11 Dec 2016

मेरे अरमान कब पूरे होंगे

बस,बहुत हो गया। अब और सहन नहीं होता। यह भी कोई जीना है। जिसमें ऐशो-आराम हराम है। न मद्यपान न धूम्रपान है। सिर्फ सुनसान है। दो दिन की जिंदगी और चार दिन की चांदनी है। दो दिन तो आने-जाने में निकल जाते हैं। एक दिन आने का और एक दिन जाने का। बची चार दिन की चांदनी। वे भी इधर-उधर के कार्यों में यूं ही कट जाती हैं। यह वक्तव्य मेरे परम मित्र बिट्टू का है। एकाध दिन से वह कुछ इस तरह के दुखड़े गा रहा हैं। कहता है कि यार! लोग खुले आसमान तले उन्मुक्त उड़ रहे हैं। उन्हें देखकर मेरा भी मन करता है। उनकी तरह उड़ान भरने का। जब भी उड़ान भरने को आमादा होता हूं,तो घरवाले पर पकड़ लेते हैं। फडफ़ड़ाता हूं,तो पर काटने दौड़ते हैं। बात-बात पर नसीहत देते हैं। नहीं कहीं जाने देते है और ना कुछ ऐसा-वैसा खाने-पीने देते हैं। यहां,वहां जाने से बीमार हो जाएंगा। यह,वह खाने-पीने से पेट खराब हो जाएंगा। इस तरह के प्रवचन सुनाते हैं। अब तू ही बता,जो व्यक्ति बीमार ही होगा। वह घर बैठे भी होगा। नहीं होगा,तो कहीं पर भी आने-जाने से नहीं होगा। इसी तरह पेट खराब होना होगा,तो ऐसा-वैसा खाना-पीना खाएं बिना भी होगा। शरीर तो नश्वर है। क्रिया-प्रतिक्रिया तो होती रहती है।

देश कब का स्वतंत्र हो गया। पर,मेरी स्वतंत्रता पर अब भी आपका आधिपत्य है। जबकि मैं तो 18 उम्र भी क्रॉस कर गया हूं और मुझे वोट डालने का अधिकार भी मिल गया है। निर्वाचन आयोग द्वारा जारी बाकायदा पहचान पत्र भी है। जब सरकार ने सरकार चुनने का अधिकार दे दिया। तो घरवाले क्यों नहीं समझते? लडक़े के भी कुछ अरमान है। जिन पर मोहर लगाने का अधिकार खुद के हैं। मेरे अरमानों का प्रचार-प्रसार नहीं करने दे,तो कम से कम गोपनीयता पर ही ठप्पा लगा दे। जिससे मेरी जीत तो सुनिश्चित हो जाएंगी। मन में मन मसोस कर जीने का खयाल तो बार-बार नहीं आएंगा। मैं भी तो आज का नवयुवक हूं। और आज के नवयुवकों की तरह़ जीना मेरा भी आधिपत्य है। ये दिल फैशन,हेयर स्टाइल,स्मार्ट मोबाइल मांगता है। बाइक होतो सोने में सुहाग है। यहीं तो पर्सनल्टी के साधन हैं। जिनके उपयोग से बेहतरीन पर्सनल्टी दिखती है। आज के युग में जो दिखता है,वहीं बिकता है। जिस दिन यह सब प्राप्त हो गया। उस दिन से मेरा भी फेसबुक,वाट्सएप,ट्विटर,इंस्टाग्राम पर अकाउंट होगा। नये-नये फेंरड्स होंगे। रोज अलग-अलग ऐंगल से सेल्फी लेकर अपलोड करूंगा। पर,क्या मेरे अरमान पूरे होंगे? कहते है कि सच्चा मित्र वहीं है,जो अपने मित्र की भावनाओं को समझे। हो सके तो उन्हें पूर्ण करने की कोशिश भी करें।
 

मैंने बिट्टू से कहा-‘देख भाई! बात ऐसी है। तेरी इच्छाओं की पूर्ति संभव है।’ कैसे संभव है? उसने उत्कंठातुरता से पूछा। मैंने कहा- ‘तेरे ‘अरमानों का विधेयक’ घरवालों के सदन में रख। जब विचार-विमर्श हो,तब पक्ष-विपक्ष पर नजर रख। कौन तेरे पक्ष में है और कौन विपक्ष में है। अगर विपक्ष का पलड़ा भारी है,तो पहले उसका वजन कम कर। जब पक्ष का बहुमत पूर्ण हो जाए। तब अपने ‘अरमानों का विधेयक’ सदन में रख और पास करवा ले।’ मित्र यह सुनकर चकित रह गया। बोला यार! वाह! क्या बात कहीं है। मैंने तो यह सोचा ही नहीं था। शुभ कार्य में देरी क्यों? आज ही श्रीगणेश करता हूं। अक्सर हम सबके घरवालों की सदन शाम को बैठती हैं। वह भी भोजन के वक्त। क्योंकि इस वक्त सब विराजमान रहते हैं। यहीं सुअवसर होता है,कहने-सुनने और घर,गृहस्थी संबंधी योजनाओं पर विचार-विमर्श करने का। इसी समय घर के नियम,कानून बनते-बिगड़ते हैं। फेरबदल होता है। जिसको जो कहना होता है,वह कहता है। जिसको सुनना होता है,वह चुपचाप सुनता है। जो नहीं कहता है और नहीं सुनता है। वह भोजन करके खिसक लेता है। ऐसा पारिवारिक सदन में ही होता है। क्योंकि यहां दल रहित सरकार होती है। पर,पक्ष-विपक्ष यहां भी होता है।



बिट्टू ने यह सोचकर अपने ‘अरमानों का विधेयक’ सदन में रखा। इस बहाने पक्ष-विपक्ष का बहुमत भी ज्ञात हो जाएंगा। और मेरा ‘विधेयक’ भी पास हो जाएंगा। एक बार तो सबके-सब उसकी तरफ कौतूहल भरी निगाहों से देखें। पहले तो गृहस्वामी ने बात को टालने की कोशिश की। पर,किसी ने दबे स्वर में उसकी मांग जायज बता दी। बस,फिर क्या था?बहस आरंभ हो गई। पक्ष पास करवाने पर जोर देना लगा और विपक्ष स्थगित करवाने पर अड़ गया। जैसे-तैसे करके निम्न सदन में पास हो गया। पर,उच्च सदन में आकर रूक गया। इस सदन में पूर्ण बहुमत नहीं होने से वहीं का वहीं अटका है। बिट्टू मन मसोकर कर कह रहा है कि आखिरकार मेरे अरमान कब पूरे होंगे? तुम्हारे पक्ष-प्रतिपक्ष के चक्कर में मुझे क्यों घसीट रहे हो। खुद के मतलब का कोई विधेयक होतो,आनन-फानन में पारित कर लेते हो। कानों-कान किसी को खबर तक नहीं लगने देते हो। क्या यहीं तुम्हारा कानून,कायदा है? मेरी बारी आती है,तो पक्ष-विपक्ष में बंट जाते हो। और मैं तुम्हारा मुंह ताकता रह जाता हूं। आखिरकार मेरा कसूर क्या है? यह तो बताओं! भगवान जानें, बेचारे बिट़टू  के अरमान कब पूरे होंगे ? 

30 Nov 2016

दो हजार का नोट और मेरी दिनचर्या- दैनिक जनवाणी

                     दो हजार का नोट और मेरी दिनचर्या

सुबह जल्दी जगा। बैंक खुलने से पहले लाइन में लगा। तब कहीं जाकर नम्बर आया। कड़ी मशक्कत
से एकमात्र दो हजार का नव नूतन नोट ही मिल पाया। पहले तो सेल्फी ली। फिर उसे लेकर दुकान पर भागा। आवश्यक सामान खरीदने हेतु! ताकि यह गुल्लक में जाएं और वहां से कट-पीटकर सौ-सौ के नोट हाथ में आए। सोचा तो यहीं था। पर, दुकानदार ने दो हजार के नोट की शक्ल देखते ही मना कर दिया। मना तो किया,जो किया। सुझाव और दे दिया। भाई! या तो पूरे दो हजार का सामान ले। या फिर छुट्टे लेकर आ।
वहां से मैं मन मसोस कर चला आया। क्योंकि सुबह से कुछ भी नहीं खाया था। बर्गर खाने का मन हुआ। पर, बर्गर वाले ने बर्गर खिलाने से पहले ही पूछ लिया। ‘छुट्टे तो हैं ना!’ मैंने कहा- ‘दो हजार का नोट है।’  यह सुनते ही उसने बर्गर जैसा मुंह बना लिया। यहां से सीधा सब्जीमंडी पहुंचा। यहां भी वहीं आलम था। पेट में चूहे कूद रहे थे,यह भी मुझे मालूम था। कचौरी खाने  को जी ललचाने लगा। यहां मैंने चतुराई दिखाई। उसने पूछा- ‘छुट्टे तो हैं ना!’ मैंने कहा- ‘हां जी! है। आप तो कचौरी दीजिए।’ उसने कचौरी की प्लेट हाथ में थमाते हुए कहा- ‘पेमेंट कीजिए।’ मैंने दो हजार का नोट थमाते हुए कहा-‘यह लीजिए।’ दो हजार के नोट को देखते कहा-‘कचौरी वापस कीजिए और यहां से चलते बनिए।’
वहां से मैं मुंह लटकाय आ गया। हजामत किए हुए कई दिन हो गए थे। सोचा, क्यों ना दाढ़ी ही करवालु। खाली सीट देखकर उस पर बैठ गया। नाई बोला-‘पहले सामने जो लिखा हुआ है। उसे पढय़े,फिर बैठए।’ मैंने गर्दन घुमाई और सामने जो लिखा था,उसे पढ़ा। ‘अभी हम दो हजार व पांच सौ का नया नोट नहीं ले रहे हैं। कृपया हमारी मजबूरी समझए।’ यह पढक़र मैं चुपचाप ही नाई की दुकान से बाहर आ गया।
चाय पीने की तलब लगी। पर,समस्या वहीं थी। मैंने सोचा,जो होगा सो देखा जाएंगा। चाय तो पीनी है ही। उसने गर्मा-गर्म चाय पिलाई। चाय पीकर मुझे राहत आयी। पर,जब पैसे देने की बारी आयी,तो वह दो हजार को नोट देखकर चाय की तरह उबलने लगा। मैंने उससे कहा-‘भाई! गर्म क्यों हो रहे हो? पैसे दे तो रहा हूं।’ वह शांत होते हुए बोला-‘पैसे तो दे रहे हो। पर, मैं तुम्हे 1995  रूपए कहां से दूं।’ यह तो शुक्र है,एनवक्त पर पड़ोसी वर्माजी आ गए। और उन्होंने चाय का भुगतान कर दिया।
चाय की दुकान से बाहर निकला ही था कि चप्पल ने धोखा दे दिया। एक चप्पल हाथ में और एक पैर में थी। लडख़ड़ाता हुआ डॉक्टर मोची के पास पहुंचा। इलाज करवाने हेतु। उसने तुरंत दुरुस्त कर दिया। मैंने कहा-‘कितने रूपए देने है।’ वह बोला- ‘दो रूपए दे दीजिए भाई!’ मैं बोला- ‘दो रूपए तो नहीं है। दो हजार का नोट है।’ मोची बोला- ‘गरीब आदमी के साथ क्यों मजाक कर रहे हो,भाई! नहीं है,तो बाद में दे देना।’ यह सुनते मैं वहां खिसक लिया। और दो हजार के नोट के चक्कर में दो रूपय उधार छोड़ आया।

25 Oct 2016

पत्नी से क्षमा मांगने में भलाई है- दैनिक जनवाणी



पत्नी ने यूएन अध्ययन की ‘पति को पीटने में भारतीय पत्नियां तीसरे स्थान पर’ वाली खबर क्या पढ़ी? वह तो मेरे पीछे ही पड़ गई। कहती है कि तुम्हें बहुत दिन हो गए मुझे उंगुली पर नचाते हुए। अब मैं बताती हूं,उंगुली पर कैसे नचाते है? कैसे हुकम चलाते है? जरा पास में आओं। उसमे अचानक मां दुर्गा का स्वरूप देखकर,उसके समीप जाने से मुझे डर लगता है। पता नहीं क्या कर बैठे? पत्नी के हाथ में झाडू देखकर शेर की तरह दहाडऩे वाले म्याऊॅ बन जाते हैं। बाहर दादागिरी दिखाने वाले ‘सत्‍यों’ को भी पत्‍नी के आगे मियामियाते हुए देखा है। मेरी तो औकात ही क्या है? जो उसके पास चला जाओं।
मैं सोच रहा हूं कि मेरी पत्नी की तरह सब भारतीय पत्नियों ने जिस दिन झाडू उठा ली। तब क्या होगा? क्या पति ‘हमें पत्नियों से बचाओं’ की तख्ती लिए जन आंदोलन करेंगे। सडक़ पर उतरेंगे। जंतर-मंतर पर धरना देंगे। संसद का घेराव करेंगे। ‘हमें पत्नियों से बचाओं’ हम शामत में है। कहते हुए अपनी बात रखेंगे। धरना-प्रदर्शन कर, शाम को घर जाएंगे तो पत्नियां कहेंगी। आए गए हमारे खिलाफ आंदोलन करके। क्या हुआ? कुछ हुआ। कुछ नहीं होगा। जैसे प्रश्नों की बौछार से पतियों को सराबोर कर देंगी। फिर पति निरुत्तर खड़े रहेंगे। पस्त होकर कहेंगे। तुम्हें जो करना है,करो। लेकिन झाडू मत उठाओं। बेलन मत फेंको। जोर से मत बोलों। पड़ोसी सुन लेगा, देख लेगा। आखिर मेरी भी कुछ इज्जत है। खैर यह सब छोड़ो।
मुझे तो अपनी पत्नी से बचने की जुगत सोचना है। इस वक्त उससे कैसे बचाव किया जाए? उसके समीप चला तो जाओं। पर,पता नहीं वह क्या फेंक मारे। घर में हर वस्तु का जित्ता उसे पता है उतना मुझे नहीं है। क्योंकि दिन-रात घर,बाहर का कार्य तो वहीं करती है। सुबह पांच बजे उठती है और बारह बजे सोती है। रसोई की तो हर चीज से अच्छी तरह से वाकिफ है। चिमटा,चकला,बेलन,झाडू फेंककर मारने में तो उसका निशाना कभी चूकता ही नहीं है। यह तो मेरी किस्मत अच्छी है कि हर बार मैं बाल-बाल बच जाता हूं। लेकिन इस बार बचने का कोई चांस दिखाई नहीं दे रहा है। सिवाह क्षमा मांगने के। चलो क्षमा मांग कर ही देख लेता हूं। कहते है कि क्षमा मांगना  सबसे बड़ी  बहादुरी होती । और जब जान बचाने की बात आए तो माफी मांगने में हर्ज ही क्‍या है?


मैं डरता हुआ पत्नी से क्षमा मांगने गया। उसने कहा-‘अब तब तो मैं यह समझती रही कि भारतीय पत्नियां मेरी तरह ही होगी। पर,भला हो यूएन अध्ययन वालों जिन्होंने मेरे ज्ञानचक्षु खोल दिए। अब तुम्हें मैं बताती हूं कि पत्नी पर हुकम कैसे चलाते है? एक बार पास में आओं।’ मैंने कहा-‘देवी! मैं क्षमा चाहता हूं। आज के बाद मैं तुम्हें कुछ नहीं कहूंगा। तुम्हें,जो करना है करो।’

12 Oct 2016

रावण ने देखा अपना दहन - दैनिक जनवाणी


रावण ने देखा अपना दहन
रावण दहन का लाइव कास्‍ट देखने खुद रावण भी आया है। रामलीला मैदान खचाखच भरा हुआ है। कोलाहल माहौल है। सबकी निगाहें रावण पर टिकी हुई है। माइक से नेताजी के आने की उद्घोषणा हो रही है। चहुंओर उत्साह है। पुतला सज-धज कर तैयार है। इत्ते बड़े रावण को देखकर रावण भी हैरान है। वह भी मन ही मन सोच-विचार कर रहा है. मेरी कद-काठी तो इत्ती नहीं थी। जित्‍ती इसकी है. मेरे तो दंत पीले थे,इसके तो सफेद है। लगता है इसने अच्छी क्वालिटी की टूथपेस्ट यूज की है। इसकी मूंछ वानर की पूंछ से मिलती-जुलती है। इस वानर की पूंछ ने ही तो सत्यानाश किया था,लंका का। सोने की लंका को जलाकर खाक कर दिया था। इस वानर से तो राम बचाएं। राम कैसे बचाएंगा? राम का तो मैं शत्रु था। राम की धर्मपत्नी का तो मैंनें अपहरण किया था। मैंनें सीता माता का अपहरण जरूर किया था।लेकिन उसके आत्म सम्मान को रत्ती भर भी ठेस नहीं पहुंचाई। और आज जो मेरा अनुसरण कर रहे हैं। वे अपहरण भी करते हैं। फिरोती भी मांगते है,फिरोती न मिले तो टपका भी देते हैं। और न जाने क्या-क्या करते हैं?कलियुग रावण तो मेरे से दो कदम आगे हैं। फिर लोग इन कलियुग रावणों का तो दहन करते नहीं.मेरा ही करते है.जो कि सरासर अन्‍याय है।

रावण यह सब सोच ही रहा था कि इत्ते में ही नेताजी आ गए। आते ही नेताजी ने पुतले की नाभि में तीर मारा और बम-पटाखों की धड़ाम-धम होने लगी। देखते ही देखते रावण जलकर खाक हो गया। लोग कह रहे थे,‘बुराई पर अच्छाई की विजय हुई’। रावण मन ही मन मुस्कुराने लगा। इस दिन हर साल बुराई जलती है। फिर साल भर में इतनी बुराई कहां से आ जाती है। तुम लोगों को मेरे में बुराई दिखती है स्वयं में नहीं। मैं तो इत्ता भी बुरा नहीं था। जित्ते तुम हो। रावण ने पब्लिक की नब्ज टटोलने के लिए,मानव के हृदय में झांक कर देखा तो रावण बैठा था। उसकी न मोटी-मोटी आंखें हैं,न भुजाओं में बल हैं। ललाट पर कोध्र की लकीर नहीं। लेकिन मन में ईर्ष्या,लोभ-लालच,छल कपट भरा पड़ा है।

दशहरा मैदान से रावण सीधा नेताजी के घर गया। नेताजी के मन में झांक कर देखा तो चकित रह गया। यह क्या? जिस मन ने अभी मेरी नाभि में तीर मार कर मेरा नेस्तनाबूद किया था और मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की भूमिका अदा की थी। उस मन में  घोटाले की मंशा उछल-कूद कर रही है। बस मौके की ताक में है। यहां से रावण एक सरकारी दफ्तर में घूस गया। वहां के कर्मियों के मन में झांक कर देखा तो होश उड़ गए। यह क्या?यहां तो रिश्‍वत रावण बैठा है। यहां से निकल कर रावण गली में घूसा,तो देखा। कुछ गुण्ड़े एक महिला से बदसलूकी कर रहे हैं और कह रहे है। ‘जो भी है हमारे हवाले कर दो,वरना जान से हाथ धो बैठोगी’। महिला भयभीत हो गई और उसने अपने आभूषण गुण्ड़ों के हवाले कर दिया। रावण यह सब देखकर समझ गया और अपने लोक की ओर प्रस्थान कर गया।
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6 Oct 2016

अरे भाई, मुझे भी झूठ बोलना सिखा दो - नवभारत टाइम्‍स

अरे भाई, मुझे भी झूठ बोलना सिखा दो
मोहन लाल मौर्य
मैं कई दिनों से उस ‘झूठ’ की तलाश में हूं। जिसे बोलकर लोग अपना कार्य आसानी से करवा लेते है। नौकरी पा लेते है। कारोबार चला लेते है। प्रेम-प्रसंग में फंसा लेते है। ब्याह-शादी रचा लेते है। चुनाव जीत जाते है। गबन कर लेते है। रिश्वत ले लेते है। पुरस्कार पा लेते है। अखबार में छप जाते है। टीवी पर दिख जाते है। सुर्खियों में बने रहते है। खास ऐसा ही झूठ मुझे भी बोलना आता तो मैं दर-दर की ठोकर नहीं खा रहा होता। कहीं ना कहीं कुछ ना कुछ जॉब कर रहा होता। मैं जब भी झूठ बोलता हूं। पकड़ा जाता हूं। एक दफा तो पकड़ा ही नहीं गया। अच्छे से धुनाई भी हुई । वह भी बिना वॉशिंग पाउडर के। वॉशिंग पाउडर मिलाकर करते तो हो सकता है। मुझे थोड़ा बहुत वह ‘झूठ’ बोलना आ जाता। जिसकी मुझे तलाश है।
जिस ‘झूठ’ की मुझे तलाश है। उस के लिए मैंने बहुत पापड़ बेले। उन तमाम लोगों से मिला हूं। जो झूठ बोलने में पीएचडी कर रखे है। झूठ बोलने के गुर सिखाते है। झूठ की बुनियाद पर अपना कारोबार चलाते है। बेवकूफ बनाते है। इन सभी ने एक ही बात बताई,झूठ बोलने में है बड़ी कठिनाई। लेकिन,जो झूठ बोलकर कमार खाए,तो उसमें क्या है बुराई। तुझे झूठ बोलने से मिलती है,भलाई। तो तू भी झूठ बोल भाई। झूठ बोलने के फायदा-नुकसान क्या है? यह मसलन हम से जान भाई। झूठ बोलकर हो जाती है सगाई। घर में आ जाती है लुगाई। कईयों कि हो जाती है,ठुकाई। किसी की जग हंसाई। हम ने तो झूठ बोलकर कईयों को फंसाया। तेरी तू जान भाई। ऐसा झूठ बोलने वालों ने मुझे बताया। जिसने भी झूठ बोलने का नायाब तरीका बताया। मैंने वहीं अपनाया। जिस पर भी अपनाया। अपने आप को नाकामयाब पाया। नाकामयाब क्यूं पाया। यह मेरी समझ में आज तक नहीं आया। लेकिन मैं हार नहीं मानंूगा। कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है। झूठ बोलने के लिए रोना भी पड़ता है। और भी न जाने क्या-क्या करना पड़ता है। जो भी करना पड़े। मैं करूंगा। चाहे मुझे दिन-रात जागना पड़े। मैं जागूंगा। किसी के पीछे भागना पड़े। मैं भागूंगा। लडऩे-झगडऩे की नौबत आयी तो वह भी करूंगा। झूकना पड़े तो सिर झूका कर झूकूंगा। क्योंकि जिस दिन झूठ बोलकर कामयाबी पाली। उस दिन से अपने पिता के नाम से नहीं,अपने नाम से जानूंगा। घर,परिवार,समाज में मेरी पहुंच होगी,तो यस-कीर्ति की उपलब्धि से अलंकृत हो जाऊंगा।
किसी ने मुझे यह भी बताया है कि झूठ बोलने के लिए कसम भी खानी पड़ती है। मैं कसम खाने के लिए आमादा हूं। मां-बाप। बीवी-बच्चे। भाई-बहिन। यार-दोस्त। रिस्तेदार। आदि-इत्यादि। कि कसम तो मैं ऐसे खा जाऊंगा। जैसे लोग गाजर-मूली खाते है। झूठी कसम खाने से पहाड़ थोड़ी टूट जाएंगा। लोग तो भरी अदालत में ‘गीता’ पर हाथ रखकर न जाने कैसी-कैसी और किस-किस की कसम खा जाते है। उन पर न तो पहाड़ टूटता है और नहीं वे पहाड़ तले दबते है। झूठ बोलने वाले तो स्वर्गगामी  मां-बाप की कसम खा जाते है। मुझे ‘आपकी कसम’,‘मेरी कसम’ खाने में भला मेरा क्या जाता है। बस,मुझे तो वह ‘झूठ’ बोलना आना चाहिए। जिसे बोलकर लोग बड़ी-बड़ी मछली यूं ही फंसा लेते है। मछली आसानी से फंस भी जाती है और उसे पता भी नहीं लगता है। उसे कब और कैसे? किस जाल से फंसाया गया है। ऐसा ही झूठ बोलने का हुनर मुझे सीखना है। सीखने के उपरान्त बड़ी मछली न सही। छोटी-मोटी मछली तो मैं भी अपने जाल में फंसाया करूंगा।
झूठ बोलकर कैसे फंसाते है? इसकी खुफिया जानकारी एक महाशय ने दी। उसने बताया कि झूठ बोलने में न हींग लगती है,न फिटकिरी। रंग चोखा आता है। न तेरे बाप का। न मेरे बाप का कुछ जाता है। जो भी आता है। उसी से आता है। जिसके सम्मुख हम झूठ बोल रहे हैं। झूठ बोलने से अगर कुछ भी नहीं आता है,तो कोई बात नहीं। कम से कम झूठ बोलने का अभ्यास ही हो जाता है। जो आगे काम आता है। अपने आप कोई नहीं फंसता है। उसे फंसाया जाता है। कैसे फंसाया जाता है? यह तरीका भी उसने ही बताया। जिस तरह से बकरे को हलाल करने से पूर्व उसे कुछ खिलाते-पिलाते है। उसके बाद हलाल करते है। उसी तरह से झूठ की कुव्वत से किसी को फंसाना है,तो पहले उसकी अच्छी तरह से खातिरदारी करों। फिर मौका देखकर बातों ही बातों में वह ‘झूठ’ बोल दो। जिससे अपना स्वार्थ सिद्ध होता है। बातों ही बातों में इसलिए,क्योंकि उसे शक नहीं हो कि बंदा झूठ बोलकर अपने को फंसा रहा है।
इसी ने बताया कि आज के युग में कौन झूठ बोल रहा है और कौन सच। यह परखना जरा मुश्किल है। झूठ सच लगता है और सच झूठ। तू तो आंख मूंद कर झूठ बोल। किसी सामने नहीं बोल सकता है,तो मोबाइल पर झूठ बोल। मोबाइल पर तो ज्ञानी से ज्ञानी भी मूर्ख बन जाता है। मसलन,दस- बीस किलोमीटर दूर बैठा व्यक्ति भी मोबाइल पर यही कहता है- दो मिनट में आ रहा हूं। पांच मिनट में पहुंच रहा हूं। नजदीक ही हूं। बस आ गया। इत्ती स्पीड तो हवाई जहाज की नहीं होती। जित्ती इन दो,पांच मिनट वालों की होती है। मैंने सलाह तो मान ली, लेकिन मुझसे  मोबाइल पर भी झूठ नहीं बोला जा रहा. सोचता हूं, झूठ हम बोलते है,बदनाम मोबाइल होता है। वह मोबाइल, जो हमारे सुख-दुख का साथी है। ऐसे साथी को भी हम झूठ बोलने में  क्‍यों शामिल करें। उसने हमारा क्‍या बिगाड़ा है!                          
            


नवभारत टाइम्‍स 06 अक्‍टुबर  2016 

23 Sept 2016

एक मच्छर से मुलाकात- दैनिक जनवाणी

कल मैं एक एडीज 
मच्छर से मुखातिब हुआ। 
उससे पूछा-सुबह-सुबह 
कहां जा रहे हो। 
वह भी इतने
दैनिक जनवाणी 23 सितम्‍बर 2016 
चिकने होकर। उसने भिनभिनाते हुए कहा-ड्यूटी पर जा रहा हूं। अस्पताल में लोगों को सम्हालने। क्या करू साब। दिन-रात की ड्यूटी कर रहा हूं। रात को जिनको काटता हूं। दिन में उनको सम्हालता हूं। हमारे साब का हूकम है
,साब। जिसे भी काटो उसको सम्हालते रहो। लेकिन आप क्यूं पूछ रहे हो। मैंने कहा-बस यूं ही पूछ लिया।

मैंने बात आगे बढ़ाते हुए पूछा-तुम्हारा भी साब है। उसने कहा- तुम लोगों का ही साब हो सकता है। हमारा साब क्यों नहीं हो सकता। हमारा साब तो बहुत खुश मिजाज का मच्छर है। जब भी हमारी मीटिंग होती है। साब हम मच्छरों की बहुत सेवा-सत्कार करता है। बस वह तो कार्य के प्रति कोताही बरतने वाले को ही माफ नहीं करता है।

मैंने कहा- तुम्हारा साब! तुम्हे क्या-क्या दिशा निर्देश देता है। उसने बताया- हमारा साब हर शाम हमारी मीटिंग लेता है। उस मीटिंग में एक-एक मच्छर से पूछताछ करता है। आज तुमने किस पर हमला किया और कहां किया। वह अस्पताल में है या फिर घर पर ही है। पूरी जानकारी मुहैया करवानी पड़ती है,साब को। इनसान की तरह आधा-अधूरा कार्य से काम नहीं चलता है। आधे-अधूरे को हमारा साब अस्वीकार कर देता है। साब ने सबको अपना-अपना एरिया बांट रखा है। समय-समय पर नसीहत देता रहता है,साब।

मैंने कहा- आपने दिल्ली में कुछ ज्यादा ही आतंक मचा रखा है। आपकी दहशत से दिल्लीवासी सहमे हुए हैं। चिकनगुनिया से मरीजों की संख्या में इजाफा हो रहा है। आप में जरा सा भी दया-धर्म नहीं है। उसने कहा- पहले आप अपने अंदर झांक कर देखों,साब। कितना दया-धर्म निभाते हो,आप। उसके बाद में मेरे से पूछना। हम ‘आप’ की तरह थोड़ी है,जो आरोप-प्रत्यारोप से गिरे रहते है। हम तो अपने कार्य में लीन रहते है। हमें तो ट्वीट करने का भी समय नहीं मिलता है। जो कि ट्वीट कर साब को बता दे। रही बात दया-धर्म की। सो हमारे लिए सब समान है। जो चपटे में आ गया। वहीं सही।
मैंने पूछा- क्या आपने भी ट्विटर पर अकांउट खोल रखा है? उसने बताया- नहीं साब! हमें ट्विटर के लिए कहां फुरसत है। जो ट्विटर पर है। वहीं हमारा कार्य कर देते हैं। हमारे संदर्भ में क्या किया जा रहा है। हम से लडऩे के लिए किस हथियार का इस्तेमाल कर रहे है। आदि-इत्यादि की सूचना मिलती रहती है।
मैंने कहा- तो आप ट्विटर के जरिए लोगों पर हमला करते है। उसने कहा-लगता है आप भी मुर्खों की श्रेणी में आते है। हमला तो हम हमारे साब के मुताबिक करते है। ट्विटर तो हमारे बचाव का साधन है। हम जिस दिन ट्विटर पर आ गए। उस दिन से सबकी छुट्टी कर देंगे। हम ऐसे-ऐसे ट्वीट करेंगे कि सब हमारे रंग में रंग जाएंगे। वैसे आपका यह ट्विटर वाला सुझाव अच्छा है। आज शाम को ही मैं हमारे साब के सम्मुख ट्विटर का सुझाव रखता हूं। अब मैं आप से विदा चाहता हूं,साब। सुबह-सुबह धंधा-पानी का टाइम है। नहीं तो साब मुझे गैर हाजिर कर देंगे। मेरे भी छोटे-छोटे बाल-बच्चे है। उसने कहा। मैंने कहा-ठीक है।

                                          

13 Sept 2016

लूटी खाट पर चर्चा -दैनिक हर‍िभूमि

लूटी खाट पर चर्चा 
राहुल गांधी की ‘खाट पर चर्चा’ की सभा खत्म होते ही कुछ खाटे खड़ी हो गई। कुछ खाटे टूट गई। कुछ छीना-झपटी में
13.सितम्‍बर 2016 हर‍िभूमि 
छूट गई। कुछ सही-सलामत घर पहुंच गई। किसी के हाथ खाट लगी तो किसी के हाथ खाट के पाए लगे। और किसी के हाथ खाट की रस्सी लगी। जिनके हाथ कुछ भी नहीं लगी। वे हाथ मलते रह गए। जिनके हाथ खाट लगी। वे खाट पर बैठकर
‘चुनावीं चर्चा’ करेंगे। ‘खाट पर चर्चा’ खाट पर ही होती है। शायद इसीलिए खाट लेकर गए है,वे लोग। ताकि खाट पर बैठकर आराम से ‘चुनावीं चर्चा’ कर सकें। जिनके हाथ खाट के पाए लगे। वे घर में टूटी हुई खाट में पाए लग वाकर ‘चुनावी चर्चा’ करेंगे। जिनके हाथ खाट की रस्सी लगी है। वे मन मसोस कर उस खाट को पूरी करेंगे। जो पिछले चुनाव में टूट गई थी।
जिन लोगों के कुछ भी हाथ नहीं लगा। वे लोग अपनी खाट पर बैठकर उसको निहार रहे होंगे। खाट नहीं लूट पाने के मलाल में अपनी खाट पर पड़े-पड़े खर्राटे भर रहे होंगे। सपने में आगामी खाट लूटने की योजना बना रहे होंगे। ताकि आगे भी ऐसा कार्यक्रम हो और हम पहले ही आमादा रहे। खाट लूटने के लिए। जैसे ही वे खाट डालेंगे। वैसे ही हम उस पर विराजमान हो जाएंगे। पहले तो ध्यानपूर्वक नेताजी का भाषण सुनेंगे। जब सभा खत्म होगी तो उस खाट को लेकर घर आ जाएंगे। इस बार किसी ने हमारी लूटी हुई खाट को लूटने की कोशिश की तो हम उसको ही लूट लेंगे।
वे हमें वर्षों से लूट रहे हैं। एक बार उनको लूट लिया तो क्या हुआ। उन्हें भी लूटने का अहसास होना चाहिए। कैसे लूटते है? आज का वोटर बावला थोड़ी है,जो हर बार लूट जाएंगा। इस बार उसने लूटकर सयाना होने का परिचय दे दिया है। चुनावीं दौर में जो भी लूटने को मिले उसे लूट लेना चाहे। पांच साल में एक बार ही तो लूटने का मौका मिलता है। बस,लूटी हुई चीज को लूट कर वहां रूकना नहीं चाहिए। सीधा घर आ जाना चाहे। क्योंकि वहां लूटी हुई को भी लोग लूट लेते हैं।
एक किसान को ठाठ-बाट का अहसास खाट पर ही होता है। ना कि कुरसी पर। उसके घर आए मेहमान की सेवा-सत्कार वह खाट पर बैठाकर ही करता है। खाट की हर रस्सी से उसका अटूट रिस्ता होता है।‘किसान यात्रा’ में अगर किसी किसान ने खाट लूट ली तो क्या हुआ। उसके घर आने वाले नेताजी को वह उसी लूटी हुई खाट पर तो बैठाएंगा। अपना दुख-दर्द बताएंगा। ‘चुनावीं चर्चा’ करेंगा। और नेताजी से कहेगा-साब,आप लूटी हुई खाट पर विराजमान हो। यह राजनीति के नीति की खाट है। झूठा आश्वासन मत देना। वरना यह लूटी हुई खाट टूट जाएंगी। खाट चाहे लूटी हुई हो। चाहे घर की हो। खाट पर जो ठाठ-बाट है। वैसे ठाठ-बाट और कहां। चाहे घर-गृहस्थी की चर्चा हो। चाहे ‘चुनावीं चर्चा’ हो। जैसी ‘चर्चा’ खाट पर होती है,भला और कहां हो सकती है।

2 Jul 2016

महंगा टमाटर और तू-तू,मैं-मैं - दैनिक जनवाणी

महंगा टमाटर और तू-तू,मैं-मैं
जब से टमाटर के भाव बढ़े है। तब से श्रीमतीजी का व्यंग्य प्रहार आरंभ है। रोज कहती है-'अजी! आज मत भूल जाना। चाहे
02 जुलाई 2016 दैनिक जनवाणी में 
दो ही टमाटर लेकर आना। लेकिन लेकर जरूर आना। आज नहीं लेकर आए तो देख लेना...।
‘श्रीमतीजी के मुंह से यह सुनकर। एक बार तो मैं टमाटर की तरह लाल-पीला हो जाता हूं। लेकिन श्रीमतीजी को देखते ही चेहरे पर झूठी मुस्कुराहाट बना लेता हूं। ताकी कुछ देर पूर्व चेहरे पर आयी लाल-पीला की छाया अदृश्य हो जाए।
मैं सब्जीवाले से सब्जी तो खरीद लेता हूं। पर,टमाटर को देखते ही श्रीमतीजी के बोल मेरे सम्मुख गोल-मोल होने लगते हैं। टमाटर लिया तो मरा और नहीं लिया तो मरा। यह प्रश्न मेरे लघुतम दिमाग में खलबली मचा देता है। कोई निर्णय लेने से पूर्व सब्जीवाला बोल देता है-'भैया टमाटर कितना देना है।‘ यह सुनते ही मैं इधर-उधर झांकने लगता हूं। तन-बदन में आग सी लग जाती है। मन तो करता है दो-चार टमाटर उठाकर इसके मुंह पर मार दू। लेकिन मन मसोस कर रह जाता हूं। क्योंकि इत्ते महंगे भाव के टमाटर खरीदने की मेरे बिसात नहीं।
इससे पहले प्याज ने अश्रु निकाले। अब टमाटर आंसूओं का जूस निकाल रहा है। दाले तो भाव खा रही हैं। आलू भी भाव खाने पर उतर आया है। अब तो सब्जियों में भी भाव खाने की प्रतिस्पर्धा होने लगी हैं। कल तक जो टमाटर हरा था। वह पड़ा-पड़ा लाल हो रहा है। किसी घर की सब्जी के टोकरी में जाने से पूर्व ही हलाल हो रहा है। बढ़ते भाव का मलाल हो रहा है।
जब मैं सब्जीवाले से सहमता हुआ घर पहुंचता हूं तो श्रीमतीजी सर्वप्रथम सब्जी में टमाटर ढूंढ़ती है। टमाटर नदारद मिलते ही वह लाल-पीली हो जाती है। बगैर बादल छाये ही तू-तू,मैं-मैं की बरसात हो जाती है। यह बरखा तब तक जारी रहती है। जब तक में अच्छी से तरह से सराबोर नहीं हो जाऊ। टमाटर के भाव क्या बढ़े? श्रीमतीजी के दृष्टि में मेरे भाव घट गए। मेरी बिसात पर पानी फिर गया। टमाटर के बढ़ते भाव ने हम दोनों के मधुर संबंधों में टर्र-टर्र कर रखी है। बढ़ती महंगाई ने मुझ जैसे उस आम आदमी को अपनी पत्नी के सम्मुख निरूत्तर खड़ा कर रखा है। जिसकी आमदनी अठ्ठनी खर्चा रूपया है।
कल श्रीमतीजी ने उंगली दिखाते हुए साफगोई शब्दों में कह दिया है-'अगर अबकी बार टमाटर नहीं लाए,तो घर आने से पूर्व एक बार सोच-विचार अवश्य कर लेना।‘ श्रीमतीजी के मुंह से यह सुनकर एक बार तो मैं सहम गया। फिर हिम्मत जुटाकर,बेमन से बोला-'ले आऊंगा जी।‘ मैं अगले दिन सब्जी लेने से पूर्व टमाटर के भाव पूछा। पूछताछ इसलिए की शायद एकाध दिन में भाव घट गए हो। सप्ताह भर से ज्यादा हो गया भाव बढ़े। जब उसने भाव बताया। मेरे अंदर करंट सा दौड़ा। एकदम से जोर का झटका सा लगा। जैसे किसी ने बिजली का तार लगा दिया हो। लेकिन इस बार मुझे टमाटर तो खरीदने ही थे। श्रीमतीजी ने उंगली,जो दिखाई थी। इसलिए धीरे से टमाटरों की ओर हाथ बढ़ाया। दो टमाटर उठाया। उनको अच्छी तरह से निहारा। कहीं सड़े गले तो नहीं। इत्ते में ही सब्जी वाला बोल पड़ा-'भैया ऐसे क्या देख रहे हो। टमाटर बहुत बढिय़ा है। देखने की जरूरत ही नहीं। लाओं इधर दो। तौल देता हूं।‘  मैंने दो टमाटर उसके हाथ में सौंप दिया। उसने झट से तौल दिया। थैली में दो हरी मिर्च और थोड़ा सा हरा धनिया डालकर। मेरे को थैली सौंप दी। मैं सब्जी के साथ दो टमाटर लेकर घर पहुंचा। श्रीमतीजी दो टमाटर देखकर फिर लाल-पीली हो गई। पहले दो टमाटर के लिए कहती थी। अब कहती है दो टमाटरों से क्या होगा। फिर वहीं तू-तू,मैं-मैं शुरू हो जाती है। अब आप ही बताएं।