8 Mar 2019

पड़ोसी ही पड़ोसी के काम आता है


मैं अपने पड़ोसी से उतना ही दुखी हूँ। जितना की आम आदमी बढ़ती महँगाई से है। गरीब गरीबी से है। बेरोजगार बेरोजगारी से है। उसकी रोज-रोज की उधारी से मुझे ब्लड प्रेशर की बीमारी हो गई है। वह इतना मीठा बोलता है,जैसे कि उसकी वाणी में मिश्री घुली हुई हो। उसके मीठे बोल सुनकर कहीं मुझे शुगर नहीं हो जाए। इस डर से वह जो भी चीज लेने आता हैं,मैं तत्काल दे देता हूँ। लेकिन वह तत्काल को आपातकाल में भी वापस नहीं करता है। कहता है कि मालामाल के क्या मांगे आपातकाल। उसके मुँह से मालामाल शब्द सुनकर मेरे मुँह से भी निकल जाता है कि तेरे मुँह में घी शक्कर। घी शक्कर का नाम सुनते ही उसके मुँह में पानी आ जाता है और वह उसी वक्त घी शक्कर मांग लेता है।
मौके पर चौका मारने में कभी नहीं चूकता है। मौके की तो वाइड गेंद को भी नहीं छोड़ता है। उस पर भी ऐसे घुमाकर मारता है कि गेंद सीधी मौके की बाउंड्री पर जाकर गिरती है। उस पर गुस्सा तो बहुत आता है। लेकिन वह मुझे गुस्सा थूकने वाला पान खिला देता है। जिसको खाने से मेरा सातवें आसमान पर चढ़ा गुस्सा भी उतर आता है और चेहरा चमक जाता है। चेहरे पर चमक देखकर वह नमक तक माँग लेता है। उसे माँगने में कतई शर्म नहीं आती है। शर्म को तो उसने खूँटी के टाँग रखा है। आएगी कहाँ से। बेझिझक आता है और जो चाहिए वह लिया जाता है। कोई मना कर दे तो मनुहार करके उसे खुश कर देता है। फिर वह खुशहाली में थाली भरकर देता है। खाली हाथ तो कभी नहीं लौटा है। बच्चों के गाल सहलाकर दाल तो इतनी ले जा चुका है,चुकाए तो उसके बाल तक बिक जाए। गृहस्थी की सरकार घाटे में चल रही है,ऐसा कहकर आटा तो आए दिन लेने आ जाता है। डाटा की तो पूछिए मत। हॉटस्‍पॉट ऑन करने के लिए सुबह चार बजे से ही  मिस कॉल पर मिस कॉल देने लगता हैं।
आदत से इतना लाचार हैं कि आचार तक नहीं छोड़ता है और विचार-विमर्श इस तरह करता है,जैसे कि बहुत बड़ा विचारक हो। जबकि विचारक कम प्रचारक ज्यादा है। क्योंकि वह गोपनीय बात का भी प्रचार-प्रसार करे बिना नहीं रहता है। सच पूछिए तो,मेरे तो किसी भी काम के लायक नहीं है, फिर भी मांगने पर उसे अपनी बाइक देनी पड़ती है। नहीं दूं तो भय रहता है,पड़ोसी धर्म संकट में नहीं पड़ जाए। क्योंकि मैं धर्म के मामले में बहुत धार्मिक हूँ। वह इसी का फायदा उठाता है। जामन के लिए भी आधी रात में आकर दरवाजा खटखटा देता है। गहरी नींद में सोया हो तो भी जगा देता है। वक्त की नजाकत देखकर भाषा शैली का प्रयोग करता है। डिस्टर्ब करके कहता है कि डिस्टर्ब के लिए क्षमा चाहता हूँ। दरअसल क्या है कि जावन को बिल्ली चाट गई। भले ही रखना भूल ही गया हो,लेकिन कहेगा हमेशा यही कि बिल्ली चाट गई।
इतना चतुर चालाक है कि लोमड़ी तक को अपनी गिरफ्त में कर लेता है। मुझे ही देख लो! मेरी उँगली पकड़ता-पकड़ता पहुँचा पकड़ लिया है। मुझे डर है कि गर्दन नहीं पकड़ ले। किसी दिन गर्दन पकड़ ली तो क्या होगा? जो माँगेगा वही देना पड़ेगा। नहीं दिया तो जान से हाथ धोना पड़ेगा। लेकिन मेरी पत्नी को पूरा विश्वास है,वह विश्वासघात तो कभी नहीं करेगा। उसे क्या मालूम नहीं,तुमने कभी उसको आलू के लिए भी मना नहीं किया है। ईमेल बाद में किया है,पहले उसे तेल दिया है। तुम्हें मारकर वह अपनी उधार की दुकान क्यों बंद करेगा? बल्कि वह तो तुम्हारी लंबी उम्र की दुआ करता होगा। वह और दुआ। कल ही मना कर दूं तो स्वाहा कर देगा।
मेरा यह पड़ोसी आलू प्याज ही नहीं, बल्कि ब्याज के नाम पर रुपया तक ले जाता है। लेकिन जब देने आता है तो मूल रकम तो अदा कर देता है, पर ब्याज जीम जाता है। मांगता हूँ तो बहानेबाजी कर जाता है। यह बहानेबाजी में भी अव्वल है। ऐसा बहाना बनाता है कि यकीन नहीं हो तो भी यकीन करना पड़ता है। कभी खुद तो कभी बीबी-बच्चों को बीमार कर देता है। खाँसी जुकाम को भी गंभीर बीमारी का रुप देकर घर बैठे को आईसीयू में भर्ती कर देता है। झूठ की पराकाष्ठा तक को लाँघने में कतई नहीं झिझकता है। आँख मूंदकर छलांग लगा देता है। क्योंकि यह  झूठ, पाखंड जैसी कलाओं में कलाकार आदमी है। सच कहूं तो यह पड़ोसी नहीं एक बला है, जो कि टालने से भी नहीं टलती है। 
मेरे इस पड़ोसी की एक अहम बात तो बताना भूल ही गया। इसका एक आदर्श वाक्य हैं,जिसका उच्चारण करना कभी नहीं भूलता है। जब भी कुछ लेकर जाएगा तो अपना आदर्श वाक्य 'पड़ोसी ही पड़ोसी के काम आता है' अवश्य बोलकर जाएगा। लेकिन मेरा यह पड़ोसी मेरे तो आज तक किसी काम नहीं आया है। सिर्फ नाम का पड़ोसी है। मेरा तो छोटा सा भी काम हो तो आनाकानी कर जाता है। खुद का काम हो तो थूक के आँसू लगाकर करवा लेता है। इससे कैसे पीछा छुड़ाऊ। समझ में ही नहीं आता है। किसी से राय-मशवरा करता हूँ तो वो भी वहीं सलाह देते हैं,जो कि उसके आदर्श वाक्य में निहित है। बोलते हैं कि आप भी कैसी बात करते हो? पड़ोसी के प्रीति मन में जो भ्रम है,उसे निकाल दो। एक पड़ोसी ही पड़ोसी के काम आता है। यह सुनकर मैं निरुत्तर हो जाता हूँ।

6 Mar 2019

खुले में शौच मुक्त की धुंधली तस्वीर


यह एक ऐसे गाँव की खुले में शौच मुक्त की तस्वीर हैं। जिसे स्वच्छ भारत मिशन का चश्मा लगाकर देखते हैं तो खुले में शौच मुक्त (ओडीएफ) स्वच्छ दिखाई देती है। चश्मा उतारकर देखते है तो धुंधली दिखाई देती है। यह स्वच्छ भारत मिशन के चश्मे का कमाल है या हमारी दृष्टि कमजोर है। हम भ्रमित हो गए। सोचा क्यूँ ना खुद का चश्मा लगाकर देखा जाए। भ्रम दूर हो जाए।
हमने हमारा चश्मा लगाकर देखना आरंभ किया। गाँव की चारों दिशाओं में खुले में शौच मुक्त के बड़े-बड़े बोर्ड लगे हुए थे। जिन पर लिखा हुआ था,'जरा मुस्कुराइए,आप खुले में शौच से मुक्त हैं।' हम भी मुस्कुराए। चलो कम से कम बोर्ड पर तो खुले में शौच से मुक्ति मिली। और लगे बोर्डो की छवि  भी स्वच्छ दिखी। लगे बोर्डों को देखकर यह तो यकीन हो गया था कि हमारी दृष्टि कमजोर हो गई है। चश्मे का नंबर कभी भी बढ़ सकता है। एक नया चश्मा ऑप्टिकल शॉप से आँखों पर चढ़ने के लिए झाँक भी रहा था। उसे देखकर मेरे नाक पर बैठकर दोनों कान पकड़े हुए मेरा चश्मा दुत्कारा था। उससे कह रहा था,'अबे ताकना-झांकना बंद कर,अभी तो चार साल ही बीते है। सरकार भी पाँच साल में बदलती हैं। अभी तो सालभर बाकी है। जरूरी नहीं सालभर बाद भी अगले पाँच वर्ष के लिए मैं ही यथावत रह जाऊं।
यहाँ से चलकर हमने घरों पर दूर से ही नजर डाली तो स्वच्छ भारत मिशन का 'एक कदम स्वच्छता की ओर' के बजाय दो कदम आगे दिखाई दिए। स्वच्छ भारत मिशन के तहत घर-घर में शौचालय बने हुए थे। उन पर लाभार्थी का नाम और अनुदान राशि स्पष्ट लिखी हुई थी। लाभार्थियों ने अनुदान का भुगतान कर लिया हैं  या नहीं यह तो उनकी बैंक पासबुक ही बता सकती है। आजकल किसी अजनबी को बैंक पासबुक दिखाना यानी कि खाते में से पैसे उड़ाना है। ऐसा बैंक वालों ने लाभार्थियों को बोल रखा हैं। बैंक वालों ने बोला है तो ठीक ही बोला हैं। क्योंकि लॉटरी के नाम पर बहुत से लूट चुके हैं।
लेकिन हमने कई शौचालयों को बिल्कुल नजदीकी से देखा तो 'स्वच्छ भारत मिशन' के कदम डगमगाते हुए दिखे। मन में विचार कौंधा। ऐसे कैसे हो सकता है? शायद चश्मे पर धूल चढ़ी गई होगी है। चश्मे को रुमाल से साफ किया,फिर देखा। तो भी कदम डगमगाते हुए दिखे। हम हैरत में पड़ गए। यह हमारी आँखों का धोखा है या हमारा चश्मा मजे ले रहा है। हमने एक नौजवान का नौजवान चश्मा लगाकर देखा,एक जने के शौचालय में उपले शोभा बढ़ा रहे थे। दूसरे के में बकरी मिमिया रही थी। तीसरे के में तो सीट ही नहीं थी। चौथे के शौचालय तो था पर गड्ढा नहीं था। पाँचवें का सब कुछ ही गड़बड़ था। यह पाँच ही नहीं। बल्कि ऐसे पाँचों की संख्या पाँचों सौ से भी ऊपर दिखी। इनके शौचालय शौच के लिए न उपयोग होकर बाकी सभी कार्यों में उपयोग हो रहे थे। 
ऐसे भी दिखे जिनके घर में सुविधायुक्त शौचालय होते हुए भी वे रोज मुँह में नीम की दातुन दबाएं और हाथ में लोटा लिए खुले में खुलेआम शौच कर खुले में शौच मुक्त की धज्जियां उड़ा रहे थे। जब धज्जियां उड़ती है ना तब रंगीन तस्वीर भी ब्लैक एंड वाइट लगती है। यह तो फिर भी धुंधली दिख रही थी। जिन आँखों से धुंधली तस्वीर दिख रही थी। उसके  धुंधलेपन का मुझे तो राज समझ में आ गया था। पर उन समझदारों को कौन समझाएगा? जिनके सुविधायुक्त शौचालय होते हुए भी उपयोग नहीं कर रहे। मेरा मानना है कि कोई भी योजना हो। वह सरकार के बलबूते से ही फलीभूत नहीं होती। आमजन की भागीदारी ही उसे फलीभूत करती है।

5 Mar 2019

किस्मत का खेल और बेचैनी



सब किस्मत का खेल है। जब से यह सुना है,तब से किस्मत का खेल खेलने के लिए बेचैन हूँ। लेकिन मौका नहीं मिल रहा है। दसवीं क्लास से ही मौके की तलाश में हूँ। बस एक बार मौका मिल जाए तो मेरा भी नसीब चमक जाए,मैं भी तकदीरवाला बन जाऊंगा,मेरी भी हथेली पर भाग्य की लकीर है। मौके को पाने के चक्कर में मैंने धोखे भी बहुत खाए हैं। गणना की जाए तो धोखा खाने का वर्ल्ड रिकॉर्ड मेरे ही नाम पर गिनीज बुक में दर्ज हो।
कहने वाले कहते हैं कि जब किस्मत का ताला खुलता है न तो ऊपरवाला छप्पर फाड़कर देता है। लेकिन मैंने तो किस्मत पर ताला लगा ही नहीं रखा है। मेरी किस्‍मत के दरवाजे तो क्‍या होने थे,घर के दरवाजे में ढंग से सांकल नहीं लगी है। अलबत्‍ता उनमें झिर्रियां बहुतायत में हैं।   वैसे भी मेरे पास कौन सा भाग्य का खजाना है। जिसको लुटेरे लूट ले जाएंगे। इतना ही नहीं मैंने तो अपना छप्पर भी फाड़ रखा है। ताकि ऊपरवाले को देने में कष्ट नहीं हो। फिर भी ऊपरवाला देने में देरी कर रहा है। पड़ोसी कहता हैं कि भगवान के घर में देर है अंधेर नहीं। मगर मेरे तो घर में बिजली के बावजूद भी अंधेरा है। मित्र कहता है कि सब्र रख,सब्र का फल मीठा होता है। आज नहीं तो कल किस्मत चमकेगी। मित्र को कैसे बताऊं कि मुझे सब्र के मीठे फल के बजाय बेसब्री फल पसंद है। फिर चाहे वह कड़वा क्यों ना हो?c
आप सोच रहे होंगे। भला किस्मत का भी कोई खेल होता है। मैं आपको बता दूं कि खेल चाहे कोई भी हो। उसमें असली खेल ही किस्मत का होता है। जो अपने प्रिय खेल का खिलाड़ी होने के साथ किस्मत के खेल का भी खिलाड़ी है। उसकी तो हर हाल में जीत होती है। यकीन नहीं है तो कभी आजमाकर देख लेना। लेकिन आजमाने से पहले यह जरूर जान लेना खिलाड़ी है या अनाड़ी है। क्योंकि किस्मत के खेल के भी कुछ खिलाड़ी अनाड़ी होते हैं। उनको भाग्य पर भरोसा नहीं होता है। वो अपने दम पर ही फ़तह चाहते हैं।
ऐसा भी नहीं है कि मैं हाथ पर हाथ रखकर बैठा हूँ। रोज भाग्य से लड़ रहा हूँ। हाथ जोड़कर विनती करता हूँ, मुझे भी किस्मत का खेल खेलना है। लेकिन वह रोज मुझे लताड़कर भगा देता है। बोलता है कि अभी तेरा भाग्य साथ नहीं दे रहा है। जिस दिन साथ देगा। उस दिन तुझे भी खेलने का पूरा मौका दूंगा। मैं अपने भाग्य से भी रोज पूछता हूँ कि मेरा साथ क्यों नहीं देता है। बोलता है कि मेहनत के बिना मैं किसी का साथ नहीं देता हूँ। मेहनत है कि भाग्य से रूठी हुई है। बोलती है कि परिश्रम मैं करती हूँ और श्रेय उसे मिलता है। तुम भी सफल होन के बाद औरों की तरह कह दोगे, यह तो मेरे भाग्य में लिखा था। कमबख्त कोई यह  नहीं कहता कि मेहनत का फल मिला था। जबकि सारा खेल मेरा होता है। 
लेकिन मेरा जो जुनून है। वह मुझे हिम्मत देता है। कभी हतोत्साहित नहीं होने देता है। कहता है कि किसी से भी अनुनय-विनय मत कर। बस मेहनत की सुन,जैसा वह कहती है, वैसा करता रह। देखना, एक न एक दिन भाग्य साथ देगा। आज नहीं तो कल तू भी किस्मत के खेल का खिलाड़ी होगा। मौका भी आएगा और चौका भी मारेगा।

23 Feb 2019

कैलेंडुला पुष्प पर तितली


सोशल मीडिया का रचना कर्म

कल तक जो श्रोता और पाठक ढूंढ़ते थे, आजकल वे हर सुबह शाम फॉरवर्ड हो रहे हैं।
जो सोशल मीडिया पर अपडेट रहता है, वह कहीं बाहर जाता है, तब भले ही परिवार को नहीं कहकर जाता हो, लेकिन फेसबुक पर बताकर ही निकलता है। किसी भी शुभ अवसर या पर्व पर जितनी बधाई फेसबुक पर दी जाती है, उतनी फेस टु फेस कहां दी जाती है? भले ही आपको अपना बर्थ डे याद न रहे। लेकिन आप फेसबुक पर हैं, तो आपके फेसबुक मित्रों को अवश्य याद रहता है। चाहे परिजन, यार, रिश्तेदार बधाई न दें, पर वे दुनिया के किसी भी कोने में हो, मुबारकबाद देना कभी नहीं भूलते। मेरे जैसा तो सोशल मीडिया पर ही डिजिटल केक काटकर अपने जन्मदिन को यादगार बना लेता है।.

लेखकों को ही देख लीजिए, परंपरागत कागज, कलम, दवात छोड़कर, सोशल मीडिया पर मोबाइल की-बोर्ड के जरिए ही रचना कर्म और रचना धर्म निभा रहे हैं। वहां चुटकुलेबाजों और अफवाहबाजों से उनकी स्पद्र्धा जारी है। कल तक जो श्रोता और पाठक ढूंढ़ते थे, आज सुबह शाम फॉरवर्ड हो रहे हैं। हिसाब लगाया जा रहा है कि एक आह के असर होने तक कितने फॉरवर्ड की जरूरत होती है। 
वधू की मुंहदिखाई की रस्म भी बदल चुकी है। दुल्हन ससुराल नहीं पहंुचती, उससे पहले सोशल मीडिया पर बगैर नेग दिए ही पूरी दुनिया उसका मुंह देख लेती है। आजकल तो प्रथम पूज्य गणपतिजी की जगह भी सोशल मीडिया ने ले ली है। हम शादी का निमंत्रण पत्र गणपतिजी से पहले किसी न किसी को तो वाट्सएप पर भेज देते हैं। अब किसी से जन्म-मरण की भी जानकारी लेने की जरूरत नहीं। नवजात को सबसे पहले हम सोशल मीडिया के दर्शन कराते हैं। पूरी दुनिया को पता पड़ जाता है कि फलाना सिंह बाप बन गया है। इसी तरह, मृतक व्यक्ति परलोक गमन नहीं करता, उससे पहले उसका आगमन सोशल मीडिया पर होता है। श्रद्धांजलि सभा से पहले ही इतनी श्रद्धांजलि दे दी जाती है कि मृतक की आत्मा तृप्त हो जाती है। 

20 Feb 2019

मुसीबत में ईमानदारी को दुआ-सलाम


ईमानदारी भी एक बला ही है,जिसके गले पड़ी तो बस पड़ ही गयी। वही एक दिन गले की फाँस बन जाती है। जबकि इसकी सगी बहन बेईमानी हाय-हैलो करने वालों के भी गले का हार बनकर रहती है। इस दुनियादारी में ईमानदारी की कदर भी रत्ती भर की है! बेईमानी की कदर ही कदर है। बेईमानी को तो बिना कार्य के भी हाथ जोड़कर नमस्कार करते हैं और ईमानदारी को तो मुसीबत में भी दुआ सलाम नहीं करते हैं। तब भी बेईमानी को ही याद करते हैं। 
आप खुद ही देख लीजिए। सौ में से ज्‍यादा बेईमानी के ही अनुयायी मिलेंगे। वे भी ईमानदारी को कोसते हुए और बेईमानी का गुणगान करते हुए मिलेंगे। फिर भी ईमानदारी परवाह नहीं है। बल्कि इतराती हुई चलती है।
इतना भी नहीं सोचती-समझती है। जिसकी सरकार होती है उसी की जय-जयकार होती है। बेईमानी की तो हर सरकार में सांठगांठ होती है। नेताओं की तो यह खास है। उनके साथ उठना-बैठना इसकी दिनचर्या का हिस्सा है। राजनीति से जुड़े हुए इसके कई किस्से हैं। यहाँ पर बताना का अभिप्राय है बेईमानी से दुश्मनी मोल लेना।
ईमानदारी का हमारा भी एक परम मित्र परम भक्त है। उसके तो रक्त में भी ईमानदारी कूट-कूटकर भरी है। ब्लड बैंक वाले भी उससे द्वारा किया रक्तदान को नहीं लेते हैं। लेकर क्या करें? उसके ब्लड ग्रुप का ब्लड लेने कोई आता ही नहीं। वह दिनभर में दो ही काम करता हैं। पहला वक्त की कद्र करना सिखाता है और दूसरा ईमानदारी का पाठ पढ़ाता है। जिससे उसका घर खर्च भी नहीं चल पाता है। बीवी-बच्‍चे समझाते भी खूब है। ईमानदारी में क्‍या रखा है? सिर्फ और सिर्फ भलाई। भलाई से पेट नहीं भरता है। बेईमानी का दामन पकड़ ले,कमाई ही कमाई है। मैं भी बड़ा होने के नाते खूब समझाता हूँ। मैं तूझ से बड़ा हूँ,तेरे भले के लिए कह रहा हूँ। इतना सुनते ही वह कविता करने लग जाता है। बड़ा हुआ तो,क्‍या हुआ। तूने ईमानदारी का पाठ तो नहीं पढ़ा। जिसने ईमानदारी का पाठ नहीं पढ़ा। वह भले ही साठ पार का ही क्‍यों ना हो।
मित्र को कौन समझाए! ज़िंदगी की पुस्तक में ईमानदारी का जो पाठ होता है। वह बड़ा दुरूह होता है। जल्दी सी हर कोई पढ़ ही नहीं सकता है। अगर किसी ने ईमानदारी का पाठ पढ़ भी लिया तो उसके याद नहीं हो पाता है और किसी ने मन लगाकर याद भी कर लिया तो कंठस्थ नहीं होता है और किसी ने दृढ़ निश्चय करके कंठस्थ भी कर लिया तो उसे हर रोज एक नई परीक्षा देनी पड़ती हैं। इसलिए लोग ईमानदारी का पाठ पढ़ने के बजाय बेईमानी की कहानी पढ़ने में रुचि रखते हैं। पहली बात तो बेईमानी की परीक्षा नहीं होती। अगर किसी दिन देनी भी पड़ जाए तो नकल-वकल करके पास हो जाते हैं।
मित्र बेईमानी की कहानी भी तो नहीं पढ़ता। अन्यथा अच्छी खासी कमाई कर ही सकता है। क्योंकि बेईमानी की कहानी में नकल नानी,जुगाड़ मामा और रिश्वत परियों की कहानी होती है। जो कि एक बार पढ़ने पर ही मुँहज़बानी रहती है, जिनको सुनाकर कम से कम घर गृहस्थी का खर्च तो आसानी से निकाल ही सकता है। लेकिन जिस पर ईमानदारी का भूत सवार होता है। वह सौ बार फेल हो जाए तो भी ईमानदारी के पढ़े हुए पाठ पर ही चलेगा। चाहे सिर कट जाए या धड़ अलग हो जाए। मगर जब तक जीएगा। तब तक ईमानदारी की ही माला फेरता रहेगा। फिर चाहे माला गले की फांस ही क्‍यूं न बन जाए?