13 Apr 2017

जुगाड़ की जुगत

मोहन लाल मौर्य
आज कल जिसे देखों वहीं किसी ना किसी जुगाड़ की जुगत में लगा हुआ है। खुद से जुगाड़ हो गया तो पौ बारह पच्‍चीस। अन्‍यथा किसी ओर से सांठगांठ कर जुगाड़ की जुगत करता है। मेरा पड़ोसी जुगलकिशोर भी अपने पुत्र को सरकारी दामाद बनाने हेतु जुगाड़ की जुगत में लगा हुआ है। हर किसी से पहुंचता रहता है। भाई! कोई जुगाड़ होतो बताना। उसे चढ़ाना भी आता है। तुम्‍हारी तो ऊॅपर तक पकड़ है। कहीं ना कहीं टांका फिट करके अपुन के छोरा (लड़का) को भी नौकरी लगवा दो। भाई! यह काम हो गया तो तेरा यह अहसान जिंदगी भर नहीं भूलूंगा। इत्‍ता सुनकर भाई टाइप का बंदा पहले तो अपने आप पर गर्व करता है और बाद में कहता है- देखता हूं। सोचता हूं। अंतः में कहेंगा- ठीक है कुछ ना कुछ जुगाड़ करता हूं। जुगाड़ हो गया तो बता दूंगा। अब तुम जाओं। मुझे भी कहीं जाना है। चाहे जाना कहीं भी नहीं हो। पर पर्सनल्‍टी के लिए ऐसा बोल ना पड़ता है।

जुगाड़ के मामले में हम लोग बहुत अग्रणी है। फट से जुगाड़ कर लेते हैं। उसके अंजाम की भी नहीं सोचते। अंजाम क्‍या होगा? जो होगा सो देखा जाएंगा। एक बार जुगाड़ तो हो जाए। जुगाड़ टेक्‍नोलॉजी है ही ऐसी चीज। जिसके बगैर काम भी तो नहीं चलता। बहुत से ऐसे कार्य होते हैं,जो जुगाड़ की जुगत से चलते हैं। चलते ही नहीं सरपट दौड़ते भी है। कहते है कि जुगाड़ टेक्‍नोलॉजी के आगे अच्‍छी से अच्‍छी टेक्‍नोलॉजी भी फेल हो जाती है और जुगाड़ टेक्‍नोजॉजी पास हो जाती है। वह भी अव्‍वल नम्‍बरों से।
मुल्‍क में ऐसे-ऐसे जुगाड़ी है,जो कबाड़ से भी कबाड़ वस्‍तु का ऐसा जुगाड़ कर देते हैं। जिसे देखकर आंखे फटी की फटी रह जाती हैं। ओर कुछेक ऐसे हैं,जो आप चाहो। उसका जुगाड़ कर देते हैं। इस तरह का जुगाड़ गोपनीय होता। क्‍या करें? जिसमें जिसक तरह की जुगाड़ करने की क्षमता होती है। वह उसी तरह का जुगाड़ करता है। यह जरूरी नहीं है कि जुगाड़ वस्‍तुओं का ही होता है। भांति-भांति तरह के जुगाड़ के विकल्‍प खुले हुए हैं। सड़क से लेकर संसद तक जुगाड़ की जुगत चलती है। नौकरी के लिए जुगाड़। नौकरशाही है,तो स्‍थानांतरण के लिए जुगाड़। राजनेता है,तो कुरसी के लिए जुगाड़। व्‍यापारी है,तो मुनाफे का जुगाड़। मजदूर है,तो काम-धाम हेतु जुगाड़। बच्‍चे का ब्‍याह नहीं हो रहा है,तो जुगाड़। ओर भी न जाने किस-किस तरह का जुगाड़ होता है। हमारे यहां तो एक वाहन का नाम ही जुगाड़ है,जो बगैर नम्‍बर प्‍लेट  और बगैर परमिट के चलता है। खूब सवारी एवं सामान ढोता है।
सोचता हूं,जुगाड़ टेक्‍नोलॉजी नहीं होती तो क्‍या होता। जिनके चूल्‍हे जुगाड़ की जुगत से जलते हैं वे नहीं जलते। जो कार्य यूं ही हो जाते हैं। उनके के लिए कई चक्‍कर काटने पड़ते। धक्‍का–मुक्‍की खानी पड़ती। खैर यह सब छोड़ों और किसी ना किसी जुगाड़ की जुगत में लग जाओं। जुगाड़ है तो सब कुछ है और जुगाड़ नहीं है तो कुछ भी नहीं। क्‍योंकि कई बार जुगाड़ की जुगत से भी किस्‍मत चमक जाती है।

3 Apr 2017

गुटखा तो जुगाली

मोहन लाल मौर्य
जिस तरह भूखे पेट भजन नहीं होता। उसी तरह गुटखा खाए बगैर दिमाग की बत्ती नहीं जलती। जब दिमाग की बत्ती जलती है तो ज्ञान प्रवाह अविरल बहता है। अविरल बहती ज्ञान गंगा की गति को गतिमान रखने के लिए गुटखा चबाना पड़ता है। जब तक मुंह में गुटखा है। तब तब ज्ञान और काम कि गंगा की गति गतिमान रहती है। ज्यों ही मुंह गुटखे से खाली हुआ। दिमाग की बत्ती गुल हो जाती है। पीकधारा से बनने वाले भित्तिचित्र अधबना रह जाते हैं। फिर अधबना भित्तिचित्र इस ताक में रहता है कि कब पीकधारा आए ओर मुझे पूर्ण करें। यह अपुन का वक्तव्य नहीं है। यह तो पीकधारा से प्रभावित पीकू का है।

पीकू ने बताया कि एकदम से गुटखा त्यागना पीक संस्कृति के खिलाफ है। गुटखा सेवन कर्ता ही तो है,जो पीक संस्कृति को बचाए हुए हैं। अन्यथा कब की विलुप्त हो गई होती। आज पीक भित्तिचित्र शैली खोजने से भी नहीं मिलती। पीक भित्तिचित्र शैली से तो सार्वजनिक पेशाबघरों की शोभा बढ़ती है। पेशाबघर की हर भीत पीक भित्तिचित्र शैली से रंगी हुई होती है। बस स्टेण्ड,रेलवे स्टेशन,सरकारी अस्पताल की भीतों पर तो पीक सभ्यता के अवशेष सदैव मौजूद रहते हैं। अवशेष तो उन सरकारी भीतों पर भी मिल जाते हैं। जिनके पास गुटखा सेवन कर्ता कार्मिक की कुरसी होती है। किंतु वे अवशेष शेष नहीं रहते हैं। जो शेष रह जाते हैं,वे अवशेष लायक नहीं रहते हैं।
पीकू का मानना है कि भारतीय संस्कृति में पीक संस्कृति का भी योगदान रहा है। तबी तो गुटखा खाने वालों का आपसी सौहार्द इतना प्रबल होता है। एक पाउच को दो लोग मिल बांटकर खा लेते हैं। कई दफा तो एक पाउच का दो से चार में भी बांटवारा हो जाता है। वह भी बिना हुज्जत किए। ऐसी भाईचारे की प्रतीक संस्कृति पर विराम लगाना पीक संस्कृति की तौहीन है। गुटखा बिरादरी पर कीचड़ उछालना है। जब किसी पर कीचड़ उछलता है तो उसके दामन पर दाग नहीं लगते। बल्कि दामन ही दागदार हो जाता है। एक बार दामन का दाग दागदार होने पर फिर किसी भी वॉशिंग पाउडर से नहीं धुलता है। भले ही कितने भी टीवी पर आने विज्ञापन देखकर कोई सा भी वॉशिंग पाउडर खरीद लो कुछ असर नहीं होता है।
अगर किसी दिन पीक भित्तिचित्र शैली में पुरस्कार देने की घोषणा हुई। मुझे तो पूर्ण विश्वास है कि प्रथम प्राइज पीकू को ही मिलेगा। क्योंकि पीकू के घर की हर भीत पर बने पीक भित्तिचित्र अपने ओर आकर्षित करते हैं।जिन्‍हें देखकर आप भी नाक चढ़ा लेगे। पीकू तो कहता है कि भाई! मुंह में गुटखा है तो जुगाली है अन्यथा मुंह खाली है। खाली मुंह किसी काम नहीं है। मुंह में कुछ ना कुछ होना चाहिए। कुछ लोग च्‍यूंगम मुंह मं चबाते रहते हैं, लेकिन च्‍यूंगम चबाने को हेय दृष्टि से देखने का चलन नहीं है। लेकिन फिर भी मुंह में कुछ तो होना चाहिए,गुटखा भी  हो सकता है।

1 Apr 2017

मूर्ख नहीं डेढ़ गुणा समझदार

आप भले ही उसे मूर्ख समझते होंगे। वह तो अपने आपको समझदार समझता है। समझता क्या है? समझदार है। आप भूल से भी उसे मूर्ख मत समझ लेना। हां,वह भाव-भंगिमा से मूर्ख प्रतीत होता है। रंगमंच पर उसका अभिनय देख,आप मूर्ख समझ बैठते हैं। जबकि वह मूर्खता के नेपथ्य में अभिनयचातुर्य है। उसकी मूर्खता ही उसका पेशा है। वह अपने पेशे में सिद्धहस्त है। वह क्या? आप भी तो अपने पेशे में सिद्धहस्त है। वह मूर्ख प्रतीत तो होता है। आप तो प्रतीत भी नहीं होते। आप तो अपने क्षेत्र में मंजे हुए खिलाड़ी है। खिलाड़ी तो वह भी है पर वह राष्ट्रीय स्तर का नहीं है। आप ठहरे राष्ट्रीय खिलाड़ी। किंतु आप भूल कैसे गए? खिलाड़ी जिला स्तरीय हो,चाहे राष्ट्रीय स्तरीय,खिलाड़ी तो खिलाड़ी होता है। दाव लगते ही चारों खाने चित लाता है। भलाई इसी में है कि अपनी समझदारी अपने पास ही रखिये। कहीं ओर काम आएंगी। यहां ही व्यर्थ कर दी तो कहीं ओर किससे काम चलाओंगे। समझदार होना तो बनता है पर समझदारी दिखाना कहां चलता है। जहां चलता है वहां चलाए। किंतु देखकर चलाए,कहीं कोई चालान नहीं कर दे।
आप उसे मूर्ख कहकर लताड़ते रहते हो। वह निरुत्तर रहता है इसलिए। उसके निरुत्तर में प्रत्युत्तर होता है,पर वह देना नहीं चाहता। आप सोच रहे होंगे। क्यों नहीं देना चाहता? वह आपको ही मूर्ख समझता है। एक दफा उसने मुझे बताया था कि उस मूर्ख से तर्क करना समझदारी नहीं बेवकूफी है। यह सुनकर एक बार तो मैं अवाक रह गया। आपकी नजर में वह बेवकूफ है और उसकी निगाह में आप बेवकूफ है। पेचीदा प्रश्न यह है कि आप दोनों में से मूर्ख कौन है? वह या आप। वह लगता नहीं और आप होंगे नहीं। आप अपने आपको समझदार जो मान बैठे हो। आपको मूर्ख घोषित करना भी उचित नहीं। मैंने घोषित कर दिया तो इल्जाम मेरे सिर पर आ जाएंगा। फिर कोट-कचहरी के चक्कर लगाने पड़ेगे। ऐसा गुनाह मैं करना नहीं चाहता।
कहीं आप मुझे भी तो मूर्ख नहीं समझ रहे है। कुछ लोग मूर्खो की वार्ता करने वालों को भी मूर्ख समझ लेते हैं। लोगों के मुंह से आपने सुना भी होगा,देखों कैसी मूर्खो जैसी बात कर रहा हैं। इसलिए कह रहा हूं। आप मुझे भी मूर्ख समझ रहे है तो ठीक ही समझ रहे है। हो सकता है,मैं भी मूर्ख हूं। अगर मैं मूर्ख हूं तो मेरे लिए तो गर्व की बात है। अब आप कहेंगे इसमें गर्व वाली बात कहां से आ गई,जो आप गर्व कर रहे हो। मैं गर्व इसलिए कर रहा हूं कि मूर्खता में जो सुख-चैन है। वह भला समझदारी में कहां है? मूर्ख से कोई उलझता नहीं है। उलझता है तो गुत्थी झुलझती नहीं। खैर,मेरे संदर्भ में आप जो चाहे सोचों। मैं क्या कर सकता हूं। दिलोदिमाग आपका है। सोचना भी आपको है और करना भी आपको है।
कहां आप हम में उलझ गए। मुद्दे पर आते है। आप जिसे मूर्ख समझ रहे हैं वह आपसे डेढ़ गुणा समझदार है। आप सोच रहे होंगे। वह समझदार ही नहीं है। डेढ़ गुणा समझदार कैसे होगा? यही आपकी गलतफहमी है। इस गलतफहमी के चश्मे को उतारकर,अपनी नंगी आंखों से देखिए। अपने आप आभास हो जाएंगा। चलों कुछ देर के लिए उसे मूर्ख मान लेते है और आपको ज्ञानवान। पहले तो आप यह बताए कि वह मूर्ख क्यूं है? संभवत: आपका वहीं जवाब होगा,जो मैं पहले ही बता चुका हूं कि वह हाव-भाव से मूर्ख प्रतीत होता है। आप उसके भाव-भंगिमा पर न जाकर उसकी विवेक शक्ति का अवलोकन कीजिए। वह जानबूझकर मूर्खता का अभियन करता है और नेपथ्य में रहकर,वे कृत्य कर लेता हैं,जो आप समझदार होकर भी नहीं कर पाते है। उसे शर्म नहीं आती है। जहां आप नहीं आते-जाते वहां वह चला जाता है। अपने कार्यों को अंजाम देना उसे आता है। आपसे अपना स्वार्थ नि:स्वार्थ करवाना उसकी फितरत है। चेहरे पर भोलापन और जुबान में मिठापन नैसर्गिक लगे ऐसे बोल बोलता है,जो उसका हुनर है। अजीबोगरीब वार्ता कर अपना उल्लू सीधा करना उसकी मर्खता नहीं,चालाकी है। अब तो आप मान गए होंगे। मूर्ख नहीं डेढ़ गुणा समझदार है।

11 Mar 2017

टोली के संग होली का आनंद

मोहन लाल मौर्य
मुझे तो अकेले होली खेलना कतई पसंद नहीं है। मैं घर से अकेला होली खेलने निकलता हूं तो घर से निकलते ही दबोच लेते हैं। टोली की टोली तैनात जो रहती हैं। गत वर्ष सीना तानकर होली दंगल में उतरा था। पर जो हाल हुआ था वह मैं ही जानता हूं। होली दंगल में उतरते ही ऐसी पटकनी दी कि चारों खाने चित आया। रंग-गुलाल से सराबोर होकर घर आया और आकर आईने में चेहरा देखा तो आईना भी मुझ पर हस रहा था। जो ओर दिनों खामोश रहता था। आईने से झूठ भी नहीं बोल सकता। उसे सब पता रहता है। वह वहीं बताता है जो खुद देखता है और आईना ही तो है,जो सच बोलता है। खैर,छोड़ों। होली पर्व ऐसा तो होता आया है। पर जो टोली बनाकर होली खेलने में मजा आता है वह भला अकेले में कहां आता है?

होली पर टोली अनायास ही बन जाती है। टोली बनते ही पूरी की पूरी टोली जिस गली से निकलती है तो अच्छे-अच्छों की रंग-गुलाल फीकी पड़ जाती है। बंदा सोचता रह जाता है कि किसके रंग-गुलाल लगाऊं और किसके नहीं लगाऊं। वह एक के लगाएंगा तो उस पर पूरी-पूरी टोली हमला कर देती हैं। इसलिए बचकर निकलना ही मुनासिब समझता है। पर उसका बचना नामुनासिब है। ट्रैफिक हवलदार से बचकर निकल सकते हैं। पर होली पर टोली से बचकर निकलना मुमकिन नहीं नामुमकिन है। क्योंकि उसके पीछे ग्यारह मुल्कों की पुलिस नहीं। बल्कि गली-मोहल्ले के वे लडक़े होते हैं,जो एक साथ टूटकर पड़ते हैं। ऐसा रंगते है कि वह भी टोली में शामिल हो जाता है।
जब टोली की हुड़दंग और होली की मस्ती मिल-बैठते हैं। तब पिचकारी पिचक जाती है और काला पेंट परवान चढ़ जाता है। रंग-गुलाल मुंह ताकते रह जाते हैं। सोचते है कि किसी खूबसूरत लोहे पर जाकर तो मुंह काला नहीं करता। अपुन के पर्व पर आकर अपनी टांग फंसा देता है,कमबख्त कहीं का। होली पर टोली वालों के सम्मुख कोई समझदारी दिखाता है,तो वे कीचड़ को भी रंग-गुलाल समझकर उसके चेहरे पर पोत देते हैं। इनका मानना है कि कीचड़ में कमल खिल सकता है तो कीचड़ से होली खेलने में क्या बुराई है? जो समझदारी नहीं दिखाता है और हंसी-खुशी से टोली के संग होली खेलता है,उसे रंग-गुलाल से सराबोर कर देते हैं। फिर उसका चेहरा नहीं,उसके सफेद दंत भी रंग-बिरंगे दिखते हैं।

अबकी बार मैं भी टोली के संग होली दंगल में उतरुगा। इसके लिए चाहे मुझे गठबंधन क्यों ना करना पड़े? जब राजनैतिक पार्टियां ही चुनावी दंगल में गठबंधन करके उतर सकती हैं,तो भला मैं क्यूं नहीं होली दंगल में उतर सकता? देखना मैं भी किसी ना किसी टोली से गठबंधन करके होली पर ऐसा धमाल मचाऊंगा की सब मेरे रंग में रंग जाएंगे। देखने वाले देखते रह जाएंगे और रंग-गुलाल लगाने वाले रंग-गुलाल लगाकर चले जाएंगे।

5 Mar 2017

होली की होली और भड़ास की भड़ास

होली एकमात्र ऐसा पर्व है। जिस पर भड़ास निकालने वाला होली की होली खेल लेता है और भड़ास की भड़ास निकाल लेता है। अहसास तक होने नहीं देता। उसे पता है कि इनकार करेगा नहीं। इनकार नहीं करेगा तो बुरा मानने का सवाल ही नहीं। किसी कारणवश बुरा मान भी गया तो क्या है? मनुहार करना जानता है। होली पर्व पर बुरा तो कोई मानता ही नहीं। बुरा मानते तो बुरा न मानों होली है’ कोई नहीं कहता। वह मनुहार के तौर पर ‘बुरा न मानों होली है’ कहता है। फिर उसको अच्छी तरह से रंग-गुलाल से रंगकर मुस्कुराता हुआ वहां से खिसक लेता है। वहां ज्यादा देर तक ठहरना नामुनासिब है। वह उस पर गुलाल लगाकर भड़ास निकाल रहा है और उस पर कोई ओर आकर उसकी तरह ही भड़ास निकाल ले। भड़ास निकाल ले तो निकाल ही ले। वह भी तो निकाल रहा है। उसके निकालने में क्या हर्ज है। वह भी कह देगा-बुरा न मानों होली है। होली पर्व पर होता भी ऐसा ही है। जिसके रंग-गुलाल लगाना चाहते हैं,उसके तो लगता नहीं,किसी ओर के लग जाता है। वह तो बच निकलता है। जिसके लगता है,वह उसके लगाता है। इसके उसके रंग लगता है,तबी तो होली खेलने में आनंद आता है। आनंद-आनंद में भड़ास तो स्वत: ही निकल जाती है। क्योंकि आनंद आने पर आनंदित हो जाता है।

भड़ास निकालने वाले का सलीका अलहदा होता है। उसकी विशेषता हस्तकौशल में परिपूर्ण होता है,उसके हाथों में अपेक्षाकृत ज्यादा रंग-गुलाल होता है। पहले आलिंगन प्रवृत्ति अपनाता है। उसके उपरांत होली खेलते-खेलते भड़ास निकाल लेता है। अपनी भड़ास पूर्ण नहीं हो। जब तक रंग-गुलाल लगाता रहता हैं। किसके रंग-गुलाल लगाना है और किससे नहीं। यह नहीं देखता,जो मिल गया वहीं सही। अलबत्ता कई बार विपरीत हो जाता है। सेर को सवा सेर मिल जाता है। जब सेर सवा सेर से मुखातिब होता है। तब भड़ास तो भाड़ में घुस जाती है और दोनों रंग-गुलाल की बौछार से सराबोर हो जाते हैं। फिर होली खेलते-खेलते हमजोली हो जाते हैं। हमजोली मिलकर टोली बनाते हैं। टोली बनाकर हल्ला-गुल्ला करते हुए घर-घर होली खेलने जाते हैं। होली पर टोली की टोली आती देखकर जो दरवाजा बंद कर लेता है। उसको रंगने के लिए अपने-अपने हथकंडे अपनाते हैं। जिसका हथकंडा लगा गया और दरवाजा खुल गया। वह दरवाजा खुलते ही रंग-गुलाल लगाता है और भड़ास निकालने वाला रंग-गुलाल की आड़ में होली खेलते-खेलते भड़ास भी निकाल लेता है।
मन की भड़ास निकालने का सुअवसर होली पर्व पर जो मिलता है। ऐसा अवसर ओर दिन कहां मिलता है? मन से भड़ास निकल जाती है और तन पर रंग-गुलाल चढ़ जाता है। मन-तन की अभिलाषा पूर्ण हो जाती है। जो प्राय: हो नहीं पाती। मन की अभिलाषा पूर्ण होती है तो तन की नहीं होती और तन की होती है तो मन की नहीं होती। जब मन-तन की अभिलाषा एक साथ पूर्ण होती है। तब उसके लिए वह दिन होली दिवाली से कम नहीं होता। जब दिन ही होली का मिल रहा है तो वह अभिलाषा पूर्ण क्यों नहीं करेगा? वह तो अवश्य करेगा। सालभर से वह इसी दिन के इंतजार में तो रहता है। कब होली आए और कब मन की मुराद पूरी करू।


होली पर जो भड़ास निकालना चाहता है। वह गतवर्ष की भरपाई करना चाहता है। गतवर्ष उसके साथ जो सलूक किया था। रंग-गुलाल की आड़ में काला तेल लगा दिया था। ऊपर से कीचड़ उड़ेल दिया था। वह भी ऐसा ही कुछ करना चाहता है। जिसने किया था वह उसके निशाने पर होता है। निशाना सही लग गया तो भड़ास निकल गई। निशाना चुक गया और कहीं ओर निशाना लग गया तो भी कोई बात नहीं। तब भड़ास रंग-गुलाल में तब्दील हो जाती है। होली पर भड़ास की रंग-गुलाल हो,चाहे प्यार-प्रेम की। रंग-गुलाल रंग-गुलाल ही होती है। उसका रंग-रूप वहीं होता है जो होता है। रंग- गुलाल लगने पर बदलते है तो चेहरे बदलते हैं। जब किसी का  चेहरा लाल,पीले,हरे,गुलाबी,रंगों से अच्‍छी तरह से लिपा-पुता हो। तब जाना-पहचाना चेहरा भी अजनबी सा लगता है। अजनबी सा इसलिए लगता है रंगों में समायोजन की भावना जो होती है। एक-दूसरे रंग में समा जाने पर हमारी तरह विरोध नहीं करते। बल्कि प्‍यार-प्रेम से समा जाते हैं।
दरअसल होली पर्व पर जो आप समझ रहे हो,उस तरह की भड़ास नहीं होती। इस भड़ास में तो मिठास होती है। जिसका स्वाद मिठा न होकर अजीब सा होता है। इसे खाना तो कोई नहीं चाहता,पर खानी पड़ जाती है। नहीं खाए तो बुरा मान जाए और होली पर बुरा मानना अच्छा नहीं है। इसलिए सब मिल-बांटकर खाते हैं और खिलाते हैं। आओं मिल-जुलकर होली खेले पर भड़ास नहीं निकाले।

28 Feb 2017

फेसबुक के एक जीव की विशेषता

मोहन लाल मौर्य
आज हम आपको फेसबुक पर पाए जाने वाले ऐसे जीव के बारे में बताएंगे,जो फेसबुक के सामान्य जीवों से अलहदा है। जिसके प्रादुर्भाव के समय ही निर्धारित फ्रेंड्स सूची पूर्ण हो जाती है और फोलॉअर्स की बहुतायत रहती है। फर्जी प्रजाति के इस जीव की पहली विशेषता होती है-यह नर होते हुए भी मादा के नाम से जाना जाता है। इसकी प्रोफाइल पर खुद की फोटू न होकर एक सुंदर सी लड़की की फोटू होती है। जिसके बारे में खुद भी नहीं जानता किसकी फोटू है। जानकर करेंगा भी क्या? प्रोफाइल फोटू तो आएदिन बदलनी जो रहती है।
                                                                                    इस जीव की दूसरी विशेषता होती है- इसके पास फ्रेंड्स रिक्वेस्ट कम आती और भेजता ज्यादा है। इसकी फ्रेंड्स सूची में यूथ का बोलबोला होता है। यह जरूरी नहीं कि इसकी एक ही फेबु आईडी होती है। अनेक भी हो सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि कई फेबु आईडी होती हैं। जिन्हें बारी-बारी से उपयोग करता रहता है। इस जीव का मुख्य उद्देश्य सस्ती लोकप्रियता हासिल करना और लोगों को गुमराह करना होता है। गुमराह कर शिकार करना इसकी चालाकी है। इसे जब देखों तब ही ऑनलाइन देखता है। लगता है जियोका भरपूर फायदा उठा रहा है।
             इसकी तीसरी विशेषता पोस्ट संबंधी होती है। नित्य एक से बढ़कर एक आकर्षित करती  सुंदर लड़की की फोटू पोस्ट करता हैं,जो प्रोफाइल फोटू से मिलती-जुलती होती है। सच बताना कैसी लग रही हूं? मुझसे दोस्ती करोंगे। जो कमेंट्स करेंगा उसको वाट्सऐप नम्बर दूंगी। सुंदर लड़की की फोटू के साथ इसी तरह से लिखा हुआ देखकर मनचले एक से बढ़कर एक कमेंट्स करते हैं। पलभर में ही हजारों की तादाद में लाइक्स,कमेंट्स आ जाते हैं। पर रिप्लाई एक को भी नहीं मिलती है। कई तो रिप्लाई के इंतजार में रातभर ढंग से सो भी नहीं पाते। बार-बार देखते रहते हैं,रिप्‍लाई आयी की नहीं आयी। अपने कमेंट्स का रिप्लाई नहीं मिलने पर इनबाक्स में जाकर चैट करते हैं। पर यह जीव बहुत चतुर होता है। इनबाक्स में बिछाई गई चैट रूपी जाल को दूर से ही भाप जाता है। समीप आता ही नहीं।
दिन-प्रतिदिन फेबु पर फर्जी प्रजाति के इस जीव की तादाद बढ़ती ही जा रही है। इसकी बढ़ती तादाद फेसबुक के सामान्य जीवों लिए घातक साबित हो सकती है। कई बार यह जीव अश्लील प्रवृत्ति की पोस्ट भी कर देता है। आपने अपनी फेसबुक वॉल पर इस जीव को कई बार देखा होगा और कई बार सामना भी हुआ होगा। चाहे यह आपकी फ्रेंड्स सूची में नहीं हो। पर आपके फ्रेंड्स लाइक,कमेंट,शेयर करके आपकी वॉल पर भी ले आते हैं। यह अपने आकर्षण से प्रभावित करता है। इससे जितना बचा जाए उतना ही फायदेमंद है। जब भी आपकी वॉल पर विचरण करने आए तो इसे लाइक,कमेंट मत कीजिए। यह अपने आप की चला जाएंगा। आज के लिए बस इनता ही। अब मुझे इजाजत दीजिए। अगले एपिसोड में मिलते एक ओर ऐसे ही जीव की कहानी के साथ। कहीं जाएंगा नहीं, देखते रहे फेसबुक जीवों से जुड़ा एक ओर खास कार्यक्रम।

19 Feb 2017

चार लोग क्या कहेंगे


मोहन लाल मौर्य
व्यक्ति चार लोगों से डरता हैं। अन्यथा पता नहीं क्या से क्या कर दे। आप सोच रहे होंगे। भला ये चार लोगहै कौन और व्यक्ति इनसे डरता क्यों हैं? मैं आपको बता दूं ये चार लोगआप हम में से ही होते हैं। जरूरी नहीं पुरूष ही हो,महिलाएं भी हो सकती हैं। ये चार लोगनारदमुनि गुणों से युक्‍त होते हैं। राई का पहाड़ और बात का बतंगड़ बनाने में महारथी होते हैं। इसको उसकी और उसकी इसको,  मिर्च-मसाला लगाकर कहना इनका कार्य है। खुशामद करने व करवाने में अग्रणी रहते हैं। जो इनकी खुशामद करता है,वह खुशहाल रहता है और जिसकी ये खुशामद करते हैं उसे कंगाल करने में लगे रहते हैं। ये किसी के फटे में ही टांग नहीं अड़ाते बल्कि फटे,पुराने व नये में भी अपनी टांग फंसा देते हैं। इनको तो अपनी टांग फंसाने से मतलब रहता हैं, फिर चाहे फटा,पुराना व नया ही क्यों ना हो? टांग फंसाने के लिए बस थोड़ा सा फटा हो। कैसे भी करके एक बार फटे में टांग फंस जाए, फिर उस फटे को ओर फाडऩे में तो ये सिद्धहस्त हैं।
ये चार लोगचहूंओर विराजमान रहते हैं। अपनी शातिर निगाहों से चलते-चलते ही ताक-झांक कर लेते हैं। कौन कब घर आ रहा है और कब घर से जा रहा है? कहां जा रहा है और कहां से आ रहा है? किसके नल में ज्यादा पानी आता है और किसके नल में कम आता है। किसका नल दिनभर खुला रहता है और किसका नल बंद रहता है। रामू के घर में क्या चल रहा है? श्यामलाल की बीवी बेलन से उसकी रोज मरम्‍मत क्‍यों करती है? मदनलाल की बीवी अपनी पड़ोसिनों कमला और विमला से क्‍या कानाफूसी करती है? जेठाराम का लडक़ा किसकी लडक़ी से नैन मटक्‍का कर रहा है? इन सब बातों की भनक लगते ही ये चार लोगप्रचार-प्रसार करने में जुट जाते हैं। जहां कहीं भी इनको दो-चार लोग मिल गए या बैठे हो,  वहीं अपनी पोटली खोल देते है। एक बार बात दो से चार में गई। उसके उपरांत कुछ ही देर में सिलसिला एक-दूसरे से आगे बढ़ता हुआ सर्वविदित हो जाता है। आधुनिकता में सोशल मीडिया ने इनका काम ओर भी आसान कर दिया है। बस कॉपी-पेस्ट करना होता है। बाकी का काम तो खुद-ब-खुद ही हो जाता है। इनके वक्तव्य की पहली शर्त होती है-देख किसी से कहना मत और कह भी दे तो मेरा नाम मत लेना। अगर मेरा नाम आ गया तो देख लेना तेरी खैर नहीं।जब सूनने वाला इस शर्त को फॉलो कर लेता है। फिर उसे पूरी स्टोरी बताते है। बाकायदा टीवी सीरियल की तरह चलचित्र दर्शाते है। एक-एक पात्र से परिचय करवाते हैं और उनका चरित्र बताते हैं।
इन चार लोगों की वैसे तो तकरीबन सारी क्रिया-प्रतिक्रिया तंदुरुस्त रहती है,पर पाचन शक्ति कमजोर रहती है। इनको आप किसी भी तरह की बात कह दो। ऊपर से कसम भी दिला दो। इनके हजम नहीं होगी। जब तक आपके द्वारा कहीं बात दो-चार को कानाफूसी नहीं कर दे। तब तक इनके पेट में मरोड़े उठ़ते रहते हैं। कुलबुलाहट लगी रहती हैं। मैं सोचता हूं,भला इनके भोजन कैसे पचता होगा?
 इनके भय से हर कोई भयभीत रहता हैं। मां-बाप अपने बेटा-बेटी को यहीं कहता है-तुम कोई-ऐसा-वैसा काम मत करना, अन्यथा चार लोग क्या कहेंगे। बात चार में चल गई तो हमारी नाक कट जाएंगी। एक बार नाक कट गई तो किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं रहेंगे। समाज में रहने के लिए नाक का होना जरूरी है। फिर चाहे नाक कैसे भी हो? लम्बी हो,छोटी हो,टेड़ी-मेड़ी हो। बस कटी हुई नहीं हो। जब नाक साफ करते वक्त जरा सा नाखून लगने से नाक कट जाती है,तब भी बहुत तकलीफ होती है। यहां तो मामला बिरादरी की नाक का हो जाता है। बिरादरी में नाक कटने पर तकलीफ नहीं बदनामी होती है। व्यक्ति तकलीफ तो सहन कर लेता है, बदनामी सहन नहीं होती। हर कोई यहीं चाहता है कि समाज,बिरादरी में मेरी नाक ऊंची रहे। नाक कटे नहीं। शायद इसीलिए व्यक्ति इन चार लोगों से डरकर ही रहता हैं।

मजे की बात है कि इन चार लोगों का तो बाल भी बांका नहीं होता। जिसका होना होता है उसका हो जाता है। ये तो अपना काम कर चलते बनते हैं। पीछे से चाहे कुछ भी हो इनकी सेहत पर क्या फर्क पड़ता हैं। जो भी पड़ता उस पर ही पड़ता है। वहीं दबता और वहीं झूकता है। इनके आगे नहीं सही पर किसी ना किसी के सम्मुख तो झूकता ही है। नहीं झूके तो अकिंचित भी कीचड़ उछाल देता है। जिसका वजूद न के बारबर होता है। पर क्या करें? जब जिसका वक्त होता है वहीं हावी होता है। जिस पर हावी होता है वह भीगी बिल्ली की तरह म्याऊं रहता है। फिर चाहे वह शेर क्यों ना? ये लोग चाहते भी यहीं है कि शेर हमारे समक्ष दहाड़े नहीं। बिल्ली की तरह म्याऊं-म्याऊं ही करता रहे। इनको शेर की दहाड़ नापसंद है और बिल्ली की म्याऊं- म्याऊं पसंद है। क्योंकि ये भी बिल्ली की श्रेणी में आते हैं। जिस तरह बिल्ली घर-घर जाती है। उसी तरह ये भी दिनभर इधर-उधर ही भटकते रहते हैं। मेरा मानना है इनसे जो जितना भयभीत रहता है। वह उतना ही पीछे चला जाता है। आप-हम पूरी जिंदगी इसी भय में गुजार देते है कि चार लोग क्या कहेंगेऔर अंत में चार लोग यहीं कहते है-राम ना सत्य है। उस वक्त आप-हम इस मोह-माया संसार को छोडक़र परलोक की यात्रा पर होते है। जहां ये चार लोगनहीं चार यमदूत होते हैं।

13 Feb 2017

वसंत अब ऑनलाइन ही मिलेगा


मोहन लाल मौर्य
वसंत एक फरवरी को परदेश से आया था। मैंने ही नहीं दीनू काका ने भी देखा था। देखा क्या था,उसने दीनू काका के पैर भी छूए थे। काका ने शुभाशीष भी दिया था-जुग-जुग जियो। यूं ही आते-जाते रहना।वसंत समूचे मोहल्ले वासियों का चेहता हैं। हर साल  इन्हीं दिनों घर आता है। कपड़ों का बैग भरकर लाता हैं। वसंत को पीले वस्त्र बहुत प्रिय हैं। उसका रूमाल तक पीले रंग का होता है। सब उससे मिलना चाहते हैं। पर जबसे आया है, दिखाई नहीं दे रहा है।

कल रामू काका पूछ रहे थे- सुना है वसंत आया हुआ है?’ मैंने कहा-आपने ठिक सुना है।यह सुनकर वे बोले-तो फिर वह कहां है? मैंने तो उसे देखा ही नहीं और ना वह मुझे मिला है।इस पर मैंने उन्हें समझाते हुए कहा-आजकल वह आप से ही नहीं, किसी से भी मिलता-जुलता नहीं है।रामू काका चौंके-क्या कह रहे हो? वसंत ऐसा लडक़ा नहीं है। वह तो जब भी आता है, सबसे मिलता है। बड़े-बुजुर्गों का अदब करता। प्यार-प्रेम की वार्ता करता है। जरूर किसी कार्य में व्यस्त होगा।
रामू काका वसंत से मिलने उसके घर पहुंचे। पर वह वहां नहीं था। उसके मां-बाप बता रहे थे कि जबसे आया है, फेसबुक पर ही चिपका रहता है। पता नहीं क्या हो गया है? गुमसुम रहता है। पहले तो खेत-खलियान में भी जाता था। सरसों के फूल बरसाते हुए आता था। सबसे मिलता-जुलता था। दिनभर खुश रहता था।

अगले दिन मैं गया तो वसंत अपने कमरे में बैठा फेसबुक पर लिख रहा था- मैं वसंत हूं। परदेश से तुम्हारे लिए आया हूं। एक खास गिफ्ट लाया हूं। वैलेंटाइन डे पर मिलेगे...।तभी उसे कमरे में मेरे दाखिल होने का भान हुआ। उसने गर्दन मेरी आरे घुमाई और बोला-आप और यहां। कैसे आना हुआ?’
मैंने कहा-भाई! आपसे मिलने आ गया। आप जबसे आए हो, मिले ही नहीं। आपको रामू काका भी पूछ रहे थे। कईयों को तो यकीन नहीं है कि वसंत आ गया है। आखिरकार बात क्या है?’ वसंत बोला-बात-वात कुछ नहीं है। अभी तुम जाओं। मैं व्यस्त हूं। शाम को फेसबुक पर ऑनलाइन मिलते हैं। वहीं वार्तालाप करते हैं।

मैं मन मसोसकर चला आया। रास्ते में रामू काका मिले। उन्होंने पुन: पूछा-वसंत मिला क्या? नहीं मिला तो कहां मिलेगा?’मैंने कहा-काका,वसंत तो अब फेसबुक पर ऑनलाइन मिलेगा।

9 Feb 2017

कबूतर चाहते हैं रोज सभा हो

मोहन लाल मौर्य
गांव की चौपाल में एक विशाल पीपल का पेड़ है। उसके चारों ओर चबूतरा बना हुआ है। जिस पर सुबह-शाम कबूतर चुग्गा चुगते हैं और दोपहर में बुजुर्ग लोग ताश-पत्ती खेलकर अपना टाइम पास करते हैं। यदा-कदा पंच-पटेल फैसला करते हैं। फैसले में न्याय होता है या अन्याय। यह तो पीपल की टहनियों पर बैठे कबूतर भी जानते हैं। पर खामोश रहते हैं। गुटरगूं-गुटरगूं नहीं करते। किस की कहे और किस की नहीं कहे यह दिक्कत रहती है। एक बार अन्याय के खिलाफ गुटरगूं-गुटरगूं की थी। किसी ने सुनी ही नहीं । एक दफा जन सुनवाई में भी गुटरगूं-गुटरगूं की थी। उस वक्त सुनकर अनसुनी कर दी। इसलिए टहनियों पर ही बैठे रहना ही उचित समझते हैं।

गांव के छोटे-मोटे सार्वजनिक कार्यक्रम इसी पीपल तले बने चबूतरे पर आयोजित होते हैं। कार्यक्रमों को देख-देखकर कई कबूतर बड़े हुए हैं और कई बुजुर्ग हो गए हैं। कबूतरों ने यहां रामलीला देखी है और धूमधाम से राष्ट्रीय पर्व भी मनाए हैं। रावण दहन पर रावण जलता देखा और होली दहन पर होली जलती देखी हैं। मदारी का खेल-तमाशा और जादूगर का जादू देखा है। पर जो चुनावीं मौसम में देखने और दाने चुगने को मिलता है। वह ऐसे अवसरों पर कहां मिलता है। चुनाव में आए दिन चबूतरे पर सभाएं होती हैं। जिस दिन जनसभा होती है। उस दिन कबूतर खुश रहते हैं। उन्हें मुफ्त में दाना-पानी मिलता है। कहीं पयालन उड़ान भरने की जरूरत ही नहीं पड़ती। बल्कि बैठ-ठाले ही बंदोबस्त हो जाता है। जब भी चुनावीं मौसम आता है। पीपल के कबूतरों के अच्छे दिन’ आ जाते हैं। नित्य किसी ना किसी नेताजी का कार्यकर्ता चबूतरे पर दाना-पानी की व्यवस्था कर देता है। दाना चुगकर दिनभर मस्त रहते हैं। पर ज्यों ही चुनावीं मौसम खत्म होता है। दाना-पानी चुगने के लाले पड़ जाते है। दाने-दाने के लिए मोहताज होना पड़ता है। कई बार तो दो चार दिन तक दाना-पानी नसीब नहीं होता है। कबूतर तो चाहते है कि रोज सभाएं हो। रोज सभाएं होंगी तो मुफ्त में दाना-पानी मिलेगा। मुफ्त का माल भला कौन छोड़ता है।

सुनने में आया है कि पीपल कटने वाला है। जब से कबूतरों ने यह खबर सुनी है चिंतित हैं। पीपल न रहेगा तो यहां सभाएं नहीं होंगी और सभाएं नहीं होगी तो दाना-पानी भी नहीं मिलेगा। चुनावीं मौसम में कहे तो किस से कहे। नेताजी भी अपने प्रचार-प्रसार में व्यस्त है। चलो नेताजी से कहकर देखते वे ही कोई ना कोई हल निकालेंगे। यह सोचकर नेताजी के पास गए। नेताजी ने कहा- मैं जीत गया तो पीपल को कभी नहीं कटने दूंगा। यह मेरा आपस से वादा है। दाना-पानी की भी व्यवस्था करवा दूंगा। चौबीस घंटे चबूतरे पर दाना-पानी उपलब्ध रहेगा। यह सुनकर कबूतर प्रफुल्लित हो गए और नेताजी को दुआएं देने लगे। नेताजी ने आश्वासन तो दिया है। यह तो चुनाव जीतने के बाद पता चलेगा पीपल कटता है या यथावत रहता है।

3 Feb 2017

हवा में उड़ते गुब्बारे की विशेषता


मोहन लाल मौर्य
चुनावीं रंग कैसे परवान चढ़े और लोग अपने रंग में कैसे रंगे? वोटर कैसे प्रभावित हो? पार्टी सत्ता में कैसे आए? गुणा,भाग,जोड़-घटा बढ़ाकर समीकरण बैठाते हैं। विचार-मंथन कर प्रचार-प्रसार करने का नायाब तरीका अपनाते हैं। अलहदा प्रसार कर चुनावीं वैतरणी पार करने की सोचते है। अबकी बार नेताजी का प्रसार हवा में गुब्बारें उड़ाकर करने का निर्णय लिया है। कर्मठ कार्यकर्ताओं को जिम्मेदारी दे गई है। क्योंकि इस कृत्य में पार्टी का कर्मठ कार्यकर्ता पारंगत होता है। वह नेताजी के नाम के गुब्बारें हवा में उड़ाना जानता है। हवा का रूख देखकर गुब्बारें उड़ाता है। उड़ते हुए गुब्बारें को जो पकडऩे दौड़ता है उसे अपना वोटर समझ बैठता है।
दिनभर गुब्बारें उड़ाने के उपरांत शाम को कार्यालय में रिपोर्ट देनी होती हैं। कार्यालय प्रमुख एक-एक कार्यकर्ता से रिपोर्ट लेता हैं-आज तुमने कितने गुब्बारें उड़ाए और कितने गुब्बारें लोगों ने पकड़े। जो गुब्बारें उड़ते हुए फुस हो गए उनकी गणना कर मत बताना। उन्हें तो वापस जमा करवाने हैं। उनके बदले में नए जो लेने हैं। जो कार्यकर्ता सर्वाधिक गुब्बारें उड़ाने का जिस दिन रिकॉड़ कायम करता है उस दिन नेताजी उसकी पीठ थप-थपाते है और उसे ओर गुब्बारें उड़ाने के लिए प्रोत्साहित करता है। नेताजी के मुंख मंड़ल से अपनी प्रशंसा सुनकर कार्यकर्ता पुलकित हो जाता है और अगले दिन उससे भी ज्यादा गुब्बारें उड़ाने के लिए जुट जाता है।
हवा में उड़ते हुए गुब्बारें को जो पकड़ लेता है उसे गुब्बारें की विशेषता बताते हैं। ये ऐसा-वैसा कोई साधारण गुब्बारा नहीं है। इसको बनाने से पूर्व हर तबके का ध्यान रखा गया हैं। उसके उपरांत इसको विकास के रंग-बिरंगे रंग से रंगा गया है। इस पर पार्टी का घोषणा पत्र अंकित हैं। विविध योजना हैं। योजनाओं को कब कैसे लागू करना है,प्लान है। प्लान के मुताबिक योजना है और योजनाओं के अनुरूप विकास है।
देखना इस बार गुब्बाराछा गया तो विकासराजमार्ग व राष्ट्रीयमार्ग से नहीं बल्कि गली,मोहल्ला,गांव व शहर से होता हुआ गुजरेगा। जिधर से भी विकासगुजरेगा उधर से कूड़ा,कचरे का नेस्तनाबूद हो जाएंगा। जल की विकट समस्या से आप नहीं हमारे नेताजी लड़ेगे। गरीब व किसान के लिए भी कुछ ना कुछ करेंगे। चौबीस घंटे विद्युत आपूत्र्ति होगी और बूंद-बूंद सिंचाई से खेती होगी। किसानों के लिए अच्छी किस्म का बीज उपलब्ध करवाएंगे। अच्छी किस्म का बीज होगा तो अच्छी पैदावार होगी। अच्छी पैदावार होगी तो किसान खुशहाल रहेगा और गरीब तंगहाल नहीं रहेगा। गरीब की मूलभूत आवश्यताओं की पूर्ति  होगी। बेरोजगारों के लिए रोजगार नहीं नौकरी होगी। हमारा प्रयास और आपका एक वोट’ ‘गुब्बारेंकी उड़ान को गगन तक पहुंचा सकता है। गुब्बारेंका गगन तक पहुंचने का अभिप्राय है नेताजी की विजय भव:निश्चित होना।