14 Apr 2019

जिंदगी वाया सोशल मीडिया



आजकल किसी की भी आवाजाही का पता लगाना मुश्किल नहीं है। कब जा रहा है,कहाँ जा रहा है,कब वापस रहा है। आदि-इत्यादि पूछने की भी जरूरत नहीं है। बस सोशल मीडिया पर अपडेट रहिए। अपने आप ही मालूम पड़ जाएगा। कहाँ जा रहे हैं और कहाँ से रहे हैं। अब दीवार पर टंगे कैलेंडर को निहारने के दिन गए। उसकी जगह डिजिटल कैलेंडर ने ले ली है। जो कि हर किसी के मोबाइल में लटका रहता है। बगैर पन्ना पलटे ही तिथि वार,तीज त्यौहार,जयंती पुण्यतिथि पलक झपकते ही बता देता है। 
जो सोशल मीडिया पर अपडेट रहता है। वह घर से कहीं बाहर जाता है,तब भले ही परिजनों को नहीं कहकर जाता हो,लेकिन फेसबुक पर बताकर ही निकलता है। पहुँचते ही जहाँ पर गया है,वहाँ की सेल्फी पोस्ट करके बता देता है कि अमुक जगह हूँ। अकेला गया है या साथ में गया है,यह तो सेल्फी से मालूम लग जाता है।
आप किसी भी शुभ अवसर या पर्व पर देख लीजिएजितनी बधाई फेसबुक पर दी जाती हैं,उतनी फेस टू फेस कहाँ दी जाती है। सब जानते हैं कि फेस टू फेस तो एक ही व्यक्ति को दे सकते हैं। फेसबुक पर एक ही पोस्ट से हजारों को शुभकामनाएँ दे दी जाती हैं और कमेंट के जरिए खुद को भी ढेर सारी शुभकामनाएँ मिल जाती हैं।किसी को अलग से भी प्रेषित नहीं करनी पड़ती है। एक ही पोस्ट से सबको निपटा दिया जाता है। यही सोचकर लोग फेस टू फेस के बजाय फेसबुक पर बधाई  देना ज्यादा महत्वपूर्ण मानते हैं।
भले ही आपको अपना बर्थडे याद नहीं रहे। लेकिन आप फेसबुक पर हैं तो आपके फेसबुक मित्रों को अवश्य याद रहता हैं। चाहे परिजन,यार-दोस्त रिश्तेदार विश नहीं करें,किंतु एफबी फ्रेंड विश्व के किसी भी कोने में होबर्थडे  पर मुबारकबाद देना कभी नहीं भूलते हैं। खास फ्रेंड तो डिजिटल गिफ्ट तक भेंट करते हैं। मसलनस्टीकर इमोजी। मेरा जैसा तो सोशल मीडिया पर ही डिजिटल केक काटकर अपने जन्मदिन को यादगार बना लेता हैं।
विवाह के उपलक्ष्य पर होने वाली वधू की मुँह दिखाई की रस्म-अदायगी देख लीजिए,दुल्हन ससुराल में नहीं पहुँचती उससे पहले तो सोशल मीडिया पर बगैर नेग दिए ही पूरी दुनिया उसका मुँह देख लेती हैं। आज की दुल्हन के लिए भी नेग से ज्यादा इंपोर्टेंट लाइक कमेंट हो गया है। नेग मिले या नहीं मिलेइसकी परवाह नहीं हैबस लाइक कमेंट मिलने चाहिएइसकी चिंता जरूर रहती है। दूल्हा-दुल्हन फेरे बाद में लेते हैं,पहले लाइव आते हैं। आप शादी में नहीं जा सके,तो पश्चाताप करने की कोई जरूरत नहीं है। वैवाहिक लाइव  देख लीजिए। शादी से ज्यादा मजा जाएगा। आजकल तो प्रथम पूज्य गणपति जी की जगह भी सोशल मीडिया ने ले ली है। आप खुद ही देख लीजिएहम शादी का निमंत्रण पत्र गणपति जी से पहले किसी ना किसी को तो व्हाट्सएप पर भेज ही देते हैं।
अब किसी  से जन्म मरण की भी जानकारी लेने की जरूरत नहीं है। नवजात शिशु को स्तनपान बाद में कराते हैं पहले उसको सोशल मीडिया के दर्शन कराते हैं। वहाँ से पूरी दुनिया को पता पड़ जाता है कि फलाना सिंह बाप बन गया है। लोग सही कहते हैं कि आजकल के बच्चे पैदा होते ही हाथ में मोबाइल थमा लेते हैं। जो बच्चा पैदा होते सोशल मीडिया पर गया। वह होश संभालते ही मोबाइल तो मांगेगा ही। इसी तरह मृतक व्यक्ति परलोक गमन नहीं करता है,उससे पहले तो उसका आगमन सोशल मीडिया पर हो जाता है। यहाँ पर श्रद्धांजलि सभा से पहले तो इतनी श्रद्धांजलि दे दी जाती हैं,मृतक की आत्मा तृप् हो जाती है। अच्छा परिजन चाहे जीवित के जीवनभर ठोकर मारते रहे होलेकिन मृत्यु के उपरांत सोशल मीडिया पर इतनी श्रद्धा से श्रद्धांजलि अर्पित करते हैंजिसे देखकर यह कतई नहीं लगता है कि मृतक के प्रति लगाव नहीं था,बल्कि ऐसा लगता है कि बहुत ख्याल रखते थे।  
देश-दुनिया में क्या घटित हो रहा है और कौन सुर्खियां बटोर रहा है। यह जानने के लिए अखबार के पन्ने पलटने की या टीवी ऑन करने की जरूरत नहीं है। बस सोशल मीडिया पर अपडेट रहिए, आपको अपने आप ही पल-पल की खबरें मिलती रहेंगी। क्योंकि खबरिया चैनलों की ब्रेकिंग न्यूज़ से पहले तो पूरी स्टोरी सोशल मीडिया पर छा जाती है।
लेखकों को ही देख लीजिए,परम्परागत कागज,कलम,दवात को छोड़कर,सोशल मीडिया पर मोबाइल की-बोर्ड के जरिए रचना कर्म और रचना धर्म निभा रहे हैं। वहां चुटकुलेबाजों और अफवाहबाजों से उनकी स्पर्द्धा जारी है। कल तक जो श्रोता और पाठक ढूंढते थे,आज सुबह-शाम फॉरवर्ड हो रहे हैं। हिसाब लगाया जा रहा है कि एक आह के असर होने तक कितने फॉरवर्ड की जरूरत होती है। अपनी फेसबुक वॉल पर पुष्प जैसे शब्दों की चादर बिछाकर,शब्दों के फूलों पर नहीं मंडराने वाले भंवरे एवं भंवरियों को भी टैग करके लाइक कमेंट बटोर रहे हैं।
आजकल तो प्यार-प्रेम  रिश्ते-नाते सोशल मीडिया के जरिए ही होने लग गए हैं। ब्याह शादी कराने वाला बिचौलिया नामक प्राणी धीरे-धीरे लुप्त होता जा रहा है।छोरा-छोरी चैट करते-करते ही आपस में सेट हो जाते हैं। सेट होने के बाद तो वैवाहिक टेंट लगकर ही रहता हैं।अब सोशल मीडिया इतना ताकतवर बन गया है कि एक ही रात में जीरो को हीरो और हीरो को जीरो बना देता हैं। मेरा तो मानना है कि जिंदगी में कुछ करना है और आगे बढ़ना है तो सोशल मीडिया पर अपडेट रहिए। 

9 Apr 2019

वंशवाद की बेल

उनकी वंशवाद की बेल मुरझाई गई थी। सूखकर गिर न जाए। इस चिंता में वे खुद सूखते जा रहे थे।मगर जैसे ही चुनावी मौसम ने दस्तक दी बेल फूटने लगी। जिसे देखकर बुझ चुका उम्मीद का दिया जल उठा। कल्पना की कोंपल टहनियों का रूप लेने के लिए मचलने लगी। अतीत के झरोखे की बंद पड़ी खिड़कियो को खोलकर उनमें से अपना राजनीतिक उज्ज्वल भविष्य देखने लगे। वंशवाद की बेल को सींचने वाले सोचने लगे,अगर पार्टी ने टिकट का खाद दे दिया तो बेल पूर्व की भाँति फिर से हरी-भरी हो जाएगी। एक बार बेल हरीतिमा का रूप ले ली तो फिर उसकी इस तरह से सार संभाल करते रहेंगे कि भविष्य में फिर कभी नहीं मुरझा पाएगी।
उन्होंने टिकट का खाद लेने के लिए,मुरझाने से पहले बेल ने विकास के खट्टे-मीठे अंगूर जनता को समर्पित किए थे,उनका पूरा विवरण बायोडाटा में लिखकर आलाकमान को सौंप दिया। मगर बायोडाटा में  यह कतई उल्लेख नहीं किया कि पराभव का कीड़ा लगने के कारण फलती-फूलती वंशवाद की बेल मुरझा गई थी। टिकट का खाद नहीं मिला तो हमने पानी देना भी मुनासिब नहीं समझा। शायद इसलिए भी मुरझा गई थी।
लेकिन आलाकमान को बायोडाटा सौंपते समय यह जरूर बताया था कि चुनावी मौसम में हमारी वंशवाद की बेल फूटने लगी है। आपने टिकट का खाद दे दिया तो यह समझिए कि बेल को खिलने में टाइम नहीं लगेगा। यह तो आप भी भली-भांति जानते हैं कि कितने वर्षों से सियासत के वृक्ष पर हमारी वंशवाद की बेल बढ़ती रही है। जिस को और आगे बढ़ाने के लिए टिकट का खाद मांग रहे हैं।
बायोडाटा की बजाए फूटती हुई बेल को देखने के लिए,आलाकमान ने तीन सदस्यों की टीम उनके संसदीय क्षेत्र में भेजी। टीम ने बेल को अच्छी तरह से देखने के बाद जनता की नब्ज टटोली तो नतीजा चौंकाने वाला सामने आया। अबकी बार वंशवाद की बेल को टिकट का खाद दे दिया तो पार्टी को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है। वंशवाद की बेल ने जनता को सिर्फ विकास के अंगूर दिखाएं हैं,खिलाए नहीं है। जबकि खुद ने विकास के अंगूर की बहुत सारी बेल लगा रखी है। 
एक नये युवा चेहरे ने भी ताल ठोक रखी है। जिसकी पैरवी पार्टी के कई कार्यकर्ता कर रहे हैं। मगर आलाकमान को नया चेहरा जम नहीं रहा है। क्योंकि नये चेहरे में इतनी ताकत नहीं है कि विपक्ष के प्रत्याशी से टक्कर ले सकें। सियासत के दांव-पेच नहीं जानता है। विपक्ष के प्रत्याशी से तो वंशवाद की बेल का उम्मीदवार ही टक्कर ले सकता है। इसलिए बिना समय गवाए प्रथम सूची में ही वंशवाद की बेल को टिकट का खाद दे दिया।
टिकट का खाद मिलते ही वंशवाद की बेल सत्ता के वृक्ष पर फलने-फूलने के लिए,मतदाताओं से मिलने-जुलने लगी। वायदों की पोटली खोलने लगी। अपने वंश की सियासत के गुणगान के गीत गाने लगी। लेकिन यह तो मतगणना के बाद ही पता लगेगा की वंशवाद की बेल पर फूल खिलते हैं या नहीं।

चुनावी कारवां गुजरने के गुबार

गरमी ने चुपके से आकर सीलिंग फैन का स्विच ऑन कर दिया है। पंखे पर जमी हुई धूल उड़कर नेताजी की गाड़ी के पीछे उड़ रही धूल में जा मिली। चुनावी धूल में मिलना या तो धूल चटाना है या फिर जीत के फूल खिलाना है।
चुनावी दौर में नेताओं की गाड़ी के पीछे उड़ती धूल बहुत मायने रखती है। उड़ती हुई धूल को देखकर एग्जिट पोल वाले नतीजे बता देते हैं। फलाना नेता आगे चल रहा है या ढिकाना। मीडिया वाले आकलन लगा लेते हैं और समाचार प्रकाशित कर देते हैं। ठुमका सिंह और झुमका सिंह के बीच ही कांटे की टक्कर रहेगी। झोपड़ी में बैठा वोटर दूर से ही पता लगा लेता है कि फलाने नेताजी गांव में पधार रहे हैं। डिमका नेताजी वोट मांगने जा रहे हैं।
सच पूछिए,तो उड़ती हुई धूल से नेताजी ही नहीं,वोटर तक की पहचान हो जाती है। बस पहचानने वाला चाहिए। जो मतदाता धूल उड़ाती गाड़ी को आते देखते ही एक तरफ साइड हो लेता है,संभवत: वह नेताजी का वोटर नहीं होता है। और जो गाड़ी के एकदम सामने आ जाने पर भी साइड में नहीं होता है, तो समझिए वह नेताजी का पक्का वोटर है।  
गाड़ी के पीछे दौड़ते बच्चों के चेहरों पर जमी धूल देखकर,बच्चों की मां समझ जाती है कि बच्चे लुका-छिपी खेलने नहीं,बल्कि नेताजी के प्रचार के परचे लूटने गए थे। लुटे हुए पर्चे व बिल्लों को देखकर मां-बाप बच्चों को डांटते नहीं है,बल्कि पूछते हैं कि आज गाँव की चौपाल में कौन नेता जी आए थे और क्या बोलकर गए हैं। भले ही बच्चों को मतदान करने का अधिकार नहीं है,मगर वे यह अवश्य जानते हैं कि वोट की कीमत क्या होती है। इसलिए कई बच्चे तो वोट डालने से पहले अपने घरवालों को यह बात अच्छी तरह से समझाकर भेजते हैं कि ईवीएम का बटन किस तरह से दबाना है।
 
धूल उड़ाती हुई गाड़ियों का काफिला जब रास्ते से गुजरता है,तो उस रास्ते पर विकास की गाड़ी चढ़ी भी है या नहीं,यह बिना पूछताछ किए ही मालूम हो जाता है। जब गाड़ी के टायर गड्ढों को बचाने के बावजूद गड्ढों में पड़ते हैं,तब गाड़ी ही बता देती है इस रास्ते पर तो विकास की गाड़ी क्‍या,विकास की साइकिल भी नहीं चली है।
लग्जरी गाड़ी में बैठे नेताजी जब अपना शीशा उतारकर पीछे देखते हैं,तो उड़ते धूल के गुब्‍बारों  में भले ही काफिले की गाड़ियां न दिखे,लेकिन कार्यकर्ताओं का जोश साफ-साफ दिखाई देता है। उनके द्वारा लगाए जा रहे,जिंदाबाद के नारे उन्‍हें लगातार आश्‍वस्‍त करते रहते हैं।

5 Apr 2019

चुनावी मौसम में वादों की टर्राहट

देखिए चुनावी मौसम है। वादों की बरसात तो होनी है। वादों के मेंढक टर्राने लगे हैं। नेता रूपी बादल वोटर को भिगोने के लिए गरजने लग गए हैं। वोटर वादों की बरसात में नहाने के बजाय यह देखना चाहता है कि वादों की बारिश हल्की बूंदाबांदी होकर ही थम जाएगी या मूसलाधार बरसेगी। एक बड़े राजनीतिक दल के मुखिया ने तो बीस फ़ीसदी गरीबों के लिए हर माह बारह हजार के वादे की बारिश कर दी है। लेकिन एक सर्वे के मुताबिक अबकी बार जिन दस चुनावी मुद्दों की बारिश होनी है,उनमें बेरोजगारी सबसे प्रमुख है। जो कि गत आमचुनाव में भी दस मुद्दों में प्रथम पायदान पर थी।
सच पूछिए तो रोजगार की बरसात की प्रतीक्षा में बेरोजगारी प्यासी मर रही है। प्यास के कारण गला सूखता जा रहा है। अगर समय रहते हुए बेरोजगारी की प्यास नहीं बुझाई गई,तो रोजगार के पानी की  तलाश में भटकती हुई दम तोड़ देगी। लेकिन  नेता चुनावी सीजन में तो आश्वासन का जल पिलाकर मतदान तक तो बचा लेते हैं। क्योंकि तब तक इन्हें वोट जो लेना रहता है। मगर मतगणना के बाद से ही चाहे बेरोजगारी दम तोड़े या किसान आत्महत्या करेंइन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता हैं। विपक्ष सत्ता पक्ष से जवाब मांगता है और सत्तापक्ष चुप्पी साध लेती है। जब विपक्ष सत्ता में आ जाती हैं और सत्ता विपक्ष पक्ष में होती है। तब भी वही प्रक्रिया रहती है। कुछ नहीं बदलता है। अगर कुछ बदलता है तो सिर्फ चेहरे बदलते हैं। यहां तक की कुर्सी भी वही की वहीं रहती है।
वैसे देखा जाए तो राजनीति में सारा खेल ही कुर्सी के लिए रचा जाता है। कुर्सी के लिए गठबंधन की नाव में बैठ जाते हैंतो गठबंधन की नाव से उतर भी जाते हैं। टिकट कट गया तो दूसरी पार्टी में सम्मिलित होकर उसी के सामने ताल ठोक देते हैं। बेटा बाप की संसदीय सीट पर अपना परचम लहराने के लिए बाप की सीट बदल देता है। बाप अपने बेटे एवं पुत्रवधू के लिए हाईकमान से पैरवी करता है। चायवाला चौकीदार बन जाता है। हाथी साइकिल पर सवार हो जाता है।   
नेता अपनी पत्नी,भाई-बहन,बेटा-बहू,भतीजा-भतीजी को राजनीति के मैदान में उतारकर अपनी वंशवाद की अमरबेल को सदैव हरी-भरी रखना चाहते हैं। राजनीति में वंशवाद की अमरबेल ऐसी बेल होती है,जो कि चुनाव के पेड़ पर ही फलती फूलती है और चुनाव के पेड़ को मतदाता ईवीएम की बाल्टी में वोट का पानी डालकर भरता है।
हमारे नेताजी की वंशवाद की बेल मुरझाई गई थी। सूखकर गिर न जाए। इस चिंता में वे खुद सूखते जा रहे थे। मगर जैसे ही चुनावी मौसम ने दस्तक दी मुरझाई बेल फूटने लगी। जिसे देखकर बुझ चुका उम्मीद का दिया जल उठा। कल्पना की कोंपल टहनियों का रूप लेने के लिए मचलने लगी। अतीत के झरोखे की बंद पड़ी खिड़कियों को खोलकर उनमें से अपना राजनीतिक उज्ज्वल भविष्य देखने लगे। वंशवाद की बेल को सींचने वाले सोचने लगे,अगर पार्टी ने टिकट का खाद दे दिया तो बेल पूर्व की भाँति फिर से हरी-भरी हो जाएगी। एक बार बेल हरीतिमा का रूप ले ली तो फिर उसकी इस तरह से सार संभाल करते रहेंगे कि भविष्य में फिर कभी नहीं मुरझा पाएगी।

2 Apr 2019

देश के भविष्य का आमचुनाव

देश के आगामी भविष्य के आमचुनाव ने धीरे-धीरे बढ़ते हुए रफ़्तार पकड़ ली है। नेताओं की भाषा शैली भी चुनावी लहजे में ढलने लगी हैं। एक-दूसरे पर कीचड़ उछालने कि प्रक्रिया मौके की तलाश में खादी के अंदर से बाहर निकलने के लिए मचल रही है। झूठ का पुलिंदा चुनावी दरिया में छलांग लगाने के लिए कपड़े उतारकर अर्धनग्न खड़ा हैं। नेताओं ने वादों की पोटली अपने सिर पर रख ली। बस उसकी गांठ खोलना बाकी है। 

नेताओं के राजनीतिक विशेषज्ञ वोट हथियाने का लोकलुभावन सलीका खोजने में जुटे हुए हैं। क्योंकि अबकी बार भ्रष्टाचार, महंगाई,गरीबी, शिक्षा, पानी, बिजली, सड़क  इत्यादि मुद्दे चुनावी मुद्दे बने या नहीं बने।लेकिन एयर स्ट्राइक,राफेल,राम मंदिर,बुलेट ट्रेन,रुपया वर्सेस डॉलर,बेरोजगारी,धारा 370,स्मार्ट सिटी,नोटबंदी,जीएसटी,जैसे मुद्दे चुनावी मुद्दे बनने की पूरी संभावनाएं दिख रही है। सत्ताधारी इन मुद्दों के गुणगान के गीत गाएगा तो विपक्ष आलोचना के ढोल बजाएगा। 
देश अपना भविष्य संवारने के लिए,आमचुनाव के आईने के सामने खड़ा हो गया है,लेकिन आम चुनाव का आईना धुंधलाया हुआ है। अभी तक उस पर किसी ने साफ करने के लिए पानी के छींटे तक नहीं मारे हैं। लगता है कि देश का वोटर ही सात चरणों में वोट रुपी पानी के छींटे मारकर रद्दी अखबार से ऐसा साफ करेगा की पांच साल तक धूल व दाग-धब्बे लगेंगे नहीं। 
लेकिन क्या आमचुनाव ही देश का भविष्य संवारने का एकमात्र माध्यम है? क्या देश के नेताओं के हाथ में ही देश का भविष्य है?क्या आम आदमी देश का भविष्य नहीं बना सकता है? सही मायने में देश का भविष्य को संवारने की जिम्मेवारी देश के प्रत्येक नागरिक हैं। लेकिन हम देश के भविष्य के बारे में तो क्या अपने भविष्य के बारे में नहीं सोचते हैं। सही पूछिए तो मुझ जैसा तो भविष्य की तो छोड़िए अपने वर्तमान को सही ढंग से व्यतीत नहीं कर पाता है। किसी ने कहा भी है कि जिसने अपना वर्तमान सही ढंग से व्यतीत कर लिया,उसका भविष्य अपने आप ही उज्ज्वल है। 
आप कुछ भी कहिए या सोचिए, लेकिन नेता अपना भविष्य संवारने के लिए हमेशा चिंतित रहता है। चुनावी मौसम में तो अपना पंचवर्षीय भविष्य बनाने के सिवाय और कुछ सोचता नहीं है। अपना भविष्य बनाने के लिए वोटर से हाथ मिलाने से लेकर उसके पांव पकड़ने तक की प्रक्रिया से गुजरने से नहीं सकुचाता है। चुनावी दौर में तो आप नेताजी से चांद सितारे जमीन पर उतारने के लिए कहेंगे तो एक बार तो उनके लिए भी मना नहीं करेगा। अमूल्य वोट के लिए तो निहायत गरीब या दलित के घर का भोजन भी करना पड़े तो मौके को गंवाएगा नहीं। अमूल्य वोट का भी मूल्य निर्धारित करके उसे खरीदनेे की पूरी कोशिश करते हैं। क्योंकि अच्छे दाम लगने पर बिकने वालों की भी कमी नहीं है। सच पूछिए तो नेता खुद का भविष्य सुधारने के लिए किसी का भी भविष्य बिगाड़ सकते हैं। देश का भविष्य बनाना तो इनका एक बहाना है। असल में तो यह खुद का भविष्य बनाने में लगे रहते हैं।

1 Apr 2019

एक अदद ‘झूठ’ की तलाश में हूं

मैं कई दिनों से उस ‘झूठ’ की तलाश में हूँ,जिसे बोलकर लोग अपना कार्य आसानी से करवा लेते हैं। नौकरी पा लेते हैं। कारोबार खड़ा कर लेते हैं। प्रेम-प्रसंग चला लेते हैं। शादी रचा लेते हैं। चुनाव जीत जाते हैं। रिश्‍वत ले लेते हैं। पुरस्कार पा लेते हैं। अखबार में छप जाते हैं। टीवी पर दिख जाते हैं। सुर्खियों में बने रहते हैं। खास ऐसा ही झूठ मुझे भी बोलना आता,तो मैं दर-दर की ठोकरें नहीं खा रहा होता। कहीं न कहीं कुछ न कुछ जॉब कर रहा होता। मैं जब भी झूठ बोलता हूँ,पकड़ा जाता हूँ। एक दफा तो पकड़ा ही नहीं गया,अच्छे से धुनाई भी हुईवह भी बिना वॉशिंग पाउडर के। जिस ‘झूठ’ की मुझे तलाश है,उस के लिए मैंने बहुत पापड़ बेले। उन तमाम लोगों से मिला जो झूठ बोलने में पीएचडी हैं। झूठ बोलने के गुर सिखाते हैं। झूठ की बुनियाद पर अपना कारोबार चलाते हैं। इन सभी ने एक ही बात बताई,झूठ बोलने में है बड़ी कठिनाई। हमने तो झूठ बोलकर कईयों को फंसाया,तेरी तू जान भाई। ऐसा झूठ बोलने वालों ने मुझे बताया।

जिसने भी झूठ बोलने का नायाब तरीका बताया,मैंने वहीं अपनाया पर अपने आप को नाकामयाब पाया। इसका कारण मेरी समझ में आज तक नहीं आया। लेकिन मैं हार नहीं मानूंगा। किसी ने मुझे यह भी बताया है कि झूठ बोलने के लिए कसम भी खानी पड़ती हैं। मैं कसम खाने के लिए तैयार हूँ। माँ-बाप। बीवी-बच्चे। भाई-बहिन। यार-दोस्त रिश्‍तेदार की कसम तो मैं ऐसे खा जाऊंगा जैसे लोग गाजर-मूली खाते हैं। झूठी कसम खाने से पहाड़ थोड़ी टूट जाएंगा। लोग तो भरी अदालत मेंगीता’ पर हाथ रखकर न जाने कैसी-कैसी और किस-किस की कसम खा जाते हैं। उन पर न तो पहाड़ टूटता है और नहीं वे पहाड़ तले दबते हैं। झूठ बोलने वाले तो स्वर्गवासी माँ-बाप की कसम तक खा जाते हैं। मुझे ‘आपकी कसम’,‘मेरी कसम’ खाने में भला मेरा क्या जाता हैं। बस,मुझे तो वह ‘झूठ’ बोलना आना चाहिए। जिसे बोलकर लोग बड़ी-बड़ी मछली यूं ही फंसा लेते हैं।

झूठ बोलकर कैसे फंसाते हैं, इसकी खुफिया जानकारी एक महाशय ने दी। उसने बताया कि झूठ बोलने में न हींग लगती हैं,न फिटकिरी। रंग चोखा आता है। न तेरे बाप का। न मेरे बाप का कुछ जाता हैं। जो भी आता है। उसी से आता है,जिसके सम्मुख हम झूठ बोल रहे हैं। झूठ बोलने से अगर कुछ भी नहीं आता है,तो कोई बात नहीं। कम से कम झूठ बोलने का अभ्यास ही हो जाता है,जो आगे काम आता हैं। अपने आप कोई नहीं फंसता हैं। उसे फंसाया जाता हैं। कैसे फंसाया जाता हैं, यह तरीका भी उसने ही बताया। जिस तरह से बकरे को हलाल करने से पूर्व उसे कुछ खिलाते-पिलाते हैं उसके बाद हलाल करते हैं। उसी तरह से झूठ से किसी को फंसाना है,तो पहले उसकी अच्छी तरह से खातिरदारी करों फिर मौका देखकर बातों ही बातों में वह ‘झूठ’ बोल दो। जिससे अपना स्वार्थ सिद्ध होता है। बातों ही बातों में इसलिए,क्योंकि  उसे शक नहीं हो कि बंदा झूठ बोलकर अपने को फंसा रहा है। शक हो गया तो पकड़ा जाएंगा और पकड़ा गया तो मार पड़ना स्‍वभाविक है। इस कला में निपुण हो गया तो समझ ले फिर कहीं भी हिचकिचाने की जरूरत नहीं।
उसी ने बताया कि आज कौन झूठ बोल रहा है और कौन सच,यह परखना जरा मुश्किल है। झूठ सच लगता हैं और सच झूठ। तू तो आँख मूंद कर झूठ बोल। किसी सामने नहीं बोल सकता है,तो मोबाइल पर झूठ बोल। मोबाइल पर तो ज्ञानी से ज्ञानी भी मूर्ख बन जाता है।

मसलन,दस- बीस किलोमीटर दूर बैठा व्यक्ति भी मोबाइल पर यही कहता है- दो मिनट में आ रहा हूँ। पांच मिनट में पहुंच रहा हूँ। नजदीक ही हूँ। बस आ गया। इत्ती स्पीड तो हवाई जहाज की नहीं होती जित्ती इन दो,पांच मिनट वालों की होती हैं। मैंने सलाह तो मान लीलेकिन मुझसे  मोबाइल पर भी झूठ नहीं बोला जा रहा। सोचता हूँझूठ हम बोलते हैं,बदनाम मोबाइल होता है। वह मोबाइलजो हमारे सुख-दुख का साथी है। ऐसे साथी को भी हम झूठ बोलने में क्‍यों शामिल करें। उसने हमारा क्‍या बिगाड़ा है!