18 Feb 2018

पाठक की धमकी

मोहनलाल मौर्य  
मुझे मोबाइल पर किसी ने धमकी दी है। धमकी दी है तो अंजाम भी देगा। यह तो अंजाम के वक्‍त ही तय होगा,किसका क्‍या अंजाम होगा। ‘मार दिया जाए,कि छोड़ दिया जाए,बोल तेरे साथ क्‍या सलूक किया जाए?’ उस वक्‍त यह किसका बोल होगा तथा ‘बोल’ का ‘मोल’ क्‍या होगा। वैसे भी इस महंगाई में धमकी देने का धंधा मंदी में चल रहा है। जरा-सी बात पर छुरा पेट में घुस देते हैं। अक्‍लमंद भी दस रूपए के लिए जान लेने पर उतारू हो जाता है। बहरहाल तो खामोश रहने में भलाई है। अन्‍यथा धमकी की चटनी चटा दी जाएंगी। जिसे चाटकर उसके स्‍वाद का अहसास अभी हो जाएंगा। इस वक्‍त मेरे मुंह के अंदर छालों ने हमला बोल रखा है। धमकी की चटनी और छालों का आमना-सामना हो गया तो जीभ बिना कसूर के ही  लहूलुहान हो जाएंगी। पाठक की धमकी
सोचा मिली धमकी की सूचना पुलिस को इतला कर दूं, क्‍योंकि ‘जान है तो जहान है।’ बिना समय गवाए पुलिस थाने पहुंच गया। थानेदार साहब से घबराते हुए बोला, ‘साहब! अब आप ही कुछ कीजिए। वरना जिंदगी की पिच पर बिना रन लिए ही आउट हो जाऊंगा।’ यह सुनकर थानेदार साहब ने कहा कि घबराईए मत। आहिस्‍ता-आहिस्‍ता बताइए,  आखिरकार हुआ क्‍या है, तबी हम कुछ कर पाएंगे।
यह सुनकर मेरी सौ की स्‍पीड से चल रही सांसों पर ब्रेक लगाने के लिए,मैंने सांसों के ब्रेकर पर पैर रखा। धीरे-धीरे सांसों की गति कम हुई। रूकी नहीं। मैं बोला, ‘साहब! सुबह-सुबह भगवान का स्‍मरण कर रहा था। तबी मोबाइल थरथराया। भगवान से स्‍मरण टूटकर मोबाइल से स्‍मरण जुड़ा। कॉल रिसीव की,स्‍मरण मरण में बदल गया।’
‘अच्‍छा तो पहले यह बताओं कि तुम करते क्‍या हो?’
‘साहब! मैं तो एक अदना सा लेखक हूं। यदा-कदा लिखता हूं। पत्र-पत्रि‍काओं में लगभग रोज छपता हूं।’ ‘यदा-कदा लिखते होतो रोज कैसे छपते हो।’ ‘साहब! वह क्‍या है कि सप्‍ताह में एक रचना लिखता हूं और वहीं किसी ना किसी अखबार में रोज सप्‍ताह भर छपता रहता है। इसलिए रोज छपता हूं।’ ‘जरूरी तुम्‍हारी सम्‍पादकों से सांठगांठ होगी।’ ‘नहीं साहब! सांठगांठ नहीं हैं। उनकी ईमेल आईडी हैं। जिन पर रचना प्रेषित कर देता हूं। अगले दिन छप जाता हूं। अगले दिन नहीं,तो उससे अगले दिन छप जाता हूं। उससे भी अगले दिन नहीं छपु तो अन्‍यत्र भेज देता हूं। लेकिन सम्‍पादक की ओर कोई रिप्‍लाई नहीं आती।’
‘जरूर तुमने किसी के खिलाफ उल्‍टा-सीधा लिखा होगा।’ ‘साहब! उल्‍टा-सीधा का क्‍या मतलब? मैं तो सीधा लिखता हूं,आप चाहे तो मेरी हैंड राइटिंग देख सकते है।’ ‘अरे! मूर्ख मैं हैंड राइटिंग की बात नहीं कर रहा। किसी लेख-वेख में उल्‍टा-सीधा तो कुछ नहीं लिखा ना।’ ‘साहब! लेख तो मैं लिखता ही नहीं हूं।’
थानेदार साहब! झुंझलाते हुए बोले, ‘अबे तो तून अभी कहा ना मैं लेखक हूं। लेखक लेख नहीं लिखता तो ओर क्‍या लिखता है? भजन लिखता है क्‍या?’ ‘साहब मैं तो ‘व्‍यंग्‍य’ लिखता हूं।’ ‘तो किसी व्‍यंग्‍य में उल्‍टा-सीधा लिख दिया होगा।’ ‘साहब! व्‍यंग्‍य सीधा-सीधा थोड़ी लिखा जाता हैं। व्‍यंग्‍य तो उल्‍टा-सीधा ही लिखा जाता है।’
‘अब आया ना ऊॅट पहाड़ के नीचे। जरूर तुने सरकार के खिलाफ व्‍यंग्‍य कसा होगा।’ ‘नहीं साहब!’ ‘तो किसी राजनेता के खिलाफ...या किसी भू माफिया के खिलाफ... या किसी डॉन या चोर उचक्‍के के खिलाफ...।’ ‘नहीं साहब!’ ‘जरूर किसी वरिष्‍ठ या गरिष्‍ठ साहित्‍यकार के खिलाफ व्‍यंग्‍य कसा होगा।’ ‘नहीं साहब! व्‍यंग्‍य तो विसंगतियों पर लिखा जाता है।’ ‘तो तुझे अभी मैंने जो बताए उनमें विसंगतियां नहीं दिखती?’
‘दिखती है ना साहब!’ ‘तो लिखता क्‍यों नहीं?’ ‘लिखता हूं,साहब!’
‘अबे मुझे क्‍यूं कंफ्यूज कर रहा है। कभी कहता है नहीं लिखता हूं,साहब! कभी कहता है लिखता हूं,साहब! खैर छोड़। यह बताओं धमकी देने वाले ने क्‍या कहा था?’ ‘साहब! ठीक से याद नहीं,पर इत्‍ता जरूर याद है कि उसने यह कहा था कि अपने मन के मुताबिक मत कर वरना अंजाम बहुत बुरा होगा।’
‘तो तुमने क्‍या बोला?’
‘मैंने उससे कहा कि मैंने क्‍या गुनाह किया है?’ ‘फिर वह क्‍या बोला?’ थानेदार साहब ने यह मुझसे पूछा। ‘बोला क्‍या? कॉल कट गई या काट दी गई।’
थानेदार साहब! ने अपने मुखबिर को सूचित किया। एक घंटे बाद मुखबिर ने धमकी देने वाले का नाम,पता बता दिया। थानेदार साहब ने उससे बात की। उसने धमकी की यह वजह बताई, जो उस वक्‍त मेरे समझ में नहीं आ रही थी। थानेदार ने मुझसे कहा, ‘यह तुम्‍हारा प्रिय पाठक है। लो इससे बात करों।’ मैंने फोन लिया, ‘हैलों...लेखकजी मैंने धमकी नहीं हिदायत दी थी कि तुम जब भी लिखते हो अपना की रोना रोता रहते हो। कभी हमारी भी सुन लिया करों। रोजी-रोटी,रोजगार,महामारी,महंगाई,भ्रष्‍टाचार,की बात कर लिया करों। तुम्‍हें अपने रोने-धोने से,पुरस्‍कार पाने से, साहित्‍यक राजनीति से फुर्सत मिले तो कभी हमारें गांव आकर देखना। हमारें यहां पर पानी नहीं।बिजली नहीं। सड़क नहीं। अस्‍पताल नहीं। बैंक नहीं। स्‍कूल नहीं। आवागमन के लिए बस नहीं। गरीबी,भूखमरी,तथा बेरोजगारी से जनता त्रस्‍त और सरकार मस्‍त हैं। लेकिन तुम तो पुरस्‍कार के लिए लड़ते हो। अध्‍यक्षता के लिए भिड़ते हो। वरिष्‍ठता का बखान करते हो। कलम सिर्फ कागज पर घिसने के लिए नहीं होती। इसे संगीन बनाओं तो ही असर करती है।’ कहकर उसने फोन काट दिया।

उसकी बातें सुनकर मैं थाने से वापस आ गया। तब से मैं यह सोच-सोचकर कोमा में हूं कि अगर सारे पाठक ऐसे ही लेखकों को धमकाने लगे,उन्‍हें सच का आईना दिखाने लगे तो हम लेखकों का क्‍या होगा?

31 Jan 2018

वसंत अब ऑनलाइन ही मिलेगा

मोहनलाल मौर्य

वसंत वसंतपंचमी को परदेश से आया था। मैंने ही नहीं दीनू काका ने भी देखा था। देखा क्या था,उसने दीनू काका के पैर भी छूए थे। काका ने शुभाशीष भी दिया था-‘जुग-जुग जियों वसंतराज। यूं ही आते-जाते रहना। सदा यू हीं मुस्‍कराते रहों।’ वसंत समूचे मोहल्ले वासियों का चेहता हैं। हर साल इन्हीं दिनों में घर आता है। कपड़ों का बैग भरकर लाता हैं। वसंत को पीले वस्त्र बहुत प्रिय हैं। उसका रूमाल तक पीले रंग का होता है। सब उससे मिलना चाहते हैं। पर जबसे आया है, दिखाई नहीं दे रहा है। वसंत कल रामू काका पूछ रहे थे- ‘सुना है वसंत आया हुआ है?’ मैंने कहा-‘आपने ठिक सुना है।’ यह सुनकर वे बोले-‘तो फिर वह कहां है? मैंने तो उसे देखा ही नहीं और ना वह मुझे मिला है।’ इस पर मैंने उन्हें समझाते हुए कहा-‘ काका! वह आजकल आप से ही नहीं, किसी से भी मिलता-जुलता नहीं है।किसी ओर कि तो क्‍या क्‍यूं? लेकिन अपुष्‍ट खबर है कि जिनका वह अजीज हैं,उनसे ही रूष्‍ट हैं। ’
रामू काका चौंके-‘क्या कह रहे हो? वसंत ऐसा लड़का नहीं है। वह तो जब भी आता है, सबसे मिलता है। बड़े-बुजुर्गों का अदब करता। प्यार-प्रेम की वार्ता करता है। जरूर किसी कार्य में व्यस्त होगा। या हो सकता है सर्दी का टाइम हैं खांसी-जुकाम हो गई हो। परदेश का तथा यहां का वातावरण अलग-अलग हैं,सूट नहीं किया हो।’ काका कि उक्‍त कथ्‍य मेरे गले नहीं उतरा तो मैंने काका से कहा-‘काका! ऐसी बात नहीं। बात कुछ और ही है। ’ यह सुनकर रामू काका बिना किसी वक्‍तव्‍य के ही वसंत की खोज-खबर में वहां से चल दिया। वसंत गोधूली के समय रामू काका वसंत से मिलने उसके घर पहुंचे। पर वह वहां नहीं था। उसके मां-बाप बता रहे थे कि जबसे आया है, फेसबुक पर ही चिपका रहता है। पता नहीं क्या हो गया है? गुमसुम रहता है। पहले तो खेत-खलियान में भी जाता था। सरसों के पीले-पीले फूल बरसाते हुए आता था। सबसे मिलता-जुलता था। पल दो पल ही सही लेकिन सबसे प्‍यार भरी मीठी-मीठी बातें करता था। सबका दिल जीत लेता था तथा दिनभर खुश रहता था। अब तो मुरझाया सा रहता है और दिनभर खाट पर औंधे मुंह करके लेटा रहता हैं। दिनभर पता नहीं मोबाइल में क्‍या देखता रहता हैं। मोबाइल पर से नज़र हटाता ही नहीं है। हमें तो डर कहीं छोरे की दृष्टि कमजोर नहीं हो जाए।  
अगले दिन मैं गया तो वसंत अपने कमरे में बैठा फेसबुक पर लिख रहा था- ‘मैं वसंत हूं। परदेश से तुम्हारे लिए आया हूं। एक खास गिफ्ट लाया हूं। वैलेंटाइन डे पर मिलेगे...।’तभी उसे कमरे में मेरे दाखिल होने का भान हुआ। उसने गर्दन मेरी आरे घुमाई और बोला-‘आप और यहां। कैसे आना हुआ?’
मैंने कहा-‘भाई! आपसे मिलने आ गया। आप जबसे आए हो, मिले ही नहीं। आपको रामू काका भी पूछ रहे थे और खुशनुमा मौसमी काकी भी पूछ रही थी। सच क्‍यूं तो कईयों को तो यकीन नहीं है कि वसंत आ गया है। आखिरकार बात क्या है?’ वसंत बोला-‘बात-वात कुछ नहीं है। अभी तुम जाओं। मैं व्यस्त हूं। शाम को फेसबुक पर ऑनलाइन मिलते हैं। वहीं वार्तालाप करते हैं।’

मैं मन मसोसकर चला आया। रास्ते में रामू काका मिले। उन्होंने पुन: पूछा-‘वसंत मिला क्या? नहीं मिला तो कहां मिलेगा?’मैंने कहा-‘काका,वसंत तो अब फेसबुक पर ऑनलाइन मिलेगा।’

29 Jan 2018

मां आखिर मां होती है!

मोहनलाल  मौर्य
बच्चा ठोकर खाकर गिर जाए तो मां सौ काम छोड़कर उठाने दौड़ती है। भागकर उठाती है और सीने से लगा लेती है। देखती है कहीं चोट तो नहीं आई। संतान के खरोंच भी आ जाए तो मां का दिल दहल उठता है। मां की ममता निर्मल है। दया,करूणा की सागर है। मां आखिर मां होती है। चाहे सौतेली मां हो। चाहे धरती मां हो। मां का वात्सल्य अपनी संतान पर सदैव न्यौछावर रहता है। मां आखिर मां होती है
धरती मां भी धरती पुत्र से अगाथ प्रेम करती है। जिस तरह मां बच्चे को नौ महिने कोख में पालती है और जन्म देती है। उसी तरह धरती मां भी धरती पुत्र की फसल को अपनी कोख में पाल-पोसकर बड़ी करती है। धरती मां फसल बुवाई से लेकर कटाई तक। फसल की उसी तरह देखभाल करती है। जिस तरह एक मां अपने नवजात बच्चे की करती है। जब बच्चा रोता है तो मां उसे स्तनपान कराती है। उसे लोरी सुनाती है और जब बच्चा सो जाता है तो अपने गृहस्थी के कार्यों में जुट जाती है। इसी तरह धरती मां फसल को प्यास लगती है,तो पानी पिलाती है। भूख लगती है,तो खाद पदार्थ से पेट भरती है। आड़ी-तिरछी पड़ जाती है,तो आहिस्ता-आहिस्ता उठाती है और अपने आंचल में लपेटकर रखती है। मां के आंचल तले फसल भी को भी सुकून का अहसास होता है।

लेकिन जब अतिवृष्टि,ओलावृष्टि,अकाल से फसल चौपट होती है। तब धरती मां का कलेजा मुंह में आ जाता है। अपनी आंखों के सामने चौपट होती फसल और पुत्र की हालात देखकर धरती मां भी,अपनी मां की तरह विलाप में डूब जाती है। धरतीपुत्र चौपट हुई फसल की खातिर मुआवजे की मांग करता है,तो या तो गोली खानी पड़ती है या फिर लाठी चार्ज से भेंट होती है। यह देखकर मां पर क्या बीतती है। यह तो मां ही जानती है। मां आखिर मां होती है। मां आखिर मां होती है
अपने आंखों के सम्मुख पुत्र को तड़फता देखकर किस मां का कलेजा नहीं फटेगा। फिर यह तो धरती पुत्र है,जो कड़ी मेहनत करके हमारे लिए अनाज पैदा करता है। बेचारा दिन-रात जागता है और फिर भी फसल का भाव न्यूनतम मिलता है। न्यूनतम भाव से खुद की पूर्ति नहीं होती। सेठ-साहूकार और बैंक का कर्ज कैसे चूकता करें। ऐसी स्थिति में साल दर साल कर्ज पर कर्ज चढ़ता रहता है और एक दिन धरती पुत्र कर्ज तले दब जाता है। कर्ज तले दबे पुत्र को मां निकल नहीं पाती है। यह मलाल मां के सीने में ताउम्र दबा रहता है।

धरतीपुत्र भी खुशहाल जिंदगी जीना चाहता है। पर कर्ज का भार उठा नहीं पाता है। खुदकुशी का रास्ता जब वह अपनाता है। तब धरती मां खून की आंसू रोती है। मां की सेवा-सत्कार करने वाला बेटा,जब आत्महत्या करता है या कर्ज तले दबकर मरता है,तो उस मां पर क्या गुजरती है। उस मां से बेहतर कौन जानता होगा। मां आखिर मां होती है।

23 Jan 2018

आलोचक की मंशा पर फिरा पानी

मोहनलाल मौर्य
इस बात का किसकों भी भान नहीं था कि बैठक में आलोचक भी मौजूद है। भान होता भी कैसे? वह तो बैठक में लोगों के बीच मौजूद होते हुए भी अदृश्‍य था। उसके साक्षात दर्शन तो तब हुए जब उसने अच्‍छी खासी हो रही संगोष्‍ठी में घुसपैठ कर मुठभेड़ किया। शुक्र है कि मुठभेड़ में आयोजकों की ओर से जवाबी कार्यवाही में कहासुनी की फायरिंग नहीं हुई। अन्‍यथा बैठक कक्ष हाथापाई की घाटी में तब्‍दील हो जाता। जवाबी कार्यवाही विनम्रता एवं प्रत्‍युत्‍तर से दी गई। यह दृश्‍य था एक आयोजन के एक माह पूर्व हुई बैठक का। आगे देखिए,कार्यक्रम से पूर्व और उपरांत में क्‍या–क्‍या घटित होता है।आलोचक की मंशा पर फिरा पानी

अगले दिन कार्यक्रम की खबर अखबार में छपी। देख आयोजकों का नाम आलोचक जग गया और बिना हाथ-मुंह धोए ही काम पर लग गया। सबसे पहले तो उसने आयोजकों से सम्‍पर्क साधा। यह सोच के कि इनमें भी कोई ना कोई तो विभीषण होगा ही। जो मेरी सहायता कर देगा। आलोचक कोई मर्यादा पुरूषोत्‍तम राम तो था नहीं। जिसकी सहायता के लिए आयोजकों में से कोई विभीषण बनकर मदद करता। खुद ना आए तो क्‍या हुआ? उसने एकाध को अपने ओर खींचा। जिन्‍हें खींचा,वे आसानी से चले आए। चले इसलिए आए कि वे प्रलोभन की रस्‍सी से और खुशामद की मजबूत पकड़ से खींचे गए थे। आलोचक की मंशा पर फिरा पानी
दरअसल में सामाजिक सामूहिक आयोजन में आयोजक को समाज के कई पथों से गुजरना होता है। भांति-भांति पथों पर भांति-भांति लोगों से बिन मांगी राय साथ लेकर चलनी होती है। पीठ पर शिकायत भी लाद दी जाएं तो उसे भी ढोना होता है। इनसे अलहदा आलोचक है,जो आयोजक के गुणगान में उस बांसुरी में फूंक मारता रहता है। जिसमें से निंदनीय ध्‍वनि निकलती है। जिसे सुनकर आयोजक भाव-विभोर हो जाता है। आलोचक के बोल गुब्‍बारे की भांति आसमान को छूने के लिए मचलते हैं। लेकिन आसमान को छूने की को‍शिश में जो हालात गुब्‍बारे की होती है। वैसी ही हालात आखिर में उसके बोले गए ‘बोल’की होती है।
आयोजक आयोजन में चार चांद लगाने के लिए कई दिनों से ग्रह त्‍याग कर अपनी झोली उठाए द्वार-द्वार दस्‍तक देता हैं। आग्रह से भरी झोली में से आग्रह निकालकर प्रसाद की तरह लोगों को बांटता है तथा झोली फैलाकर योगदान की भीख मांगता है। कोई आग्रह के प्रसाद के बदले में स्‍वेच्‍छा से चंदे का दान देता है तो कोई सादर नमस्‍कार कर अलविदा कह देता है। तब कहीं जाकर आयोजन सफल हो पाता है।
रोज की तरह सूर्योदय ने उस दिन की भी खबर दी। जिस दिन का आयोजन था। आलोचक अपने फूंक मारे प्‍यारों के साथ सबसे आगे ही विराजमान था। समारोह की चकाचौंध एवं अपेक्षा से ज्‍यादा लोगों की तादाद को देख हैरान था। कि गई आलोचना से जो आशा थी वहीं आशा अपने प्रेमी के साथ निराशा का खत लिखकर भाग गई थी। अब ऐनवक्‍त पर करें तो क्‍या करें? आशा लौटकर आ नहीं सकती। आखिरी आलोचना मन मसोस कर चुपचाप कार्यक्रम देखना ही रह गई थी। जिसका उसने पूरे मनोयोग से उपयोग किया और समारोह समापन तक पूरा आनंद लिया। 

20 Jan 2018

अनुभवी को प्राथमिकता

मुझे यह कहकर साक्षात्‍कार से बाहर की राह दिखा दी कि ना तो अनुभव है और ना ही अनुभव प्रमाण पत्र है। हम अनुभवी को ही प्राथमिकता देते हैं। दुख बाहर किए जाने का नहीं है। बाहर तो कई बार मुझे यार-दोस्‍तों ने भी कर दिया हैं। कई बार कुपित होकर पिताजी ने बाहर कर दिया। बाहर करना था तो कह देते,तुम्‍हारे पास अप्रोच नहीं है। तुम्‍हारे पास कोई सोर्स नहीं है। तुम्‍हारे पास फलाना नहीं है। तुम्‍हारे पास डिमका नहीं है। ये क्‍या बात हुई कि तुम्‍हारे पास अनुभव नहीं है? अरे,अनुभव तो मि‍त्रों! मित्रों के पास भी नहीं था। फिर भी हवा में उड़े की नहीं। और ऐसा उड़े कि परिंदे भी जिंदगी भर में जितना नहीं उड़े कि वे पांच साल में उतने उड़ लिए। अनुभवी को प्राथमिकता
अनुभव को प्रमाण कि क्‍या जरूरत है? अनुभव तो मेरे अंदर कूट-कूट के भरा है। यकीन न हो तो कूट-कूट कर देख लो। सैम्‍पल लेकर देख लो भाई! रक्‍त का,मांस का,मज्‍जा का। बोटी-बोटी से अनुभव टपेगा। अंग-अंग से फड़क उठेगा। इसके बाद भी अगर प्रमाण लेना ही है तो एक कागज के टुकड़े पर लिखे ढाई आखर के प्रमाण से क्‍या लेना? इस तरह के प्रमाण के प्रमाण पत्र तो रद्दी के भाव में बहुत मिल जाते हैं। लेना ही है तो कुछ दिन अवसर देकर लीजिए। फिर मेरा प्रायोगिक अनुभव देखकर अपने आप आभास हो जाएंगा।
जब पैदा हुआ,बड़ा हुआ,अपने आस-पास देखा तो अनुभव मिला। क्‍या मालिया कर्जे से डूबता छोड़ अनुभव लेकर पैदा हुआ था? उससे सीखा कि ऋण लेकर घी पीना चाहिए। फिर देश-दुनिया देखी। सीखा कि पांव पूजाने का अनुभव। जरूरत पड़ी तो पांव उखाड़ने का अनुभव भी पाया। धवल धारियों से सीखा कि वक्‍त जरूरत पड़ने पर किस तरह पलटी मारी जाती है। पलटी मारकर किस तरह बाजी जीती जाती है। गधे को बाप बनाने का हुनर तो अब पुराना हो गया। आजकल तो मैं इतना सीख गया हूं कि शेर को बच्‍चा बना सकता हूं। हाथी को पहाड़ के नीचे ला सकता हूं। ऊंट को पहाड़ पर ले जा सकता हूं। उखड़े को गाड़ सकता हूं। गाड़े को उखाड़ सकता हूं। इतना सर्वतोमुखी सम्‍पन्‍नता के बाद भी बाहर कर देना कैसे हजम होगी। बताओं भला! आज के हालात में और देश में जीने के लिए ऐसे अनुभवों की दरकार है या नहीं? एक बार मौका देकर तो देखे,दम नहीं,खम देखें,पांच सितारा बुंलदी ना देखा दो तो सच्‍चा भारतीय नहीं। आप तो धार देखें,चाहे तो उधार देखें,और एक बार सेवा का मौका दे। अनुभवी को प्राथमिकता
मुझे पच्‍चीस तीस प्रतिशत अनुभव तो पुश्‍तैनी विरासत से मिला है। पच्‍चीस प्रतिशत संघर्ष करके अर्जित किया है और चौदह प्रतिशत साक्षात्‍कार देते रहने से हो गया है। कुलयोग किया जाए तो चौंसठ प्रतिशत होता है। मुझे मालूम है,आज के युग में चौंसठ प्रतिशत की कोई वैल्‍यू नहीं। इसलिए शेष छत्‍तीस प्रतिशत के लिए भी प्रयासरत हूं। वैसे देखा जाए तो छत्‍तीस प्रतिशत वाले नब्‍बे,पचानवे प्रतिशत वालों पर हुक्‍म चलाते हैं। साथ में वे ही अनुभव के आधार पर देश चला रहे हैं। और नब्‍बे,पचानवे वाले उनकी हां में हां और ना में ना मिलाकर भागीदारी निभा रहे हैं। अनुभव के आधार पर तो झोलाछाप डॉक्‍टर क्‍लीनिक चला रहे हैं। धड़ल्‍ले से मरीजों का इलाज कर रहे हैं और खूब पैसा कमा रहे हैं। बिना लाइसेंस धारी अनुभव के आधार पर मोटरसाईकल से लेकर ट्रक तक दौड़ा रहे हैं और ट्रैफिक पुलिस वाले उनका बाल भी बांका नहीं कर पाते। एक मैं हूं,जिसे चौंसठ प्रतिशत अनुभवी होते हुए भी बाहर की राह दिखा दी जाती है। बताओं! क्‍या यह सही है?
मुझे तो लगता है कि इन्‍हीं की वजह से मुल्‍क में मुझ जैसे अनुभवियों का हिमांक अनुपात हिमांक बिंदु से नीचे गिरता जा रहा हैं। जिसके चलते ज्यादातर अनुभवी स्‍वदेश छोड़कर विदेश के ओर पलायन कर जाते हैं और शेष बचे-खुचे यहीं रह जाते हैं। जिनके रहने के तमाम कारण हैं। जिनमें मुख्‍य कारण परिस्थिति है। और परिस्थिति अच्‍छे से अच्‍छे अनुभवी को बेरोजगारी का दामन थमा देती हैं। क्‍योंकि परिस्थिति को रोज दर-दर की ठोकरों से मिली सम्‍मान पूर्वक सेवा-सत्‍कार अच्‍छी लगती हैं।
जब बाहर निकला तो सोचा,मतलब अनुभव पाया कि अब मैं धक्‍के नहीं खाऊंगा। धक्‍के देकर आगे बढ़ना होगा। जिंदगी इतनी सरल नहीं मोहन बाबू कि सारी जिंदगी धक्‍के खाते रहो। देखना अब मेरे अनुभव का कमाल। ऐसा धमाल मचाऊंगा कि देखकर सब ढंग रह जाएंगे। जिन्‍होंने बाहर की राह दिखाई है ना वे भी देखकर दांतों तले उंगली चबाते रह जाएंगे।

19 Jan 2018

मूर्खता के नेपथ्‍य में समझदार

मोहनलाल मौर्य

आप भले ही उसे मूर्ख समझते होंगे। वह तो अपने आपको समझदार समझता है। समझता क्या है? समझदार है। रंगमंच पर उसका अभिनय देखकर उसे मूर्ख समझना आपकी ही मूर्खता हैं। वह मूर्खता के नेपथ्य में अभिनयचातुर्य है। आप भूल से भी उसे मूर्ख मत समझ लेना। यह समझ लो कि उसकी मूर्खता ही उसका पेशा है। वह अपने पेशे में सिद्धहस्त है। वैसे तो आप भी अपने पेशे में सिद्धहस्त होंगे। लेकिन मूर्खता में सिद्धहस्त होना तो कोई उससे ही सीखे। सीखे नहीं तो देखे कि वह किस तरह मूर्खता का अभिनय करता है। उस वक्‍त यह नहीं सोचे कि मूर्ख बनने के पीछे बेचारे की कोई मजबूरी होगी। मूर्खता उसकी मजबूरी नहीं,समझदारी है। जिसकी वह जान-बूझकर अदाकारी  करता है। जिसे देखकर आप समझ बैठते है कि वाकई में मूर्ख है। इसी वक्‍त आप सोचे-समझे तो उसकी मूर्खता की कलाकारी को समझ सकते है। लेकिन आप सोचते-समझते नहीं। क्‍योंकि आप तो अपने आपको समझदार समझते हो और आप जैसे समझदार सोचते-समझते थोड़ी है। आप तो जो देखते-सुनते है उसे ही सच समझते है। शायद आपने अभी तक यह नहीं सुनना होगा कि आंखों देखी और कानों सुनी भी कई बार सच नहीं होती। सुनी होती तो आप अब तक समझदारी छोड़कर उसकी मूर्खता की खोज में जुट गए होते।
लेकिन एक बात आप अब भी समझ लो। आप उसे मूर्ख कहकर लताड़ते रहते हो। वह निरुत्तर रहता है इसलिए। उसके निरुत्तर में प्रत्युत्तर होता है,पर वह देना नहीं चाहता। आप यहीं कहेंगे कि क्यों नहीं देना चाहता? वह आपको ही मूर्ख समझता है। एक दफा उसने मुझे बताया था कि उस मूर्ख से तर्क करना समझदारी नहीं बेवकूफी है। यह सुनकर एक बार तो मैं भी हतप्रभ रह गया। आपकी नजर में वह बेवकूफ है और उसकी नजर में आप बेवकूफ है। समझ में नहीं आता कि आप दोनों में से मूर्ख कौन है और ज्ञानी कौन है? वह या आप। वह लगता नहीं और आप होंगे नहीं। आप अपने आपको समझदार जो मान बैठे हो। आपको मूर्ख घोषित करना भी मूर्खता होगी। क्‍योंकि इसमें मूर्खता की ही तौहीन होगी। आपकी वजह से मूर्खता की तौहीन होना। आपकी समझदारी के मुंह पर तमाचा है। आपकी समझदारी पर तमाचा पड़ना आपकी तौहीन नहीं,समझदारी की तौहीन है। समझदारी की तौहीन होना समझदार से समझदारी का गायब होना है। इसलिए आप तो अपने आप में समझदार ही रहे।

कहीं आप मुझे भी तो मूर्ख नहीं समझ रहे है। कुछ लोग मूर्खो जैसी वार्ता करने वालों को भी मूर्ख समझ लेते हैं। आपने सुना भी होगा,देखों कैसी मूर्खो जैसी बात कर रहा हैं। इसलिए कह रहा हूं। आप मुझे भी मूर्ख समझ रहे है तो ठीक ही समझ रहे है। हो सकता है,मैं भी मूर्ख हूं। अगर मैं मूर्ख हूं तो मेरे लिए तो गर्व की बात है। अब आप कहेंगे इसमें गर्व वाली बात कहां से आ गई,जो आप गर्व कर रहे हो। मैं गर्व इसलिए कर रहा हूं कि मूर्खता में जो सुख-चैन है,जो आनंद है। वह भला समझदारी में कहां है? क्‍योंकि मूर्ख से कोई जल्‍दी सी उलझता नहीं है। उलझता है तो गुत्थी झुलझती नहीं। इसलिए मेरी तो मूर्खता में ही समझदारी है। मूर्खता में समझदारी का फायदा एक नहीं,अनेक है। एक तो ज्‍यादा माथापच्‍ची नहीं करनी पड़ती है। दूसरा अपना काम आसानी से हो जाता है। और किसी को संदेह भी नहीं होता कि बंदा मूर्ख नहीं समझदार है। इससे ज्‍यादा अपने को चाहिए क्‍या?
आप जिसे मूर्ख समझते होना उसे ही देख लो। आपसे अपना स्वार्थ नि:स्वार्थ करवाना उसकी फितरत है। चेहरे पर भोलापन और जुबान में मिठापन नैसर्गिक लगे ऐसे बोल बोलता है,जो उसका हुनर है। अजीबोगरीब वार्ता कर अपना उल्लू सीधा करना उसकी मूर्खता नहीं,चालाकी है। अब तो आप समझ गए ना कि वह मूर्ख नहीं है। बल्कि मूर्खता के नेपथ्‍य में डेढ़ गुणा समझदार है। कहना का तात्‍पर्य तो आप समझ ही गए होंगे। अगर आपको अब यकीन नहीं आ रहा है तो आप उसकी तहकीकात कर लीजिए। फिर आपको यकीन नहीं आए तो कहना। मैंने तो उसकी तरह मूर्खता का अभिनय करने वाले मेरे पड़ोसी गंगाराम का ही अनुसरण किया है। वह भी उसकी शरण में गए बैगर। क्‍योंकि गंगाराम शरणार्थियों को मूर्खता में समझदारी का ज्ञान नहीं परोसता। उसकी तो बगैर शरण में गए ही उसकी भावभंगिमा से ही मूर्खता में समझदारी का ज्ञान अर्जित किया जा सकता है। वह भी सावधानी पूर्वक। उसे भनक भी लग जाती है तो वह आप से पहले सावधान हो जाता है। और अहसास तक होने नहीं देता है। अहसास हो जाए तो मूर्खता में समझदारी का जो लिबास पहन रखा है वह उतर जाए।
अब भी आपके समझ में नहीं आया तो आपकी आप जानों। मेरा कर्तव्‍य समझाना नहीं बताना था,जो मैंने बताया दिया। समझदार को क्‍या समझाए? फिर आप तो मुझे समझदार ही नहीं डेढ़ गुणा समझदार लगते हो। लेकिन मेरी एक बात जरूर ध्‍यान रखएंगा। जिसमें आपकी भलाई है। बात दरअसल यह है कि अपनी समझदारी अपने पास ही रखिये। कहीं ओर काम आएंगी। यहां ही व्यर्थ कर दी तो कहीं ओर किससे काम चलाओंगे। क्‍योंकि समझदार होना तो बनता है पर समझदारी दिखाना कहां चलता है। जहां चलता है वहां चलाए। किंतु देखकर चलाए,कहीं कोई चालान नहीं काट दे। चालान कट गया तो समझ लो जुर्माना भरना ही पड़ेगा। और समझदारी दिखाने का जुर्माना कई बार बहुत महंगा पड़ता है। अब आप सोच लो। एक बार फिर कह रहा हूं मूर्खता में ही समझदारी है। समझदारी में तो खतरा भारी है और डेढ़ गुणा समझदारी की तो बात ही न्‍यारी।
                                  व्‍यंग्‍योदय अंक 06-2018


समीक्षा- आखिरकार विकास मिल गया



अरे भाई, मुझे भी झूठ बोलना सीखा दो




1 Jan 2018

28 Nov 2017

साहित्‍य सृजन में उत्‍कृष्‍ट कार्य के लिए मोहनलाल मौर्य का सम्‍मान




26 नवम्‍बर 2017 रविवार को थानागाजी में अखिल भारतीय रैगर महासभा जिला अलवर के तत्‍वाधान में आयोजित आठवां प्रतिभावान सम्‍मान समारोह में गांव चतरपुरा के मोहन लाल मौर्य को साहित्‍य सृजन में उत्‍कृष्‍ट कार्य करने पर राजस्‍थान अनुसूचित जाति आयोग के उपाध्‍यक्ष दर्जा उपमंत्री विकेश खोलिया एवं अखिल भारतीय रैगर महासभा के राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष एवं सेवानिवृत्‍त आईएएस अधिकारी भंवरलाल खटनावलिया के द्वारा प्रशस्ति प्रमाण पत्र एवं डा.भीमराव अम्‍बेड़कर का मोमेंटों देकर सम्‍मानित किया गया। मौर्य की रचनाएं देश के प्रमुख समाचार पत्र-‍पत्रि‍काओं में प्रकाशित होती रहती है। 
राजस्‍थान अनुसूचित जाति आयोग के उपाध्‍यक्ष विकेश खोलिया एवं अखिल भारतीय रैगर महासभा के राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष एवं सेवानिवृत्‍त आईएएस अधिकारी भंवरलाल खटनावलिया के द्वारा मोहन लाल मौर्य को साहित्‍य सृजन में उत्‍कृष्‍ट कार्य करने पर प्रशस्ति प्रमाण पत्र एवं डा.भीमराव अम्‍बेड़कर का मोमेंटों देकर  सम्‍मानित करते हुए ।

प्रतिभाएं समाज की धरोहरः भंवरलाल खटनावलिया

अनुसूचित जाति आयोग के उपाध्‍यक्ष विकेश खोलिया ने थानागाजी में रैगर छात्रावास बनाने की घोषणा की।मोहनलाल मौर्य चतरपुरा एवं घनश्‍याम बसेठिया चतरपुरा,अलवर  
अलवर। जिले के थानागाजी में स्थित राजकीय उच्‍च माध्‍यमिक विद्यालय के खेल मैदान में रविवार 26 नवम्‍बर 2017 को अखिल भारतीय रैगर महासभा जिला शाखा अलवर के तत्‍वावधान में आठवां प्रतिभावान सम्‍मान समारोह आयोजित किया गया।
कार्यक्रम की अध्‍यक्षता कर रहे अखिल भारतीय रैगर महासभा के राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष एवं सेवानिवृत्‍त आईएएस भंवरलाल खटनावलिया ने अपने सम्‍बोधन में कहा कि प्रतिभाएं समाज की धरोहर है। ऐसी धरोहर रैगर समाज की अनुकर‍णीय है,जो समाज की दिशा एवं दशा बदल देगी। उन्‍होंने कहा कि प्रति‍भाएं निरंतर प्रगति की ओर अग्रसर रहे और अपने माता-पिता,घर,परिवार,समाज का नाम रोशन करते हैं एवं बाबा साहेब डा. भीमराव अम्‍बेड़कर के पद चिह्रनों पर चलने का आह्वान किया। कार्यक्रम में मुख्‍य अतिथि राजस्‍थान अनुसूचित जाति आयोग के उपाध्‍यक्ष विकेश खोलिया ने पांडाल में उपस्थित लोगों को सम्‍बोधित करते हुए कहा कि हमें एकजुट होना होगा और समाज को अपनी ताकत दिखाकर बताना होगा हमारी तादाद कितनी है। जब तक  हमारी राजनैतिक में ज्‍यादा से ज्‍यादा भागीदारी नहीं होगी। तब तक हमारी आवाज वहां नहीं पहुंचेगी जा पहुंचनी चाहिए। इस मौके पर इन्‍होंने रैगर समाज अलवर के लोगों की मांग पर थानागाजी में जल्‍द ही रैगर समाज का छात्रावास बनाने की घोषणा की है।

             बाबा साहेब.डा.बी.आर.अम्‍बेड़कर के छायाचित्र के समक्ष दीप प्रज्‍वलित के दौरान अतिथिगण

कार्यक्रम में सर्वप्रथम लोगों को सम्‍बोधित करते हुए राष्‍ट्रीय प्रचार-प्रचार सचिव एवं रघुवंशी पत्रि‍का के सम्‍पादक मकेश कुमार गाडेगावलिया ने अखिल भारतीय रैगर महासभा के द्वारा किए गए सामाजिक कार्यों के बारे में बताया एवं आगामी कार्यों के बारे में विचार वक्‍त किए। कार्यक्रम में विशिष्‍ठ अतिथि दिल्‍ली के पूर्व महापौर योगेन्‍द्र चांदोलिया ने बालिका शिक्षा को बढ़ावा देने का आह्वान किया। इसी क्रम में विशिष्‍ठ अतिथि मुख्‍य श्रेत्र‍ि‍य प्रबधंक दी ऑरियन्‍टल इंशोरेंस क.लि. के दयानन्‍द सक्‍करवाल ने कहा कि रैगर समाज का उत्‍थान करने के लिए हमें शिक्षा पर ज्‍यादा से ज्‍यादा फोक्‍स करना होगा। विशिष्‍ठ अतिथि अखिल भारतीय रैगर महासभा के प्रदेशाध्‍यक्ष डा.एस.के.मोहनपुरिया ने रैगर समाज को सामाजिक,आर्थिक,एवं शैक्षिक, रूप से मजबूत करने पर बल दिया। इन्‍होंन ने कक्षा 12 वीं विज्ञान वर्ग में 98 प्रति‍शत अंक अर्जित करने वाले पुष्‍पराज भारती की भूरी-भूरी प्रशंसा की और बच्‍चों से कहा कि आपको भी पुष्‍पराज भारती का अनुसरण करना चाहिए। कार्यक्रम में विशिष्‍ठ अतिथि प्रधान आयुक्‍त दिल्‍ली सी.एम.चांदोलिया ने अपने सम्‍बोधन में कहा कि समाज अपने वोट की अहमियत समझनी चाहिए। जांच-परख कर ही मतदान करें। इससे पूर्व कार्यक्रम की शुरूआत सभी अतिथियों ने बाबा साहेब डा.भीमराव अम्‍बेड़कर के छायाचित्र के समक्ष दीप प्रज्‍वलित करके की। कार्यक्रम का मंच संचालन अखिल भारतीय रैगर महासभा जिला अलवर के जिला सचिव एवं स्‍वतंत्र पत्रकार,युवा व्‍यंग्‍यकार मोहनलाल मौर्य निवासी चतरपुरा ने एवं पूरन मल रातावाल मैंड ने किया। इस मौके पर विशिष्‍ठ अतिथि अखिल भारतीय रैगर महासभा के युवा प्रकोष्‍ठ प्रदेशाध्‍यक्ष भानू खोरवाल,महिला प्रकोष्‍ठ की प्रदेशाध्‍यक्ष तारा देवी बेनिवाल,पूर्व शिक्षा उपनिदेशक ज्ञानचंद मौर्य, अखिल भारतीय रैगर समाज धर्मशाला रामदेवरा एवं अखिल भारतीय रैगर महासभा दिल्‍ली के प्रदेशाध्‍यक्ष नेतराम पिंगोलिया ने भी उपस्थि‍त लोगों को सम्‍बोधित किया। कार्यक्रम का समापन जिलाध्‍यक्ष तोताराम मौर्य ने सभी का आभार प्रकट करके किया।
मंच पर विराजमान अतिथिगण 

इन भामाशाहों का रहा विशेष सहयोग 
कार्यक्रम में भोजन व्‍यवस्‍था खैराती लाल मौर्य एवं सुंदरलाल मौर्य निवासी नरहैठ,शिल्‍ड,मोमेन्‍टों खरकड़ी कला सरपंच शकुंतला देवी सक्‍करवाल एवं प्रमुख समाज सेवी रतनलाल सक्‍करवाल खडकड़ी कला, पानी की व्‍यवस्‍था नत्‍थूराम बंदरवाल थानागाजी,माइक एवं साउण्‍उ की व्‍यवस्‍था धीरोड़ा सरपंच अनिता देवी  एवं नवल किशोर जलुथरिया,फोटो स्‍टूडियों जीआर फोटो स्‍टुडियों थानागाजी के गौतम सक्‍कर वाल एवं राहुल तौनगरिया भांगडोली का विशेष सहयोग रहा है।

इस अवसर पर प्रमुख समाजसेवी रतनलाल सक्‍करवाल, अखिल भारतीय रैगर महासभा जिला अलवर के जिला वरिष्‍ठ उपाध्‍यक्ष नवल तौनगरिया भांगडोली,युवा प्रकोष्‍ठ के जिलाध्‍यक्ष रामप्रताप खोरवाल,जिला महासचिव मोहनलाल सांटोलिया,जिला उपाध्‍यक्ष ओमप्रकाश जाजोरिया डहरा,जिला सचिव सेडूराम मौर्य,नरहैठ, कोषाध्‍यक्ष शम्‍भू दयाल सक्‍करवाल खरकड़ी कला, जिला प्रवक्‍ता अनुज कुमार जलु‍थरिया नरहैठ, थानागाजी ब्‍लॉक अध्‍यक्ष विजय सिंह मौर्य नरहैठ, बानूसर ब्‍लॉक अध्‍यक्ष मालेराम शेरसिया, मालाखेड़ा ब्‍लॉक अध्‍यक्ष भोमाराम खटुम्‍बरिया, महिला प्रकोष्‍ठ की जिलाध्‍यक्ष रूपा देवी, रामजीलाल जाजोरिया डहरा, प्रधानाचार्य सरदार सिंह जलुथरिया अजबगढ़,अनिल मौर्य चतरपुरा,जयपुर ग्रामीण के कांग्रेस युवा प्रकोष्‍ठ के लोकसभा प्रवक्‍ता एवं अखिल भारतीय रैगर महासभा के राष्‍ट्रीय सदस्‍य नीरज कुमार तौनगरिया,भारत भूषण भारतीय कराणा,गणराम सक्‍करवाल कराणा,पूर्व जिलाध्‍यक्ष गोपीराम जाजोरिया,मुंडावरा,पंचायत समिति सदस्‍य राजेन्‍द्र प्रसाद रैगर,महिमा सांटोलिया अजबपुरा,सेवानिवृत्‍त व.अ.चन्‍दर लाल मौर्य चतरपुरा, दीनदयाल मौर्य बांधका, उद्योगपति जीवनराम मौर्य अलवर, पवन कुमार मौर्य चतरपुरा, राजेन्‍द्र धुडि़या बसई जोगियान, कमलेश कुमार बसेठिया चतरपुरा,मनुज कुमार जलुथरिया नरहैठ,नवीन खजोतिया नारायणपुर,दिनेश कुमार मौर्य नरहैठ,चुन्‍नी लाल सौकरिया अम्‍बेड़कर नगर,रामनिवास सांटोलिया अजबपुरा,पूर्व सरपंच अम्‍बेड़कर नगर रोहिताश्‍व सौकरिया,बीईओं बंशीधर खोरवाल अलवर,चन्‍द्र पाल धूडि़या नाराणयपुर,धीरोड़ा के पूर्व सरपंच रामगोपाल जलुथरिया,हुक्‍म चंद सक्‍करवाल बलदेवगढ़,दिनेश कुमार सक्‍करवाल सूरतगढ़,मूलचंद देवतवाल टहला,रमेश चन्‍द तौनगरिया सूरतगढ़,राधेश्‍याम सांटोलिया अजबपुरा,जगमोहन मौर्य माधोगढ़, शंकर सौकरिया अकबरपुर,राकेश उदेणिया माधोगढ़,नत्‍थूराम बंदरवाल थानागाजी, गौतम बंदरवाल थानागाजी,जगदीश बंदरवाल थानागाजी,राजेन्‍द्र जाजोरिया मुंडावरा,भीवाराम खजोतिया नाराणयपुर सहित समाज के गणमान्‍य लोग मौजूद थे।
पांडाल में उपस्थित रैगर समाज के लोग 

पांडाल में उपस्थित रैगर समाज के लोग 
विज्ञान वर्ग में 98 प्रतिशत अंक अर्जित करने वाले पुष्‍पराज भारती का पुष्‍पमालओं ,प्रशस्ति पत्र,शिल्‍ड देकर सम्‍मानित करते हुए मंच पर उपस्थित अतिथिगण 

बालिका को सम्‍मानित करते हुए दिल्‍ली के पूर्व महापौर योगेन्‍द्र चांदोलिया 



6 Oct 2017

तबादले ने बदली आबोहवा

मंगूरामजी तबादला निरस्‍त की जुगत में है। लेकिन जुगाड़ लग नहीं रहा। जुगाड़ लग जाए तो मंगूरामजी गांव के गांव में ही रह जाए। दरअसल मंगूरामजी का तबादला गांव से मीलों दूर शहर में हो गया है। अब जिसने पूरी सेवाकाल गांव की आबोहवा में व्‍यतीत की हो। उसे तो शहरी आबोहवा अजीब सी लगेगी। हां,मंगूरामजी के साथ गांव की आबोहवा का भी तबादला हो गया होता तो वे अब से पहले कार्यभार ग्रहण कर लेते। क्‍योंकि गांव की आबोहवा उनके अनुकूल रही है। कभी प्रतिकूल हुई नहीं। जब भी होने की कोशिश की है उससे पहले बंदोबस्‍त हो जाता था। अब वे आबोहवा का तो तबादला करवा नहीं सकते। खुद का निरस्‍त हो जाए,वहीं गनीमत है।तबादले ने बदली आबोहवा
मंगूरामजी की ना तो मंत्रीजी से जान-पहचान और ना ही मंत्रीजी मंगूरामजी को जानते हैं। जो जाते ही तबादला निरस्‍त कर दे। चुनाव दौर में जरूर जानते-पहचानते होगे। क्‍योंकि उस वक्‍त तो अनजान भी जान-पहचान वाला हो जाता है और चुनाव जीतने के बाद चिरपरिचित भी अनजान हो जाता है। मंगूरामजी ठहरे सीधे-साधे व्‍यक्ति। कभी राजनीति से तादात्‍म्‍य रहा नहीं। ईमानदारी से नौकरी की है। लेकिन कभी अपने बाल-बच्‍चों की ख्‍वाहिश पूरी नहीं की है।
तबादला निरस्‍त के चक्‍कर में मंगूरामजी की चप्‍पल घिस गई। गांव के मुखिया से लेकर प्रधान तक और प्रधान से लेकर क्षेत्रीय विधायक तक कई चक्‍कर लगा मारे। इन सब से विन्रम आग्रह भी कर लिया और आबोहवा का जिक्र भी कर दिया। आग्रह स्‍वीकार कर लेते हैं पर उपकार में आश्‍वासन थमा देते हैं। जो‍ कि किसी काम न काज का। बस थोड़ी देर खुशमिजाज का। उसके बाद फिर से नेताजी की ज़बान का। क्‍योंकि आश्‍वासन ही तो है,जो आसानी से चिपका दिया जाता है। वैसे भी नेताजी का आश्‍वासन देने में क्‍या जाता है? बहुतायत में पर्याप्‍त है। जो कभी समाप्‍त ही नहीं होता।
अंत में मंगूरामजी गंगारामजी के पास पहुंचे,जो मंत्रीजी का खास है। खास से आस रहती है कि तबादला निरस्‍त हो जाएंगा। गंगारामजी बोले- ‘बताए कैसे आना हुआ।’ मंगूरामजी ने अपनी दुविधा बताई। सुनकर गंगारामजी ने भी सहानुभूति दिखाई। समझाते हुए कहा-‘बहरहाल तो तुम्‍हारा तबादला निरस्‍त हो नहीं सकता।’ यह सुनकर मंगूरामजी एक शब्‍द ही बोल पाए-‘क्‍यों?’ ‘क्‍योंकि तुम्‍हारी जगह मंत्रीजी के साले का तबादला हुआ है। इसलिए।’ यह सुनकर मंगूरामजी चुपचाप ही वहां से चले आए और अगले दिन शहर के लिए बोरिया-बिस्‍तर गोल कर ली। उस वक्‍त मंगूरामजी ने भी यह सोचा होगा-काश हम भी मंत्रीजी खास होते तो आज गांव की आबोहवा में श्‍वास ले रहे होते। पर अब तो जो खास है वहीं पास है और जो पास है वहीं खास है। फिर चाहे वह अंगूठाछाप क्‍यों ना हो? मंत्रीजी उसकी सुनेगा,जो उसका खास है। कुछेक दिन तो शहरी आबोहवा में घुटन सी हुई। बाद शहरी आबोहवा इत्‍ती अच्‍छी लगने लगी कि गांव की आबोहवा का जिक्र करना ही भूल गया और कहने लगा कि मंत्रीजी ने यहां तबादला करके  बहुत अच्‍छा किया। अन्‍यथा मैं शहरी आबोहवा से महरूम रहता। इसीलिए मैं मंत्रीजी को धन्‍यवाद देता हूं।


अच्‍छाई और बुराई की लड़ाई

सुबह-सुबह ही बुराई और अच्‍छाई लड़ने लगी। लड़ती-झगड़ती हाथापाई पर उतर आई। जिन्‍हें देखकर भीड़ इकट्ठी हो गई। जो उन्‍हें छुड़ाने के बजाय खड़ी-खड़ी तमाशा देखने लगी। मैं दोनों के बीच-बचाव में बीच में इसलिए नहीं कूदा कि  कहीं बीच-बचाव में एकाध मुक्‍की मेरे नहीं पड़ जाए। इसलिए मैं भी ओर की तरह भीड़ का ही हिस्‍सा बनकर ही रह गया। मेरी तरह जो भी आ रहा था, वह भीड़ का हिस्‍सा बनकर भीड़ ही बढ़ा रहा था। छुड़ाने के लिए कोई आगे नहीं आ रहा था।अच्‍छाई और बुराई की लड़ाई
जो आ रहा था,वहीं जेब से मोबाइल निकालकर वीडियों बनाने में मशगूल होता जा रहा था। मैंने एक सज्‍जन से पूछा-भाई ! वीडियों क्‍यों बना रहें है? देखने के लिए बना रहे है,उसने कहा। मैं फिर बोला-जब लाइव ही देख रहे हो तो विडियों की क्‍या जरूरत है,भाई। वह बोला-बस,यूं ही। यूं ही क्‍यों?मैंने पूछा। तो वह बोला-फेसबुक पर वायरल करूंगा। तुम्‍हें आपत्ति है क्‍या? मुझे भला क्‍या आपत्ति है? पर किसी की निजता को मोबाइल में कैद करना अच्‍छी बात थोड़ी है। जरा सोचिए। वह बोला-सोचना क्‍या है? देखना है,जिसे लोग देखेंगे। लोग देखेंगे तो लाइक,कमेंट्स की भरमार होगी। मैं बोला-भाई! मेरा अभिप्राय यह नहीं है,जो आप समझ रहे है। मेरा अभिप्राय है कि कल कोई आपकी निजता को भंग करें तो आप क्‍या सोचेंगे? यह सुनकर वह निरुत्‍तर हो गया और मोबाइल जेब में रखकर वहां से खिसक गया।
हालांकि पता तो मुझे भी नहीं है। दोनों किस बात पर लड़ रही हैं,पर भीड़ में से एक भाई साहब! बता रहे थे कि अच्‍छाई ने बुराई को यह कह‍ दिया कि आज रावण दहन के पुतले के साथ तू भी जलकर खाक हो जाएंगी। बस,यह सुनकर बुराई आग बबूला हो गई और गालियां देने लगी। जब बुराई बुरी-बुरी गांलिया निकालने लगी तो अच्‍छाई से रहा नहीं गया तथा उसने उसकी चोटी पकड़कर दो-चार थप्‍पड़ रसीद कर दी। फिर क्‍या था? दोनों में गुत्‍थमगुत्‍थी हो गई। दोनों की दोनों लड़ती-झगड़ती बीच सड़क पर आ गई। इन्‍हें देखकर आप-हम भी जुट गए। अफसोस कि अब भी छुड़ाने को कोई आगे नहीं आ रहा है।
लड़ती हुई बुराई कह रही है कि तू अच्‍छाई होकर भी क्‍या कर पाई? मैं देख बुरी होकर भी कहां से कहां पहुंच गई। तू समझती है कि रावण के पुतले के साथ मैं भी जलकर खाक हो जाती हूं। मूर्ख मैं जलती ही नहीं,साइड से निकल जाती हूं। यह तो मेरी कला है। जो आंखों में धूल झोंककर निकल जाती हूं। एक बार तू मुझे छोड़कर देख। फिर बताती हूं। मैं क्‍या बला हूं। अच्‍छाई उसे छोड़ी तो नहीं,पर बोली- तू चाहे जो बला हो। लेकिन मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकती। बुराई तू बुरी है और बूरी ही रहेंगी और आज मैं तूझे तेरी औकात बताकर ही रहूंगी। बुराई छुड़ाने का बार-बार जतन तो कर रही थी। लेकिन कामयाब नहीं हो पा रही थी। इसलिए भला-बुरा कही जा रही थी। जिसका अच्‍छाई मुंहतोड़ जवाब दे रही थी। यह तो शुक्र है कि वक्‍त पर अच्‍छाई की बहिन भलाई आ गई और बुराई का भाई बुरा आ गया। जिन्‍होंने आते ही दोनों को अलग-अलग कर दिया। अन्‍यथा दोनों एक-दूसरी की जान लेने पर तुली थी। ज‍बकि भीड़ तमाशबीन ही खड़ी थी।