1 Mar 2018

टोली के संग होली का आनंद


मोहनलाल मौर्य
मुझे तो अकेले होली खेलना कतई पसंद नहीं है। मैं घर से अकेला होली खेलने निकलता हूं तो घर से निकलते ही दबोच लेते हैं। टोली की टोली तैनात जो रहती हैं। गत वर्ष सीना तानकर होली दंगल में उतरा था। पर जो हाल हुआ था वह मैं ही जानता हूं। होली दंगल में उतरते ही ऐसी पटकनी दी कि चारों खाने चित आया। रंग-गुलाल से सराबोर होकर घर आया और आकर आईने में चेहरा देखा तो आईना भी मुझ पर हस रहा था। जो ओर दिनों खामोश रहता था। आईने से झूठ भी नहीं बोल सकता। उसे सब पता रहता है। वह वहीं बताता है जो खुद देखता है और आईना ही तो है,जो सच बोलता है। खैर,छोड़ों। होली पर्व ऐसा तो होता आया है। पर जो टोली बनाकर होली खेलने में मजा आता है वह भला अकेले में कहां आता है? टोली के संग होली  का आनंद
होली पर टोली अनायास ही बन जाती है। टोली बनते ही पूरी की पूरी टोली जिस गली से निकलती है तो अच्छे-अच्छों की रंग-गुलाल फीकी पड़ जाती है। बंदा सोचता रह जाता है कि किसके रंग-गुलाल लगाऊं और किसके नहीं लगाऊं। वह एक के लगाएंगा तो उस पर पूरी-पूरी टोली हमला कर देती हैं। इसलिए बचकर निकलना ही मुनासिब समझता है। पर उसका बचना नामुनासिब है। ट्रैफिक हवलदार से बचकर निकल सकते हैं। पर होली पर टोली से बचकर निकलना मुमकिन नहीं नामुमकिन है। क्योंकि उसके पीछे ग्यारह मुल्कों की पुलिस नहीं। बल्कि गली-मोहल्ले के वे लडक़े होते हैं,जो एक साथ टूटकर पड़ते हैं। ऐसा रंगते है कि वह भी टोली में शामिल हो जाता है।
जब टोली की हुड़दंग और होली की मस्ती मिल-बैठते हैं। तब पिचकारी पिचक जाती है और काला पेंट परवान चढ़ जाता है। रंग-गुलाल मुंह ताकते रह जाते हैं। सोचते है कि किसी खूबसूरत लोहे पर जाकर तो मुंह काला नहीं करता। अपुन के पर्व पर आकर अपनी टांग फंसा देता है,कमबख्त कहीं का। होली पर टोली वालों के सम्मुख कोई समझदारी दिखाता है,तो वे कीचड़ को भी रंग-गुलाल समझकर उसके चेहरे पर पोत देते हैं। इनका मानना है कि कीचड़ में कमल खिल सकता है तो कीचड़ से होली खेलने में क्या बुराई है? जो समझदारी नहीं दिखाता है और हंसी-खुशी से टोली के संग होली खेलता है,उसे रंग-गुलाल से सराबोर कर देते हैं। फिर उसका चेहरा नहीं,उसके सफेद दंत भी रंग-बिरंगे दिखते हैं।
अबकी बार मैं भी टोली के संग होली दंगल में उतरुगा। इसके लिए चाहे मुझे गठबंधन क्यों ना करना पड़े? जब राजनैतिक पार्टियां ही चुनावी दंगल में गठबंधन करके उतर सकती हैं,तो भला मैं क्यूं नहीं होली दंगल में उतर सकता? देखना मैं भी किसी ना किसी टोली से गठबंधन करके होली पर ऐसा धमाल मचाऊंगा की सब मेरे रंग में रंग जाएंगे। देखने वाले देखते रह जाएंगे और रंग-गुलाल लगाने वाले रंग-गुलाल लगाकर चले जाएंगे।

24 Feb 2018

सारथी बालिका अभियान एक सार्थक पहल

चर्चित तथा दबंग आईपीएस पंकज चौधरी ने की पहल  
मोहनलाल मौर्य 
एक रिपोर्ट के मुताबिक राजस्थान में वर्ष 2015 में 2215 महिला पुलिसकर्मी सूबे के 861 थानों पर तैनात थी। वही सूबे में होने वाले महिलाओं के खिलाफ अपराध पर दृष्टि डालें, तो पुराने आंकडे ही चौंकाते है। फ़िर ऐसे में आज के परिवेश में महिला सुरक्षा की सूबे में क्या स्थिति होगी, इसका अंदाजा 2012 के आंकड़ों से लगाया जा सकता है। सूबे में 2012 में बलात्कार के दो हज़ार से अधिक मामले दर्ज हुए, तो 2014 में लगभग 3800। ऐसे में राज्य पुलिस औऱ स्टेट क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की सार्थक पहल सारथी अभियान बालिकओं को पुलिस के क्षेत्र में आने के लिए प्रोत्साहित करने का बेहतर जरिया हो सकता है। जो जयपुर में महिला दिवस के मौके पर चर्चित, दबंग आईपीएस अधिकारी पंकज चौधरी के नेतृत्व में शुरू होगा। इस सारथी अभियान का मुख्य उद्देश्य बालिकाओं को पुलिस प्रशिक्षण देना है। जिसमें अनुमान के मुताबिक सूबे की लाखों महिलाएं और बालिकाएं हिस्सेदारी लेंगी। यह सारथी टीम जहां पुलिस बल के कार्यों के बारे में इस अभियान के माध्यम से समझाएगी। वहीं सूबे के लोगों औऱ पुलिस बल के बीच सामंजस्य स्थापित करने का कार्य भी करेंगी।


वैसे राष्ट्रीय स्तर पर पुलिस बल में महिलाओं की बेहतर उपस्थिति सुनिश्चित करने की पहल 2009 में मनमोहन सिंह सरकार ने किया था। जब सरकार ने कहा था, कि सभी केंद्र शासित प्रदेशों और राज्य सरकारों में कम से कम पुलिस बल में महिलाओं की संख्या 33 फीसदी की जाए। पर यह महिलाओं के अधिकार के प्रति रहनुमाई व्यवस्था की अचेतन अवस्था का परिणाम है, कि महिला अपराधों में वृद्धि 2018 आते-आते काफ़ी तेज़ी के साथ बढ़ रही है, लेकिन पुलिस बल में महिलाओं की संख्या में कोई विशेष इज़ाफ़ा होता नहीं दिख रहा। ये बात साबित करती है, कि हमारा समाज महिलाओं के प्रति संवेदनहीनता का शिकार तो है ही, रहनुमाई व्यवस्था भी महिलाओं को त्वरित न्याय औऱ भय मुक्त वातावरण देने के प्रति कितनी सज़ग है? इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है, कि देश में सिर्फ़ 586 महिला पुलिस थाने हैं, यानि हर जिले में एक महिला पुलिस थाने भी नहीं क्योंकि देश में लगभग 641 जिले हैं। यह आलम उस वक्त है, जब देश में अपराध सबसे ज़्यादा महिलाओं के खिलाफ ही होते हैं। 

              इसके साथ 2014 की रिपोर्ट के मुताबिक देश में महिला पुलिसकर्मियों की संख्या काफी कम है। जो  चिंताजनक स्थिति बयां करती है। 2014 की रिपोर्ट के अनुसार देश में कुल 17,22,786 पुलिस कर्मियों में से महिला पुलिस कर्मियों की संख्या सिर्फ़ 6.11 फीसदी है। फ़िर ऐसे में महिला सशक्तिकरण की बात धरातल पर कैसे आ सकती है। विचारणीय तब यह स्थिति ओर व्यापक हो जाती है, जब पता चलता है, महाराष्ट्र के साथ ओड़िशा, मध्यप्रदेश, तमिलनाडु, राजस्थान, गुजरात, सिक्किम,  झारखण्ड औऱ  त्रिपुरा जैसे राज्यों में महिलाओं के लिए 30 फ़ीसद या उससे अधिक का पद आरक्षित है। फ़िर हमारी रहनुमाई व्यवस्था इस बात का आंकलन क्यों नहीं करती, कि क्या कारण है। जिसकी वज़ह से महिलाओं की संख्या इतनी पुलिस बल में कम क्यों है। जो महिलाएं खुद पुलिस में है, वो जब ख़ुद मानती है, कि महिलाएं पुलिस बल में भर्ती नहीं होना चाहतीं, तो इसका कारण सरकारें पता क्यों नहीं करती। पुलिस में कार्यरत महिलाओं के बीच किए जाने वाले सर्वे  में यह निष्कर्ष निकलता रहता है, कि महिलाएं पुलिस बल में भर्ती होने से इसलिए कतराती है, क्योंकि उन्हें टॉयलेट जैसी मूलभूत सुविधा के अभाव आदि का सामना करना पड़ता है। इसके साथ अन्य कारण भी महिलाओं को पुलिसकर्मी बनने से रोकते हैं। साथ में महिला पुलिसकर्मियों को लैंगिक भेदभाव का सामना करना पड़ता है। तो अगर राजस्थान के जयपुर से महिलाओं और बालिकाओं को पुलिस प्रशिक्षण देने की शुरुआत आगामी 8 मार्च से हो रहीं है। तो क्यों न सूबे से ही ऐसी अलख निकले जिससे देश भर में पुलिस बल में महिलाओं की संख्या बढ़ाई जा सकें। अगर महिलाओं की संख्या बढ़ेगी, तो महिलाओं के प्रति अपराध भी कम होंगे, साथ में सूबे की आधी आबादी को अपने आप पर घटित आपबीती सुनाने में दिक्कत। तो अगर सारथी अभियान के माध्यम से सीधा संवाद अवाम से स्थापित करवाने का माध्यम लड़कियां बनेगी, तो उनको ज्ञान तो पुलिस भर्ती की बारीकियों का भी मिलना चाहिए, लेकिन अगर सारथी पहल के माध्यम से लाखों लड़कियां औऱ महिलाएं वालेंटियर्स के रूप में पुलिस और लोगों से जुड़ेंगी, तो यह भी सूबे की आधी आबादी के लिए गर्व की बात है। सारथी टीम व इसके संरक्षक दबंग आईपीएस पंकज चौधरी न सिर्फ प्रशंसा के पात्र है बल्कि एक नये युग का आगाज भी करने वाले है।

18 Feb 2018

पाठक की धमकी

मोहनलाल मौर्य  
मुझे मोबाइल पर किसी ने धमकी दी है। धमकी दी है तो अंजाम भी देगा। यह तो अंजाम के वक्‍त ही तय होगा,किसका क्‍या अंजाम होगा। ‘मार दिया जाए,कि छोड़ दिया जाए,बोल तेरे साथ क्‍या सलूक किया जाए?’ उस वक्‍त यह किसका बोल होगा तथा ‘बोल’ का ‘मोल’ क्‍या होगा। वैसे भी इस महंगाई में धमकी देने का धंधा मंदी में चल रहा है। जरा-सी बात पर छुरा पेट में घुस देते हैं। अक्‍लमंद भी दस रूपए के लिए जान लेने पर उतारू हो जाता है। बहरहाल तो खामोश रहने में भलाई है। अन्‍यथा धमकी की चटनी चटा दी जाएंगी। जिसे चाटकर उसके स्‍वाद का अहसास अभी हो जाएंगा। इस वक्‍त मेरे मुंह के अंदर छालों ने हमला बोल रखा है। धमकी की चटनी और छालों का आमना-सामना हो गया तो जीभ बिना कसूर के ही  लहूलुहान हो जाएंगी। पाठक की धमकी
सोचा मिली धमकी की सूचना पुलिस को इतला कर दूं, क्‍योंकि ‘जान है तो जहान है।’ बिना समय गवाए पुलिस थाने पहुंच गया। थानेदार साहब से घबराते हुए बोला, ‘साहब! अब आप ही कुछ कीजिए। वरना जिंदगी की पिच पर बिना रन लिए ही आउट हो जाऊंगा।’ यह सुनकर थानेदार साहब ने कहा कि घबराईए मत। आहिस्‍ता-आहिस्‍ता बताइए,  आखिरकार हुआ क्‍या है, तबी हम कुछ कर पाएंगे।
यह सुनकर मेरी सौ की स्‍पीड से चल रही सांसों पर ब्रेक लगाने के लिए,मैंने सांसों के ब्रेकर पर पैर रखा। धीरे-धीरे सांसों की गति कम हुई। रूकी नहीं। मैं बोला, ‘साहब! सुबह-सुबह भगवान का स्‍मरण कर रहा था। तबी मोबाइल थरथराया। भगवान से स्‍मरण टूटकर मोबाइल से स्‍मरण जुड़ा। कॉल रिसीव की,स्‍मरण मरण में बदल गया।’
‘अच्‍छा तो पहले यह बताओं कि तुम करते क्‍या हो?’
‘साहब! मैं तो एक अदना सा लेखक हूं। यदा-कदा लिखता हूं। पत्र-पत्रि‍काओं में लगभग रोज छपता हूं।’ ‘यदा-कदा लिखते होतो रोज कैसे छपते हो।’ ‘साहब! वह क्‍या है कि सप्‍ताह में एक रचना लिखता हूं और वहीं किसी ना किसी अखबार में रोज सप्‍ताह भर छपता रहता है। इसलिए रोज छपता हूं।’ ‘जरूरी तुम्‍हारी सम्‍पादकों से सांठगांठ होगी।’ ‘नहीं साहब! सांठगांठ नहीं हैं। उनकी ईमेल आईडी हैं। जिन पर रचना प्रेषित कर देता हूं। अगले दिन छप जाता हूं। अगले दिन नहीं,तो उससे अगले दिन छप जाता हूं। उससे भी अगले दिन नहीं छपु तो अन्‍यत्र भेज देता हूं। लेकिन सम्‍पादक की ओर कोई रिप्‍लाई नहीं आती।’
‘जरूर तुमने किसी के खिलाफ उल्‍टा-सीधा लिखा होगा।’ ‘साहब! उल्‍टा-सीधा का क्‍या मतलब? मैं तो सीधा लिखता हूं,आप चाहे तो मेरी हैंड राइटिंग देख सकते है।’ ‘अरे! मूर्ख मैं हैंड राइटिंग की बात नहीं कर रहा। किसी लेख-वेख में उल्‍टा-सीधा तो कुछ नहीं लिखा ना।’ ‘साहब! लेख तो मैं लिखता ही नहीं हूं।’
थानेदार साहब! झुंझलाते हुए बोले, ‘अबे तो तून अभी कहा ना मैं लेखक हूं। लेखक लेख नहीं लिखता तो ओर क्‍या लिखता है? भजन लिखता है क्‍या?’ ‘साहब मैं तो ‘व्‍यंग्‍य’ लिखता हूं।’ ‘तो किसी व्‍यंग्‍य में उल्‍टा-सीधा लिख दिया होगा।’ ‘साहब! व्‍यंग्‍य सीधा-सीधा थोड़ी लिखा जाता हैं। व्‍यंग्‍य तो उल्‍टा-सीधा ही लिखा जाता है।’
‘अब आया ना ऊॅट पहाड़ के नीचे। जरूर तुने सरकार के खिलाफ व्‍यंग्‍य कसा होगा।’ ‘नहीं साहब!’ ‘तो किसी राजनेता के खिलाफ...या किसी भू माफिया के खिलाफ... या किसी डॉन या चोर उचक्‍के के खिलाफ...।’ ‘नहीं साहब!’ ‘जरूर किसी वरिष्‍ठ या गरिष्‍ठ साहित्‍यकार के खिलाफ व्‍यंग्‍य कसा होगा।’ ‘नहीं साहब! व्‍यंग्‍य तो विसंगतियों पर लिखा जाता है।’ ‘तो तुझे अभी मैंने जो बताए उनमें विसंगतियां नहीं दिखती?’
‘दिखती है ना साहब!’ ‘तो लिखता क्‍यों नहीं?’ ‘लिखता हूं,साहब!’
‘अबे मुझे क्‍यूं कंफ्यूज कर रहा है। कभी कहता है नहीं लिखता हूं,साहब! कभी कहता है लिखता हूं,साहब! खैर छोड़। यह बताओं धमकी देने वाले ने क्‍या कहा था?’ ‘साहब! ठीक से याद नहीं,पर इत्‍ता जरूर याद है कि उसने यह कहा था कि अपने मन के मुताबिक मत कर वरना अंजाम बहुत बुरा होगा।’
‘तो तुमने क्‍या बोला?’
‘मैंने उससे कहा कि मैंने क्‍या गुनाह किया है?’ ‘फिर वह क्‍या बोला?’ थानेदार साहब ने यह मुझसे पूछा। ‘बोला क्‍या? कॉल कट गई या काट दी गई।’
थानेदार साहब! ने अपने मुखबिर को सूचित किया। एक घंटे बाद मुखबिर ने धमकी देने वाले का नाम,पता बता दिया। थानेदार साहब ने उससे बात की। उसने धमकी की यह वजह बताई, जो उस वक्‍त मेरे समझ में नहीं आ रही थी। थानेदार ने मुझसे कहा, ‘यह तुम्‍हारा प्रिय पाठक है। लो इससे बात करों।’ मैंने फोन लिया, ‘हैलों...लेखकजी मैंने धमकी नहीं हिदायत दी थी कि तुम जब भी लिखते हो अपना की रोना रोता रहते हो। कभी हमारी भी सुन लिया करों। रोजी-रोटी,रोजगार,महामारी,महंगाई,भ्रष्‍टाचार,की बात कर लिया करों। तुम्‍हें अपने रोने-धोने से,पुरस्‍कार पाने से, साहित्‍यक राजनीति से फुर्सत मिले तो कभी हमारें गांव आकर देखना। हमारें यहां पर पानी नहीं।बिजली नहीं। सड़क नहीं। अस्‍पताल नहीं। बैंक नहीं। स्‍कूल नहीं। आवागमन के लिए बस नहीं। गरीबी,भूखमरी,तथा बेरोजगारी से जनता त्रस्‍त और सरकार मस्‍त हैं। लेकिन तुम तो पुरस्‍कार के लिए लड़ते हो। अध्‍यक्षता के लिए भिड़ते हो। वरिष्‍ठता का बखान करते हो। कलम सिर्फ कागज पर घिसने के लिए नहीं होती। इसे संगीन बनाओं तो ही असर करती है।’ कहकर उसने फोन काट दिया।

उसकी बातें सुनकर मैं थाने से वापस आ गया। तब से मैं यह सोच-सोचकर कोमा में हूं कि अगर सारे पाठक ऐसे ही लेखकों को धमकाने लगे,उन्‍हें सच का आईना दिखाने लगे तो हम लेखकों का क्‍या होगा?

31 Jan 2018

वसंत अब ऑनलाइन ही मिलेगा

मोहनलाल मौर्य

वसंत वसंतपंचमी को परदेश से आया था। मैंने ही नहीं दीनू काका ने भी देखा था। देखा क्या था,उसने दीनू काका के पैर भी छूए थे। काका ने शुभाशीष भी दिया था-‘जुग-जुग जियों वसंतराज। यूं ही आते-जाते रहना। सदा यू हीं मुस्‍कराते रहों।’ वसंत समूचे मोहल्ले वासियों का चेहता हैं। हर साल इन्हीं दिनों में घर आता है। कपड़ों का बैग भरकर लाता हैं। वसंत को पीले वस्त्र बहुत प्रिय हैं। उसका रूमाल तक पीले रंग का होता है। सब उससे मिलना चाहते हैं। पर जबसे आया है, दिखाई नहीं दे रहा है। वसंत कल रामू काका पूछ रहे थे- ‘सुना है वसंत आया हुआ है?’ मैंने कहा-‘आपने ठिक सुना है।’ यह सुनकर वे बोले-‘तो फिर वह कहां है? मैंने तो उसे देखा ही नहीं और ना वह मुझे मिला है।’ इस पर मैंने उन्हें समझाते हुए कहा-‘ काका! वह आजकल आप से ही नहीं, किसी से भी मिलता-जुलता नहीं है।किसी ओर कि तो क्‍या क्‍यूं? लेकिन अपुष्‍ट खबर है कि जिनका वह अजीज हैं,उनसे ही रूष्‍ट हैं। ’
रामू काका चौंके-‘क्या कह रहे हो? वसंत ऐसा लड़का नहीं है। वह तो जब भी आता है, सबसे मिलता है। बड़े-बुजुर्गों का अदब करता। प्यार-प्रेम की वार्ता करता है। जरूर किसी कार्य में व्यस्त होगा। या हो सकता है सर्दी का टाइम हैं खांसी-जुकाम हो गई हो। परदेश का तथा यहां का वातावरण अलग-अलग हैं,सूट नहीं किया हो।’ काका कि उक्‍त कथ्‍य मेरे गले नहीं उतरा तो मैंने काका से कहा-‘काका! ऐसी बात नहीं। बात कुछ और ही है। ’ यह सुनकर रामू काका बिना किसी वक्‍तव्‍य के ही वसंत की खोज-खबर में वहां से चल दिया। वसंत गोधूली के समय रामू काका वसंत से मिलने उसके घर पहुंचे। पर वह वहां नहीं था। उसके मां-बाप बता रहे थे कि जबसे आया है, फेसबुक पर ही चिपका रहता है। पता नहीं क्या हो गया है? गुमसुम रहता है। पहले तो खेत-खलियान में भी जाता था। सरसों के पीले-पीले फूल बरसाते हुए आता था। सबसे मिलता-जुलता था। पल दो पल ही सही लेकिन सबसे प्‍यार भरी मीठी-मीठी बातें करता था। सबका दिल जीत लेता था तथा दिनभर खुश रहता था। अब तो मुरझाया सा रहता है और दिनभर खाट पर औंधे मुंह करके लेटा रहता हैं। दिनभर पता नहीं मोबाइल में क्‍या देखता रहता हैं। मोबाइल पर से नज़र हटाता ही नहीं है। हमें तो डर कहीं छोरे की दृष्टि कमजोर नहीं हो जाए।  
अगले दिन मैं गया तो वसंत अपने कमरे में बैठा फेसबुक पर लिख रहा था- ‘मैं वसंत हूं। परदेश से तुम्हारे लिए आया हूं। एक खास गिफ्ट लाया हूं। वैलेंटाइन डे पर मिलेगे...।’तभी उसे कमरे में मेरे दाखिल होने का भान हुआ। उसने गर्दन मेरी आरे घुमाई और बोला-‘आप और यहां। कैसे आना हुआ?’
मैंने कहा-‘भाई! आपसे मिलने आ गया। आप जबसे आए हो, मिले ही नहीं। आपको रामू काका भी पूछ रहे थे और खुशनुमा मौसमी काकी भी पूछ रही थी। सच क्‍यूं तो कईयों को तो यकीन नहीं है कि वसंत आ गया है। आखिरकार बात क्या है?’ वसंत बोला-‘बात-वात कुछ नहीं है। अभी तुम जाओं। मैं व्यस्त हूं। शाम को फेसबुक पर ऑनलाइन मिलते हैं। वहीं वार्तालाप करते हैं।’

मैं मन मसोसकर चला आया। रास्ते में रामू काका मिले। उन्होंने पुन: पूछा-‘वसंत मिला क्या? नहीं मिला तो कहां मिलेगा?’मैंने कहा-‘काका,वसंत तो अब फेसबुक पर ऑनलाइन मिलेगा।’

29 Jan 2018

मां आखिर मां होती है!

मोहनलाल  मौर्य
बच्चा ठोकर खाकर गिर जाए तो मां सौ काम छोड़कर उठाने दौड़ती है। भागकर उठाती है और सीने से लगा लेती है। देखती है कहीं चोट तो नहीं आई। संतान के खरोंच भी आ जाए तो मां का दिल दहल उठता है। मां की ममता निर्मल है। दया,करूणा की सागर है। मां आखिर मां होती है। चाहे सौतेली मां हो। चाहे धरती मां हो। मां का वात्सल्य अपनी संतान पर सदैव न्यौछावर रहता है। मां आखिर मां होती है
धरती मां भी धरती पुत्र से अगाथ प्रेम करती है। जिस तरह मां बच्चे को नौ महिने कोख में पालती है और जन्म देती है। उसी तरह धरती मां भी धरती पुत्र की फसल को अपनी कोख में पाल-पोसकर बड़ी करती है। धरती मां फसल बुवाई से लेकर कटाई तक। फसल की उसी तरह देखभाल करती है। जिस तरह एक मां अपने नवजात बच्चे की करती है। जब बच्चा रोता है तो मां उसे स्तनपान कराती है। उसे लोरी सुनाती है और जब बच्चा सो जाता है तो अपने गृहस्थी के कार्यों में जुट जाती है। इसी तरह धरती मां फसल को प्यास लगती है,तो पानी पिलाती है। भूख लगती है,तो खाद पदार्थ से पेट भरती है। आड़ी-तिरछी पड़ जाती है,तो आहिस्ता-आहिस्ता उठाती है और अपने आंचल में लपेटकर रखती है। मां के आंचल तले फसल भी को भी सुकून का अहसास होता है।

लेकिन जब अतिवृष्टि,ओलावृष्टि,अकाल से फसल चौपट होती है। तब धरती मां का कलेजा मुंह में आ जाता है। अपनी आंखों के सामने चौपट होती फसल और पुत्र की हालात देखकर धरती मां भी,अपनी मां की तरह विलाप में डूब जाती है। धरतीपुत्र चौपट हुई फसल की खातिर मुआवजे की मांग करता है,तो या तो गोली खानी पड़ती है या फिर लाठी चार्ज से भेंट होती है। यह देखकर मां पर क्या बीतती है। यह तो मां ही जानती है। मां आखिर मां होती है। मां आखिर मां होती है
अपने आंखों के सम्मुख पुत्र को तड़फता देखकर किस मां का कलेजा नहीं फटेगा। फिर यह तो धरती पुत्र है,जो कड़ी मेहनत करके हमारे लिए अनाज पैदा करता है। बेचारा दिन-रात जागता है और फिर भी फसल का भाव न्यूनतम मिलता है। न्यूनतम भाव से खुद की पूर्ति नहीं होती। सेठ-साहूकार और बैंक का कर्ज कैसे चूकता करें। ऐसी स्थिति में साल दर साल कर्ज पर कर्ज चढ़ता रहता है और एक दिन धरती पुत्र कर्ज तले दब जाता है। कर्ज तले दबे पुत्र को मां निकल नहीं पाती है। यह मलाल मां के सीने में ताउम्र दबा रहता है।

धरतीपुत्र भी खुशहाल जिंदगी जीना चाहता है। पर कर्ज का भार उठा नहीं पाता है। खुदकुशी का रास्ता जब वह अपनाता है। तब धरती मां खून की आंसू रोती है। मां की सेवा-सत्कार करने वाला बेटा,जब आत्महत्या करता है या कर्ज तले दबकर मरता है,तो उस मां पर क्या गुजरती है। उस मां से बेहतर कौन जानता होगा। मां आखिर मां होती है।

23 Jan 2018

आलोचक की मंशा पर फिरा पानी

मोहनलाल मौर्य
इस बात का किसकों भी भान नहीं था कि बैठक में आलोचक भी मौजूद है। भान होता भी कैसे? वह तो बैठक में लोगों के बीच मौजूद होते हुए भी अदृश्‍य था। उसके साक्षात दर्शन तो तब हुए जब उसने अच्‍छी खासी हो रही संगोष्‍ठी में घुसपैठ कर मुठभेड़ किया। शुक्र है कि मुठभेड़ में आयोजकों की ओर से जवाबी कार्यवाही में कहासुनी की फायरिंग नहीं हुई। अन्‍यथा बैठक कक्ष हाथापाई की घाटी में तब्‍दील हो जाता। जवाबी कार्यवाही विनम्रता एवं प्रत्‍युत्‍तर से दी गई। यह दृश्‍य था एक आयोजन के एक माह पूर्व हुई बैठक का। आगे देखिए,कार्यक्रम से पूर्व और उपरांत में क्‍या–क्‍या घटित होता है।आलोचक की मंशा पर फिरा पानी

अगले दिन कार्यक्रम की खबर अखबार में छपी। देख आयोजकों का नाम आलोचक जग गया और बिना हाथ-मुंह धोए ही काम पर लग गया। सबसे पहले तो उसने आयोजकों से सम्‍पर्क साधा। यह सोच के कि इनमें भी कोई ना कोई तो विभीषण होगा ही। जो मेरी सहायता कर देगा। आलोचक कोई मर्यादा पुरूषोत्‍तम राम तो था नहीं। जिसकी सहायता के लिए आयोजकों में से कोई विभीषण बनकर मदद करता। खुद ना आए तो क्‍या हुआ? उसने एकाध को अपने ओर खींचा। जिन्‍हें खींचा,वे आसानी से चले आए। चले इसलिए आए कि वे प्रलोभन की रस्‍सी से और खुशामद की मजबूत पकड़ से खींचे गए थे। आलोचक की मंशा पर फिरा पानी
दरअसल में सामाजिक सामूहिक आयोजन में आयोजक को समाज के कई पथों से गुजरना होता है। भांति-भांति पथों पर भांति-भांति लोगों से बिन मांगी राय साथ लेकर चलनी होती है। पीठ पर शिकायत भी लाद दी जाएं तो उसे भी ढोना होता है। इनसे अलहदा आलोचक है,जो आयोजक के गुणगान में उस बांसुरी में फूंक मारता रहता है। जिसमें से निंदनीय ध्‍वनि निकलती है। जिसे सुनकर आयोजक भाव-विभोर हो जाता है। आलोचक के बोल गुब्‍बारे की भांति आसमान को छूने के लिए मचलते हैं। लेकिन आसमान को छूने की को‍शिश में जो हालात गुब्‍बारे की होती है। वैसी ही हालात आखिर में उसके बोले गए ‘बोल’की होती है।
आयोजक आयोजन में चार चांद लगाने के लिए कई दिनों से ग्रह त्‍याग कर अपनी झोली उठाए द्वार-द्वार दस्‍तक देता हैं। आग्रह से भरी झोली में से आग्रह निकालकर प्रसाद की तरह लोगों को बांटता है तथा झोली फैलाकर योगदान की भीख मांगता है। कोई आग्रह के प्रसाद के बदले में स्‍वेच्‍छा से चंदे का दान देता है तो कोई सादर नमस्‍कार कर अलविदा कह देता है। तब कहीं जाकर आयोजन सफल हो पाता है।
रोज की तरह सूर्योदय ने उस दिन की भी खबर दी। जिस दिन का आयोजन था। आलोचक अपने फूंक मारे प्‍यारों के साथ सबसे आगे ही विराजमान था। समारोह की चकाचौंध एवं अपेक्षा से ज्‍यादा लोगों की तादाद को देख हैरान था। कि गई आलोचना से जो आशा थी वहीं आशा अपने प्रेमी के साथ निराशा का खत लिखकर भाग गई थी। अब ऐनवक्‍त पर करें तो क्‍या करें? आशा लौटकर आ नहीं सकती। आखिरी आलोचना मन मसोस कर चुपचाप कार्यक्रम देखना ही रह गई थी। जिसका उसने पूरे मनोयोग से उपयोग किया और समारोह समापन तक पूरा आनंद लिया। 

20 Jan 2018

अनुभवी को प्राथमिकता

मुझे यह कहकर साक्षात्‍कार से बाहर की राह दिखा दी कि ना तो अनुभव है और ना ही अनुभव प्रमाण पत्र है। हम अनुभवी को ही प्राथमिकता देते हैं। दुख बाहर किए जाने का नहीं है। बाहर तो कई बार मुझे यार-दोस्‍तों ने भी कर दिया हैं। कई बार कुपित होकर पिताजी ने बाहर कर दिया। बाहर करना था तो कह देते,तुम्‍हारे पास अप्रोच नहीं है। तुम्‍हारे पास कोई सोर्स नहीं है। तुम्‍हारे पास फलाना नहीं है। तुम्‍हारे पास डिमका नहीं है। ये क्‍या बात हुई कि तुम्‍हारे पास अनुभव नहीं है? अरे,अनुभव तो मि‍त्रों! मित्रों के पास भी नहीं था। फिर भी हवा में उड़े की नहीं। और ऐसा उड़े कि परिंदे भी जिंदगी भर में जितना नहीं उड़े कि वे पांच साल में उतने उड़ लिए। अनुभवी को प्राथमिकता
अनुभव को प्रमाण कि क्‍या जरूरत है? अनुभव तो मेरे अंदर कूट-कूट के भरा है। यकीन न हो तो कूट-कूट कर देख लो। सैम्‍पल लेकर देख लो भाई! रक्‍त का,मांस का,मज्‍जा का। बोटी-बोटी से अनुभव टपेगा। अंग-अंग से फड़क उठेगा। इसके बाद भी अगर प्रमाण लेना ही है तो एक कागज के टुकड़े पर लिखे ढाई आखर के प्रमाण से क्‍या लेना? इस तरह के प्रमाण के प्रमाण पत्र तो रद्दी के भाव में बहुत मिल जाते हैं। लेना ही है तो कुछ दिन अवसर देकर लीजिए। फिर मेरा प्रायोगिक अनुभव देखकर अपने आप आभास हो जाएंगा।
जब पैदा हुआ,बड़ा हुआ,अपने आस-पास देखा तो अनुभव मिला। क्‍या मालिया कर्जे से डूबता छोड़ अनुभव लेकर पैदा हुआ था? उससे सीखा कि ऋण लेकर घी पीना चाहिए। फिर देश-दुनिया देखी। सीखा कि पांव पूजाने का अनुभव। जरूरत पड़ी तो पांव उखाड़ने का अनुभव भी पाया। धवल धारियों से सीखा कि वक्‍त जरूरत पड़ने पर किस तरह पलटी मारी जाती है। पलटी मारकर किस तरह बाजी जीती जाती है। गधे को बाप बनाने का हुनर तो अब पुराना हो गया। आजकल तो मैं इतना सीख गया हूं कि शेर को बच्‍चा बना सकता हूं। हाथी को पहाड़ के नीचे ला सकता हूं। ऊंट को पहाड़ पर ले जा सकता हूं। उखड़े को गाड़ सकता हूं। गाड़े को उखाड़ सकता हूं। इतना सर्वतोमुखी सम्‍पन्‍नता के बाद भी बाहर कर देना कैसे हजम होगी। बताओं भला! आज के हालात में और देश में जीने के लिए ऐसे अनुभवों की दरकार है या नहीं? एक बार मौका देकर तो देखे,दम नहीं,खम देखें,पांच सितारा बुंलदी ना देखा दो तो सच्‍चा भारतीय नहीं। आप तो धार देखें,चाहे तो उधार देखें,और एक बार सेवा का मौका दे। अनुभवी को प्राथमिकता
मुझे पच्‍चीस तीस प्रतिशत अनुभव तो पुश्‍तैनी विरासत से मिला है। पच्‍चीस प्रतिशत संघर्ष करके अर्जित किया है और चौदह प्रतिशत साक्षात्‍कार देते रहने से हो गया है। कुलयोग किया जाए तो चौंसठ प्रतिशत होता है। मुझे मालूम है,आज के युग में चौंसठ प्रतिशत की कोई वैल्‍यू नहीं। इसलिए शेष छत्‍तीस प्रतिशत के लिए भी प्रयासरत हूं। वैसे देखा जाए तो छत्‍तीस प्रतिशत वाले नब्‍बे,पचानवे प्रतिशत वालों पर हुक्‍म चलाते हैं। साथ में वे ही अनुभव के आधार पर देश चला रहे हैं। और नब्‍बे,पचानवे वाले उनकी हां में हां और ना में ना मिलाकर भागीदारी निभा रहे हैं। अनुभव के आधार पर तो झोलाछाप डॉक्‍टर क्‍लीनिक चला रहे हैं। धड़ल्‍ले से मरीजों का इलाज कर रहे हैं और खूब पैसा कमा रहे हैं। बिना लाइसेंस धारी अनुभव के आधार पर मोटरसाईकल से लेकर ट्रक तक दौड़ा रहे हैं और ट्रैफिक पुलिस वाले उनका बाल भी बांका नहीं कर पाते। एक मैं हूं,जिसे चौंसठ प्रतिशत अनुभवी होते हुए भी बाहर की राह दिखा दी जाती है। बताओं! क्‍या यह सही है?
मुझे तो लगता है कि इन्‍हीं की वजह से मुल्‍क में मुझ जैसे अनुभवियों का हिमांक अनुपात हिमांक बिंदु से नीचे गिरता जा रहा हैं। जिसके चलते ज्यादातर अनुभवी स्‍वदेश छोड़कर विदेश के ओर पलायन कर जाते हैं और शेष बचे-खुचे यहीं रह जाते हैं। जिनके रहने के तमाम कारण हैं। जिनमें मुख्‍य कारण परिस्थिति है। और परिस्थिति अच्‍छे से अच्‍छे अनुभवी को बेरोजगारी का दामन थमा देती हैं। क्‍योंकि परिस्थिति को रोज दर-दर की ठोकरों से मिली सम्‍मान पूर्वक सेवा-सत्‍कार अच्‍छी लगती हैं।
जब बाहर निकला तो सोचा,मतलब अनुभव पाया कि अब मैं धक्‍के नहीं खाऊंगा। धक्‍के देकर आगे बढ़ना होगा। जिंदगी इतनी सरल नहीं मोहन बाबू कि सारी जिंदगी धक्‍के खाते रहो। देखना अब मेरे अनुभव का कमाल। ऐसा धमाल मचाऊंगा कि देखकर सब ढंग रह जाएंगे। जिन्‍होंने बाहर की राह दिखाई है ना वे भी देखकर दांतों तले उंगली चबाते रह जाएंगे।