11 Aug 2020

मैं नहीं बदला,मुझे बदल डाला

आप बदल गए हैं। यह पत्नी का कहना था। घर में रहना है,तो पत्नी के कथन में हाँ में हाँ और ना में ना मिलाना ही पड़ता है। नहीं मिलाए तो वैवाहिक जीवन तू-तू मैं-मैं में व्यतीत होगा। इस सबसे तनाव होगा। तनाव होगा तो खींचतान होगी। खींचतान होगी तो प्रेम का धागा टूटेगा। एक बार धागा टूट गया तो वापस जोड़ने के लिए फिर गाँठ ही लगती है। कई ऐसे भी धागे होते हैं, जिनमें गाँठ भी नहीं लगती। उनकी सीधी कोर्ट में पेशी लगती है। अधिकतर पेशियों का अंतिम परिणाम वही तीन बार बोलने वाला कुछ होता है,जिसके पीछे पड़ने वाले उसे लेकर ही रहते है।

मुझमें ऐसा क्या बदलाव आ गया,जो मुझे ही दिखाई नहीं दे रहा है और पत्नी को दिख रहा है! न मोटा हुआ हूँ ,न दुबला। न स्वभाव बदला है,न रंग-रूप। मूँछें भी इंची टेप से नापकर ही कटवा रहा हूँ। सोचा पत्नी से ही पूछ लेता हूँ। सो मैंने पूछ ही डाला।

वह बोली,‘देखिए जी! कई दिनों से देख रही हूँ कि...मुझ चिर- जिज्ञासु ने बीच में ही टोक दिया,‘क्या देख रही हो?’ वह फिर बोली,‘ यही कि आप बदल गए हैं।अब मेरा गुस्सा होना नैतिक रूप से जायज था,मगर पत्नी के सामने कैसी नैतिकता। नैतिकता के सारे मानदंड पत्नियों के सामने ही तो टूटते हैं! इसलिए मैंने अपना गुस्सा लोकसभा स्पीकर की तरह पीते हुए मन व झक, दोनों मारकर कहा,‘हें...हें...हें... कहाँ बदला हूँ पगली, वैसा का वैसा तो हूँ। देख जरा! वही चाल वैसा ही बेहाल!

मेरी नकली मुस्कराहट को उसने वैसे ही लपक कर पकड़ लिया, जैसे दीवार पर छिपकलियां मासूम मच्छरों को धप से पकड़़ लिया करती हैं। मुझे गिरफ्त में आता और गिड़गिड़ाता देख मुझ गुलाम पर उसने तुरुप का इक्का चला दिया, ‘ तुम्हारी ओर वही चाल। सवाल ही नहीं।बेवजह ही बवाल खड़ा नहीं हो जाए। बवाल हो गया तो जल्दी सी बहाल नहीं होगा। यही सोचकर मैंने विनम्रता से पूछा, ‘तो फिर कैसा हूँ?’ 

वह बोली,‘इतने भोले-भाले भी मत बनो। तुम्हें सब पता है। कैसे हो। कैसे नहीं हो। मुझसे पूछने से क्या कैसे के ऐसे और ऐसे के कैसे बन जाओगे क्यातब तो बताऊं कैसे हो?’

मैं तपाक से बोला,‘बताइए! तुम कहोगी जैसा ही बन जाऊंगा। बहरहाल तो बना हुआ भी हूँ।वह  बोली,‘रहने दीजिए। मेरे मुँह से वो सच निकल आएंगा,जो सच है।’ 

मुझे सच ही जानना है।’ ‘तो कान खोलकर सुनिए।’ 

मैंने चुटकी लेते हुए कहा,‘कान ही क्यामुँह व आँख भी खोल रखे हैं। बस जल्दी सी सुना दीजिए।’  

पहले तो यह बताइए! मुझसे प्यार क्यों नहीं करते हो। जबकि पहले बेहद प्यार करते थे।’  

मैं बोला,‘तुम्हीं ने कहा था कि घर प्यार-प्रेम से नहीं,पैसों से चलता है। पैसा प्रेम से नहीं। कमाने से आता है। कमाई मेरी लुगाई नहीं। जो कि जेब में आकर समा जाए। यह  पटाने से भी नहीं पटती है। दौड़-धूप से फंसती है। तब दो पैसे जेब में आते हैं। जिनसे घर का चूल्हा जलता है। आजकल पैसे से प्यार है। प्यार से पैसा नहींहै।जिसकी जेब में पैसा है। उसकी मुहब्बत फलीभूत है। जिसकी में नहीं है। उसकी निष्फल है।’  

यह सुनकर वह लाल-पीली हो गई। बोली,‘मुझे प्यार-प्रेम की परिभाषा मत समझाइए। मैं वाकिफ हूँ। पहले देसी में बोलते थे। अब अंग्रेजी की टांग तोड़ते हो।मैं बोला,‘यह भी तुम्हीं ने कहा था कि तुम्हारे को बोलने का ढंग सही नहीं है। हिंदी में बोलिया करो। हम हिंदी बोलेंगे। तभी तो बच्चे बोलेंगे।’ ‘हाँ कहा था,मगर आप तो अंग्रेजी में न जाने क्या-क्या बोल जाते हैं,जो मेरे तो पल्ले नहीं पड़ती है।’ ‘अपने बच्चे इंग्लिश मीडियम में पढ़ते हैं। इसलिए बोलना पड़ता है। ए डबल पी एल ई एप्पलएप्पल यानी सेब। बीओवाई ब्वॉय,ब्वॉय यानी लड़का। सीएटी कैट,कैट यानी बिल्ली। यह नहीं बोलूं तो बच्चे खिल्ली उड़ाते हैं। पापा को इंग्लिश नहीं आती है। बच्चों के सम्मुख इज्जत का फ़ालूदा नहीं बने। इसलिए बोलता हूँ।

पत्नी बोली,‘बच्चों के समक्ष तो ठीक है। मगर अहर्निश मुझे खटकती है। पहले सादा पेंट शर्ट पहन कर रहते थे।

अब तो जींस टी-शर्ट के अलावा कुछ ओर पहनते ही नहीं हो।मैं बोला,‘तुम्हारी याददाश्त कमजोर हो गई है। तुम्हीं ने तो कहा था कि सादा पैंट-शर्ट नहीं,जींस टी-शर्ट पहनकर रहा करो। इससे पर्सनैलिटी बनती है। तुम पर जमती भी है। इसलिए पहनता हूँ। जो कि मुझे असहज लगता है। मगर तुम्हारी खातिर सहता हूँ।

पत्नी बोली,‘सहता है। वह कहता नहीं। निकालकर फेंक देता है। कई दिनों से देख रही हूँ। आजकल आप बहुत खिले-खिले रहते हो।

मैं चौंका!... और मैं क्या, मेरी सात पुश्तें चौंक गई। मैं तुरंत बोल पड़ा,‘तुम ही तो कहती थी,सूमड़े- सट्ट मत रहा करो,थोड़ा बोला-चाला करो,लोग पीठ पीछे आपको आलोकनाथ बोलते हैं। जब तुमने इतना सब कहा था तो अपन थोड़ा हँसने-बोलने लगे।

हाँ,हंसो-बोलो,मगर इतना भी खुश मत रहो कि लोग मुझ पर शक करने लगें?’ 

इस बार मुझे अपनी सगी पत्नी,पत्नी वाले रोल में दिखाई दी। वह पत्नी ही क्या, जो पति को खुश रह लेने दे! मैं उसकी यह पीड़ा समझ गया था कि मैं उसका पति होने के बावजूद पीड़ित जैसा क्यों नहीं लग रहा था! मैंने तुरंत अपना सॉफ्टवेयर बदला। उस दिन से मैं फिर सूमड़ा-सट्ट हो गया।


9 Aug 2020

मुझे भी खुद को दिखाना है

कई दिनों से सोच रहा हूँ कि सोशल मीडिया पर लाइव आऊं,लेकिन यही सोचकर रह जाता हूँ कि अपनी शक्ल-सूरत शायद लाइव होने लायक नहीं। सुना है कि जिनकी सूरत खूबसूरत होती है,सिर्फ वही लाइव आते हैं। उन्हें ही ज्यादा लाइक और कमेंट का प्रसाद मिलता है। भले ही वे यूं ही लाइव हुए हों। यह भी सुना है कि लाइव के लिए शक्ल-वक्ल मायने नहीं रखती। बस लाइव आने के पीछे कोई न कोई उद्देश्य अवश्य होना चाहिए। हाँ,लाइव पर लाइक नहीं मिले तो लाइव आना ही बेकार है। इससे मेरी दुविधा और बढ़ गई। फिलहाल मैं इसी उधेड़बुन में हूँ कि लाइव आने का आखिर मकसद क्या हो और बिना उद्देश्य न हो क्या करूं-क्या कहूं? ऐसा क्या करूं कि सोशल मीडिया में अपना चेहरा दिखाऊं

लाइव बोले तो जिंदा। विमर्श यह कि मुद्दा सामयिक हो या असामयिक। सामाजिक हो या राजनीतिक। ऐतिहासिक हो या साहित्यिक। आर्थिक हो या धार्मिक।  सहिष्णु हो या असहिष्णु। एलोपैथिक हो या आयुर्वेदिक। या फिर इनसे अलग ही हो। अलग क्या होअलग हो तो ऐसा होजो कि अलख जगा दे। बिना वायरस के पहली लाइव में ही लाइफ बना दे। किसी वायरस की वजह से लाइव हुए तो क्या हुए। लाइफ बेवजह खतरे में डालकर चर्चित हुए तो यह भी कोई वायरल होना हुआ।

मेरे मित्र मुझे बता रहे हैं- समझा रहे हैं कि लाइफ में लाइव नहीं आया, दुनिया को अपना चेहरा नहीं दिखाया तो सोशल मीडिया की दुनिया में रहना ही निरर्थक है। ज्यादा नहीं तो एक लाइव तो बनता है। इस आभासी दुनिया में लाइव से ही पहचान बनती है। लाइव से ही वाइफ खुश रहती है। वाइफ खुश तो सारा जहां खुश। लाइव से फेसबुक फ्रेंड का बैकग्राउंड दिख जाता है। बगैर लाइव के फ्रेंड के बारे में कुछ भी पता नहीं लगता। वह कैसा दिखता है? किस टाइप का है? लाइव से उसका रूपरंग,हाव-भाव से परिचित हो जाते हैं। फैन बन जाते हैं।

मित्र ने तो यहाँ तक कहा है कि आजकल लाइव ही वह  मिसाइल है,जिसके जरिए व्यक्ति चाँद तक पहुँच जाता है। मैं हूँ कि गली के नुक्कड़ तक नहीं पहुँच पा रहा हूँ। चाँद तक न सही,आसमान छूने की तमन्ना तो मेरी भी है,लेकिन मैं हूँ कि लाइव आने-चेहरा दिखाने में हिचकिचा रहा हूँ। समझ में नहीं आ रहा है कि लाइव आने के लिए ऐसा क्या करुं जिससे कि मेरी हिचक दूर हो जाए और मैं लाइव आ जाऊं। 

मन कह रहा है कि तू साहित्यकार है नतो क्यों न उसे ही आजमाएकविता,गीत,गजल,व्यंग्य या कहानी में से किसी एक को लेकर लाइव आ और सुर्खियों में छाजा।लाइव आने को मोबाइल हाथ में लेता हूँ,तो एक मन कहानी के लिए और और दूसरा मन व्यंग्य के लिए। मुझे गीत गजल तो आती नहीं। कविता लेकर इसलिए नहीं आना चाहता,क्योंकि अभी कविता सुनने वाले श्रोता कम और कवि लाइव ज्यादा आ रहे हैं। ऐसे में मुझ अकिंचन की कविता के लाइव को देखना-सुनना तो दूर एक लाइक तक नहीं मिलेगा। कहानी और व्यंग्य में कहानी मुझे कहनी नहीं आती  और व्यंग्य हर किसी के समझ में नहीं आता है। यह सोच कर लाइव नहीं आ पा रहा हूँ।

हालांकि राजनीति की समझ नहीं है। अन्यथा राजनीति को लेकर बिना किसी हिचकिचाहट के लाइव आ जाऊं। और बेतुके बयान देकर सुर्खियों में छा जाऊं। सोच रहा हूँ कि किसी न किसी सामाजिक विषय को लेकर लाइव आ जाऊं,लेकिन सामाजिक विषय तो तमाम हैं। उनमें चयन नहीं कर पा रहा हूँ कि किस विषय को लेकर लाइव का प्रयास करूंक्योंकि मैं ऐसे विषय के साथ लाइव आना चाहता हूँ जिसके साथ अभी तक कोई भी लाइव नहीं आया हो। लाइफ में पहला लाइव ऐसा हो कि कोई वाह किए बगैर न रहे। वैसे तो तमाम  विवादस्पद मुद्दे हैं,लेकिन मुझे सर्वसम्मति वाला कोई विषय दिख नहीं रहा है। अगर आपको दिख रहा है तो मुझे अवश्य बताइएगा,ताकि मैं अविलंब लाइव आ जाऊं।

मोहनलाल मौर्य 

4 Aug 2020

बड़ा आदमी और गांधीजी

वह बड़ा आदमी है। इतना बड़ा है कि बड़े-बड़े भी उसके चरण स्पर्श करते हैं। अपने आपको उसके चरणों की धूल बताते हैं। मगर मेरा मानना है कि जो स्वयं को उसके चरणों की धूल बताते हैं,वे या तो स्वयं मूर्ख हैं या दूसरों को मूर्ख बनाते हैं। क्योंकि वे स्वयं की शिनाख्त जिस आदमी के चरणों की धूल होने में करते हैं,उसके चरणों में तो धूल कभी होती ही नहीं है। अगर कभी भूल से जरा धूल लग भी जाएतो पोंछने- चाटने वाले धूल का एक कण भी नहीं छोड़ते। फिर वे चरणों की धूल कैसे हुएयह समझ से परे है और परे ही रहेगा। वैसे ऐसी घटिया बातों को धूल में ओटकर भूल जाना ही अच्छा।
मगर लोग कहते हैं कि उस आदमी, जिसके पैरों में धूल बताई गई थी, के आदेश को बड़े से बड़े लोग सिर- आँखों पर रखने से इंकार नहीं करते। क्यों करेगा? दरअसल,उसके आदेश के साथ गांधीजी जो चस्पा होते हैं। गांधीजी किसे बुरे लगते हैं। सबको अच्छे लगते हैं। और जो चीज अच्छी लगती है,लोग सिर-आँखों पर ही नहीं, माथे,मगज,जेब से लेकर बैंक अकाउंट तक में भी रखने से कभी इंकार नहीं करते।
उस बड़े आदमी का नाम इतना बड़ा नहीं है कि उसके नाम से काम हो जाएं। हाँ,मगर जब उसके नाम के पिच्छू गांधीजी का सरनेम लग जाता है तो फिर उसका कोई काम नहीं रुकता। वह अपने काम निकालने के लिए सामने वाले को गांधीजी के दर्शन करवाता है। सामने वाला भी दर्शन करते ही सत्य और अहिंसा टाइप की चीजें ऊपर वाली दराज से निकालकर, उन्हें सैनिटाइजर करके नीचे वाली दराज में खिसका देता है। और फिर ऊपर वाली दराज में गांधीजी को रख लेता है। उसके सत्य और अहिंसा तब तक नीचे वाली दराज में नहीं जाते,जब तक की गांधीजी ऊपर वाली दराज में नहीं आ जाते।
दरअसल,उस बड़े आदमी का गांधीजी में बहुत विश्वास है। बल्कि यूं कह लीजिए कि उसके पास गांधीजी का इतना अधिक टर्नओवर है कि लोग अब उसमें विश्वास करने लगे हैं। लोगों ने उसका टर्नओवर देख उसकेे प्रति अपनी हिकारत को यू-टर्न करवा दिया है। वह गांधीजी का छोटा नहीं बल्कि बड़ा अनुयायी है। बड़ा इस मायने में है कि वह छोटे काम में हाथ डालता ही नहीं। बस सामने वाले के मुँह पर बड़ेे-बड़े गांधीजी फेंकता है और बड़े काम निकलवा लेता है। छोटे काम उसे अपनी और गांधीजी, दोनों की तौहीन लगते हैं। वह गांधी के दर्शन और गांधी के प्रदर्शन दोनों में गहन विश्वास रखता है। दरअसल,पहले वह बहुत छोटा आदमी था। मगर गांधीछाप हरी पत्ती के हेर-फेर में वह इतना बड़ा हो गया कि अब पहले से भी और छोटा,और बोना हो गया है।
उसने आज तक गांधीजी को कभी पढ़ा नहीं है, बस देखा है। उसके लिए इतना ही पर्याप्त है। गांधीजी को पढ़कर करता भी क्या? ऐसा उसका जमीर अक्सर उससे कहता रहता है। हाँ, लेकिन जिस शिद्दत से उसने गांधीजी को देखा और फिर उनका सदुपयोग किया है, वैसा गांधीजी स्वयं का नहीं कर पाए होंगे।
गांधीजी अक्सर उसके सपने में आते हैं, बल्कि वह तो जागते हुए भी गांधीजी के ही सपने देखता है। उसने खुद ही नहीं बल्कि अपने नाते-रिश्तेदारों को भी गांधीजी के ही सपने देखने की लत-सी लगा दी है। रिश्तेदार भी अब सरकारी टेंडर का फॉर्म डालने से पहले गांधीजी का स्मरण करते हैं और फिर टेंडर का चयन करने वाले अधिकारी को गांधीजी का स्मरण करवा डालते हैं। अब गांधीजी का कहा कौन टाल सकता है भला! इसलिए गांधीजी का नया,गच्च-भक्त बना वह अधिकारी भी गांधीजी की बात नहीं टालता और बड़ा आदमी मुस्करा देता।

2 Aug 2020

सावन-भादों की सीख



रोज कोयल कुकू-कुकू कर कह रही है कि सावन आ गया है,घर से बाहर निकलिए और चौतरफा छाई हरीतिमा को निहारिए,पर उसकी कोई नहीं सुन रहा है। सब अपने-अपने कार्यों में इस तरह से उलझे हुए हैं कि अपनों की नहीं सुन रहे हैं,कोयल की क्‍या सुनेंगे! वह लोगों के कानों में भी कूकने लग जाए,तब भी नहीं सुनेंगे। आजकल लोगों को कर्णप्रिय के बजाय कानफोड़ू ज्यादा प्रिय है।
अब मोर जंगल में ही नहीं,घरों की छत पर भी नाच रहे हैं। पीहू-पीहू करके लोगों को बुला भी रहे हैं कि आइए,और हमारा नृत्य देखिए। फिर भी लोग उनका नृत्य नहीं देख रहे हैं। शायद इसीलिए लोगों का मन मयूर की तरह नहीं हो पा रहा है। जब तक मनुष्य का मन मयूर की तरह नहीं होता है,वह सावन-भादों का भी आनंद नहीं उठा पाता है।
हमेशा सावन-भादों में मेंढक टर्र-टर्र करते हुए घरों के अंदर यह बताने के लिए घुसते हैं कि टर्र-टर्र हमें ही शोभा देती है,तुम्हें नहीं,लेकिन मनुष्य है कि टर्र-टर्र किए बगैर रह ही नहीं रहा है। जब देखों टर्र-टर्र करता रहता है,जबकि मेंढक बारिश के मौसम में ही टर्र-टर्र करते हैं।
सावन-भादों में नाग-नागिन नृत्य करके यही बताने में व्‍यस्‍त रहते हैं कि ब्याह-शादी में लोग हमारी नकल करके जमीन पर पलटी मारकर जो नागिन डांस करते हैं,वह नागिन डांस नहीं होता है। जिस तरह से हम कर रहे हैं,वह होता है। लेकिन,लोग उनके नृत्य को देखना तो दूर,उन्हें देखकर ही सहम जाते हैं। असल में नाग-नागिन डसने के लिए नहीं,बल्कि नागिन डांस सिखाने के लिए नृत्य करते हैं।
सावन-भादों के महीने में मेघ मेहरबानी करके बारिश ही नहीं करते हैं,बल्कि मेहरबान किस तरह से हुआ जाता हैं,यह दिखाने के लिए भी कई बार झड़ी लगा देते हैं। हम हैं कि मेहरबानी तो दूर,दुआ-सलाम भी स्वार्थ से ही करते हैं। शायद इसीलिए मेघ हम पर जल्दी से मेहरबान नहीं होते हैं। वे गरजने के बावजूद यही सोचकर नहीं बरसते होंगे कि हम तो इन पर मेहरबान हो जाते हैं और ये लोग हैं कि होते ही नहीं है।
हवा में उड़ने वालों को सावन-भादों के महीने में चलने वाली मंद-मंद हवा यही समझाने में लगी रहती कि हवा में उड़ने से अच्छा है कि जमीन पर पैर रख कर ही अपने कार्यों को अंजाम दिया जाए। धड़ाम से नीचे गिरोगे तो जमीन के अंदर ही धंस जाओगे। लेकिन,लोग हैं कि समझते ही नहीं। हवा में बातें करने और हवाई किले बनाने से डरते ही नहीं है।
सावन-भादों के महीनों में घर-दालान में आने वाली सीलन भी हमें यही सीख देती है कि आलीशान मकान बनाने से ही कुछ नहीं होता है। समय-समय पर उसकी मरम्मत भी बहुत जरूरी है। सीलन ही है,जो हमें  मरम्मत कराने पर विवश कर देती है। अगर सीलन नहीं आए,तो हम दीवारों की ओर देखें ही नहीं। जो बरसात के दिनों में सीलन को देख कर भी अनदेखी कर देता है,उसके मकान धराशायी होकर ही रहते हैं।
इसी तरह नदी और नाले उफान पर आकर हमें यही बताते हैं कि गुस्से में कुछ नहीं रखा है। गुस्से में केवल अपनी और दूसरों की तबाही हैं। एक बार तबाह होने पर उसकी भरपाई में वर्षों लग जाते हैं। लेकिन,हम हैं कि नदी और नाले के उफान को देखकर भी अपने गुस्से पर नियंत्रण नहीं कर पाते हैं। 
इन दोनों महीनों में प्रकृति हरी चुनरी ओढ़कर हमें यही बताने आती है कि हरियाली से ही खुशहाली है। लेकिन,हम हैं कि हरियाली का संहार करने में लगे हुए हैं। पेड़ों पर कुल्हाड़ी चलाने से पहले एक बार भी नहीं सोचते हैं कि इनकी वजह से ही हरियाली है। जिनके आसपास हरियाली नहीं,वहाँ खुशहाली कैसे आएगी! जहाँ खुशहाली नहीं होगी,वहाँ पर घरवाली भी खुश नहीं होगी। जिस घर में घरवाली खुश नहीं,उस घर में सावन-भादों भी यादों में ही निकल जाते हैं। शायद इन्‍हीं यादों को संजोने के लिए ही सावन-भादों में वृक्षारोपन किया जाता है। 
मोहनलाल मौर्य

19 Jul 2020

Saavan and frog


Every day the cuckoo is saying cuckoo, that the spring has come, get out of the house and look at the all-round greenery. But nobody is listening to him. All are entangled in their respective actions in such a way that they are not listening to their loved ones. Even when a cuckoo starts crying in people's ears, they will not listen. Because nowadays people are more fond of earrings than Karnapriya.
Now peacocks are dancing not only in the jungle but also on the roof of houses. People are even calling people after drinking. Come and see our dance. Still people are not watching their dance. Perhaps this is why people are not able to feel like Mayur. As long as the human mind is not like a peacock, he does not even enjoy the sawn bhads.
Forever the frogs enter the homes of the savannahs to tell them that it is their beauty that does not suit you. But there is no human being that is not living without a twist. When you see, then it keeps on talking. Whereas frogs tend to tread in the rainy season.
In Saavan Bhadas, Nag-Nagin dances by telling them that in marriage, people imitate us and dance on the ground and dance on the ground, and they do not dance the serpent. The way we are doing it does not happen. But people are scared to see their dance and away from them. Whereas serpent-nagins dance not to dance, but to teach serpent dance.
In the month of Sawan Bhadas, the clouds do not show their mercy, but they show themselves the way they show them, and sometimes showers. We are far from obliged, but we also do self-interest. Perhaps this is why the clouds are not kind to us soon. Despite the thunder, they will not rain thinking of this, we are kind to them and it is people that do not exist.

The wind that blows in the month of Sawan Bhadas to the wind blowers will be able to convince them that it is better to fly in the wind, do your tasks only by keeping a foot on the ground. Otherwise, you will fall down from the pit, neither will you sink inside the ground. But people don't understand that. There is no fear of talking in the air and building an air fort.
In the months of the monsoon months, the dampness that comes in the house-hallway also teaches us that nothing happens by building luxurious houses. Periodic repairs are also very important. It is the dampness that compels us to repair. If the damp does not come, then we do not look at the walls. Who does not ignore the seals even during the rainy days, nor does his house remain dashed.
Similarly, coming to the river and drain, it tells us that nothing is kept in anger. Anger is the destruction of ourselves and others like us. Once devastated, it takes years to recover. But we are not able to control our anger even after seeing the river and rivulets.
Mohanlal maurya

9 Jul 2020

महज शब्द नहीं हैं प्लीज़ और सॉरी


प्लीज और सॉरी महज दो शब्द ही नहीं है,बल्कि जीवन पथ पर सदैव साथ निभाने वाले सहायक हैं। इन दोनों शब्दों को बोलकर खलनायक भी नायक बन जाता है। कई बार इनके उच्चारण मात्र से ही घर-परिवार,समाज और देश की बहुत सी समस्याओं का समाधान हो जाता है।
प्लीज और सॉरी कोई क्लिष्ट शब्द नहीं है,बल्कि ये तो सहज और सरल शब्द है। जिन्हें कोई भी,कभी भी बोल सकता है,जरूरी नहीं जिनको इंग्लिश आती हैं,वही बोल सकते हैं,इनको तो अनपढ़ भी आसानी से बोल सकते हैं। सब जानते हैं कि हिंदी में प्लीज का अर्थ कृपया और सॉरी का क्षमा होता है। मगर कृपया और क्षमा बोलने पर प्लीज और सॉरी जैसी अनुभूति नहीं हो पाती है। इन दोनों शब्दों को बोलने में न हींग लगती है,न फिटकिरी। रंग चोखा आता है। फिर बोलने से परहेज क्यों
जो लोग इस गलतफहमी में रहते हैं कि प्लीज और सॉरी बोलने से उनका कद घट जाएगा,तो मैं उन्हें बता दूं कि इन दोनों शब्दों को बोलने से कद घटता नहीं,बल्कि बढ़ता है। एक बार बोलने से काम नहीं बन रहा हो तो बार-बार बोलिए और फिर कमाल देखिए। चमत्कार जैसा महसूस नहीं हो तो कहना। एक बार चमत्कार हो गया,तो फिर प्लीज और सॉरी बोलकर नित्य नए-नए अविष्कार किए बगैर नहीं रहेंगे। यह मैं नहीं,मेरा तजुर्बा कह रहा है। 
प्लीज और सॉरी ऐसे शब्द है,जिन्हें बोलकर पोल खोलने वाले का भी मुँह बंद कर सकते हैं। दुश्मन को दोस्त बना सकते हैं। आपसी मनमुटाव दूर कर सकते हैं। टूटे रिश्ते जोड़ सकते हैं। कलह को सुलह में बदल सकते हैं। सातवें आसमान पर चढ़े गुस्से को उतार सकते हैं। पत्थर दिल को पिघला सकते हैं। रूठे को मना सकते हैं। झूठे से सच बुलवा सकते हैं। दूध का दूध और पानी का पानी करवा सकते हैं। मुश्किल और देरी से होने वाले काम आसानी से करवा सकते हैं। डांट-फटकार की जगह सत्कार पा सकते हैं।
लोग प्लीज और सॉरी बोलकर तो बात का बतंगड़ और राई का पहाड़ बनाने वालों को भी ऐसा करने से रोक देते हैं। मौके पर चौका मारने वालों को मारने नहीं देते हैं। अकड़कर चलने वालों को झुका देते हैं। बात-बात में मीनमेख निकालने वालों को ऐसा करना बंद करवा देते हैं। हठधर्मियों का हठ हटा देते हैं। हर कार्य को झटपट करने वालों को आहिस्ता-आहिस्ता से करने पर विवश कर देते हैं। लोक निंदा करने वालों से प्रशंसा करवा लेते हैं। आरोप-प्रत्यारोप लगाने वालों को लगाने से रोक देते हैं।
जो इन दोनों शब्दों को बोलने में बिल्कुल भी नहीं हिचकिचाहते हैं,वो गलती करके भी नहीं पछताते हैं। क्योंकि उनके पास प्लीज और सॉरी जैसे सशक्त हथियार हैं,जिनके जरिए,वे कोई भी दरिया पार कर सकते हैं। हर उस मुश्किल घड़ी की सुई को तेज कर सकते हैं जो धीमी चलती है। कई तो प्लीज और सॉरी के बल पर ही अपना कारोबार चला रहे हैं और खूब कमा रहे हैं।
मोहनलाल मौर्य

Please and Sorry are not just two words


Please and Sorry are not just two words, but are always helpful to follow along on the path of life. By speaking both these words the villain also becomes a hero. Many times, many of the problems of home, family, society and country are solved by mere pronunciation.
Please and sorry is not a word, but it is a simple and easy word. Whomever can speak anytime, not necessarily those who know English, they can speak it, even illiterate can speak it easily. Everyone knows that please in Hindi means please and sorry for sorry. But please and forgiveness, there is no feeling like please and sorry. It does not take asafetida or alum to speak these two words. Color comes sharpened. Why then refrain from speaking ?  
Those who live in the misconception that speaking and sorry will decrease their stature, then let me tell them that speaking these two words does not decrease their stature, but increases. Once speaking is not going to work, then speak again and again and watch it. If you do not feel like a miracle, say it. Once a miracle has happened, then please speak and sorry and will not live without constantly innovating. It is not me, my experience is saying. 
Please and sorry are such words which can also be silenced by the person speaking the pole. The enemy can be made friends. Can overcome mutual estrangement. Broken relationships can add up. Can turn discord into reconciliation. Climbing the seventh sky can vent anger. Stones can melt the heart. Can celebrate anger. Can call the truth from a liar. You can get milk of milk and water of water. Difficult and late work can be easily done. You can get hospitality instead of scolding.
People, by speaking please and sorry, also prevent those who make a talk and mountain of rye from doing so. The fours on the spot do not let those who kill. Swingers tend to tilt those who walk. In conversation, the people who make Meenmakh are stopped. Remove the persistence of dogma. They force everyone to do the work quickly and slowly. People get praise from condemners. Accusations prevent the imposters from applying. 
Those who do not hesitate to speak these two words they do not regret even by mistake. Because they have strong weapons like please and sorry, through which they  can cross any river. You can sharpen every difficult clock needle that  runs slow. Many are running their own business on the strength of please and sorry and are earning a lot.
Mohanlal maurya

7 Jun 2020

सड़क की आपबीती


मैं सड़क हूँ। अब यह मत पूछिएगा कि कहाँ की हो। नेशनल हाईवे की हो या स्टेट हाईवे की। या फिर जिला,तहसील,शहर,कस्बा,देहात की हो। इसी देश की हूँ। यही के रोड़ी,कंकड़,तारकोल से निर्मित हूँ। मेरे निर्माता मजदूर,ठेकेदार,इंजीनियर भी यही के ही हैं। लेकिन यह सब मैं क्यों बता रही हूँ। यह तो आपको भी पता है और सरकार को भी। मैंने आप लोगों से ही सुना है कि दुख-दर्द बाँटने से कम हो जाते हैं,इसलिए सोचा कि क्यों न अपना दुख-दर्द बाँटकर थोड़ा कम ही कर लूं,क्योंकि इन दिनों मैं पैदल चल रहे अपने देश के मजदूर भाई-बहनों की हालात देखकर इतनी दुखी हूँ कि लफ्जों के जरिए बता पाना मुश्किल हो रहा है। सच पूछिए तो मैं इतनी दुखी तो तब भी नहीं होती,जब बारिश के दौरान मेरे सीने में गड्ढे पड़ जाते हैं। चिलचिलाती धूप से मेरी तारकोल रूपी चमड़ी पिघलने लग जाती है। 
मैं अपने जीवन काल में न जाने कितनी बार टूटी-फूटी हूँ,पर कभी भी मुझ पर चलने वाले लोगों को प्रवासी मजदूरों की जितनी तकलीफ नहीं उठानी पड़ी होगी। मैंने साइकिल से लेकर ट्रक तक का भार वहन किया है,पर आजकल मुझसे मजदूर भाई-बहनों का मामूली सा भार वहन नहीं हो रहा है। मुझ पर चलने से उनके नंगे पैरों में मेरे कंकड़ चुभ रहे हैं। जिससे मुझे भी उतनी ही तकलीफ हो रही है। जितनी उन्हें हो रही है। लेकिन मैं भी मजदूरों की तरह मजबूर हूँ। माना कि मेरा दिल कंकड़-पत्थर से निर्मित है,लेकिन मैं पत्थर दिल नहीं हूँ।मजदूरों के पैरों में छाले पड़ते ही मेरी आँखों से आँसू छलक पड़ते हैं। मजदूर महिलाओं के सिर पर अपनी जिम्मेदारियों का बोझ और गोद में देश का भविष्य को देखकर मैं स्तब्ध हूँ। सरकार को खूब कोस रही हूँ,पर मेरी सरकार ने कब सुनी है जो कि अब सुन लेगी। सरकार को चुनने में मेरा योगदान होता तो शायद मेरी सुन भी लेती। लेकिन सरकार चुनने में इन मजदूरों का तो बहुत बड़ा योगदान रहता है। फिर भी इनके लिए बस या रेल की व्यवस्था नहीं की।  सरकार जनता द्वारा चुने हुए जनप्रतिनिधि बनाते हैं,ये मजदूर नहीं। मुझे तो लगता है कि शायद जनता में ये प्रवासी मजदूर आते ही नहीं हैं। अगर आते तो ये भूखे-प्यासे पैदल नहीं चल रहे होते। 
आपने तो मजदूरों की वही तस्वीर देखी होंगी,जो कि मीडिया या सोशल मीडिया पर वायरल हुई है। मैं तो लॉकडाउन लगे दिन से ही नित्य लाइव देख रही हूँ। कोई अपनी बीवी को,तो कोई अपने बच्चे को कंधे पर बैठाकर ले जा रहा है। कोई अपनी माँ को गोद में तो कोई अपने बाप को पीठ पर लादकर चल रहा है। कोई अकेला तो कोई झुँड के साथ चल रहा हैं। थोड़ी बहुत देर मेरे किनारे किसी पेड़ की छाँव तले बैठे तो बैठे अन्यथा चले जा रहे हैं। किसी से कोई गिला-शिकवा नहीं कर रहे हैं। किसी न्यूज़ चैनल के रिपोर्टर ने पूछ लिया तो अपनी व्यथा बता दी। लेकिन जितना समय रिपोर्टर के साथ व्यतीत किया है न उसे कवर करने के लिए पूर्व की अपेक्षा तेज चलने लगते हैं और तब तक इसी स्पीड से चलते रहते हैं। जब तक अपने साथियों के साथ नहीं हो जाए। समय का एक पल भी गँवाना नहीं चाहते हैं। बस जल्दी से जल्दी अपने घर पहुँचना चाहते हैं। घर पहुँचने की जल्दी में न धूप से डर रहे हैं और न भूख से व्याकुल हो रहे हैं। भूखे या फिर रूखी सूखी खाकर मेरे पर चले जा रहे हैं।
मैं रोज यही सोचती हूँ कि आज शायद ही कोई मजदूर मेरे ऊपर से गुजरेगा। लेकिन कारवाँ टूट नहीं रहा हैं। रोज मजदूर भाई-बहनों की पदचाप मेरे कानों में पड़ रही हैं। जिसे सुनकर मैं सुन्न हो जाती हूँ। न जाने क्या-क्या सोचने लगती हूँ। दिनभर उधेड़बुन में ही रहती हूँ। मजदूरों की देह से मेरी देह पर इतना पसीना पड़ रहा है कि चिलचिलाती धूप न हो तो दरिया की तरह बहने लग जाए। लेकिन पसीना सुखाने के बजाय चले जा रहे हैं। कोई पानी की बोतल या भोजन का पैकेट देने के लिए रोकता है,तब भी रुकते नहीं है चलते-चलते ही ले लेते हैं।
एक दिन तो वो मजदूर मेरे पर चलकर अपने घर जा रहे थे,जिन्होंने मेरा निर्माण किया था। उनके चरण अपने पर पाकर मैं धन्य तो हो गई। मगर मुझ पर लग रहे उनके चरणों के खून के धब्बे देखकर मेरे मुख से धन्यवाद तक प्रस्फुटित नहीं हुआ। उस समय उन्हें धन्यवाद से कहीं ज्यादा मरहम पट्टी की आवश्यकता थी।जो मैं चाहकर भी नहीं कर पाई। कर भी कैसे पातीमेरे पास रोड़ी,कंकड़,पत्थर,तारकोल के सिवाय कुछ भी नहीं है। जिनसे मरहम पट्टी नहीं,बल्कि घाव होते हैं।  काश,निर्जीव न होती,तो शायद कुछ न कुछ बंदोबस्त अवश्य करती। 

गर्मी व कूलर


3 Jun 2020

रोटी ‘दो जून’ की ही क्यों !


अभी 02 जून बिता,तो सबको ‘दो जून की रोटी’ वाला मुहावरा खूब याद आया। लेकिन आज तक यह समझ में नहीं आया कि रोटी दो जून की ही क्यों होती है दो जनवरी, दो फरवरी, दो मार्च,दो अप्रैल या दो मई की क्यों नहीं होती? जून में भी दो जून ही क्यूंएक या तीन जून की भी तो हो सकती थी। दो जुलाई की रोटी कहने में क्या बुराई हैं। क्या दो जुलाई पराई हैअगर यह पराई है,तो दो अगस्त या दो सितंबर की रोटी रख लेते। इनमें भी खोट थी,तो दो अक्टूबर या दो नवंबर-दिसंबर की  रोटी का मुहावरा बना देते।
रोटी के साथ सब्जी शामिल क्यों नहीं की गईजबकि रोटी और सब्जी का तो जन्म-जन्मांतर का साथ है। मुहावरा दो जून की रोटी-सब्जी हो जाता, तो क्या धरती-आसमान ऊपर-नीचे हो जाते हैंरोटी-सब्जी न सही,दाल-रोटी रख लेते। तब मुहावरा बनता ‘दो जून की दाल-रोटी’। और अगर तब भी दाल महंगी थी,तो चटनी सम्मिलित कर लेते। दो जून की चटनी-रोटी का मुहावरा और भी बेहतर लगता। वैसे भी दो जून की रोटी वालों के नसीब में चटनी-रोटी ही होती है। साग- सब्जी तो कभी-कभार ही खाने को मिलती हैं। 
दो जून तो आटे के किसी ब्रांड का नाम भी नहीं। ब्रांड होता,तो बात सहज समझ आती कि दो जून ब्रांड के आटे में जरूर कुछ क्वालिटी होगी, कि गूंथने और बेलने में आसानी रहती होगी,कि तवे पर गिरते ही रोटी खुदेई फूल के गोलगप्पा बन जाती होगी, कि खाते ही गप्प दने से पच जाता होगा। फिर तो उसका विज्ञापन भी आता ‘दो जून का आटा,खाते हैं बिरला-टाटा’। मगर ये ब्रांड-वांड़ का मामला लगता नहीं क्योंकि ये मुहावरा उस वक्त से है, जब बाजार घर में घुसा नहीं था।
इंसान रोज ही, मतलब पूरे साल, जनवरी से दिसंबर तक की हर तारीख को रोज़ी-रोटी के लिए परिश्रम करता है,मगर क्रेडिट कमबख्त दो जून को मिल जाता है कि ‘दो जून की रोटी कमाने को हाड़तोड़ मेहनत कर रहे हैं बाबूजी’।
आखिर वह किस वर्ष की सौभाग्यशाली दो जून थी,जो मुहावरा बन गई। कहीं ऐसा तो नहीं कि जून में बहुत गर्मी पड़ती है और गर्मी में मेहनत करने पर पसीना आता है, इसलिए पसीने से कमाई गई रोटी को कह दिया गया हो, ‘दो जून की रोटी’। मगर गर्मी तो मई में भी रहती है। फिर मई ने क्या बिगाड़ा था? हें जी?
खैर,बात दो जून की रोटी की हो रही थी। तो सवाल यह भी उठता है कि दो जून की रोटी मोटी हो या पतली,गोलमटोल हो या टेढ़ी-मेढ़ी,अधजली हो या अधपकी, जिसे जैसी मिल जाए,कोई उसे छोड़ता नहीं। हां,इसके लिए लोग घर-परिवार जरूर छोड़ देते हैं। खुद के ही देश में प्रवासी बन जाते हैं। जिस दो जून की रोटी के लिए,गांव छोड़कर शहर गए थे, लॉकडाउन में उसी रोटी के लिए मोहताज हो गए। शहर से वापस गांव भूखे प्यासे ही सैकड़ों किलोमीटर पैदल चले। मगर ये लोग जून में पैदल नहीं चले, बल्कि दो जून की रोटी के लिए अप्रैल और मई में पैदल चले। वैसे कुछ भी कहिए,पर भूख यह कभी नहीं देखती कि रोटी किसकी और कब की है।
यह सब शोध का विषय है। मगर इस पर शोध करे कौन? अपन तो करने से रहे क्योंकि अपन तो लेखक हो गए हैं। और जो आदमी एक बार लेखक हो जाता है, फिर वह किसी और काम का नहीं रहता।
वैसे दो जून की रोटी पर मंथन करते-करते अब मुझे तो भूख लग आई है। अगर आगे का शोध आप लोग कर लो, तो मैं जाकर रोटी खा लूं। कबीर दास जी कह गए हैं-‘रूखी-सुखी खाए के ठंडा पानी पीव,देख पराई चुपड़ी मत ललचावे जीव’।

1 Jun 2020

गर्मी,कूलर और असमंजस


पंखा गर्म हवा देने लगा है। जिसके नीचे लेटना तो दूर बैठ तक नहीं सकते। तुम हो कि सुनते ही नहीं। सुनकर अनसुनी कर जाते हो। क्या तुम्हें गर्म हवा नहीं लगतीबताइएबहरे हो क्याया फिर जान-बूझकर बन गए हो। जो कि बता भी नहीं रहे हो। गूंगा-बहरा बनने से पार नहीं पड़ेगी। मैं कोई आभूषण तो लाने के लिए कह नहीं रही हूं। न हाथी घोड़ा। न हवाई जहाज के लिए कह रही हूं। बस एक कूलर के लिए कह रही हूं। जो कि कोई लाख दो लाख का तो आएगा नहीं। यही कोई पांच-सात हजार रुपए का आएगा।’  
जब मेरी जीवनसंगिनी मुझसे यह कहा तो मैंने उसे समझाते हुए कहा,‘पंखा गर्मी की वजह से गर्म हवा फेंक रहा है। वरना यह पंखा इत्ती ठंडी हवा देता है कि इसके आगे तो एसी भी फेल है। कूलर की तो बिसात ही क्या है?’ 
यह सुनकर पत्नी बोली,‘उपलब्धि मत गिनाओं। तुम तो यह बताओं। कूलर लाना है या नहीं।
कूलर लाकर करेंगे क्याएक बार बरसात हो जाने दे। फिर देखना,यह पंखा ही कूलर बन जाएगा। इसे ही मीडियम पर चलाना पड़ेगा। चद्दर और ओढ़नी पड़ेगी।
यह मैंने पत्नी से कहा तो वह भृकुटी चढ़ाते हुई बोली, ‘इस खटारे पंखे की ज्यादा महिमामंडित मत करिए,वरना नीचे उतारकर कबाड़ी को बेच दूंगी।
तुझे पता भी है। यह पंखा कितना पुराना है। अब तक सिर्फ दो बार ही खराब हुआ है।’  
यह मैंने कहा तो वह गुस्से से लाल पीली हो गई और बोली,‘मुझे सब पता है। बताने की जरूरत नहीं है। जिसकी जरूरत है न उसके संदर्भ में तो बता नहीं रहे हैं। पंखे का गुणगान किए जा रहे हो। तुम तो सारी दोपहरी नीमड़ी तले बैठकर ताश पत्ती पीटते रहते हो। तुम्हें क्या पतागर्म हवा तो मैं खाती हूं न।
मैंने कहा,‘तू सीढ़ी लगा। मैं अभी दो बाल्टी पानी की छत पर डाल आता हूं। छत ठंडी होते ही देखना,पंखा ठंडी हवा नहीं देने लगे तो कहना।
वह बोली, ‘तुम मूर्ख हो या फिर मुझे मूर्ख समझते हो। दो बाल्टी तो दो मिनट में उड़ जाएंगी। दिख नहीं रहा धूप कित्ती तेज पड़ रही है। सूर्य की ओर देखा तक नहीं जा रहा है। एक दिन पानी डालने से क्या होगारोज-रोज तो डालने से रहे। छत पर डालने के बजाए कूलर लाकर उसी में डालिए न।
मैंने कहा, ‘कूलर तो ले आएंगे। पर उसे रखेंगे कहांइस छोटे से कमरे में रखने की जगह तो है ही नहीं। सारी जगह तो बेड,अलमारी और संदूक ने रोक रखी है।
पत्नी बोली,‘लेकर तो आए नहीं और रखने की पहले ही सोचने लग गए। जंगले के बाहर रख लेंगे।
तुम्हें पता भी है। जंगले के बाहर रखेंगे तो हवा अंदर पार ही नहीं होगी। जंगले की जाली बहुत ही बारिक है।
मेरी बात को बीच में ही काटती हुई पत्नी बोली, ‘जंगले की जाली काट लेंगे। तुम कूलर तो लेकर आओं।’ 
मैंने कहा,‘थोड़ी देर के लिए मान लीजिए कूलर आ ही गया। उसे जंगले के बाहर रख भी दिया। पर मुझे यह बताइए बाहर धूप से कूलर गर्म नहीं होगा क्यागर्म होने के बाद फिर वह भी गर्म हवा ही फेंकेगा। फिर तुम एसी के लिए कहोगी। एसी लाने की मेरी औकात नहीं है।
जिसकी औकात है न वो तो ला नहीं रहे हो और  बेमतलब की बातें बनाते जा रहे हो। सीधे-सीधे यूं ही क्यों नहीं कर देते कि कूलर लाने की औकात नहीं है। तुमसे अच्छा तो हमारा पड़ोसी ही सही है,जो कि अपनी बीवी के एक बार कहने पर ही कूलर लाकर लगा दिया। जबकि वह तो हमारे से भी गरीब है।यह कहकर पत्नी रसोई में चली गई और मैं सोच रहा हूं कि कूलर लाऊं या फिर नहीं लाऊं। अब आप ही बताइए।
मोहनलाल मौर्य