18 Sept 2018

आनंदक्रीडा में बीता बचपन


मैं जन्‍म से ही दुबला-पतला था। इसकी पुष्टि उस फोटू से होती है,जो मेरे शैशवकाल की एकमात्र फोटू है। जिसमें मेरी मां और दादाजी कुरसी पर बैठी हुई हैं और मैं मां की गोद में बैठा हुआ शायद कैमरे की ओर निहार रहा हूं। उस वक्‍त मेरी उम्र यहीं कोई साल-डेढ़ साल की रही होगी। मां बताती है कि मैं इतना कमजोर पैदा हुआ था कि अड़ोसी-पड़ोसी यह कहते थे कि यह छोरा तो मुश्किल ही जी पाए। कहते है कि मां की ममता तथा मां के दूध में वह ताकत होती है कि वह निर्बल को भी बलवान बना देती है। इसी ताकत ने मुझे शक्ति प्रदान की और मैं आठवें या नौवें म‍हीनें में ही ठुमक-ठुमक कर चलने लगा।
दस-ग्‍यारह माह की उम्र में एक रोज आंगन में खेलते-खेलते छत पर जा पहुंचा। और वहीं खेलने में मशगूल हो गया। जब मां को मेरा ख्‍याल आया तो मैं नदारद था। इर्द-गिर्द देखा। नहीं मिला। सोचा यहीं-कहीं खेल रहा होगा। गृहस्‍थी के कामकाज में जुट गई। घंटा आध घंटा बाद फिर ख्‍याल आया तो कहीं नहीं दिखा। फिर मां घर से बाहर निकली। अड़ोसी-पड़ोसियों से पूछा। मोहल्‍ले में ढूंढ़ा। लेकिन कहीं नहीं मिला। हताश होकर मां घर लौट आई। एकाएक मां की नज़र मुझे पर गई और मुझे छत पर देखकर आंखे फटी की फटी रह गई। छत पर कैसे चढ़ा? कब चढ़ा? जैसे प्रश्‍न मां के मन में ही कौंधने लगे। मां ने बताया कि उस वक्‍त मैं घबरा गई थी। पकड़ने जाऊं और मुझे देखकर भागने ना लग जाए। अगर भागने लगा तो नीचे आ गिरेगा। यहीं सोचकर मां घबरा गई थी। मां ने सूझबूझ से काम लिया। बिना पदचाप किए धीरे-धीरे छत पर जा पहुंची। पीछे से मुझे जकड़ लिया। जैसे-तैसे गोद में उठाकर मुझे नीचे लेकर आई। तब मां ने राहत की सांस ली। इस घटना के बाद मां ने कभी भी मुझे ओझल नहीं होने दिया।

शैशवकाल के बाद बाल्‍यकाल में मैंने आनंदक्रीड़ा का आनंद लिया। उछलकूद,लम्‍बीकूद,रस्‍सीकूद तो यह मानों कि आंख मूंदकर कूदी। साईकल का टायर दौड़ाने में अग्रगामी था। स्‍कूल की छूट्टी के दिन तो साईकल के टायर की खूब पिटाई करता था। दिनभर हम सब टायर ही पिटने में लगे रहते थे। ये देखकर पिताजी कुपित हो जाते थे। हाथ से टायर छीनकर छप्‍पर पर प्रक्षेपित कर देते थे। और नसीहत से छोली भर देते थे। पढ़ता-लिखता तो है नहीं और दिनभर टायर पिटता रहता है। कमबख्‍त कहीं का। उस वक्‍त तो मैं पिटाई के डर के मारे चुपचाप पढ़ने बैठ जाता था। जैसे ही पिताजी इधर-उधर हुए कि छप्‍पर पर से टायर को उतारने के लिए उतावला रहता था। जैसे ही मौका मिलता उतार लेता था। छप्‍पर पर चढ़ने उतरने में मददगार नीम का पेड़ था। जो‍ कि छप्‍पर के पास मौजूद था। 
एक बार तो मैं बाल-बाल ही बचा। हुआ यूं कि नीम की जिस डाली को पकड़कर छप्‍पर पर उतर रहा था वह डाली टूट गई और मैं सीधे नीचे आ थमा। गनीमत यह रही कि मुझे खंरोच तक नहीं आई। अन्‍यथा खंरोच पर मरहम पट्टी की जगह पापाजी से फटकार की मरहम पट्टी बांधनी पड़ती। और टायर छप्‍पर के बजाया कुंए में प्रक्षेपित होता। या फिर कई दिनों तक टायर पिटने से महरूम होना पड़ता।
गिल्‍ली डंडा,लुका-छिपी,सतोलिया,कंचा भी बारी-बारी से खेलता था। यह सब खेल मेरे प्रिय खेल थे। कंचा खेलने में तो मैं उस्‍ताद था। मकर संक्रांति के दिनों में तो पेंट की दोनों जेब कंचों से भरी रहती थी। पतंगबाज़ी का तो इत्‍ता उन्‍माद था कि कठाके की सर्दी में भी पेंच लड़ाने में पहुंच जाता था। यह देखकर कठाके की सर्दी भी छुमंतर हो लेती थी। शहरों की मानिंद हम छत पर पेंच नहीं लड़ाते थे। खेत खलियानों में ही पतंग की डोर खींचते थे। एक बार घर से पतंग लेकर निकल गए तो शाम को ही वापस लौटते थे।

बचपन में खेलते-कूदते खेत-खलियानों में घूमते वक्‍त नीम व पीपल के पेड़ के कोटर से तोते के बच्‍चे पकड़कर घर ले आता था। कभी पिल्‍ला पकड़कर ले आता था। लेकिन कोई भी तोता का बच्‍चा सप्‍ताह भर से ज्‍यादा दिन का मेहमान नहीं रहा। नहीं रहने के पीछे दो ही कारण थे। पहला- बिल्‍ली नहीं रहने देती थी। पकड़कर खा जाती थी। दूसरा कारण था कि खुद खा पीकर फुर्र हो जाते थे। ऐसा भी नहीं था कि उनके रहने की जगह असुरक्षित थी। बाकायदा तूली का पिंजरा बनाकर पिंजरा प्रवेश करवाता था। उस में रहने-सहने से लेकर दाना-पानी की उत्‍तम व्‍यवस्‍था करता था। फिर भी उन्‍हें पिंजरा रास नहीं आता था और जैसे-तैसे पिंजरे से निकलकर फुर्र हो जाते थे। उस वक्‍त बालमन को ये थोड़ी पता था कि उन्‍मुक्‍त पंछी पिंजरे में नहीं रहते। वे तो गगन तले उन्‍मुक्‍त उड़ते हैं और बिना किसी भेदभाव,मनमुटाव,जाति-धर्म से अलहदा किसी भी मंदिर-मस्जिद में अपना आशियाना बनाकर मिल-झुलकर साथ-साथ रहते हैं।
पिल्‍लों को तो मैं देशी घी के बने लड्डू खिलाता था। लेकिन वे भी खा-पीकर चलते बनते थे। मैंने एक काला पिल्‍ला पाला था,जो खा-पीकर नहीं भागा। भागता कैसे? उसको मैंने देशी घी के लड्डू ही नहीं खिलाया। बल्कि अपने साथ अपने बिस्‍तर पर सुलाता था। एक दिन उसे देखकर एक बालमित्र बोला। बालकपन में बालमित्र ही होता है। ‘ये पिल्‍ला तो बहुत सुंदर है। लेकिन ये ओर भी सुंदर दिख सकता’ मैंने पूछा-‘कैसे?’ वह बोला-‘इसके दोनों कान आधे काट दो। फिर देखना।­­’ ये सुनकर मैं बोला-‘पिल्‍ले के कुछ हो गया तो।’ वह बोला-‘कुछ नहीं होगा।’ उस वक्‍त बालमित्र से बालमन ने सवाल किया। ‘कान काटेंगा कौन?’ यह सुनकर बालमित्र तपाक से बोला-‘अपन दोनों ही काट देंगे। ऐसा करना तू तो पकड़ लेना और मैं काट दूंगा।’ मैं बोला-‘ठीक है।’ हम दोनों पिल्‍ले को लेकर खेतों में चले गए। उसने एक कान तो काट दिया था। दूसरा कान आधे से कम कटा होगा कि बा‍लमित्र को काटकर भाग गया। दोनों के दोंनों उसके पीछे-पीछे भागे भी काफी दूर तक लेकिन पकड़ में ही नहीं आया। कुछेक दिन तो कहीं भी दिखाई नहीं दिया। एक दिन अवारों कुत्‍तों के झुंड में नज़र आया तो मैंने पकड़ने की कोशिश की लेकिन हाथ नहीं आया। जब भी कहीं भी मिलता तो मुझे देखते ही दुम दबाकर भाग जाता था। मुझे ऐसा लगता है शायद उस दिन के बाद उसे भय हो गया कहीं पकड़कर कान नहीं काट ले। वह जब त‍क जीवित रहा मोहल्‍लें में रहा और अधकटा कान लटकता ही रहा। जब भी मैं उसे देखता तो मुझे बहुत दुख होता और बालमित्र पर गुस्‍सा भी आता। उस वक्‍त भी यहीं सोचता था और आज भी कि उस दिन बालमित्र की बात टाल देता तो पिल्‍ला इस तरह दुम दबाकर नहीं भागता। बल्कि दुम हिलाता हुआ आता।

एक किस्‍सा तब का है। जब मैं सातवीं कक्षा में पढ़ता था और गणतंत्र दिवस की तैयारी हेतु एक दिन पूर्व शाला गणवेश के प्रेस करना था। उन दिनों कोयले की प्रेस का प्रचलन था। होने को तो इलेक्‍ट्रॉनिक प्रेस भी थी। लेकिन कोयले की प्रेस खुद के नहीं तो अड़ोसी-पड़ोसी के अवश्‍य मिल ही जाती थी। लेकिन उस दिन मुझे किसी के भी प्रेस नहीं मिली। तब मेरे दिमगा में आइडिया आया कि क्‍यों ना थाली में कोयले सुलगाकर प्रेस किया जाए। मैं बिना समय गंवाहे प्रेस करने में जुट गया। जैसे ही शर्ट पर थाली रखी शर्ट थाली के चिपक गई। उस दिन मैं बहुत रोया। रोया इसलिए कि मास्‍साब ने कहा था कि जो भी विद्यार्थी यूनिफार्म नहीं पहनकार आएंगा। उसकी अगले दिन अच्‍छे से धुनाई होगी। इस भय के कारण में गणतंत्र दिवस के दिन ही नहीं। बल्कि उसके अगले दिन भी स्‍कूल नहीं गया। इस तरह के बचपन उन तमाम लम्‍हों को आज याद करते हैं तो वे दिन ताजा हो जाते हैं और मन कहता वे दिन वापस लौट आए तो कितना मजा आए।

यहां बात लेखनी की करे तों मेरे लेखन की शुरूआत तब से हुई जब मैं ग्‍यारहवीं में पढ़ता था। तब मैंने अपने समाज के एक पाक्षिक अखबार में ‘राजनीति का भंवरा’ शीर्षक से कविता भेजी। लेकिन वह तो छपी नहीं और किसी ओर की कविता मेरे नाम से प्रकाशित हो गई। मुझे बधाई भी प्राप्‍त हुई। वह कविता भी छपी। लेकिन काफी दिनों बाद में। इसके बाद लम्‍बे अंतराल तक कुछ भी नहीं लिखा। अक्‍टुम्‍बर 2011 से मैंने समाज के ही पाक्षिक अखबार रघुवंशी रक्षक प‍त्र‍िका के लिए सामाजिक खबरें एवं सामाजिक उत्‍थान एवं सामाजिक करूतियों पर आलेख लिखने लगा। इन्‍हें दिनों से यदा-कदा राजस्‍थान पत्र‍िका एवं डेली न्‍यूज के पाठक पीठ में भी छपने लगा। 10 फरवरी 2015 को दैनिक जनवाणी में मेरी पहली व्‍यंग्‍य रचना ‘सम्‍मान समारोह में‍ शिरकत’ प्रकाशित हुई और इसके बाद में साल भर के लिए अंतराल का ताला लग गया। इस अंतराल में तीन कहानी अवश्‍य छपी। लेकिन व्‍यंग्‍य आलेख नहीं छपे। मैं अनवरत व्‍यंग्‍य लिखता रहा। न छपने पर कभी भी हताश नहीं हुआ। इस दौरान फेसबुक के जरिए मेरी मित्रता श्री निर्मल गुप्‍त सरजी हुई और उन्‍होंने मेरा मार्गदर्शन किया। जिनकों मैं अपना व्‍यंग्‍य गुरु मानता भी हूं। इन्‍हीं के शुभ आशीष से 16 मार्च 2016 को दैनिक ट्रि‍ब्‍यून में छपी व्‍यंग्‍य रचना के बाद लम्‍बा अन्‍तराल नहीं लगा। 




29 Aug 2018

मोबाइल की माहिमा


देखा भाईकमाल हो गया। कल का छोरा सब पर भारी हो गया। रामदुलारी भी पढ़-लिखकर कुछ ना कर पाई। जो उस छोरे ने कर दिखाया है। उसे देखकर मेरी तो आँखे ही फटी की फटी रह गई। इत्‍ती सी उम्र में इत्‍ता नॉलेज। वह भी बिना गए कॉलेज। और एक तुम हो जिससे कॉलेज पास आउट होने के बाद भी नॉलेज नहीं आई।
जरा हमें भी तो बताए रामदुलारी के बापू। किसने? राई के नौ पहाड़ कर दिया। जिसका इत्‍ता बखान कर रहे हो।’ मैंने पूछा। क्‍या है कि गाँव के छोटे-बड़े ग्‍यारसी लाल काका को रामदुलारी का बापू कहकर बुलाते हैं। सबके सामने छोटे-बड़ों से अलहदा आदरसूचक को काका निरादर ना समझ ले,इसीलिए मैंने रामदुलारी का बापू कहकर ही सम्‍बोधित किया। अकेले में तो काका कहकर ही सत्‍कार करता हूँ।
अरे! क्‍या बताए बेटा और क्‍या ना बताएं? अरेवह लल्‍लू का छोरा नहीं है क्‍या? उसकी उम्र में हमें तो ढंग से चड्डी भी नहीं पहनी आती थी। अर्धनग्‍न घूमते थे और दिनभर खेलने में मगन रहते थे। और उसे देखों! दुनिया भर के गेम बैठे-बैठे ही ऐसे खेल लेता है जैसे साँप सीढ़ी खेल रहा हो। वह जो गेम खेलता हैं। अगर वे ओलंपिक में होते तो अब से पहले सारे मेडल उसकी झोली में होते तथा गोल्‍ड मेडल तो उसी के नाम होता।’  
यह सुनकर मैं बोला,‘काकाक्‍यूँ मासूम बच्‍चे को झाड़ पर चढ़ा रहे हो? वह और गेम। उसे तो ढंग से गेमों का नेम भी नहीं पता। क्रिकेट,फूटबॉल,बॉलीवाल,बैंडमैंटिन,खेल है या मनोरंजन के साधन। ये भी नहीं जानता। वह तो घर की देहरी ही नहीं लांघता। लक्ष्‍मण रेखा के अंदर ही बंदर की तरह उछलता रहता है।
उसे बंदर समझकर परिहास का पात्र मत समझए। रावण ने भी हनुमानजी को बंदर समझा था। लेकिन जब हनुमानजी ने लंका में डंका बजाया तो सबके तोते उड़ गए थे। ये बंदर भी ना अंदर ही अंदर मोबाइल में किसी ना किसी गेम का गेम बजा रहा होता है।
काका के मुँह से यह सुनकर मेरी हँसी नहीं रुकी। मुश्किल से नियंत्रण करते हुए बोला,‘काका तुम भी ना कमाल करते हो।­’ 
काका बोला,‘मैंने क्‍या कमाल कर दियामैंने तो आँखों देखी लाइव का टेलिकास्‍ट किया है।’ 
मुझे लगता है,काका! तुम्‍हारे पास आज का संगी-साथी स्‍मार्टफोन नहीं है। होता तो तुम्‍हें ज्ञात होता।­’ 
अरे! मोबाइल तो मेरे पास एंड्रॉइड है,पर मुझसे तो ससुरे का लॉक भी दूसरे प्रयास में खुलता है।
तभी तो आपको इल्‍म नहीं है। लल्‍लू का छोरा तो फिर भी अनाड़ी है। लक्ष्‍मी की छोरी और मांगेलाल का छोरा तो  मंजे हुए खिलाड़ी हैं। आपको क्‍या पता?अपने मोहल्‍ले के अक्‍कू-नक्‍कू,चिंटू-पिंटू,रिया-दिव्‍या,बंटी-बबली तो इनके भी बाप हैं। ये तो मोबाइल में गेम नहीं बल्कि अपलोड से लेकर डाउनलोड तक करने में उस्‍ताद हैं।
बाप रे बाप! तुने तो मेरे आँखे खोल दी। मैं तो अनभिज्ञता में उसकी प्रशंसा का झंडा लहरा रहा था। मैं समझा लल्‍लू के छोरे में ही टैलेंटे है। मुझे क्‍या पता?आज के बच्‍चे  स्‍मार्टफोन की तरह स्‍मार्टनैस हैं। मल्‍टी टैलेंटेड हैं।
काका! आजकल के बच्‍चें कच्‍चे नहीं हैं। पक्‍के पकाए आम हैं। मोबाइल चलाने में तो परचम लहराए हुए हैं। जो बच्‍चे उठते-बैठते,सोते-जागते,खाते-पीते मोबाइल के उँगली करते रहते हैं,वे तो मोबाइल के हर एक एप्प को अच्‍छी तरह से चेकअप ना करले उससे पहले सुपुर्द नहीं करते। डिसचार्ज अवस्‍था में भी उससे छेड़छाड़ करे बिना नहीं रहते हैं। क्‍योंकि वे जानते है कि अभी तो सांस चल रही है। और जब तक मोबाइल में सांस है तब तक आस है।
अच्‍छा तो इसीलिए लल्‍लू छोरे को मोबाइल चलता देखकर प्रमुदित होता है।
काका! बच्‍चे को सारे दिन मोबाइल में उँगली करता देखकर माँ-बाप का खिलखिलाना। बच्‍चे के बचपन पर कुठाराघात करना है। सुरम्‍य सृष्टि को निहारने वाली दृष्टि को समय से पूर्व चश्‍में में गिरफ्त करना हैं। मोबाइल से होने वाली नोमोफोबिया जैसी बीमारियों को न्‍योता देना हैं।
यह सुनकर काका हँसने लगा। ‘भला मोबाइल से भी बीमारी होती है क्‍या? मोबाइल में तो दुनिया समाई हुई हैं। जिसे लोग तो दिनभर गर्दन झुकाकर टकटकी लगाए देखते रहते हैं। परसों ही गुलाब की लुगाई की लोकेशन मोबाइल ने ही बताई थी। जिसके साथ गुल खिलाने के लिए भागी थी उसको साथ में पकड़वाया था। जो सबकी खोज-खबर रखता है। भला उससे बीमारी कैसे होगी?
मैंने बोला,'अब तुम्‍हें कैसे समझाऊं? मोबाइल की बीमारी तो रामदुलारी ही बता देगी।
ये सुनकर काका फिर से हँसने लगे। ‘रामदुलारी ओर उसे मोबाइल की जानकारी। उसे जानकारी होती तो वह मुझे जरूर बताती। पहले प्रयास में लॉक खोलने का हुनर सीखाती। वह पारंगत होती तो मैं लल्‍लू को देखकर किंकर्तव्‍यविमूढ़ क्‍यों होतालल्‍लू की मानिंद प्रमुदित होता।
अरे,काका! तुम ना मजे ले रहे हो। रामदुलारी ओर उसे ना हो मोबाइल की जानकारी। ये तो सरासर झूठ है। उसने तो फेसबुक पर मचा रखी धूम है। फेसबुक की दीवानी को यूं ना कहों अज्ञानी। बुरा मान जाएंगी रामदुलारी। लाड़ली है तुम्‍हारी। सच में कमाल तो रामदुलारी ने किया है। रोज मिलनी वाली वन जीबी का हर रोज पूरा इस्‍तेमाल किया है। जिस दिन वन जीबी से भी पार नहीं पड़ी तो हॉटस्‍पॉट से उधार लिया है। अब तो आपका सीना गर्व से फूल गया होगा। और एक पते की बात और बताओं काकादरअसल में रोज मिलनी वाली वन जीबी ने तो अज्ञानी को भी ज्ञानी बना दिया है।
इस बार काका गंभीर होते हुए बोले,‘तुम्‍हारे मुताबिक रामदुलारी को जानकारी होते हुए भी मुझे कुछ ना बताई। यहाँ तक की लॉक खोलना भी नहीं सिखाई। आज उसकी खैर नहीं। लेकिन मोबाइल से होने वाली यह नोमोफोबिया कौनसी बीमारी हैइसके बारे में आज से पहले कभी नहीं सुना। क्‍या टीबी,कैंसर से भी खतरनाक है। यह नोमोफोबिया है क्‍या भला? ’
काका को समझाना तो टेढ़ी खीर है। फिर भी प्रयास किया। मैंने उनसे पूछा ‘ काका! तुम मोबाइल के बगैर कितनी देर रह सकते हो।
काका बोला,‘ मोबाइल के बिना तो एक पल भी जीना मुहाल लगता है। मैं तो रात को भी बगल में रखकर सोता हूँ। बाथरूम भी जाता हूँ तो साथ ले जाता हूँ। आज के युग में मोबाइल ही तो सुख-दुख का संगी-साथी है। जैसा कि कुछ देर पहले तुमने ही बताया था।
इतना सुनते ही मेरे मुँह से तत्काल से निकल गया।‘ जो तुमने बताया वे नोमोफोबिया के ही लक्षण है।’ यह सुनकर काका चलते बने।

19 Aug 2018

मृत्युभोज की लपटें


मुर्दे की राख ठंडी भी नहीं हुई थी। मृत्युभोज की लपटें उठने लगी। उठती लपटों को बुझाने के बजाय सुलगाने लगे। लपटें श्मशान से घर तक आ गई। परिजनों को चपेट में लेने लगी। मृतक की पत्नी बेसुध थी। बच्चे विलाप में डूबे हुए थे। मृत्युभोज की लपटे छूते ही तिलमिला उठे। समाज बोल उठा,‘यह लपटें तो सहनी पड़ेगी। आज नहीं तो कल। इनसे बचना मुश्किल है। हर हाल में सहना होगा। बहरहाल सह लिया तो हर तरह से बच जाओगे।’

सांत्वना देने आए नाते-रिश्तेदारों ने भी समाज के वक्तव्य को विहित बताया। अपने वक्तव्य से चेताया भी। यहाँ हस्तियों को कब तक रखेंगेइन्हें गंगा में विसर्जित करनी होंगी। तभी मृतकी आत्मा को आत्मशांति मिलेगी। नहीं तो भूत-प्रेत बन जाएगा। भूत-प्रेत बन गया तो तुम्हें ही हैरान करेगा। मानते हैं इस वक्त लपटे तीव्र है पर जब तक सहन नहीं करोगे। तब तक धधकती रहेगी। बुझेगी नहीं। बल्कि बाद में तो समाज तानो का केरोसिन डालकर ज्यादा दहकाता रहेगा। उस वक्त तिलमिलाओगे ही नही। तड़पोगे भी। बाद में एक दिन चुपचाप सहन भी करोगे। तो अभी कर लो। मृत्युभोज भारी बोझ है। लंबे समय तक उठाए रखना मूर्खता है। इस बोझ को तो तेरहवीं पर ही उतार देना चाहिए। जो तेरहवीं पर नहीं उतारते हैं। वे इस के बोझ तले दबकर मर भी जाते हैं। कई मर भी गए हैं। जो इस बोझ तले दबकर मरते हैं,वे बोझ पर बोझ छोड़ जाते हैं। जो फिर पीछे वालो से उतारने से भी नहीं उतरता। इसलिए ज्यादा सोच-विचार मत करो,सहन कर लो।
सबकी सुनकर मृतक की पत्नी साड़ी के पल्लू से आँसू पोंछती हुई बोली,‘सहन कैसे करेसहने के लिए पैसा चाहिए। पैसा है नहीं। जो था मृतक की बीमारी में लग गया। एकमात्र पचास हजार की एफडी बची है,जो बच्चों के भविष्य को संवारने में काम आएगी। एफडी तुड़वाकर सहन कर लिया तो बच्चों का भविष्य चौपट हो जाएगा। जब बच्चे काबिल होंगे। तब सहन कर लेंगे। बहरहाल तो मृत्युभोज की उठती लपटों पर पानी डालिए। हमें बचाइए। यहीं हमारे प्रति तुम्हारी सांत्वना होगी।’
उसकी संवेदना पर किसी ने भी सांत्वना की बाल्टी से पानी नहीं डाला। मरने वाला मर कर भी नहीं मरा था। बस उसका शरीर पंचतत्व में विलीन हुआ था। मर गया होता तो मृत्युभोज की लपटें नहीं उठती। पता नहीं कब और किसकी मृत्यु पर यह लपटे उठी थी,जो आज तक नहीं बुझ पाई है। लपटे बेकाबू होने लगी। काबू में करने के लिए परिजनों ने संवेदना के पानी से भरी मटकिया उड़ेलने लगे। फिर भी मृत्युभोज की लपटें बुझी नहीं। बल्कि ज्यादा दहकने लगी। दहकती हुई चारों तरफ फैल गई। बचना मुश्किल था। अपनी आगोश में ले उससे पहले ही एफडी व कर्ज की फायर ब्रिगेड से नियंत्रण किया। 

यह देखकर खामोश हस्तियां भी हंसने लगी। बोली,‘यह कैसी रवायत है? हमें गंगा में विसर्जित करने के लिए इस तरह तामझाम। कुटुंब सहित गंगा स्नान। मृत्युभोज के नाम पर सामूहिक भोज। जिसमें एक से बढ़कर एक पकवान। मेहमानों को स्मृति भेट। जानवर भी अपने साथी के मरने पर वियोग करते हैं और यहाँ मनुष्य अपने सगे-संबंधी के मरने पर भोज करने पर तुले हैं। खुशी के मौके पर तो मिठाइयां चलती है पर मरने पर शर्मनाक है। यह व्यर्थ खर्च नहीं तो और क्या है? यह तो पीड़ादायक कुरीति है।’

पर हस्तियों की सुनने वाला कौन था? वे तो मटकी के अंदर थी। ऊपर से मुँह सफेद कपड़े से  बंधा हुआ था। बाहर तो आवाज ही नहीं पहुँची होगी। जिस दिन मटकी के मुँह पर से सफेद कपड़ा हट गया। खुद हस्तियां ही मृत्युभोज पर प्रतिबंध लगा देंगी। अंततः अस्थियां गंगा में विसर्जित की गई और तेरहवीं पर मृत्युभोज होकर ही रहा।

29 Jul 2018

एक पाठक की धमकी


मुझे मोबाइल पर किसी ने धमकी दी है। धमकी दी है तो अंजाम भी देगा। सोचा मिली धमकी की सूचना पुलिस को इतला कर दूं,क्‍योंकि जान है तो जहान है।बिना समय गवाए पुलिस थाने पहुँच गया। थानेदार साहब से घबराते हुए बोला, ‘साहबअब आप ही कुछ कीजिए। वरना ज़िंदगी की पिच पर बिना रन लिए ही आउट हो जाऊंगा। यह सुनकर थानेदार साहब ने कहा कि घबराईए मत। आहिस्‍ता-आहिस्‍ता बताइए,आखिरकार हुआ क्‍या है,तबी हम कुछ कर पाएंगे।
मैं बोला,साहब! सुबह-सुबह भगवान का स्‍मरण कर रहा था। तबी मोबाइल थरथराया। भगवान से स्‍मरण टूटकर मोबाइल से स्‍मरण जुड़ा। कॉल रिसीव की,स्‍मरण मरण में बदल गया।
अच्‍छा तो पहले यह बताओं कि तुम करते क्‍या हो?
साहब! मैं तो एक अदना सा लेखक हूँ। यदा-कदा लिखता हूँ। पत्र-पत्रि‍काओं में लगभग रोज छपता हूँ।
यदा-कदा लिखते हो तो रोज कैसे छपते हो। 
साहबवह क्‍या है कि सप्‍ताह में एक रचना लिखता हूँ और वही ही किसी ना किसी अखबार में रोज सप्‍ताह भर छपती रहती है। इसलिए रोज छपता हूँ। 
जरूरी तुम्‍हारी सम्‍पादकों से सांठगांठ होगी। 
नहीं साहब! सांठगांठ नहीं हैं। उनकी ईमेल आईडी हैं। जिन पर रचना प्रेषित कर देता हूँ। अगले दिन छप जाता हूँ। अगले दिन नहीं,तो उससे अगले दिन छप जाता हूँ। उससे भी अगले दिन नहीं छपु तो अन्‍यत्र भेज देता हूँ। लेकिन सम्‍पादक की ओर  से कोई रिप्‍लाई नहीं आती।
जरूर तुमने किसी के खिलाफ उल्‍टा-सीधा लिखा होगा।
साहबउल्‍टा-सीधा का क्‍या मतलब? मैं तो सीधा लिखता हूँ। आप चाहे तो मेरी हैंड राइटिंग देख सकते है।
अरेमूर्ख मैं हैंड राइटिंग की बात नहीं कर रहा। किसी लेख-वेख में उल्‍टा-सीधा तो कुछ नहीं लिखा ना। 
साहब!लेख तो मैं लिखता ही नहीं हूँ।
थानेदार साहब! झुंझलाते हुए बोले, ‘अबे तो तून अभी कहा ना मैं लेखक हूँ। लेखक लेख नहीं लिखता तो ओर क्‍या लिखता है? भजन लिखता है क्‍या? साहब मैं तो व्‍यंग्‍यलिखता हूँ। 
तो किसी व्‍यंग्‍य में उल्‍टा-सीधा लिख दिया होगा। 
साहबव्‍यंग्‍य सीधा-सीधा थोड़ी लिखा जाता हैं। व्‍यंग्‍य तो उल्‍टा-सीधा ही लिखा जाता है।
अब आया ना ऊॅट पहाड़ के नीचे। जरूर तुने सरकार के खिलाफ व्‍यंग्‍य कसा होगा। 
नहीं साहब! 
तो किसी राजनेता के खिलाफ...या किसी भू माफिया के खिलाफ... या किसी डॉन या चोर उचक्‍के के खिलाफ...।
 नहीं साहब! 
जरूर किसी वरिष्‍ठ या गरिष्‍ठ साहित्‍यकार के खिलाफ व्‍यंग्‍य कसा होगा। 
नहीं साहबव्‍यंग्‍य तो विसंगतियों पर लिखा जाता है। 
तो तुझे अभी मैंने जो बताए उनमें विसंगतियां नहीं दिखती?
दिखती है ना साहब! तो लिखता क्‍यों नहीं? लिखता हूँ, ना साहब!
अबे मुझे क्‍यूं कंफ्यूज कर रहा है। कभी कहता है नहीं लिखता हूँ,साहबकभी कहता है लिखता हूँ,साहबखैर छोड़। यह बताओं धमकी देने वाले ने क्‍या कहा था?
साहबठीक से याद नहीं,पर इत्‍ता जरूर याद है कि उसने यह कहा था कि अपने मन के मुताबिक मत कर वरना अंजाम बहुत बुरा होगा।
तो तुमने क्‍या बोला?
मैंने उससे कहा कि मैंने क्‍या गुनाह किया है? फिर वह क्‍या बोला? थानेदार साहब ने यह मुझसे पूछा। बोला क्‍या? कॉल कट गई या काट दी गई।
थानेदार साहब! ने अपने मुखबिर को सूचित किया। एक घंटे बाद मुखबिर ने धमकी देने वाले का नाम,पता बता दिया। थानेदार साहब ने उससे बात की। उसने धमकी की यह वजह बताई, जो उस वक्‍त मेरे समझ में नहीं आ रही थी। थानेदार ने मुझसे कहायह तुम्‍हारा प्रिय पाठक है। लो इससे बात करों।’ 
मैंने फोन लियाहैलों...लेखकजी मैंने धमकी नहीं हिदायत दी थी कि तुम जब भी लिखते हो अपना की रोना रोता रहते हो। कभी हमारी भी सुन लिया करों। रोजी-रोटी,रोजगार,महामारी,महंगाई,भ्रष्‍टाचार,की बात कर लिया करों। तुम्‍हें अपने रोने-धोने से,पुरस्‍कार पाने से, साहित्‍यक राजनीति से फुर्सत मिले तो कभी हमारें गाँव आकर देखना। हमारें यहाँ पर पानी नहीं। बिजली नहीं। सड़क नहीं। अस्‍पताल नहीं। बैंक नहीं। स्‍कूल नहीं। आवागमन के लिए बस नहीं। गरीबी,भूखमरी,तथा बेरोजगारी से जनता त्रस्‍त और सरकार मस्‍त हैं। लेकिन तुम तो पुरस्‍कार के लिए लड़ते हो। अध्‍यक्षता के लिए भिड़ते हो। वरिष्‍ठता का बखान करते हो। कलम सिर्फ कागज पर घिसने के लिए नहीं होती। इसे संगीन बनाओं तो ही असर करती है। कहकर उसने फोन काट दिया।
उसकी बातें सुनकर मैं थाने से वापस आ गया। तब से मैं यह सोच-सोचकर कोमा में हूँ कि अगर सारे पाठक ऐसे ही लेखकों को धमकाने लगे,उन्‍हें सच का आईना दिखाने लगे तो हम लेखकों का क्‍या होगा?

24 Jul 2018

घर बैठे समस्या का समाधान

आजकल सबको घर बैठे-बिठाए समाधान चाहिए। खर्चा-पानी भले ही चार गुना लग जाए। लेकिन समस्या का समाधान घर बैठे ही होना चाहिए। रोज व्यक्ति को अनेकानेक समस्याओं से लड़ना पड़ता है। इस दौरान कभी चारों खाने चित तो कभी हार का मुंह देखना पड़ता है। इस हार-जीत से छूटकारा पाने के लिए,वह घर बैठे समाधान चाहता है। घर बैठे समस्या का समाधान 

आजकल घर बैठे समाधान करने वाले भी,हर जगह दुकान खोले बैठे हैं। इन्‍होंने अपना कारोबार ऑनलाइन से लेकर ऑफलाइन तक फैला रखा है। इनकी दुकान कस्टमर को पटाने के तमाम नायाब तरीकों से खचाखच भरी हुई रहती है। एक बार जो कस्टमर आ गया। वह समाधान खरीद कर ले ही जाएगा। यह समस्या का समाधान गारंटी के साथ करने का दावा भी करते हैं।

मसलन, गृह-क्लेश,आपसी मनमुटाव,पति-पत्नी में अनबन, गुप्त रोगी आदि इत्यादि समस्याओं का गारंटी के साथ घर बैठे समाधान। श्रीश्री गुरुजी द्वारा तैयार किया कवच मंगवाए। उसे पहनिए और समस्याओं से छूटकारा पाए। समस्या का समाधान नहीं हो तो पूरे पैसे वापस। तो देर किस बात की मोबाइल उठाइए और नीचे दी गई स्क्रीन पर दिए गए नंबरों पर लगाइए और घर बैठे हमारा प्रोडक्ट मंगवाए। जब टीवी स्क्रीन पर इस तरह का विज्ञापन बार-बार आता है तो लोग उसे ललचाए निगाहों से देखते हैं। और देखते-देखते ही ऑडर कर देते हैं। 

चाचा ग्यारसी लाल कई दिनों से किसी समस्या से जूझ रहे थे। चाचा ने लगा दिया फोन। एक सप्ताह उपरांत आया पार्सल। चाचा ने पार्सल खोला। पार्सल में घास-फूस और एक चिट्ठी थी। जिस तरह बस में लिखा हुआ होता है,‘सवारी अपने सामान की रक्षा स्वयं करें।’ उसी तरह चिट्ठी में लिखा हुआ था,‘अपनी समस्या का समाधान स्वयं करें।’ यह पढ़कर चाचा अपना सिर पीटने लगे। मैंने कहा, ‘चाचाश्री! सिर  पीटने से अब कुछ नहीं होगा। ऐसे समाधान होने लगे तो पता है न आपको देश में कितनी समस्याएं हैं। गिनाने लगे तो सुबह से शाम हो जाएगी। अगर ऐसे समाधान होते तो हमें दुश्मन से लड़ने की जरूरत ही नहीं होती। समस्याओं का ऐसे समाधान होने लगता तो मुल्क में भ्रष्टाचारमहंगाईबेरोजगारी, ऐसे खुलेआम नहीं घूमती। हमारे यहां तो टोल फ्री हेल्प लाइन पर समस्याओं का समाधान नहीं होता। सौ बार फोन लगाओं तो बड़ी मुश्किल से एक बार लगता है। जब तक पूरी जन्‍म कुण्‍ड़ली नहीं जान लेंगे उससे पहले शिकायत दर्ज नहीं करते। शीघ्र आपकी समस्‍या का समाधान कर दिया जाएंगा। यह कहकर पूरी बात सुनने से पहले फोन काट देते हैं।’  
चाचा बोले,‘बेटे मेरे तीन हजार रुपए का क्या होगा?’ मैंने चाचा को सांत्वना देते हुए कहा,‘जिस तरह श्मशान में गई हुई लकड़ी वापस नहीं आती। उसी तरह उनके पास गए हुए पैसे वापस नहीं आते।’
मेरा पड़ोसी भी एक बार झांसे में आ गया था। उसके घर पर चूहों ने हमला बोल दिया था। एक व्यक्ति चूहे मारने की दवा बेच रहा था। उसने उससे दस पैकेट खरीदे। घर आकर खोले तो हर पैकेट में एक ही बात लिखी हुई थी,चूहे पकड़िए और मारिए। आप भी ऐसे समाधानों से दूर रहेंगे तो बेहतर है। 

12 Jul 2018

चार लोग क्या कहेंगे!


व्यक्ति चार लोगों से डरता है। इन चार का न हो तो मनुष्‍य क्या से क्या कर डाले। कभी ना कभी इन चार से आपका भी पाला पड़ा होगा क्‍योंकि ये ‘चार लोग आप हम में से ही होते हैं। जरूरी नहीं पुरूष ही हो। महिलाएं भी हो सकती हैं,बल्कि महिलाएं ज्‍यादा होती हैं। ये चारों नारदीय गुणों से युक्‍त होते हैं। राई का पहाड़ और बात का बतंगड़ बनाना इनका ‘ऑल आइम फेवरेट’ काम होता है। ये किसी के फटे में ही टांग नहीं अड़ाते, बल्कि कई बार तो अच्‍छे-भले को पहले खुद फाड़ते हैं,फिर उसमें टांग अड़ाकर उसे चीर ही डालते हैं। ये पुराने से पुराने और नए से नए में भी अपनी टांग फंसाने हा हुनर रखते हैं। ये चरित्र से लेकर इज्‍जत और अफवाह से लेकर कानाफूसी तक को उछालने,उड़ाने और हवा देने में गजब के माहिर होते हैं। चार लोग क्या कहेंगे!
यदि आप यह सोच रहे हैं कि ‘ये चार’ कहां पाए जाते हैं,तो ज्‍यादा दूर जाने की जरूरत नहीं। आप नजरें उठाकर देखिए,‘ये चारों’ आपको आपपास ही मिल जाएंगे। यदि चार न दिखकर तीन ही दिखें तो भी चिंतित मह होइए,क्‍योंकि कभी-कभी तो आप स्‍वयं भी इन्‍हीं चार में से एक होते हैं।
दरअसल, ये चार लोग अपनी शातिर निगाहों से चलते-चलते कब अपने मतलब की बात ताड़ जांए, खुद उन्‍हें भी पता नहीं चलता। शास्‍त्रों में ‘ताड़न के अधिकारी’ इन्‍हें ही कहा गया है,क्‍योंकि ‘ताड़ जाने पर इनका खासा अधिकार होता है।’
    
कौन कब घर आ रहा है, कब जा रहा हैकहां से आ रहा है,कहां जा रहा हैकिसके नल में ज्यादा पानी आता है, किसके में कम? रामू के घर में क्या चल रहा हैश्यामू की बीवी बेलन से उसकी रोज मरम्‍मत क्‍यों करती हैमदन की बीवी अपनी पड़ोसिनों कमला और विमला से क्‍या कानाफूसी करती हैजेठाराम का लड़का किसकी लड़की से नैन मटक्‍का कर रहा हैइन सब बातों की भनक लगते ही ‘ये चार’ इन रहस्‍यों को किसी सैटेलाइट की तरह अफवाह की कक्षा में प्रेक्षपित कर देते हैं। बाकी का काम ‘मोहल्‍ले का सौरमंडल’ कर देता है।
इनकी पहली शर्त होती है देख, तुझे बता रहा हूं, किसी से कहना मत।’ यदि आप कह भी दें कि ‘मैं तो बताऊंगा’, तब भी इनके पेट में कुछ टिकेगा नहीं, ये आपको सब बताकर ही चैन लेंगे। वस्‍तुतः इन चारों की पाचन शक्ति बहुत कमजोर होती है। इन्‍हें कोई बात बताकर भले ‘कसम का चूर्ण’ खिला दो, बात पचेगी नहीं। मरोड़ उठेगी और ये तुंरत किसी के कान में उल्‍टी कर देंगे।
लोग सलाह देते हैं कि समाज में इज्‍जत और शांति से रहना है तो इन चार लोगों से बचों, लेकिन सलाह देने वाला भी तो इन चार में से एक होता है। अब उससे कैसे बचें?

9 Jul 2018

झमाझम बारिश का दृश्य


मानसून की मेहरबानी से झमाझम बारिश हो रही है। सड़क जल से लबालब है। उसमें बच्चे कागज की कश्ती तैरा-तैराकर धमाचौकड़ी मचा रहे हैं। मैं खिड़की में से इस नैसर्गिक सौंदर्य को निहार रहा हूँ। रामू काका साइकिल पर चले आ रहे है। वे एकदम से रपटकर इस तरह गिरते हैंजैसे गठबंधन से बनी सरकार एकाएक टूटकर गिर जाती है। यह देखकर बच्चे खिलखिलाने लगते हैं। काका को उठाने के लिए बच्चे हाथ बढ़ाते हैं उससे पहले वह खुद ही लड़खड़ाते हुए चल देता है। इनके पीछे चली आ रही आंटी के हाथ से छाता ऐसे उछल कर गिराजैसे कि उसका भी मन झमाझम बारिश में भीगने को मचल रहा हो। यह तो शुक्र है कि एक बच्चे ने झट से पकड़कर छाता आंटी को सौंप दिया। अन्यथा छाता झमाझम बारिश का पूरा आनंद लेता। इसी तरह सब्जी वाले की रेहड़ी से आलूटमाटर,टिंडे झमाझम बारिश में भीगने के लिए अपने ऊपर रखी खाली बोरी से बाहर निकल रहे थे।
इस दरमियान एक बच्चे की कश्ती डूबने लगती है। वह अपनी डूबती कश्ती को उसी तरह बचाने का पुरजोर प्रयास करता है। जिस तरह लोकतंत्रवादी लोकतंत्र को बचाने के लिए प्रयास करते हैं। उसका प्रयास उसी भाँति विफल हो जाता है,जिस भाँति एक लोकतंत्रवादी का हो जाता है। बच्चा थोड़ी देर तो रोता है। उसके बाद बच्चों के संग नई कागज की कश्ती बनाकर धमाचौकड़ी मचाने में मशगूल हो जाता है।
यहां से मेरी नज़र एकाएक दीनू काका पर जा टिकती हैंजो छत से टपकते पानी से उसी तरह परेशान है। जिस तरह लोग दिन-ब-दिन बढ़ती महंगाई से परेशान हैं। उसके सारे बिस्तर भीग गई गए हैं। और खुद भी भीग गया है। जिस तरह महंगाई का कोई हल नहीं निकल पा रहा है। उसी तरह दीनू काका को इस झमाझम बारिश में छाता नहीं मिल पा रहा है। सीबीआई की तरह घर के सभी सदस्य छाते को खोजने में लगे हुए हैं। छाता है कि किसी कुख्यात अपराधी की तरह न जाने कहां छुपा हुआ है। घर के बीहड़ इलाके तक में ढूंढ लिया पर हाथ नहीं लग रहा। छाता मिल जाए तो छत का जायजा कर आए। जायजा हो जाए तो कुछ ना कुछ जुगाड़ ही कराए।
यहीं से मेरी नजरें उनके पड़ोसी की रसोई पर जा टिकती हैं। भाई साहब जी झमाझम बारिश में इस तरह से कढ़ाई में से गरमा-गरम पकौड़ी निकाल कर भाभी जी को खिला रहे थे। जिन्हें देखकर कर मेरे भी मुंह में पानी आ गया और पकौड़ी खाने के लिए जी ललचाने लगा। लेकिन ललचाता जी उस लड़की को देखकर झूमने लगाजो अपनी बालकनी में से हाथ निकालकर झमाझम बारिश के संग झूम रही थी। बौछारे उसके तन-मन को छूकर इतनी प्रफुल्लित हो रही थी कि धरा पर ही नहीं गिर रही थी। 
खिड़की से दृश्य बदलता है देख रहा हूँ कि मास्टर आनंदीलाल जी कुर्सी पर बरामदे में बैठे हुए हैं और अखबार में देश-दुनिया की सैर पर हैं। देश-दुनिया की सैर सपाटे के बीच-बीच में झमाझम बारिश को इस कधर निहार रहे हैंजैसे की चालान काटते हुए ट्रैफिक हवलदार निहारता है। मास्टरजी के सामने रहने वाली शारदा काकी के घर में भरा बारिश का पानी उसी तरह नहीं निकल रहा है। जिस तरह देश से भ्रष्टाचार नहीं निकल रहा है। वह उसी तरह बारिश के पानी को घर से बाहर निकालने में जुटी हुई है। जिस तरह से एसीबी वाले भ्रष्टाचार को निकालने में लगे रहते हैं। पर वह जितना पानी निकाल रही है उससे ज्यादा घुस रहा है।
मैं खिड़की से देख रहा हूं कि झमाझम बारिश थम चुकी है। लेकिन बच्चें अब भी धमाचौकड़ी में मशगूल हैं। दीनू काका छत पर आ पहुंचा है। मास्टर जी अखबारी देश-दुनिया की सैर कर पलंग पर खर्राटे भर रहे हैं। पकौड़ी वाले भाई साहब जी कढ़ाई मांज रहे हैं और भाभी जी छत पर जाकर सेल्फी दर सेल्फी ले रही है। फेसबुक पर चिपकाने के लिए। बालकनी वाली लड़की बालकनी से गायब है।शारदा काकी सरपंच को कोस रही है। उसने प्रधानमंत्री आवास का आश्वासन दिया था लेकिन बनवाया नहीं। और मैं गरमा-गरम चाय के मजा ले रहा हूँ।