होली पर टोली से बचकर निकलना मुमकिन नहीं नामुमकिन है। क्योंकि उसके पीछे ग्यारह मुल्कों की पुलिस नहीं। बल्कि गली-मोहल्ले के वे लडक़े होते हैं,जो एक साथ टूटकर पड़ते हैं। ऐसा रंगते है कि वह भी टोली में शामिल हो जाता है।
जब टोली की हुड़दंग और होली की मस्ती मिल-बैठते हैं। तब पिचकारी पिचक जाती है और काला पेंट परवान चढ़ जाता है। रंग-गुलाल मुंह ताकते रह जाते हैं। सोचते है कि किसी खूबसूरत लोहे पर जाकर तो मुंह काला नहीं करता। अपुन के पर्व पर आकर अपनी टांग फंसा देता है,कमबख्त कहीं का। होली पर टोली वालों के सम्मुख कोई समझदारी दिखाता है,तो वे कीचड़ को भी रंग-गुलाल समझकर उसके चेहरे पर पोत देते हैं। इनका मानना है कि कीचड़ में कमल खिल सकता है तो कीचड़ से होली खेलने में क्या बुराई है? जो समझदारी नहीं दिखाता है और हंसी-खुशी से टोली के संग होली खेलता है,उसे रंग-गुलाल से सराबोर कर देते हैं। फिर उसका चेहरा नहीं,उसके सफेद दंत भी रंग-बिरंगे दिखते हैं।
अबकी बार मैं भी टोली के संग होली दंगल में उतरुगा। इसके लिए चाहे मुझे गठबंधन क्यों ना करना पड़े? जब राजनैतिक पार्टियां ही चुनावी दंगल में गठबंधन करके उतर सकती हैं,तो भला मैं क्यूं नहीं होली दंगल में उतर सकता? देखना मैं भी किसी ना किसी टोली से गठबंधन करके होली पर ऐसा धमाल मचाऊंगा की सब मेरे रंग में रंग जाएंगे। देखने वाले देखते रह जाएंगे और रंग-गुलाल लगाने वाले रंग-गुलाल लगाकर चले जाएंगे।

24 Feb 2018

सारथी बालिका अभियान एक सार्थक पहल

चर्चित तथा दबंग आईपीएस पंकज चौधरी ने की पहल  
मोहनलाल मौर्य 
एक रिपोर्ट के मुताबिक राजस्थान में वर्ष 2015 में 2215 महिला पुलिसकर्मी सूबे के 861 थानों पर तैनात थी। वही सूबे में होने वाले महिलाओं के खिलाफ अपराध पर दृष्टि डालें, तो पुराने आंकडे ही चौंकाते है। फ़िर ऐसे में आज के परिवेश में महिला सुरक्षा की सूबे में क्या स्थिति होगी, इसका अंदाजा 2012 के आंकड़ों से लगाया जा सकता है। सूबे में 2012 में बलात्कार के दो हज़ार से अधिक मामले दर्ज हुए, तो 2014 में लगभग 3800। ऐसे में राज्य पुलिस औऱ स्टेट क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की सार्थक पहल सारथी अभियान बालिकओं को पुलिस के क्षेत्र में आने के लिए प्रोत्साहित करने का बेहतर जरिया हो सकता है। जो जयपुर में महिला दिवस के मौके पर चर्चित, दबंग आईपीएस अधिकारी पंकज चौधरी के नेतृत्व में शुरू होगा। इस सारथी अभियान का मुख्य उद्देश्य बालिकाओं को पुलिस प्रशिक्षण देना है। जिसमें अनुमान के मुताबिक सूबे की लाखों महिलाएं और बालिकाएं हिस्सेदारी लेंगी। यह सारथी टीम जहां पुलिस बल के कार्यों के बारे में इस अभियान के माध्यम से समझाएगी। वहीं सूबे के लोगों औऱ पुलिस बल के बीच सामंजस्य स्थापित करने का कार्य भी करेंगी।


वैसे राष्ट्रीय स्तर पर पुलिस बल में महिलाओं की बेहतर उपस्थिति सुनिश्चित करने की पहल 2009 में मनमोहन सिंह सरकार ने किया था। जब सरकार ने कहा था, कि सभी केंद्र शासित प्रदेशों और राज्य सरकारों में कम से कम पुलिस बल में महिलाओं की संख्या 33 फीसदी की जाए। पर यह महिलाओं के अधिकार के प्रति रहनुमाई व्यवस्था की अचेतन अवस्था का परिणाम है, कि महिला अपराधों में वृद्धि 2018 आते-आते काफ़ी तेज़ी के साथ बढ़ रही है, लेकिन पुलिस बल में महिलाओं की संख्या में कोई विशेष इज़ाफ़ा होता नहीं दिख रहा। ये बात साबित करती है, कि हमारा समाज महिलाओं के प्रति संवेदनहीनता का शिकार तो है ही, रहनुमाई व्यवस्था भी महिलाओं को त्वरित न्याय औऱ भय मुक्त वातावरण देने के प्रति कितनी सज़ग है? इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है, कि देश में सिर्फ़ 586 महिला पुलिस थाने हैं, यानि हर जिले में एक महिला पुलिस थाने भी नहीं क्योंकि देश में लगभग 641 जिले हैं। यह आलम उस वक्त है, जब देश में अपराध सबसे ज़्यादा महिलाओं के खिलाफ ही होते हैं। 

              इसके साथ 2014 की रिपोर्ट के मुताबिक देश में महिला पुलिसकर्मियों की संख्या काफी कम है। जो  चिंताजनक स्थिति बयां करती है। 2014 की रिपोर्ट के अनुसार देश में कुल 17,22,786 पुलिस कर्मियों में से महिला पुलिस कर्मियों की संख्या सिर्फ़ 6.11 फीसदी है। फ़िर ऐसे में महिला सशक्तिकरण की बात धरातल पर कैसे आ सकती है। विचारणीय तब यह स्थिति ओर व्यापक हो जाती है, जब पता चलता है, महाराष्ट्र के साथ ओड़िशा, मध्यप्रदेश, तमिलनाडु, राजस्थान, गुजरात, सिक्किम,  झारखण्ड औऱ  त्रिपुरा जैसे राज्यों में महिलाओं के लिए 30 फ़ीसद या उससे अधिक का पद आरक्षित है। फ़िर हमारी रहनुमाई व्यवस्था इस बात का आंकलन क्यों नहीं करती, कि क्या कारण है। जिसकी वज़ह से महिलाओं की संख्या इतनी पुलिस बल में कम क्यों है। जो महिलाएं खुद पुलिस में है, वो जब ख़ुद मानती है, कि महिलाएं पुलिस बल में भर्ती नहीं होना चाहतीं, तो इसका कारण सरकारें पता क्यों नहीं करती। पुलिस में कार्यरत महिलाओं के बीच किए जाने वाले सर्वे  में यह निष्कर्ष निकलता रहता है, कि महिलाएं पुलिस बल में भर्ती होने से इसलिए कतराती है, क्योंकि उन्हें टॉयलेट जैसी मूलभूत सुविधा के अभाव आदि का सामना करना पड़ता है। इसके साथ अन्य कारण भी महिलाओं को पुलिसकर्मी बनने से रोकते हैं। साथ में महिला पुलिसकर्मियों को लैंगिक भेदभाव का सामना करना पड़ता है। तो अगर राजस्थान के जयपुर से महिलाओं और बालिकाओं को पुलिस प्रशिक्षण देने की शुरुआत आगामी 8 मार्च से हो रहीं है। तो क्यों न सूबे से ही ऐसी अलख निकले जिससे देश भर में पुलिस बल में महिलाओं की संख्या बढ़ाई जा सकें। अगर महिलाओं की संख्या बढ़ेगी, तो महिलाओं के प्रति अपराध भी कम होंगे, साथ में सूबे की आधी आबादी को अपने आप पर घटित आपबीती सुनाने में दिक्कत। तो अगर सारथी अभियान के माध्यम से सीधा संवाद अवाम से स्थापित करवाने का माध्यम लड़कियां बनेगी, तो उनको ज्ञान तो पुलिस भर्ती की बारीकियों का भी मिलना चाहिए, लेकिन अगर सारथी पहल के माध्यम से लाखों लड़कियां औऱ महिलाएं वालेंटियर्स के रूप में पुलिस और लोगों से जुड़ेंगी, तो यह भी सूबे की आधी आबादी के लिए गर्व की बात है। सारथी टीम व इसके संरक्षक दबंग आईपीएस पंकज चौधरी न सिर्फ प्रशंसा के पात्र है बल्कि एक नये युग का आगाज भी करने वाले है

18 Feb 2018

पाठक की धमकी

मोहनलाल मौर्य  
मुझे मोबाइल पर किसी ने धमकी दी है। धमकी दी है तो अंजाम भी देगा। यह तो अंजाम के वक्‍त ही तय होगा,किसका क्‍या अंजाम होगा। ‘मार दिया जाए,कि छोड़ दिया जाए,बोल तेरे साथ क्‍या सलूक किया जाए?’ उस वक्‍त यह किसका बोल होगा तथा ‘बोल’ का ‘मोल’ क्‍या होगा। वैसे भी इस महंगाई में धमकी देने का धंधा मंदी में चल रहा है। जरा-सी बात पर छुरा पेट में घुस देते हैं। अक्‍लमंद भी दस रूपए के लिए जान लेने पर उतारू हो जाता है। बहरहाल तो खामोश रहने में भलाई है। अन्‍यथा धमकी की चटनी चटा दी जाएंगी। जिसे चाटकर उसके स्‍वाद का अहसास अभी हो जाएंगा। इस वक्‍त मेरे मुंह के अंदर छालों ने हमला बोल रखा है। धमकी की चटनी और छालों का आमना-सामना हो गया तो जीभ बिना कसूर के ही  लहूलुहान हो जाएंगी। पाठक की धमकी
सोचा मिली धमकी की सूचना पुलिस को इतला कर दूं, क्‍योंकि ‘जान है तो जहान है।’ बिना समय गवाए पुलिस थाने पहुंच गया। थानेदार साहब से घबराते हुए बोला,साहब! अब आप ही कुछ कीजिए। वरना जिंदगी की पिच पर बिना रन लिए ही आउट हो जाऊंगा। यह सुनकर थानेदार साहब ने कहा कि घबराईए मत। आहिस्‍ता-आहिस्‍ता बताइए,  आखिरकार हुआ क्‍या है, तबी हम कुछ कर पाएंगे।
यह सुनकर मेरी सौ की स्‍पीड से चल रही सांसों पर ब्रेक लगाने के लिए,मैंने सांसों के ब्रेकर पर पैर रखा। धीरे-धीरे सांसों की गति कम हुई। रूकी नहीं। मैं बोला,साहब! सुबह-सुबह भगवान का स्‍मरण कर रहा था। तबी मोबाइल थरथराया। भगवान से स्‍मरण टूटकर मोबाइल से स्‍मरण जुड़ा। कॉल रिसीव की,स्‍मरण मरण में बदल गया।
अच्‍छा तो पहले यह बताओं कि तुम करते क्‍या हो?
साहब! मैं तो एक अदना सा लेखक हूं। यदा-कदा लिखता हूं। पत्र-पत्रि‍काओं में लगभग रोज छपता हूं। यदा-कदा लिखते होतो रोज कैसे छपते हो। साहब! वह क्‍या है कि सप्‍ताह में एक रचना लिखता हूं और वहीं किसी ना किसी अखबार में रोज सप्‍ताह भर छपता रहता है। इसलिए रोज छपता हूं। जरूरी तुम्‍हारी सम्‍पादकों से सांठगांठ होगी। नहीं साहब! सांठगांठ नहीं हैं। उनकी ईमेल आईडी हैं। जिन पर रचना प्रेषित कर देता हूं। अगले दिन छप जाता हूं। अगले दिन नहीं,तो उससे अगले दिन छप जाता हूं। उससे भी अगले दिन नहीं छपु तो अन्‍यत्र भेज देता हूं। लेकिन सम्‍पादक की ओर कोई रिप्‍लाई नहीं आती।
जरूर तुमने किसी के खिलाफ उल्‍टा-सीधा लिखा होगा। साहब! उल्‍टा-सीधा का क्‍या मतलब? मैं तो सीधा लिखता हूं,आप चाहे तो मेरी हैंड राइटिंग देख सकते है। अरे! मूर्ख मैं हैंड राइटिंग की बात नहीं कर रहा। किसी लेख-वेख में उल्‍टा-सीधा तो कुछ नहीं लिखा ना। साहब! लेख तो मैं लिखता ही नहीं हूं।
थानेदार साहब! झुंझलाते हुए बोले,अबे तो तून अभी कहा ना मैं लेखक हूं। लेखक लेख नहीं लिखता तो ओर क्‍या लिखता है? भजन लिखता है क्‍या? साहब मैं तो ‘व्‍यंग्‍य’ लिखता हूं। तो किसी व्‍यंग्‍य में उल्‍टा-सीधा लिख दिया होगा। साहब! व्‍यंग्‍य सीधा-सीधा थोड़ी लिखा जाता हैं। व्‍यंग्‍य तो उल्‍टा-सीधा ही लिखा जाता है।
अब आया ना ऊॅट पहाड़ के नीचे। जरूर तुने सरकार के खिलाफ व्‍यंग्‍य कसा होगा। नहीं साहब! तो किसी राजनेता के खिलाफ...या किसी भू माफिया के खिलाफ... या किसी डॉन या चोर उचक्‍के के खिलाफ...। नहीं साहब! जरूर किसी वरिष्‍ठ या गरिष्‍ठ साहित्‍यकार के खिलाफ व्‍यंग्‍य कसा होगा। नहीं साहब! व्‍यंग्‍य तो विसंगतियों पर लिखा जाता है। तो तुझे अभी मैंने जो बताए उनमें विसंगतियां नहीं दिखती?
दिखती है ना साहब! तो लिखता क्‍यों नहीं? लिखता हूं,साहब!
अबे मुझे क्‍यूं कंफ्यूज कर रहा है। कभी कहता है नहीं लिखता हूं,साहब! कभी कहता है लिखता हूं,साहब! खैर छोड़। यह बताओं धमकी देने वाले ने क्‍या कहा था? साहब! ठीक से याद नहीं,पर इत्‍ता जरूर याद है कि उसने यह कहा था कि अपने मन के मुताबिक मत कर वरना अंजाम बहुत बुरा होगा।
तो तुमने क्‍या बोला?
मैंने उससे कहा कि मैंने क्‍या गुनाह किया है? फिर वह क्‍या बोला? थानेदार साहब ने यह मुझसे पूछा। बोला क्‍या? कॉल कट गई या काट दी गई।
थानेदार साहब! ने अपने मुखबिर को सूचित किया। एक घंटे बाद मुखबिर ने धमकी देने वाले का नाम,पता बता दिया। थानेदार साहब ने उससे बात की। उसने धमकी की यह वजह बताई, जो उस वक्‍त मेरे समझ में नहीं आ रही थी। थानेदार ने मुझसे कहा, यह तुम्‍हारा प्रिय पाठक है। लो इससे बात करों।मैंने फोन लिया, हैलों...लेखकजी मैंने धमकी नहीं हिदायत दी थी कि तुम जब भी लिखते हो अपना की रोना रोता रहते हो। कभी हमारी भी सुन लिया करों। रोजी-रोटी,रोजगार,महामारी,महंगाई,भ्रष्‍टाचार,की बात कर लिया करों। तुम्‍हें अपने रोने-धोने से,पुरस्‍कार पाने से, साहित्‍यक राजनीति से फुर्सत मिले तो कभी हमारें गांव आकर देखना। हमारें यहां पर पानी नहीं।बिजली नहीं। सड़क नहीं। अस्‍पताल नहीं। बैंक नहीं। स्‍कूल नहीं। आवागमन के लिए बस नहीं। गरीबी,भूखमरी,तथा बेरोजगारी से जनता त्रस्‍त और सरकार मस्‍त हैं। लेकिन तुम तो पुरस्‍कार के लिए लड़ते हो। अध्‍यक्षता के लिए भिड़ते हो। वरिष्‍ठता का बखान करते हो। कलम सिर्फ कागज पर घिसने के लिए नहीं होती। इसे संगीन बनाओं तो ही असर करती है। कहकर उसने फोन काट दिया।

उसकी बातें सुनकर मैं थाने से वापस आ गया। तब से मैं यह सोच-सोचकर कोमा में हूं कि अगर सारे पाठक ऐसे ही लेखकों को धमकाने लगे,उन्‍हें सच का आईना दिखाने लगे तो हम लेखकों का क्‍या होगा?