5 Sept 2017

कभी नहीं घटे,शिक्षक का आदर-सत्‍कार

शिक्षक का नाम मन-मस्तिष्क में आते ही हमारे समाज में एक अलग रूपरेखा निर्मित हो जाती है। शिक्षक समाज, देश का पथप्रदर्शक होता है। एक शिक्षक देश को बना सकता है, तो देश का विनाश भी कर सकता है। देश का भविष्य कैसा होगा, यह शिक्षकों के हाथों में समाहित होता है। गुरु का स्थान हमारे पुरातन संस्कृति में भगवान से बढ़कर बताया गया है। तभी तो यह उक्ति प्रचलित है, गुरु गोविंद दो खड़े, काके लागु पाय,बलिहारी गुरु आपसे गोविंद देऊ बताए।शिक्षक घर,परिवार,समाज में आदरणीय व सम्माननीय स्थान रखता है। माता-पिता के बाद शिक्षक ही बच्चों के भविष्य का निर्माण करता है। छात्रों को अच्छे संस्कार से अवगत कराता है। एक गुरु की तुलना हम एक कुम्हार और जौहरी से कर सकते हैं। जिस प्रकार एक कुम्हार बिखरी हुई मिट्टी को समायोजित करते हुए उसे घड़े का आकार देता है, वहीं काम एक शिक्षक समाज और देश के लिए करता है। बड़ों के प्रति आदर-सत्कार व सेवा-भावना  की प्रेरणा शिक्षक से ही मिलती हैं। एक शिक्षक की दृष्टि में सभी छात्र समान होते हैं, और वह सभी का भला चाहता है। वह अपने शिष्यों को सही-गलत व अच्छे-बुरे की पहचान करवाते हुए उनकी नींव मजबूत करता हैं और उन्हें एक साचे में ढालकर कामयाबी की सीढ़ी तक पहुंचाता हैं। ताकि वे अपने मंजिल तक पहुंच जाएं। किताबी ज्ञान के साथ नैतिकता की शिक्षा देकर अच्छे चरित्र का निर्माण करता है।

शिक्षक की तुलना उस संचालक से की जा सकती है,जिसके बिना जीवन रूपी गाड़ी का कोई औचित्य नहीं। जिस प्रकार महंगी से महंगी गाड़ी, बिना संचालक के बैलगाड़ी के समतुल्‍य है, उसी तरह बिना गुरु के जीवन का कोई सार्थक मूल्य नहीं। लेकिन वर्तमान परिवेश में शिक्षा जगत व्यापार बन गया है। गुरु-शिष्य के बीच वे संबंध अब नही रहे, जो गुरुकुल परम्परा या प्राचीन समय में थे। आज के कई शिष्य तो अपने शिक्षक के चरण छूने में भी शर्म महसूस करते हैं, तो कई शिक्षक भी अपने छात्रों का शारीरिक और मानसिक शोषण करते हैं। दूसरे अर्थों में आज गुरु-शिष्य की वास्तविक परिकल्पना ही नज़र नहीं आती। शिक्षक भी जब शिष्य के स्तर पर आकर छात्रों से व्यवहार करने लगते हैं, फिर उनकी व्यवहारिकता और प्रभावित होने लगती है। आज अगर गुरु-शिष्य का संबंध मात्र किताबी ज्ञान तक सीमित रह गया है। तो यह रवायत भी सही नहीं है। सभ्य समाज में गुरु को ईश्वर से भी बड़ा माना गया हैं। वह परम्परा समाज से गुम नहीं होनी चाहिए। एकलव्य ने द्रोणाचार्य को अपना गुरु मानकर उनकी मूर्ति को अपने सक्षम रख धनुर्विद्या सीखी, लेकिन आज न द्रोण जैसे शिक्षक है, और न ही एकलव्य जैसे छात्र। आज तो छात्र शिक्षा को खरीदी जाने वाली वस्तु, और शिक्षक ने शिक्षा को व्यवसाय बना दिया है। किंतु इन सब के इतर आज भी हमारे समाज में ऐसे शिक्षक हैं। जिन्होंने हमेशा समाज के सामने एक अनुकरणीय मिशाल पेश किया है। जिनकी हम जितनी सराहना करें, वह कम ही होगी। 
देश के द्वितीय राष्ट्रपति डा.सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्म दिवस के उपलक्ष्य में मनाया जाने वाला शिक्षक दिवस हर वर्ष 5 सितम्बर को एक पर्व की तरह मनाया जाता है। जो शिक्षक समुदाय की गरिमा को बढ़ाता है। भारत में प्राचीन काल से ही गुरु-शिष्य की परम्परा चली आ रही है। जो आज भी विद्यमान है। लेकिन अब धन के बल पर शिक्षा लेने और देने का कारोबार फल-फूल रहा है। जिसमें ज्ञान अर्जित नहीं होता,बल्कि परीक्षा में उत्तीर्ण होने के फार्मूलों के साथ रटाया जा रहा है। बदलते समय के मुताबिक जरूरत किताबी ज्ञान के साथ व्यवहारिक,सुसंस्कारी,मनोवैज्ञानिक ज्ञान की शिक्षा देने की है। जिससे आज के छात्र में भारतीय सभ्‍यता और संस्‍कृति का भी अंतर्भाव रहे। इसके अलावा शिक्षक दिवस पर अपने टीचर को गुलाब का पुष्प या कोई उपहार देने से बढ़कर हैं, आज की छात्र पीढ़ी उनका आदर-सम्मान करें,  और उनके द्वारा बताएं गए मार्ग पर चले। तब शिक्षक दिवस मनाने का महत्त्व अधिक सार्थक सिद्ध होगा। क्योंकि टीचर का संबंध केवल शिक्षा तक ही सीमित नहीं है। बल्कि वह तो हर मोड़ पर अपने शिष्य का हाथ थामने के लिए आमादा रहता है। 
जहां कहीं भी शिष्य विचलित होता है या अपनी राह से भटकर दूसरी राह पर चलने लगता है। तब टीचर को बहुत दुख होता है। क्योंकि उसके द्वारा,जो बीज रोपकर पौधा धीरे-धीरे पेड़ बनने के लिए आमादा था। वह पेड़ बनने से पूर्व टूटने के कगार होता है तब सबसे ज्यादा दुख टीचर को ही होता है। इसी स्थिति में उसी पथ पर वापस लाले के लिए शिष्य को अपने पास बुलाता है और समझाता है। जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है और यह एक शिक्षक का कर्तव्य भी है। कई बार शिक्षक अपने शिष्यों को डांट-फटकार देता है, तो कई छात्र कुपित हो जाते हैं। छात्र कुपित होने की बजाय यह जानने की कोशिश करें कि उसने क्या गलती की है? जो टीचर ने मुझे डांटा है। साथ ही साथ आज गुरु- शिष्य की परम्परा को पुनर्जन्म की आवश्यकता भी है,जिससे समाज को सही दिशा मिल सके। शिक्षा मात्र पठन और पाठन का जरिया न रहकर, आपसी स्नेह, और विचारों के प्रवाह की धारा बन सके, जो आज टूटता दिख रहा है। उसे टूटने से बचाया जाए।

30 Aug 2017

सही बात है,नाम में कुछ नहीं रखा

मैं कई दिनों से अपने नाम को लेकर हैरान हूं। हैरान इसलिए हूं कि एक दिन एक मित्र ने यह कह दिया-अपना नाम बदल लीजिए। मैंने उससे पूछा- नाम बदलने से क्या होगा? उसने जवाब दिया-एक बार नाम बदलकर तो देखिए। फिर देखना होता क्या है? दरअसल उसने ही बताया कि आपका नाम यानी की मेरा नाम मेरे मुताबिक जम नहीं रहा है। मैंने सुना है कि मित्र का मंतव्य ही गंतव्य तक पहुंचाता है। इसलिए मैंने अपना नाम बदल लिया। बदले नाम से एकाध रचना भी प्रकाशित करवा ली। मन में उत्कंठा उत्पन्न हुई कि,जो मूल नाम से यश-कीर्ति प्राप्त नहीं हुई। हो सकता है परिवर्तन नाम से हो जाए। यहीं सोचकर मैंने अपने नाम में से मध्यम हटा दिया। प्रथम और अंतिम रख लिया। सम्पूर्ण परिवर्तन तो कर नहीं सकता। सम्पूर्ण परिवर्तन करने का अभिप्राय है अपना जो अस्तित्व है उसे विलुप्त करना।
सुना है कि नाम की बड़ी महत्ता होती है। यह अलग बात है कि कईयों कि नाम के विपरीत मनोदशा होती है। जैसे कि नाम तो रोशन लाल है,पर रहता बेचारा अंधेरे में है। इसी तरह नाम तो शमशेर बहादुर सिंह है,पर मरे ना चूहा भी। कद का ठिगना है,पर नाम लम्बरदार है। रंग का काला है,पर नाम सुन्दरलाल और रंग का गोरा है,पर नाम कालूराम है। देह दुबली पतली है और नाम मोटूराम है। अष्ट-पुष्ट,लम्बी-चौड़ी कद-काठी है,पर नाम छोटूराम। कई होते तो मर्द हैं,पर उनके नाम में औरत का नाम पहले आता हैं। जैसे कि दुर्गाप्रसाद,लक्ष्मी नारायण,सीताराम,आदि-इत्यादि। कईयों के नाम बड़े-अटपटे होते हैं,पर उनका नाम बड़ी इज्जत से लिया जाता है और कईयों के नाम भगवान के नाम पर होते हैं,फिर भी उन्हें आधे-अधूरे नाम से सम्बोधित किया जाता है। मसलन,नाम तो है ‘हनुमान’ और बुलाते है ‘हड़मान’।

मैंने अपना नाम परिवर्तन क्या किया? अड़ोसी-पड़ोसी आपत्ति जताने लगे। जबकि नाम मैंने परिवर्तन किया है और आपत्ति वे जता रहे हैं। पड़ोसी गंगाराम ने बताया कि भाई नाम परिवर्तन से कुछ नहीं होता। नाम तो काम से होगा। नाम तो मुंबई,कोलकाता,चेन्नई,वाराणसी,सहित कई शहरों के भी बदले गए है। लेकिन हुआ क्या? क्या वे शहर इधर से उधर हो गए? यहां फिर उनके पंख लग गए,जिधर मन किया उधर की उड़ चले। वे वहीं स्थित हैं,जहां थे। हां,उनका आकार-विकार जरूर बढ़ता रहता है। आकार-विकार का क्या है? वह तो बगैर नाम परिवर्तन के भी घटता-बढ़ता रहता है। पड़सोसियों कि ओर से इस तरह के सुझाव सुनकर मैं असमंजस में हूं। इस सोच में डूबा हुआ हूं कि मित्र ने भी कुछ ना कुछ उधेड़बुन कर ही ऐसी राय दी होगी। अन्यथा आज के युग में भला ऐसी  राय कौन देता है।
एक पड़ोसी ने तो यह तक कह दिया-भाई! नाम अमरसिंह रखने से कोई अमर नहीं हो जाता। उसे भी मरना तो पड़ता ही है। लक्ष्मी नाम है तो इसका मतलब यह थोड़ी है कि कुबेर का खजाना उसी के पास है। नाम सत्यप्रकाश है तो यह जरूरी थोड़ी है कि वह  झूठ नहीं बोलेंगा। इसी तरह नाम दयाशंकर है तो इसका मतलब यह नहीं कि उसे क्रोध नहीं आएंगा। भाई! नाम तो नाम होता है। नाम चाहे बड़ा हो। चाहे छोटा हो। उसके काम के अनुरूप ही उसका नाम बड़ा होता है। इत्ती सी बात मेरे समझ में कैसे नहीं आयी और पड़ोसी ने चंद नामों के जरिए ही समझा दिया। लेकिन एक बात अब भी समझ में नहीं आयी। मित्र ने नाम परिवर्तन का सुझाव क्यों दिया? खैर छोडि़ए। कई दिनों से जो उलझन बनी हुई थी वह सुलझ गई और नाम की महत्ता का भी ज्ञान हो गया। 

14 Aug 2017

खिड़की से झमाझम बारिश का दृश्य

झमाझम बारिश हो रही है। सड़क जल से लबालब हो गई है। बच्चे कागज की कश्ती लेकर धमाचौकड़ी करने आ गए हैं। वे पूरे मनोयोग से बारिश का लुत्फ उठा रहे हैं। मैं इस नैसर्गिक सौंदर्य को खिड़की से निहार रहा हूं। रामू काका साइकिल पर चले आ रहे है। अचानक वे रपटकर गिर पड़ते हैं। वे ऐसे गिरते है,जैसे गठबंधन से बनी सरकार अचानक टुटकर गिर गई हो। बच्चें मदद के लिए आगे बढ़ते है उससे पहले वह खुद ही खड़ा हो लेता है। रामू काका बच्चों को थैंक्स कहने के बजाय दुतकारता हुआ आगे बढ़ता है। एक बच्चे की कश्ती डूबने लगती है। जिस तरह एक नेता अपने डूबते कैरियर को बचाने के लिए तमाम हथकंडे अपनाता है। उसी तरह वह बच्चा अपनी डूबती कश्ती को बचाने के तमाम प्रयास करता है। लेकिन वह अपनी डूबती कागज की कश्ती को बचा नहीं पाता है। बच्चा थोड़ी देर तो रोता है। फिर बच्चों के संग कागज की कश्ती बनाकर बहाने लगता है।

खिड़की से दृश्य बदलता है। दीनू काका की छत से पानी टपकने लगता है। सारे बिस्तर गिले हो गए हैं। दीनू काका छत से टपकते पानी से उसी तरह परेशान है। जिस तरह लोग दिन-ब-दिन बढ़ती महंगाई से परेशान है। जिस तरह महंगाई का कोई हल नहीं निकल पा रहा है। उसी तरह दीनू काका को इस झमाझम बारिश में छाता नहीं मिल पा रहा है। छाता मिल जाए तो छत का जायजा कर आए। और कुछ इंतजाम भी कर सके। सीबीआई ही तरह घर के सभी सदस्य छाते की तलाश में जुट हुए है,पर छाता है कि मिल नहीं रहा। लगता है छाता भी किसी कुख्यात अपराधी की तरह हाथ नहीं लगने वाला है।
खिड़की से एक बार फिर से नजर बच्‍चों की ओर घुमती है,जिन्‍हें देखकर सहज अंदाज लगाया जा सकता है। आज बच्चें बस्ते के बोझ तले से उन्मुक्त हुए हैं। रोज कॉफी-किताबों से भरा बस्ता पीठ पर लादकर सुबह स्कूल जाते हैं और दोपहर को लौटकर आते ही हॉमवर्क करने में जुट जाते हैं। खेलने-कूदने का टाइम ही नहीं मिलता। संडे का दिन है और झमाझम बारिश हो रही। इसलिए बच्चें छुट्टी का भरपूर फायदा उठा रहे हैं। सावन मास में हो रही झमाझम बारिश में बच्चें ही क्या? बड़े,बुढ़े पीछे नहीं रहते। वे भी बच्चों की तरह अठखेलियां करते दिख जाते हैं। फिर वे तो बच्चें ही हैं।
एक बार फिर खिड़की से दृश्य बदलता है और देखता हूं कि रघु काका अपनी झोपड़ी पर फटा-पुराना तिरपाल टांकने में लगा है। उसकी देह थर-थर कांप रही है फिर भी बार-बार तिरपाल को टांक रहा है और तिरपाल हर बार नीचे गिर रहा है। झमाझम बारिश के आगे तिरपाल उस तरह ही नहीं टिक पा रहा है। जिस तरह दंगल में रहित दांव-पेच वाला पहलवान नहीं टिक पाता है। रघु काका भी तिरपाल टांकते-टांकते पस्‍त हो गया है। अब वह बीड़ी फूंकना चाह रहा है। पर हर एक नई सींक बीड़ी सुलगाने में नाकामयाब हो रही हैं। लगता है झमाझम बारिश ने माचिस और सींक के अटुट बंधन को तोड़ दिया है।

यहां से नजर मास्टर आनंदीलाल पर जा टिकती है। मास्टरजी अपने कमरे में बैठे हुए है और हाथ में अखबार लेकर अखबार में देश-दुनिया की सैर कर रहे है। अखबार की देश-दुनिया की सैर के बीच-बीच में झमाझम बारिश को इस कधर ताक रहा है। जैसे चालान काटते हुए ट्रैफिक हवलदार ताकता है। मास्टरजी के सामने रहने वाली शारदा काकी के घर में बारिश का पानी भर आया है। जिस तरह देश से भ्रष्टाचार नहीं निकल पा रहा है। उसी तरह शारदा काकी से घर से बारिश का पानी नहीं निकल पा रहा है। वह पानी को निकालने का भरपूर जतन कर रही है। लेकिन पानी है कि जित्ता निकलता है उससे कहीं ज्यादा घुस जाता है। इसी बीच शारदा काका और दीनू काका की आवाज आती हैं। वे दोनों हेला देकर अपने-अपने बच्‍चों को बुला रहे हैं। उनके बच्‍चों को उनकी आवाज उनकी एवं साथी बच्‍चों की हाऊ हुल्‍लड़ सुनाई नहीं दे रहा हैं। मैं खिड़की से अब भी देख रहा हूं। बारिश थम चूकी है। लेकिन बच्चें अब भी धमाचौकड़ी में मशगूल हैं। दीनू काका छत पर आ पहुंचा है और रघु काका चिलम सुलगा रहा है। मास्टर आनंदीलाल अखबार में देश-दुनिया की सैर कर चुका है और शारदा काकी अब भी पानी निकालने में जुट हुई है। 

12 Aug 2017

अफवाह...आखिरकार अफवाह है

हर अफवाह सच में परिवर्तन होने का ख्वाब देखती है। जो कभी पूरा नहीं होता है। इन दिनों चोटी काटने की अफवाह भी इसी वहम में है कि मैं भी अफवाह न रहकर सच में परिवर्तन हो जाऊं। इसलिए सच के मार्ग पर चलने के लिए उतावली हो रही है। लेकिन सच की राह इससे कोसों दूर है। वहां तक पहुंचेगी,उससे पहले ही दम तोड़ चुकी होगी। क्योंकि किसी भी तरह की अफवाह के पैर नहीं होते। वह तो दूसरों के कंधों पर सवार होकर कुछ दिन दौड़ लेती हैं। दूसरे भी इसका ज्यादा दूर तक बोझ उठा नहीं पाते हैं। वे तो क्या है कि अंधविश्वास के चलते अपने कंधों पर बैठा लेते हैं अन्यथा वे ही अपने समीप नहीं आने दे। जैसे ही इनकी आंखों पर से अंधविश्वास का चश्मा उतरता है। वे खुद ही कंधों पर बैठी अफवाह को झट से नीचे पटक देते हैं।
सच की डगर पर दौड़ना आसान थोड़ी है। बल्कि इस डगर पर तो चलना तक मुश्किल है,क्योंकि यह रास्ता इत्ता विकट होता है कि कदम-कदम पर खतरा होता है और इस पर जित्ते घुमाव आते हैं। उतने घुमाव शायद ही किसी मार्ग पर आते होंगे। घुमाव भी इत्ते नजदीक-नजदीक होते हैं कि एक घुमाव पार करके आधा किमी चले नहीं कि दूसरा घुमाव आ जाता है। और प्रत्येक घुमाव पर खतरा नहीं खतरे का बाप होता है। जिससे भेंट होने पर पूरी अदब से भेंटवार्ता होती है। इस मार्ग पर तो इंसान ही चलने से कतराता है। अफवाह नाम की चीज की तो हिम्मत नहीं,जो इस मार्ग पर चल सके। वह तो क्या है कि सच के मार्ग पर चलने का ख्वाब देख लेते है। ख्वाब देखना और ख्वाब को पूरा करने में दिन-रात का अंतर है। जो अफवाह नाम की चीज के लिए तो कतई असंभव है।
चोटी वाली अफवाह जो ख्वाब देख रही है। वह ख्वाब ही रहेगा। वैसे भी ख्‍वाब कहते हैं कि कभी पूरे नहीं होते हैं। वह अपने मनसूबे में कभी भी कामयाब नहीं होगी। वजह साफ है कि वह जिस कधर सच के मार्ग पर चढ़ने के लिए उतावली हो रही है। उसी कधर कतरा भी रही है। चोटी वाली अफवाह ही क्या? हर अफवाह भली भांति जानती है कि सच के मार्ग पर चलना किसी भी अफवाह कि बस की बात नहीं। यह चोटी वाली अफवाह होने को तो अब से पहले ही रफूचक्कर हो लेती। पर क्या है कि कुछेक लोग अंधविश्वास की ज्योति को बुझने नहीं देते। उसे जलाए रखना चाहते है। इसी वजह से यह हावी हो रही है और अंधविश्वास की गलियों में घूम रही है। अंधविश्‍वास की गलियां काफी अंधेरी होती हैं। इसमें प्रकाश का कहीं कोई नामोनिशां नहीं होता है। हां,यदि प्रकाश की एक किरण भी इसमें पहुंच जाए,तो सारा अंधविश्‍वास धरा का धरा रह जाता है। चोटी कटवा अफवाह के पीछे भी शायद यही मनोविज्ञान काम कर रहा है। देखना कुछेक दिन उपरांत अंधविश्वास की गलियों में ही दम तोड़ देंगे। इसके बाद फिर कोई नई अफवाह का जन्म होगा। कुछ दिन तक होहल्‍ला मचेगा। फिर शांत।  दरअसल क्या है, इस तरह की अफवाहें आती है और कुछ दिन अफवाह फैला कर चली जाती है। यह सच है कि अफवाह आखिरकार अफवाह होती है।

10 Aug 2017

सुनूंगा तो अंतरात्मा की ही सुनूंगा

उसकी अंतरात्मा हमेशा उसे सही राह दिखाना चाही। लेकिन वह हर बार सुनी की अनसुनी कर देता। अंतरात्मा कचोटती रह जाती। इसी का फायदा उठाकर नेताजी की अंतरात्मा सुन लेती है। उसकी अंतरात्मा की आवाज को और सुनकर नेताजी के भाषण में उपयोग कर देती है। इस बात का भान नेताजी को भी नहीं है। वे भी असमंजस में हैं। पीए द्वारा लिखा गया भाषण माइक पकड़ते ही बदल कैसे जाता है? यह नहीं तो पीए समझ पा रहा है और ना ही नेताजी के समझ में आ रहा है। इसे आम आदमी तो भली भांति समझ ही नहीं पाता और ना ही अमल कर पाता है। इसलिए हर बार ठगा जाता है और नेताजी जीतता जाता है।
आम आदमी की तो अंतरात्मा भी आम आदमी की तरह ही भोली-भाली होती है। जिससे ना सियासी दाव-पेंच आता है और ना ही अवसरवादी नेता की तरह दल बदलना आता है। बस,उसे तो दो वक्त की रोजी-रोटी की कसरत आती हैं। जिसे पूरी करके अपने स्वामी और उसके परिवार का पेट भरती है और मतदान दिवस पर मतदान करना नहीं भूलती है। इसी तरह किसान की अंतरात्मा कर्ज माफी के लिए सरकार से पुकार करती है। परन्तु उसकी पुकार कुछ तो पहले से ही कर्ज तले दबी हुई होती है और रही सही पुकारते-पुकारते दम तोड़ देती है।

नित्य नेताजी के पास भांति-भांति अंतरात्माएं दुख,दर्द,दया-याचना लेकर पहुंचती हैं। तब नेताजी की अंतरात्मा है कि गहरी नींद में सोई हुई रहती है। जगाने पर भी नहीं जागती है। उसकी तो आंखे तब खुलती हैं,जब नेताजी की कुरसी खतरे में होती है। तब तो गहरी नींद आ रही हो,तब भी नहीं सोएंगी। बल्कि फट से जागकर जट से कुरसी बचाने की जुगत में जुट जाएंगी। कुरसी के लिए चाहे इस्तीफा ही क्यूं ना दिलवाना पड़े,दिलवाएंगी। नेताजी को उसी कुरसी पर फिर से बैठाने के लिए। चाहे दुश्मन से ही हाथ क्यूं ना मिलाना पड़े,मिलाएंगी। और रातों-रात सियासी खेल खेलकर सुबह तो शपथ दिलवा देती है।
यह सब देखकर उसकी अंतरात्मा उसे जगाती है,जो अपनी अंतरात्मा की आवाज हर बार सुन कर अनसुनी कर देता है। अब उसने भी ठान लिया है। सुनूंगा तो अंतरात्मा की ही सुनूंगा। अन्यथा किसी की नहीं सुनूंगा। अब उसकी तो अंतरात्मा प्रफुल्लित है,पर नेताजी की अंतरात्मा दुखी है। जिस अंतरात्मा की सुनकर वह नेताजी के लिए, यह सब कर रही थी। अब आगे नहीं कर पाएंगी। इसलिए दुखी होकर उसने नेताजी को सब कुछ साफगोई बता दिया है। जो नेताजी के नहीं समझ में आ रहा था। अब वह अच्छी तरह से समझ में आ गया है। पर अब समझने से क्या फायदा है? क्योंकि अब तो उसकी अंतरात्मा जो कुछ भी बताएंगी उसी को बताएंगी और नेताजी की अंतरात्मा सुनकर भी ना सुन पाएंगी। इसी मलाल में नेताजी और उसकी अंतरात्मा हैरान है।

लेकिन नेताजी ने भी ठान लिया है। अब तो सुनूंगा तो अंतरात्मा की सुनूंगा। चाहे कुछ भी करना पड़े। इसके लिए चाहे किसी की अंतरात्मा ही उधार क्यों ना लेनी पड़े। लेने के लिए मय ब्याज रकम चूकाऊंगा। या फिर उसकी की अंतरात्मा ही क्यों ना खरीदनी पड़े। जिसकी अंतरात्मा से नेताजी की कल तक राजनीति चमक रही थी।

1 Aug 2017

चाहकर भी नहीं दे सकता इस्तीफा

इनदिनों इस्तीफा देने का दौर चल रहा है। जो बिहार से यूपी जा पहुंचा है। मैं भी सोच रहा हूं क्यों ना इस्तीफा दे दूं और ढ़ेर सारी शुभकामनाएं बटोर लूं। काफी दिन हो गए न तो कोई बधाई ही दे रहा और न कोई शुभकामना प्रेषित कर रहा है। एक वह दौर था जब इस्तीफा लिया जाता था तो इस्तीफा देना वाला मायूस हो जाता था। एक यह दौर है जिसमें इस्तीफा लिया नहीं दिया जा रहा है और इस्तीफा देने वाला प्रफुल्लित नजर आ रहा है। इसलिए मन कर रहा है क्यों ना मैं भी इस्तीफा दे दूं?

अपुन भी ना क्या-क्या सोच लेता है। मैं बुद्द्धू का बुद्द्धू ही रहा। अपुन इस्तीफा दे दे तो बाहर वाले तो दूर घरवाले भी बधाई नहीं देंगे। घरवालों को इस बात कि भनक भी लग जाए तो घर के अंदर घुसने तक नहीं दे। उनके बधाई देने की तो सपने में भी नहीं सोच सकता। इस्तीफा देने की जरा सी चर्चा भी कर दू तो साले के साले का साला भी हिदायत देने लगता है कि आपके दिमाग में इस्तीफे का विचार आखिरकार आया कैसे? ऐसा आइडिया दिया किसने। इस तरह के तमाम प्रश्रों की बौछार तब तक करता रहेंगा। जब तक उसके प्रश्रों की बौछार से मैं सराबोर नहीं हो जाऊं। वह हिदायत तो ऐसे देगा,जैसे मेरे इस्तीफे से उसके वहां पर भूचाल आ जाएंगा। और वह भूचाल की तबाही से तहस-नहस हो जाएंगा।
अपुन तो चाहकर भी इस्तीफा नहीं दे सकता है। अपुन कोई सीएम नीतीश कुमार तो है नहीं,जो इस्तीफा देते ही भाजपा की तरह घरवाले या बाहरवाले समर्थन का ऐलान कर देंगे और बहुमत साबित करने पर समर्थन भी दे देंगे। अपुन के लिए तो पड़ोसी गंगाराम भी समर्थन नहीं करने वाला। हां कभी अपुन का भी एक वक्त था। जब एक नहीं कई पड़ोसी समर्थन करने के लिए तैयार रहते थे। पर आज अपुन की स्थिति भी वैसी है,जैसे कांग्रेस की है। क्या करें? समय सबका आता है। आज उनका है और हो सकता कल भी उनका हो। लेकिन परसो हमारा हो।

इस्तीफा देने का भी एक सही वक्त होता है। क्योंकि की वक्त में बड़ी ताकत होती है। जो वक्त की ताकत को मध्यनजर रखकर इस्तीफा देता है। (जैसे कि सीएम नीतीश कुमार ने दिया है।) वहीं राजनीति में फिर से सत्ता पर काबिज हो जाता है। वह भी उसी पद पर जिस पर रहते हुए इस्तीफा दिया गया था। वैसे तो मैंने भी बहुत से लोगों को इस्तीफा देते हुए देखा हैं। सोच-समझकर इस्तीफा देने वाले भी देखे हैं और आनन-फानन में दिया गया इस्तीफा भी देखा है। लेकिन जिस तरह से सीएम नीतीश कुमार ने इस्तीफा दिया है। वह तो इस्तीफों के इतिहास में सुनहरे अक्षरों में लिखा जाना चाहिए। जिससे कि आने वाली राजनीतिक पीढ़ी को प्रेरणा मिल सके। महागठबंधन से जुड़ा हुआ नाता तोड़ते ही उनसे गठजोड़ कर लेना चाहिए। जिनसे फिर कभी नहीं जुड़ने की कसम खा ली थी। 

24 Jul 2017

समझने का सलीका सीखना होगा

हम स्कूल में पढ़ते थे तब हिंदी के गुरुजी बहुत समझाते थे। नालायको समझ जाओं। अन्यथा बहुत पश्चताओंगे। उस वक्त गुरुजी बताते थे कि समझना और समझाना में बस एक मात्रा का फर्क है।  ‘झ’ वर्ण में लगी ‘आ’ की मात्रा का और ‘झ’ वर्ण में न लगी ‘आ’ की मात्रा का। यहीं रत्तीभर फर्क जिसकी समझ में गया,उसकी नैया पार है और जिसकी समझ में नहीं आता उसका बेड़ा गरक है। गुरुजी प्यार से भी समझाते और मार से भी। हिंदी के गुरुजी के अलावा अन्य गुरुजी समझाते नहीं थे। अंग्रेजी के गुरुजी तो सीधे मीनिंग लिखवाते और सेंटेंस में प्रयोग करवाते। गणित के गुरुजी सवाल निकलवाते और जिस दिन सवाल नहीं निकलवाते उस दिन सिर से जूं निकलवाते।
दौर बदला और आज जिसे देखों,वहीं समझाने में आमादा है। कोई बात से तो कोई लात से समझाने पर अड़ा हैं। जरा सी चूक हुई तो समझाना और चूक नहीं भी हुई तो भी समझाना। उन्हें कौन समझाए। भाई! समझाना जित्ता सुगम है उत्ता ही समझना मुश्किल है। जिस भाषा में आप समझा रहे हो। वह अगले के समझ में आ रही है या नहीं। पहले यह तो जान लो। उसके बाद समझा लेना। वह भी समझने को तैयार हो तब। जबरन समझाओंगे तो समझदार के भी समझ में नहीं आएंगा। समझना मनुष्य के हाथ में थोड़ी है। यह तो मानव मस्तिष्क पर निर्भर करता है। उसके दिमाग कि क्षमता कित्ती है। स्पेस कितना है। दिमाग में रजिस्टर्ड टोटल सिक्योरिटी एंटी वायरस है या नहीं। एंटी वायरस की वैधता समाप्त तो नहीं हो गई। यह सब जाने रहित ही समझाना तो मूर्खता है।
समझाने का क्षेत्र व्यापक होता जा रहा है। ऐसा लगता मानो समझाना तो एक कारोबार बन गया है। इसके कारोबारी सुबह से लेकर शाम तक अपना माल बेचने में लगे रहते हैं। इनको इनके माल को खरीदने वाला खरीदार नहीं मिलता तब भी यह मायूस नहीं होते हैं। इनका माल साग-सब्जी की तरह तो है नहीं,जो सड़-गल जाएंगी। इनका माल तो खरा सोना है। आज नहीं तो कल बिक ही जाएंगा। इनकी टैग लाइन ही ऐसी है-‘समझ में नहीं आता क्‍या?जहां कहीं भी इस टैग लाइन का प्रयोग हो जाता है। वहां इनका माल या तो बिकता नहीं या फिर ऐसा बिकता है कि माल ही कम पड़ जाता है। इनके माल की कोई गारंटी या वारंटी भी नहीं होती फिर भी यह अपने माल का सरेआम बेचान कर कर देते हैं।

मेरे को समझाने वाले समझाने की जिन विधियों का प्रयोग करते हैं। वे तमाम विधियों 64 जेबी दिमाग मेमोरी युग में मेरी एक जेबी दिमाग मेमोरी में घुसती ही नहीं। मैं तो बहुत कुछ समझने चाहता हूं। दिमाग पर जोर भी खूब डालता हूं। पर ज्यों ही जोर डालता हूं,दिमाग की नसे फुलने लगती है। नसे फुलते ही थोड़ा बहुत समझ में आ रहा होता है,वह भी समझ नहीं आता है। जब समझाने वाला पूछता है कि कुछ समझ में आया। तब मैं हां कहकर झूठी सहमति दे देता हूं। अब आप भी बताए समझने में मेरा कसूर है या फिर समझाने वाले का सलीका अलहदा है। या फिर मुझे भी समझने का वह सलीका सीखना होगा,जो समझाने वाले को आता है। मुझे आपकी राय की प्रतिक्षा है। 

14 Jul 2017

घनघोर मेघ बरसते-बरसते रह गए

मानसून आ नहीं रहा है। उसकी प्रतीक्षा में वसुधा का गला सूखता जा रहा है। आंखों से निकलने वाली अश्रुधारा बह-बह कर सूख गई हैं। अश्रु निकाले से भी नहीं निकल रहे हैं। बार-बार होंठों पर जीभ फेरी जा रही है। ताकि कम से कम गला तो अधगीला रहे वसुधा अपना गला गीला करने के लिए बदरा से कह रही है- बदरा भाई! बरस जाओं। मेरा कंठ सूख रहा है। गले में पानी नहीं गया तो मैं मर जाऊंगी।
बदरा समीर के संग झूमता हुआ कहता है- देखों,बहिना तरस तो तुम पर बहुत आ रहा है। पर क्या करू, विवश हूं। मेरे उच्च अधिकारी एक-एक बूंद का लेखा-जोखा रखते हैं। कहां कितना पानी बरसाना है। यह सब पहले बाकायदा रजिस्टर में दर्ज होता है। उसके बाद उस क्षेत्र में बारिश होती है। कुछ दिन पहले घनघोर मेघ साहब की गैर हाजिर में बिना अनुमति के राजस्थान सूबे पर मेहरबानी कर दी। जब साहब आए तो इतनी लताड़ लगाए कि पूछों मत। एक भी बूंद इधर-उधर नहीं कर सकता। मुझे बूंद-बूंद का हिसाब देना होता है। तुम कहती हो कि बरस जाओं। मेरी भी नौकरी का सवाल है।
बदरा भाई! कुछ भी करों। कैसे भी करों। मेरे गले में थोड़ा सा पानी तो डाल दो। अन्यथा मैं मर जाऊंगी। मैं मर गई तो। सम्पूर्ण पृथ्वी का विनाश हो जाएंगा। पृथ्वी का विनाश हो। ऐसा मैं कदाचित भी नहीं चाहती।
अरे,वसुधा बहिना तुम समझती कैसी नहीं। अब तुम्हें कैसे समझाऊं? जिनके लिए तू बूंद-बूंद के लिए तरस रही हैं। उन्हीं तेरे बांशिदों ने तेरा विदोहन किया है। जिनसे तेरी हरीतिमा है। उन पेड़-पौधों से सम्मोहित होकर मैं बरसने को मजबूर हो जाता हूं। वे उन पर ही स्वार्थलिप्सा की कुल्हाड़ी चला रहे हैं। जिससे तेरे पर ही नहीं। अपितु हमारे समूचे बदरा समुदाय पर भी काले बादल मंडरा रहे हैं।
बदरा भाई! तेरी बात कटू शाश्वत है। प्राकृतिक आपदाओं के माध्यम से मैं भी इन्हें समझाने की कोशिश करती हूं। लेकिन इस बार कैसे भी करके मुझ पर रहम कर। मानसून का दौर है। जमकर बरस जा। हो सकता तेरी मेहरबानी से मेरे बांशिदों का दिल पसीज जाए। उनके ज्ञान चक्षु खोल जाए।
वसुधा की बेबस हालात देखकर बदरा को तरस आ गया। उसने पूछा बताओं! कहां-कहां बारिश करवानी है। यह सुनकर वसुधा का चेहरा खिल उठा और उसने वह फाइल सौंप दी जिसमें राज्यवार बारिश की सूची थी। समीर के माध्यम से फाइल एक बदरा बाबू से दूसरे बदरा बाबू तक पहुंची। दूसरे से तीसरे तक पहुंची। एक तरफ बारिश फाइल यहां से वहां पहुंच रही थी और दूसरी तरफ घनघोर मेघ बरसने के लिए आतुर हो रहा था। तबी घनघोर मेघ साहब के पास बारिश फाइल पहुंच गई। भारत मुल्क की फाइल देखकर घनघोर मेघ काला-पीला हो गया और बरसते-बरसते रह गया और वसुधा गगन की ओर मुंह करके बारिश के प्रतीक्षा में हैं कि बस,मेघ मेहरबान होने वाले ही है। 

18 Jun 2017

बीमारी नहीं महामारी है


बीमारी कैसी भी हो। वह अच्छे भले इंसान को इंसान से मरीज बना देती है। जब व्यक्ति किसी भी बीमारी से ग्रस्त होता है। तब वह मनुष्य न होकर एक मरीज होता है। उस वक्त उसे लोग ही नहीं,अपने चिरपरिचित भी उसको मरीज की दृष्टि से निहारते हैं। उसकी देखभाल भी इंसान की तरह नहीं करके मरीज की तरह करते हैं। ताकि वह शीघ्र स्वस्थ हो जाए। मुल्क में एक बीमारी ऐसी है। जिसकी चपेट में आने पर व्यक्ति बीमार तो नहीं होता। पर हालत बीमार से बदतर हो जाती है। आजीविका की गाड़ी सही ढंग से चल नहीं पाती है। घर में आए दिन गृहकलह रहता है। उस बीमारी का नाम है बेरोजगारी। जो सब बीमारियों पर भारी है। यह मौसमी बीमारी नहीं है। मौसमी बीमारी होतो रोकथाम की संभावना रहती है। पर यह तो बारहमासी है। इससे पीडि़त व्यक्ति नहीं सही ढंग से जी पाता है और नहीं मृत्यु को पाता है। रोजगार दवा हेतु दर-दर की ठोकर खाता फिरता है।
बंदा बेरोजगारी बीमारी की चपेट में कैसे आता है। जब रोजगार की तलाश में पस्त हो जाता है। तब बेरोजगारी बीमारी से ग्रस्त हो जाता है। शिक्षित बेरोजगार इस बीमारी की चपेट में कैसे आता है। यह शिक्षित बेरोजगार दीनू की मनोदशा से समझ सकते है। विविध डिग्रीधारी दीनू ने पहली बार कंपटीशन दिया तो एकाध अंक से लुढ़क गया। दूसरी बार दिया तो मामला कोर्ट में अटक गया। तीसरी बार दिया तो पेपर लीक हो गया। चौथी बार आवेदन किया तो भर्ती निरस्त हो गई। इसके बाद सिलसिला ऐसे ही गुजरता रहा। कभी पेपर लीक तो कभी मामला कोर्ट में चलता रहा और कभी खुद एकाध अंक से लुढ़कता रहा। फिर भी कभी पस्त नहीं हुआ। समय का पहिया अपनी गति से चलता रहा। जो ख्वाब संजोए थे। वे समय के पहिए के तले कुचलते गए। नौकरी पाने के चक्कर में कब बेरोजगारी बीमारी से पीडि़त हो गया। खुद को भी पता नहीं। ऐसा भी नहीं है कि दीनू होशियार नहीं था। दीनू प्रथम जमात से प्रतिभा का धनी रहा है। आज वहीं प्रतिभा का धनी। धन के पीछे भाग रहा है। फिर भी धन पकड़ में नहीं आ रहा है। जो पकड़ में आ रहा है। वह घर-गृहस्थी से होकर वापस जा रहा है। बचत के नाम पर ठेंगा है। यह कहानी अकेले दीनू की ही नहीं। बल्कि हर उस शिक्षित बेरोजगारी की है,जो बेरोजगारी बीमारी से ग्रस्त है।

पहले नौकरी बाद में छोकरी’ का प्रण लेने वाले। इस बीमारी से पीडि़त होने के उपरांत शीघ्र ही प्राणिग्रहण संस्कार में बंध जाते हैं। इनके घरवाले शादी जल्दी इसलिए कर देते हैं। नौकरी चक्कर में कहीं छोकरी भी नहीं मिली तो जिंदगी भर कुंवारा बैठा रहेगा। इस बीमारी से पीडि़त,चाहकर भी घरवालों के खिलाफ नहीं जा सकता। खिलाफ चल तो जाए। पर खिलाफ जाने के सभी रास्ते अवरुद्ध होते हैं। जाए तो किधर से जाए। दुस्साहस करके अवरूद्ध रास्ते से चल भी गया तो काम से गया। काम से गया तो तमाम से गया। इसलिए अवरूद्ध रास्ते से कोई नहीं जाना चाहता है।

शादी के उपरांत धर्मपत्नी को क्या-क्या चाहिए होता है। इससे तो आप अच्छी तरह से वाकिफ है। पत्नी पतिदेव को आए दिन रसोई से लेकर अपने सौंदर्य प्रसाधनों तक की फेहरिस्त थमाती रहती है। जो इस बीमारी के पीडि़त से कभी पूरी नहीं हो पाती है। जब पत्नी द्वारा दी गई फेहरिस्त पूरी नहीं होती है। तब गृहकलह होता है। गृहकलह होता है तो न जाने पति को क्या-क्या सुनना पड़ता है। कहने की तो हिम्मत नहीं होती। चुपचाप सुनना ही पड़ता है। सुनने में भलाई है। अन्यथा शामत नहीं।
महंगाई की मार का भार शिक्षित बेरोजगार उठा नहीं पाता है। बड़ी मुश्किल से उठाने की कोशिश करता है तो लडख़ड़ा कर गिर जाता है। गिरे हुए को कोई उठाने भी नहीं आता है। सब देखकर चलते बनते हैं। खुद को ही उठना पड़ता है। फिर से खड़े होकर जैसे-तैसे महंगाई की मार का भार उठाना ही पड़ता है। क्या करेंबेरोजगारी बीमारी से पीडि़त है। जिसका इलाज भगवान भरोसे हो जाए तो हो जाए। अन्यथा वह इस बीमारी से जूझता रहता है। इस बीमारी का कोई अस्पताल तो होता नहीं। नहीं कोई डॉक्टर होता है। इसकी नहीं कोई दवा। दुआ ही इसकी दवा है। जो कुछ चमत्कार होता है,वह भगवान भरोसे होता है। होने को तो भरोसा भरसक होता है। पर जिस पर भरोसा होता है और वह भरोसेमंद नहीं निकले। तब भरोसा भरसक न होकर भूसा हो जाता है। भूसा भी ऐसा होता है। पशु मुंह मारकर दूर हट जाते हैं। किंतु भगवान पर भरोसा तो भरोसा ही होता है।

जो शिक्षित बेरोजगार बेरोजगारी बीमारी से पीडि़त है। वह जब देखों तब ही किस्मत का रोना रोता रहता है। उसकी दिलोदिमाग की शक्ति निर्बल पड़ जाती है। वह चाहकर भी अपनी स्थिति सुधार नहीं पाता है। उसको अपनी अर्हता के अनुरूप कार्य मिलता नहीं और देहाड़ी मजदूरी होती नहीं। अर्हता के मुताबिक कार्य मिलता है तो वेतन अर्हता के अनुरूप नहीं मिलता है। ऐसी स्थिति में यह बीमारी दिन-ब-दिन बढ़ती जाती है। हां इस बीमारी का एक रामबाण उपाय है। अपनी अर्हता के मुताबिक प्रतियोगिता परीक्षाओं की निर्धारित आयु सीमा से पूर्व नौकरी मिल जाए तो निजात मिल जाती है। अन्यथा यह बीमारी महामारी बन जाती है। जब महामारी बन जाती है तो इसका इलाज लाइलाज है। जिंदगी भर सताती है। अपनी साथ ओर बीमारियों को भी बुला लेती हैं। 

17 Jun 2017

रामभरोस का भरोसा रामभरोसे

मित्र! रामभरोस यथा नाम तथा गुण चरितार्थ है। उस पर कोई भरोसा करें ना करें। वह तो आंख मूंदकर भरोसा कर लेता है। फिर चाहे सामने वाला भरोसेमंद ही नहीं हो। कई लोग इत्ते भरोसे के साथ यकीन दिलाते हैं कि आपका अमुख कार्य। अमुख तारीख को सुनिश्चित हो जाएंगा। यह सुनकर हम भी सुनिश्चित की चादर ओढ़कर सो जाते हैं। सुनिश्चित की अवधि समीप आने पर हमारी आंखे खुलती हैं तो सुनिश्चित की चादर अनिश्चित में समेटी हुई मिलती है। अनिश्चित में समेटी हुई चादर को आप हम तो दोबारा ओढ़ना मुनासिब नहीं समझते। पर मित्र ! रामभरोस अनिश्चित में समेटी हुई चादर को भी फैलाकर दुबारा सो लेता है। अब रामभरोस को कौन समझाएवह किसी कि मानता भी तो नहीं। कहता है,बेचारे की कुछ मजबूरी रही होगी। वह तो तकरार में भी इनकार नहीं करता। इनकार ही किया है। इकरार तो यथावत है। इकरार है तो भरोसा भरसक है। इसे क्या मालूमऐनवक्त पर मना करने पर वहीं स्थिति होती है। जो चुनाव में नेताजी की ऐनवक्त पर टिकट कटने पर होती है।
कहते है कि जिस पर भरोसा होता है। वहीं मुसीबत में काम आता है। लेकिन भरोसा देकर ऐनवक्त पर टालमटोल कर जाना। मुसीबत में एक ओर मुसीबत झेलना पड़ता है। फिर एक ओर एक मुसीबत मिलकर ग्‍यारह का काम करती हैं। मौका मिलने पर काम भी तमाम कर देती है। मुसीबत यहां तो आती नहीं और आती है जल्दी सी जाती नहीं। खुद तो आती है,जो आती है,अपने संग मानिसक तनाव और ग्रह क्लेश भी साथ लाती है। जेल से कैदी का बाहर निकलता आसान है पर मुसीबत का निकलना मुश्किल है। मुसीबत तो मुसीबत है।
रामभरोस का जिस पर भरोसा कायम है। उसे रामभरोस के नाम में,जो ­‘राम’ है उसमें मर्यादा पुरुषोत्तम ­‘राम’ तो नजर आता है। पर राम के पीछे जुड़ा ‘भरोस’ में भरोसा दिखाई नहीं देता। वह सोचता होगा। जिसका नाम ही राम के भरोसे है यानी रामभरोस है। उस पर क्या भरोसा करें?विश्वास कुमार होतो। कम से कम नाम पर तो विश्वास रहता है। फिर चाहे वह नाममात्र का ही विश्वास कुमार क्यूं ना हो। इसमें रामभरोस का दोष थोड़ी है। मां-बाप दोषी है। जिन्होंन ऐसा नाम रखा। मां-बाप भी क्यूं दोषी हैदोषी तो ज्योतिषी है। ज्योतिषी भी क्यूं दोषीवह तो पंचाग के मुताबिक चलता है। दोषी तो ग्रह है जिसमें इसका जन्म हुआ था। ग्रहों का भी क्या दोष हैदोष तो तुला राशि का है जिसने यह नाम प्रदान किया। इसमें तुला राशि का भी क्या दोष हैतुला राशि ने थोड़ी कहा था कि रामभरोस ही नाम रखना। तुला में रामभरोस के अलावा ओर भी अनेकानेक नाम थे। उनमें से भरोसा लायक नाम रख लेते। खैर,छोड़ों।
रामभरोस ऐसा क्या करेंउसका जिस पर भरोसा है। वह भी उस पर भरोसा कर ले। आप ही कोई सुझाव दीजिए। हो सकता है,आपका सुझाव। उसके दिमाग में घुस जाए और वह भरोसा कर ले। एक भाई साहब! ने बहुत अच्छा सुझाव दिया। भरोसा तो भरोसा है। करें ना करें उसकी मर्जी। इसमें आप-हम क्या कर सकते है सरजी। आप भी किसी के भरोसे आश्वस्त है तो जान लीजिए भाई साहब का सुझाव शाश्वत है। इसके बावजूद भी भरोसा करते हैं तो जिम्मेवारी खुद की होगी। एक दूसरे भाई साहब ने सुझाव दिया- भरोसे पर दुनिया कायम है। भरोसा है तो सब कुछ है। अन्यथा कुछ भी नहीं। सुझाव तो इनका भी वाजिब है। ऐतबार ही है,जिसकी बुनियाद पर रिश्तों की इमारत टिकी हुई है। अन्यथा कब की ध्वस्त हो गई होती। ऐतबार नहीं होता तो प्रेमी-प्रेमियों में प्रेम ही नहीं होता। प्रेम नहीं होता तो प्रेमी-प्रेमिका नहीं होती। ऐतबार है तो प्रेम है और प्रेम है तो प्रेमी-प्रेमिका है।
रामभरोस जिस पर अटूट भरोसा करता है। उसने मुझे बताया कि अधुनातन में भरोसा रहा ही कहांजो निहायत कम बचा हुआ है। उसके भी स्वार्थ की दीमक लग गई है। जो भरोसे को धीरे-धीरे चट कर रही है। जिस पर खुद से ज्यादा विश्वास है। वहीं विश्वास का गला दबा रहा। इसीलिए तो भाई भाई से आंखे नहीं मिला रहा है। उसी ने आगे बताया कि भाई साहब ! होने को तो भरोसा तो भरसक होता है। लेकिन जिस पर भरोसा होता है। वहीं विश्वासघात निकल आए तो इसमें भरोसा भी क्या करे?रही बात रामभरोस की,जिसका नाम ही रामभरोस है। उस पर भरोसा करना भी रामभरोसे ही है।

6 Jun 2017

पर्यावरण संरक्षित खुद के बदलने से संभव

हर वर्ष पांच जून को हम विश्व पर्यावरण दिवस मनाते हैं और पर्यावरण के प्रति चिंता जाहिर करते हैं। विचार-विमर्श करते हैं। लोगों में जागरूता लाने के लिए रैलियां निकालते हैं। लेकिन खुद इस दिन के अगले दिन ही भूल जाते हैं। जबकि बचाव और बदलाव खुद के बदलने से ही संभव है। जब तक खुद आगे आकर पहल नहीं करेगें तो दूसरा कैसे करेंगा। यह सोचनीय और विचारणीय प्रश्र है। जिसका उत्तर किसी ओर के पास नहीं है। बल्कि खुद के पास ही है। लेकिन हमारी मानसिकता होती है कि मेरे अकेले से क्या होगा? यह सोचकर कदम पीछे रख लेते हैं। लेकिन अब हमें कदम आगे बढ़ना होगा है। प्रकृति ने हमको जीवन दिया। जीने का अधिकार दिया है। हमारे साथ उन तमाम जीव-जन्तुओं को भी जीवन दिया है,जो प्रकृति पर ही निर्भर हैं। पर समझ से परे है कि मनुष्य को पता भी है कि पर्यावरण है तो जीवन है। उसके बावजूद भी अपने स्वार्थ की खातिर प्रकृति से खिलवाड़ कर रहा है। प्रकृति से खिलवाड़ करना खुद पर कुठाराघात करना हैं। अब भी वक्त हैं बिगड़ते पर्यावरण को संरक्षित करने का। अगर अब भी नहीं चेते तो समझों विनाश भी नजदीक ही है।

आज हम बिगड़ते पर्यावरण के कारण,जो संकट झेल रहे हैं। उनसे हम सब अच्छी तरह से वाकिफ हैं। जल रसातल में पहुंच गया। पीने योग्‍य पानी नहीं बचा है। वायु दूषित हो रही है। श्वास लेने भी लकलीफ होती। स्वार्थलिप्सा की कुल्हाड़ी पेड़-पौधों पर इस कधर चल रही है कि जंगल के जंगल विलुप्त हो रहे हैं। जीवनदायिनी नदियां मिटने के कगार पर हैं। पहाड़ ध्वस्त हो गए है। ग्लोबल वार्मिंग बढ़ता जा रहा है। इत्ता ही नहीं विकास के नाम पर भी पर्यावरण का विनाश हो रहा है। विकास की राह में जो भी पर्यावरण संसाधन आ रहे हैं उन्हें बचाने के बजाय उनका नेस्तनाबूद कर रहे हैं। जबकि जल,जंगल,नदियां,पहाड़ के बिना जीवन अधूरा है।
रोजमर्रा के कार्यों में हम ऐसे कृत्य करते हैं,जिससे पर्यावरण दूषित होता है। घर का कूड़ा-कचरा पड़ोसी की ओर सरका देते और पड़ोसी अपनी ओर सरका देता है। जिससे मृदा प्रदूषण फैलता है और मक्खी,मच्छर पनपते हैं। अपने आस-पास मच्छर पनपने का अभिप्राय है,मलेरिया,डेंगू,चिकनगुनिया,जैसी जानलेवा बीमारियों को बढ़ावा देना। पड़ोसी की ओर कूड़ा-कचरा सरकाने की बजाय अपना एवं अपने आस-पास कूड़े के लगे ढेर को जला दे। जिससे अपने आस-पास स्वच्छता होगी और प्रदूषण भी नहीं फैलेगा। हम सब करने लग जाए,तो पर्यावरण कितना संरक्षित हो सकता है। इसका आकलन आप खुद कर सकते हैं।
इसी तरह पॉलिथीन के बढ़ते प्रभाव पर नियंत्रण करना होगा। क्योंकि हम साग,सब्जी,फल व अन्य वस्तुओं के साथ जो पॉलिथीन ला रहे हैं। उसी पॉलिथीन का बहुतायत में दुरुपयोग होता है। हम सामान तो रख लेते हैं और पॉलिथीन को घर से बाहर फेंक देते हैं। जो पर्यावरण के साथ-साथ पशुओं के लिए भी नुकसान दायक है। यह नष्ट न होने की वजह से भूमि की उर्वरता क्षमता को भी कम करती है। इसके जलाने से निकलने वाली धुआं ओजोन परत को क्षति पहुंचा रही है। जिससे ग्‍लोबल वार्मिग एक बड़ा कारण है। इसके कचरे के जलाने से कार्बन मोनोऑक्साइड व कार्बन डाईऑक्साइड जैसी विषैली गैस उत्सर्जित होती हैं। अगर पॉलिथीन का पूर्णतया उपयोग बंद हो जाए तो पर्यावरण तो संरक्षित होगा ही,साथ में पॉलिथीने से होने वाला दुष्प्रभावों से भी बचाव होगा।
आज सबसे महत्ती आवश्यकता है बहुतायत में पेड़-पौधे लगाने की। क्योंकि जितने अधिक पेड़-पौधे होंगे। उतना ही पर्यावरण संरक्षित होगा। इसके लिए हमें कुछ अलहदा करना होगा। जैसे कि जन्मदिन,शादी में उपहार के साथ एक पौधा देने की रवायत भी बना ले तो आने वाले समय में पर्यावरण को बचाया जा सकता है। उपहार में मिले पौधे को लगाना और उसकी देखभाल करना एक बच्चे के पालन-पोषण के समतुल्य है। एक पौधे का ख्याल भी अपने बच्चे की तरह करेंगे तो वह पौधा एक दिन पेड़ का रूप धारण करके हमें वह सब प्रदान करेंगा। जिसकी हमें अपेक्षा रहती है। बहुतायत पेड़-पौधे होंगे तो हमें शुद्ध वायु मिलेगी। समय पर बारिश होगी। समय पर बारिश होगी तो जल स्तर ऊपर उठेगा। पेड़-पौधे लगाना और उनकी रक्षा करना मनुष्य के हाथ में ही है। इसमें लागत और श्रम की आवश्यकता नहीं होती है। बस समय पर देखभाल करनी होती है।