3 Jun 2018

मंत्रीजी तो बिजी है


माननीय के मंत्री बनने की अभी घोषणा ही हुई है। अभी तो शपथ भी नहीं ली। पदभार भी नहीं संभाला। आप चले आए मंत्रीजी से मिलने। न गुलदस्‍ता लाए और न मिठाई। खाली हाथ बधाई देकर श्रीगणेश करेंगे तो अशुभ होगा श्रीमानजी! ये तो मंत्रीजी है। खाली हाथ मिलेंगे तो दुआ-सलाम भी कबूल नहीं होगी। आश्‍वासन का तो सवाल नहीं। जो मिल जाएंगा।
‘आप कौन है भाई साहब!’ मंत्रीजी तो बिजी है
‘मैं मंत्रीजी का निजी सचिव हूं और अभी बहुत बिजी हूं। आज तो मंत्रीजी भी बिजी हैं। कल शपथ लेंगे। परसों पदभार संभालेंगे। उसके बाद से कार्यकर्ता व नागरिकों की ओर से जगह-जगह अभिनंदन समारोह होंगे। समारोह भी क्षेत्रीय तथा गैर क्षेत्रीय होंगे। अब मंत्रीजी क्षेत्रीय नहीं रहे। प्रादेशिक हो गए हैं। राजनैतिक समारोह तो होंगे ही। समाज स्‍तरीय भी होंगे। नेताजी मंत्री बनने से पूर्व अपने समाज के उच्‍चस्‍तरीय नेता रहे है। उनके समाज वाले भी तो मंत्रीजी का मंत्री स्‍तरीय सम्‍मान करेंगे न। अभी तो कई दिनों तक मंत्रीजी फूल मालाओं से लदे रहेंगे। बाजे-गाजे से चलेंगे। चलते-चलते ही दोनों हाथ जोड़कर अभिवादन करेंगे। लोगों से मिलेंगे-जुलेंगे। कोई हाथ मिलाएंगा,कोई गले लगेगा। कोई दूर से ही हाथ हिलाकर बधाई, शुभकामनाएं प्रेषित करेंगा। जनसभा स्‍थल पर सम्‍बोधित करेंगे, वादे करेंगे। तालिया बजेगी। जय-जयकार होगी। जिंदाबाद के नारे लगेंगे। कार्यकर्ता सेल्‍फी लेंगे। सेल्‍फी फेसबुक पर टांक कर लाइक कमेंट्स बटोरेगे। ये देखकर मंत्रीजी मन ही मन प्रमुदित होंगे। ऐसा कीजिए श्रीमानजी! अब तो आप जाए और फिर कभी आइएंगा। अब तो मंत्रीजी से मिलने-जुलने का सिलसिला चलता ही रहेगा। और हां मेरी बात का बुरा मत मानिएंगा। मैं तो मंत्रीजी के आदेशों की अनुपालन कर रहा हूं। अनुपालन करना ही मेरी ड्यूटी है। मैं अपनी ड्यूटी में जरा सी भी कोताही नहीं बरता।’
यह सुनकर श्रीमानजी ने औपचारिक रस्‍म-अदायगी में विदाई लेने से अच्‍छा बिना मिले-जुले ही घर आना ही मुनासिब समझा। वे घर चले आए। मंत्रीजी की शपथ,पदभार,अभिनंदन के ढाई वर्ष उपरांत वह फिर जा पहुंचा। रोज मंत्रीजी से ना जाने कि इतने ही मेल-मुलाकात करने आते हैं। किस-किस को याद रखे। कब तक रखे? क्‍यों रखे? जरूरत नहीं। जिन्‍हें जरूरत है वे हमें याद रखें। यहीं सोचकर निजी जी ने परिचय पूछा। ‘मैं मंत्रीजी के क्षेत्र का ही एक वोटर हूं। नेताजी तो मंत्री बनते ही फूल गए और एक वोटर से किए वायदे भूल गए। विकास की राह देखते-देखते गांव के आम रास्‍ते सिकुड़ गए। पेयजल संकट से गले सूख गए। सरकारी अस्‍पताल अभाव में फोड़ा,फुंसी भी घाव बन गए। समय पर इलाज ना होने से कई असमय चल बसे। सरकारी स्‍कूल के अभाव में बच्‍चें अपना उज्‍ज्‍वल भविष्‍य दो कोस पैदल चलकर बना रहे हैं। और निजी स्‍कूल वाले लूटमारी का उत्‍सव मना रहे हैं। जिसमें अभिभावक शिरकत करके लूट रहे हैं। फिर चाहे शिरकत करने के पीछे मजबूरी हो या प्रतिस्‍पर्धा। बिजली के तो पूछिए मत। बिजली तो मनचली हो रही है। इस मनचली बिजली ने किसान को दुखी कर रखा है। अब और क्‍या बताए और क्‍या ना बताए? चुनावीं घोषणा पत्र तो हमें पॉश इलाके का सपना दिखाता हैं। हमारे गांव के तो भाग्‍य विधाता मंत्रीजी ही है। अंदर जाने दीजिए और गांव का भाग्‍य चमकाने में सहयोग कीजिए। ग्रामवासियों की ओर से दुआएं मिलेगी।’
 
‘देखिए वोटरजी! पहले तो जल-पान कीजिए। उसके बाद संवाद कीजिए। सभी वायदे याद हैं। वे तो कब के ही पूरे हो गए होते। बीच-बीच में कभी पंचायतीराज चुनाव,कभी शहरी निकाय चुनाव तो कभी उप चुनाव जो आ जाते हैं। उप चुनाव तो महाचुनाव होता है। इसमें नींद हराम हो जाती है। पार्टी की नाक का सवाल जो रहता है, जिससे बचाने के लिए दिन-रात उसी क्षेत्र में डेरे डाले रहना होता है। अब जल्‍द ही वायदे पूरे होंगे। ऐसा है कि आज तो मंत्रीजी बिजी हैं। कल दौरे पर रहेंगे। परसों मीटिंग में रहेंगे और उसके बाद निजी कार्य से बाहर रहेंगे। इसके बाद कभी भी आइए,स्‍वागत है आपका।’ यह कहकर निजी सचिव मंत्रीजी की कैबिन में चला गया।
वोटरजी मुंह लटकाए चला आया। कुछ समय बाद एक रोज खुद के पुत्र विकास के ‘विकास’ के लिए जा पहुंचा। निजी सचिव जी से बोला,‘पुत्र का शारीरिक एवं मानसिक विकास तो गया है। लेकिन आर्थिक विकास मंत्रीजी की इनायत से हो जाए तो विकास खुद का एवं अपने बाल-बच्‍चों का विकास अच्‍छे से कर लेगा।’ सुनकर निजी सचिव वहीं बोला, जो बोलता आया था, ‘आज तो मंत्रीजी बिजी हैं। अंदर कॉन्‍फ्रेंस चल रही है। कल चुनावीं रणनीति की मीटिंग। परसों से दिल्‍ली जाएंगे। टिकट पर तलवार लटक गई है। परसों के बाद से तो क्षेत्र में रहेंगे। चुनाव नजदीक है। ऐसा कीजिए,वहीं मुलाकात कर लीजिए। और हां चुनाव में मंत्रीजी का ध्‍यान रखिएगा।’
उसके बाद जाने कितने परसों निकल गए मंत्रीजी नहीं आए। लगता है टिकट पर तलवार लटक गई होगी। इसलिए दिल्‍ली में ही अटक गए। अब चाहे अटके, चाहे वोट के लिए दर-दर भटकें। वादे तो कब के ही हवाई किले में कैद हो गए। अब तो कम ही टाइम बचा है।  एक बार फिर से वायदे,घोषणाओं की मुनादी में। अब चाहे निजी जी बिजी रहे या मंत्रीजी। चुनावीं घोषणा और पुत्र विकास का ‘विकास’ तो होने से रहा।
चुनावीं दौर में दौरा करते हुए एक रोज मंत्रीजी वोटर के घर पधारे। गृह प्रवेश से पूर्व निजी सचिव जी ने मंत्रीजी के कान में वोटर जी की शिकवा-गिलवा बता दी। मंत्रीजी ने निजी सचिव जी की कानाफूसी सुनकर जाते ही रूठे वोटर को मनाने के लिए गले लगा लिया। यह देखकर वोटरजी शिकवा-गिलवा भूल गया और मंत्रीजी की पार्टी का झंडा उठा लिया। जिंदाबाद! जिंदाबाद! के नारे लगाने लगा। ताकि अबकी बार दिखाए गए सुनहरे स्‍वप्‍न साकार हो जाए। और गांव का भाग्‍य चमक जाए। गांव का भाग्‍य तो पता नहीं कब चमकेगा। लेकिन एक बार फिर से मंत्रीजी का भाग्‍य चमक गया और वे भारी बहुमत से विजयी होकर मंत्री बन गए। और मंत्री बनते ही पूर्व की भांति बिजी हो गए।

31 May 2018

शीतलता से बढ़ते है पेट्रोल-डीजल


प्रतिस्‍पर्धा के दौर में कौन नहीं बढ़ रहा? हर कोई बढ़ रहा है। बढ़ता है,तभी आसमान को छूता है। बढ़ते हुए को दुनिया सलाम करती है। घट़ते हुए को कोई सांत्‍वना भी नहीं देने आता। ऐसे में पेट्रोल-डीजल पीछे क्‍यों रहे? ये भी बढ़ने के लिए ही तो पैदा हुए हैं। लेकिन पेट्रोल-डीजल आसमान छूने के लिए बढ़ते हैं,तो हम आसमान को सिर पर उठा लेते हैं। मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक हाहाकार मचाए रहते हैं। सोशल मीडिया पर तो  पेट्रोल डीजल की बढ़त को लेकर हमारी 'बढ़त' इस तरह हावी रहती है, जिसे देखकर पेट्रोल-डीजल चिढ़ जाते हैं और वर्तमान दर से बेदर्द होकर नर्इ दर का आनंद लेते है जबकि भ्रष्‍टाचार,चोरी,डकैती,अपहरण व बलात्‍कार निरंतर बढ़ रहे हैं। इनको लेकर तो हम जरा भी नहीं सोचते और ना ही बवाल मचाते हैं। जो यदा-कदा बढ़ते हैं उनकी की टांग पकड़कर खींचते हैं। पेट्रोल-डीजल
असल में टांग ही खींचनी है तो इन निरंतर वालों की खींचो ना,जो मानवीय मूल्यों को क्षति पहुंचा रहे हैं। पर निरंतर वालों से तो आप भी डरते हैं।

इसी तरह बढ़ते तापमान के सम्‍मुख भी कोई मुंह नहीं खोलता। मुंह खोलना तो दूर घर से बाहर ही नहीं निकलते हैं। अगर दम ही है,तो बढ़ते तापमान की टांग खींचकर बताओं। जब जाने,हम तो। आप कितने दमदार है। जबकि बढ़ता तापमान तो हाल-बेहाल कर देता है,फिर भी हम उसका बाल भी बांका नहीं कर सकते। ज्‍यादा से ज्‍यादा कूलर-एसी की हवा लेकर राहत की सांस ले सकते हैं। लेकिन तापमान से इसलिए डरते हो कि वह आग बरसाते हुए बढ़ता है और पेट्रोल-डीजल पर इसलिए हावी हो जाते हो कि वे शीतलता के साथ बढ़ते हैं। पेट्रोल-डीजल की बढ़तको लेकर हम सरकार को कोसते हैं। भला-बुरा कहते है। सरकार तो पेट्रोल-डीजल की मां-बाप है। कौन मां-बाप अपनी संतान को बढ़ते हुए नहीं देखना चाहता। दिन दुगुनी और रात चौगुनी की रफ्तार से संतान की बढ़त होती हैं,तब सबसे ज्यादा खुशी माता-पिता को ही होती हैं। सरकार तो माता-पिता होने का फर्ज निभा रही है। आप-हमकों सरकार का फर्ज भी बुरा लेगे तो,इसमें सरकार भी क्‍या कर सकती?
पेट्रोल-डीजल का एक ही तो सपना है,पैसे दर पैसे बढ़ते हुए,जल्‍दी सी एक सौ को आरपार करना। जब भी मंजिल की ओर बढ़ते हैं तो राह में कभी चुनाव तो कभी विपक्ष राह का रोड़ा बनकर खड़ा हो जाता हैं। और आगे बढ़ने से रोकने लगते हैं। और कभी-कभी तो रोकते ही नहीं वर्तमान दर से दस-बीस पैसे पीछे भी धकेल देते हैं। बढ़ने से ही रोकना है तो उन रिश्‍वतखोरों को रोको ना,जो सरेआम रिश्‍वत लेते हैं। भ्रष्‍टाचार बढ़ा रहे है। इसी तरह रोकना है तो उन नेताओं को बढ़ने रोको,जो चुनावीं मौसम में तो एक से बढ़कर एक वायदे करते हैं और जीतने के बाद शक्‍ल भी नहीं दिखाते।
मेरा तो मानना है कि पेट्रोल-डीजल इसी तरह बढ़ते रहेंगे तो सरपट दौड़ते वाहनों की बढ़ोतरी में कमी होगी। वाहनों की बढ़ोतरी में कमी होगी तो पर्यावरण में बढ़ोतरी होगी। पर्यावरण की बढ़ोतरी होगी तो बारिश होगी। बारिश होगी तो घटता जल स्तर बढ़ेगा। जल स्तर बढ़ेगा तो किसान खुशहाल रहेगा। किसान खुशहाल रहेगा तो देश की प्रगति होगी। देश की प्रगति होगी तो विकासशील से विकसित की ओर बढ़ेगा।

17 May 2018

तूफान को लेकर दिखा उत्‍साह


तूफान धरा पर जरा कम सोशल मीडिया पर पुरजोर आया। इसे लेकर ऐसा उत्‍साह दिखा जैसा नागिन डांस करते हुए दूल्‍हे के दोस्‍तों के चेहरे पर झलकता हैं। अलर्ट के बाद ऐसे राह देख रहे थे जैसे बड़े दिनों बाद मामा घर पर आ रहा हो। उत्‍साह की हवा ने तूफान के वीडियों को इस तरह वायरल किया कि सोशल मीडिया पर धूल भरी आंधी चलती हुई तथा मोबाइल में अंधेरा छाते हुए दिखा। अमुख शहर में आ गया है। अभी हमारी ओर बढ़ रहा।कि टैग लाइन के साथ आया तूफान सोशल मीडिया पर धरा पर आए तूफान की स्‍पीड से कई गुणा तेजी से आता हुआ दिखा।
                                                              सोशल मीडिया पर पुरजोर आए तूफान ने शायद ही ऐसा कोई फेसबुक वॉल और वाट्सएप ग्रुप छोड़ा होगा,जिसको अपनी चपेट में नहीं लिया हो। जो भी चपेट में आया,उसी ने तूफान के बारे ऐसे बताया जैसे न्‍यूज चैनल का एंकर किसी सनसनीखेज खबर के दौरान बताता है। दे‍खिए,तूफान का ये अद्भूत दृश्‍य। देखेगे तो हिलाकर रख देगा। अब से पहले कभी नहीं देखा होगा,ऐसा तूफान। जिसे देखकर लोग बिना आए तूफान के ही घरों के खिड़की,दरवाजे बंद करते हुए दिखे। उस दौरान जरा-सी आंधी भी चली तो सोशल मीडिया पर आया तूफान धरा पर उतरते हुए दिखा। पेड़-पौधे उखड़ते और टीन-टप्‍पर उड़ते हुए दिखे। मकान धराशायी होते हुए दिखे। कुछ लोग तूफान को मोबाइल में कैद करने के लिए छत पर चढ़ते हुए दिखे। उनके मोबाइल में तूफान का बवंडर कैद हो जाए तो वे भी सोशल मीडिया पर तूफान ला दे,उनमें ऐसा उत्‍साह दिखा।
एकाएक आए बवंडर के बाद तो पूर्वानुमान कर्ता भी अपना अनुभव साझा करते हुए दिखे। जबकि धरा पर आए बवंडर से पूर्व पूर्वानुमान कर्ताओं की दिमाग की बत्‍ती गुल कैस हो गई थीउन्‍होंने अपने पूर्वानुमान से पहले आगाह क्‍यों नहीं कियाऔर उन भविष्‍यवाणी कर्ताओं की वाणी को क्‍या लकवा मार गया था,जो बूंदाबांदी की भी मूसलाधार भविष्‍यवाणी कर देते हैं।
                                                               उनसे मैंने पूछा तो एक ने बताया कि हम कैसे करतेहम तो बाल-बच्‍चों का भविष्‍य बनाने में लगे हुए थे। उनके भविष्‍य से फुरसते मिलते ही हम जरूर भविष्‍यवाणी करते हैं। आप चाहे तो हमारी पिछला रिकॉड़ देख सकते है। किसी भी राज्‍य के चुनाव से पूर्व की एग्जिट पोल देख सकते है। मौसम की भविष्‍यवाणी देख सकते हैं। सटीक ही मिलेगी। और हां,तूफान के उपरांत तो हमने अलर्ट जारी कर ही दिया था कि अलर्ट रहना हैं और सोशल मीडिया के सिवाह कहीं भी आवाजाही नहीं करनी हैं।
इन पूर्वानुमान कर्ताओं और भविष्‍यवाणी कर्ताओं से नेक तो सोशल मीडिया पर तूफान को लेकर उत्‍साह में दिखे लोग लगे,जो तूफान आने के बाद सावधान रहने की चेतावनी देते हुए दिखे। आपातकालीन सामग्री और आवश्‍यक खाद पदार्थ,कि जानकारी इस तरह से बता रहे थे,जैसे योगगुरु योग के दौरान बताता है।
धरा पर तो तूफान घंटा या आधा घंटा ही आया होगा। लेकिन सोशल मीडिया पर पुरजोर से आए तूफान की धूल अब भी रह-रहकर उड़ रही है। धूलकण आंखों में चुभ रहे हैं। बार-बार आंखों को मसलने के बाद भी धूलकण रमे हुए है।


16 May 2018

तूफान को लेकर दिखा उत्‍साह


 तूफान धरा पर जरा कम,सोशल मीडिया पर पुरजोर आया। इसे लेकर ऐसा उत्‍साह दिखा,जैसा नागिन डांस करते हुए दूल्‍हे के दोस्‍तों के चेहरे पर झलकता है। अलर्ट के बाद ऐसे राह देख रहे थे,जैसे बड़े दिनों बाद मामा घर पर आ रहा हो। उत्‍साह की हवा ने तूफान के वीडियों को इस तरह वायरल किया कि सोशल मीडिया पर धूल भरी आंधी चलती हुई तथा मोबाइल में अंधेरा छाते हुए दिखा। तूफान को लेकर दिखा उत्‍साह

अमुख शहर में आ गया है। अभी हमारी ओर बढ़ रहा।की टैग लाइन के साथ आया तूफान धरा पर आए तूफान की स्‍पीड से कई गुणा तेजी से आता हुआ दिखा।

शायद ही ऐसा कोई फेसबुक वॉल या वाट्सएप बचा हो,जिसको तूफान ने अपनी चपेट में नहीं लिया हो। जो भी चपेट में आया,उसी ने तूफान के बारे ऐसे बताया,जैसे न्‍यूज चैनल का एंकर किसी सनसनीखेज खबर के बारे में बताता है। दे‍खिए,तूफान का ये अद्भूत दृश्‍य। देखेगे तो हिलाकर रख देगा। जिसे देखकर लोग बिना आए तूफान के ही घरों की खिड़की,दरवाजे बंद करते हुए दिखे। उस दौरान जरा-सी आंधी भी चली,तो सोशल मीडिया पर आया तूफान धरा पर उतरते हुए दिखा। पेड़-पौधे उखड़ते और टीन-टप्‍पर उड़ते हुए दिखे। मकान धराशायी होने लगे। कुछ लोग तूफान को मोबाइल में कैद करने के लिए छत पर चढ़ गए,ताकि मोबाइल में बवंडर कैद हो जाए, तो वे भी सोशल मीडिया पर तूफान ला दे,उनमें ऐसा उत्‍साह दिखा।

एकाएक आए बवंडर के बाद तो भविष्‍यवाणी वाले भी अपना अनुभव साझा करते हुए दिखे। जबकि धरा पर आए बवंडर से पहले भविष्‍यवक्‍ताओं की दिमाग की बत्‍ती गुल कैस हो गई थीउन्‍होंने पहले आगाह क्‍यों नहीं किया? उनकी वाणी को क्‍या लकवा मार गया था,जो बूंदाबांदी की भी मूसलाधार भविष्‍यवाणी कर देते हैं।

धरा पर तो तूफान घंटा या आधा घंटा ही आया होगा, लेकिन सोशल मीडिया पर पुरजोर से आए तूफान की धूल अब भी रह-रहकर उड़ रही है। धूल-कण आंखों में चुभ रहे हैं। बार-बार आंखों को मसलने के बाद भी रमे हुए है।

7 May 2018

अमूल्‍य वोट के लिए...


गिरधारी लाल जी चुनाव में शिकस्‍त खायी है। तब से आएदिन आयोजनों में मुख्‍य अतिथि या विशिष्‍ट अतिथि के रूम में शिरकत कर रहे हैं। वे अतिथि बनाए नहीं जाते। खुद बन जाते है। तिकड़म-अकड़म लगाकर मंचासीन हो जाते है। बाकी अतिथिगण तो बीच में ही चलते बनते है। लेकिन गिरधारी लाल जी समापन तक डटे रहते है। कुरसी पर टिके रहते है। उन्‍हें कुरसी से अगाध लगाव है। उसके लिए वे किसी भी नीति को गति दे सकते है। प्रणनीति छोड़कर रणनीति अपना सकते है। दल से बेदखल हो सकते है। सत्‍तारूढ़ दल से हाथ मिला सकते है।
अमूल्‍य वोट के लिए...
गिरधारी लाल जी गत चार वर्ष में चार सौ से ज्‍यादा आयोजनों का व्‍यंजन खा चुके है। डकार तक नहीं ली। ले कैसे? लेने के लिए फुरसत ही नहीं है। आयोजन में लाइजन बनाने में मशगूल रहते है। चुनाव में लाइजन बहुत मायने रखता है। आचारसंहिता लगने से लेकर प्रचार के आखिरी दिवस तक। मतदान से लेकर परिणाम दिवस तक। लाइजन ही काम करता है। फिर लाइजन से तो वह अमूल्‍य वोट मिल जाता है,जो किसी ओर को जा रहा होता है। डकार लेने के लिए तो आयोजक व अवाम हैं ना। डकार ले सकते हैं। लेते भी होंगे।
गिरधारी लाल जी छोटे-मोटे प्रोग्रामों में तो बिना आमत्रंण के चले जाते हैं। उदर पूर्ति परिपूर्ण करके आते है। कुआं पूजन,ब्‍याह-शादी,सवामणी,जागरण,आदि-इत्‍यादि में तो जाना भूलकर भी नहीं भूलते है। उनका मानना है कि ऐसे अवसरों पर आने-जाने से भी अमूल्‍य वोट मिलता है। और क्षेत्र में गत चार वर्ष में जो भी स्‍वर्ग सिधारे हैं। उनके घर गिरधारी लाल जी अवश्‍य पधारे है। मृत्‍यु के घर जाकर श्रद्धा‍जंलि अर्पित करने से अमूल्‍य वोट बिना मूल्‍य के ही मिल जाता है। ऐसा उनका मानना है। माननीय बनने के लिए मानना पड़ता है। मान ना मान मैं तेरा मेहमान भी बनना पड़ता है। चरण स्‍पर्श का अभिनय करना पड़ता है। भले ही चरण स्‍पर्श हो या ना हो। हाथ को चरण सीमा तक ले जाकर माथे के लगाना पड़ता है। एक अमूल्‍य वोट के लिए,ना जाने क्‍या-क्‍या ढोंग-पाखंड करना पड़ता है। झूकना पड़ता। सुनना पड़ता है। वोटर की मनोभावना के अनुकूल चलना पड़ता है।

गिरधारी लाल जी इतने उदात्‍त है। उनके बिना बुलाए चले जाने से तो चलता प्रोग्राम परिवर्तित हो जाता है। घंटे आध घंटे के लिए अवरूद्ध हो जाता है। बिन बुलाए गिरधारी लाल ‘नेताजी’ पधारते है तो मेजबान को उनकी आवगभगत में पलक पॉंवड़े बिछाना पड़ता है। दरी पट्टी थोड़ी है कि झाड़ी और बिछा दी। पलक पांवड़े है,बिछाने में टाइम तो लगता है। घंटा या आधा घंटा गवाना पड़ता है। झूठ-मूठ कहना भी पड़ता है। ‘ये तो हमारा सौभाग्‍य है। बिना बुलाए आप हमारे यहां पधारे। आपके आगमन से कार्यक्रम की शोभा बढ़ गई।’ शोभा तो बढ़ी ना बढ़ी हो। लेकिन बजट अवश्‍य बढ़ जाता है। क्‍योंकि उनकी खातिरदारी न्‍यारी जो होती है।
गिरधारी लाल जी गत चुनाव में नया चेहरा था। गैर क्षेत्रीय था। वोटर ने पहचाना नहीं। पार्टी के नाम पर मत मिला। वह भी अल्‍पमत मिला। अब वे बहुमत के लिए बहुत दौड़-धूप कर रहे है। हालांकि वे ना दौड़ते और ना ही धूप में निकलते है। आहिस्‍ता–आहिस्‍ता चलते हुए छांव-छांव में जान-पहचान बढ़ा रहे हैं। पुराना चेहरा बनने की पराकाष्‍ठा पर है। क्‍योंकि गत चार वर्ष में इतने चेहरों से मुखातिब हो चुके हैं। नये चेहरे को भी पुराना बता देते हैं। नया चेहरा पुराना सुनकर प्रमुदित हो जाता है। और कहता फिरता है,‘नेताजी तो मुझे अच्‍छी तरह से जानते हैं।’ इस वहम में अपना अमूल्‍य वोट का दान नेताजी के नाम करने की सोच रखा है।
गिरधारी लाल जी आयोजनों में आयोजन से संबंधित विचार तो सोच-विचार के वक्‍त भी नहीं सोचते। बोलने का तो सवाल नहीं। वे तो अपने लच्‍छेदार भाषण से इस मानिंद आकर्षित करने में रहते है कि अमूल्‍य वोट खुद-ब-खुद खींचा चला आए। और भारी बहुमत से विजय बना जाए। गिरधारी लाल जी का मानना है कि अमूल्‍य वोट सुविचार प्रकट करने से थोड़ी आता है। वह तो भाषणबाजी के प्रंपच से फंसता हैं। लोक लुभावन घोषणाओं की मुनादी से बहकता है। सुनहरे स्‍वप्‍न दिखाने पर मतदान करता है। फिर आयोजन से संबंधित विचार प्रकट करने के लिए तो खुद आयोजक होते हैं ना। वे ही विचारों का खूब आचार डाल देते हैं।

2 May 2018

अनुभवी को प्राथमिकता


मुझे यह कहकर साक्षात्‍कार से बाहर की राह दिखा दी कि ना तो अनुभव है और ना ही अनुभव प्रमाण पत्र है। हम अनुभवी को ही प्राथमिकता देते हैं। दुख बाहर किए जाने का नहीं है। बाहर तो कई बार मुझे यार-दोस्‍तों ने भी कर दिया हैं। कई बार कुपित होकर पिताजी ने बाहर कर दिया। बाहर करना था तो कह देते,तुम्‍हारे पास अप्रोच नहीं है। तुम्‍हारे पास कोई सोर्स नहीं है। तुम्‍हारे पास फलाना नहीं है। तुम्‍हारे पास डिमका नहीं है। ये क्‍या बात हुई कि तुम्‍हारे पास अनुभव नहीं है? अरे,अनुभव तो मि‍त्रों! मित्रों के पास भी नहीं था। फिर भी हवा में उड़े की नहीं। और ऐसा उड़े कि परिंदे भी जिंदगी भर में जितना नहीं उड़े कि वे पांच साल में उतने उड़ लिए। अनुभवी को प्राथमिकता

अनुभव को प्रमाण कि क्‍या जरूरत है? अनुभव तो मेरे अंदर कूट-कूट के भरा है। यकीन न हो तो कूट-कूट कर देख लो। सैम्‍पल लेकर देख लो भाई! रक्‍त का,मांस का,मज्‍जा का। बोटी-बोटी से अनुभव टपेगा। अंग-अंग से फड़क उठेगा। इसके बाद भी अगर प्रमाण लेना ही है तो एक कागज के टुकड़े पर लिखे ढाई आखर के प्रमाण से क्‍या लेना? इस तरह के प्रमाण के प्रमाण पत्र तो रद्दी के भाव में बहुत मिल जाते हैं। लेना ही है तो कुछ दिन अवसर देकर लीजिए। फिर मेरा प्रायोगिक अनुभव देखकर अपने आप आभास हो जाएंगा।
जब पैदा हुआ,बड़ा हुआ,अपने आस-पास देखा तो अनुभव मिला। क्‍या मालिया कर्जे से डूबता छोड़ अनुभव लेकर पैदा हुआ था? उससे सीखा कि ऋण लेकर घी पीना चाहिए। फिर देश-दुनिया देखी। सीखा कि पांव पूजाने का अनुभव। जरूरत पड़ी तो पांव उखाड़ने का अनुभव भी पाया। धवल धारियों से सीखा कि वक्‍त जरूरत पड़ने पर किस तरह पलटी मारी जाती है। पलटी मारकर किस तरह बाजी जीती जाती है। गधे को बाप बनाने का हुनर तो अब पुराना हो गया। आजकल तो मैं इतना सीख गया हूं कि शेर को बच्‍चा बना सकता हूं। हाथी को पहाड़ के नीचे ला सकता हूं। ऊंट को पहाड़ पर ले जा सकता हूं। उखड़े को गाड़ सकता हूं। गाड़े को उखाड़ सकता हूं। इतना सर्वतोमुखी सम्‍पन्‍नता के बाद भी बाहर कर देना कैसे हजम होगी। बताओं भला! आज के हालात में और देश में जीने के लिए ऐसे अनुभवों की दरकार है या नहीं? एक बार मौका देकर तो देखे,दम नहीं,खम देखें,पांच सितारा बुंलदी ना देखा दो तो सच्‍चा भारतीय नहीं। आप तो धार देखें,चाहे तो उधार देखें,और एक बार सेवा का मौका दे।

मुझे पच्‍चीस तीस प्रतिशत अनुभव तो पुश्‍तैनी विरासत से मिला है। पच्‍चीस प्रतिशत संघर्ष करके अर्जित किया है और चौदह प्रतिशत साक्षात्‍कार देते रहने से हो गया है। कुलयोग किया जाए तो चौंसठ प्रतिशत होता है। मुझे मालूम है,आज के युग में चौंसठ प्रतिशत की कोई वैल्‍यू नहीं। इसलिए शेष छत्‍तीस प्रतिशत के लिए भी प्रयासरत हूं। वैसे देखा जाए तो छत्‍तीस प्रतिशत वाले नब्‍बे,पचानवे प्रतिशत वालों पर हुक्‍म चलाते हैं। साथ में वे ही अनुभव के आधार पर देश चला रहे हैं। और नब्‍बे,पचानवे वाले उनकी हां में हां और ना में ना मिलाकर भागीदारी निभा रहे हैं। अनुभव के आधार पर तो झोलाछाप डॉक्‍टर क्‍लीनिक चला रहे हैं। धड़ल्‍ले से मरीजों का इलाज कर रहे हैं और खूब पैसा कमा रहे हैं। बिना लाइसेंस धारी अनुभव के आधार पर मोटरसाईकल से लेकर ट्रक तक दौड़ा रहे हैं और ट्रैफिक पुलिस वाले उनका बाल भी बांका नहीं कर पाते। एक मैं हूं,जिसे चौंसठ प्रतिशत अनुभवी होते हुए भी बाहर की राह दिखा दी जाती है। बताओं! क्‍या यह सही है?
मुझे तो लगता है कि इन्‍हीं की वजह से मुल्‍क में मुझ जैसे अनुभवियों का हिमांक अनुपात हिमांक बिंदु से नीचे गिरता जा रहा हैं। जिसके चलते ज्यादातर अनुभवी स्‍वदेश छोड़कर विदेश के ओर पलायन कर जाते हैं और शेष बचे-खुचे यहीं रह जाते हैं। जिनके रहने के तमाम कारण हैं। जिनमें मुख्‍य कारण परिस्थिति है। और परिस्थिति अच्‍छे से अच्‍छे अनुभवी को बेरोजगारी का दामन थमा देती हैं। क्‍योंकि परिस्थिति को रोज दर-दर की ठोकरों से मिली सम्‍मान पूर्वक सेवा-सत्‍कार अच्‍छी लगती हैं।
जब बाहर निकला तो सोचा,मतलब अनुभव पाया कि अब मैं धक्‍के नहीं खाऊंगा। धक्‍के देकर आगे बढ़ना होगा। जिंदगी इतनी सरल नहीं मोहन बाबू कि सारी जिंदगी धक्‍के खाते रहो। देखना अब मेरे अनुभव का कमाल। ऐसा धमाल मचाऊंगा कि देखकर सब ढंग रह जाएंगे। जिन्‍होंने बाहर की राह दिखाई है ना वे भी देखकर दांतों तले उंगली चबाते रह जाएंगे।

14 Apr 2018

रामभरोस का भरोसा रामभरोसे


कई लोग इत्ते भरोसे के साथ यकीन दिलाते हैं कि आपका अमुख कार्य। अमुख तारीख को सुनिश्चित हो जाएंगा। यह सुनकर हम भी सुनिश्चित की चादर ओढ़कर सो जाते हैं। सुनिश्चित की अवधि समीप आने पर हमारी आंखे खुलती हैं तो सुनिश्चित की चादर अनिश्चित में समेटी हुई मिलती है। अनिश्चित में समेटी हुई चादर को आप हम तो दोबारा ओढ़ना मुनासिब नहीं समझते। पर मित्र ! रामभरोस अनिश्चित में समेटी हुई चादर को भी फैलाकर दुबारा ओढ़ लेता है। अब रामभरोस को कौन समझाए? वह किसी कि मानता भी तो नहीं। कहता है,बेचारे की कुछ मजबूरी रही होगी। वह तो तकरार में भी इनकार नहीं करता। इनकार ही किया है। इकरार तो यथावत है। इकरार है तो भरोसा भरसक है। इसे क्या मालूम? ऐनवक्त पर मना करने पर वहीं स्थिति होती है। जो चुनाव में नेताजी की ऐनवक्त पर टिकट कटने पर होती है। 
रामभरोस का भरोसा रामभरोसे
कहते है कि जिस पर भरोसा होता है। वहीं मुसीबत में काम आता है। लेकिन भरोसा देकर ऐनवक्त पर टालमटोल कर जाना। मुसीबत में एक ओर मुसीबत झेलना मजबूर करना है। फिर एक ओर एक मुसीबत मिलकर ग्‍यारह का काम करती हैं। मौका मिलने पर काम भी तमाम कर देती है। मुसीबत यहां तो आती नहीं और आती है जल्दी सी जाती नहीं। खुद तो आती है,जो आती है,अपने संग मानिसक तनाव और गृहक्लेश भी साथ लाती है। जेल से कैदी का बाहर निकलता आसान है पर  मुसीबत से निकलना मुश्किल है। मुसीबत तो मुसीबत है।
रामभरोस का जिस पर भरोसा कायम है। उसे रामभरोस के नाम में,जो ­‘राम’ है उसमें मर्यादा पुरुषोत्तम ­‘राम’ तो नजर आता है। पर राम के पीछे जुड़ा ‘भरोस’ में भरोसा दिखाई नहीं देता। वह सोचता होगा। जिसका नाम ही राम के भरोसे है यानी रामभरोस है। उस पर क्या भरोसा करें? विश्वास कुमार होतो। कम से कम नाम पर तो विश्वास रहता है। फिर चाहे वह नाममात्र का ही विश्वास कुमार क्यूं ना हो। इसमें रामभरोस का दोष थोड़ी है। मां-बाप दोषी है। जिन्होंन ऐसा नाम रखा। मां-बाप भी क्यूं दोषी है? दोषी तो ज्योतिषी है। ज्योतिषी भी क्यूं दोषी? वह तो पंचाग के मुताबिक चलता है। दोषी तो ग्रह है जिसमें इसका जन्म हुआ था। ग्रहों का भी क्या दोष है? दोष तो तुला राशि का है जिसने यह नाम प्रदान किया। इसमें तुला राशि का भी क्या दोष है? तुला राशि ने थोड़ी कहा था कि रामभरोस ही नाम रखना। तुला में रामभरोस के अलावा ओर भी अनेकानेक नाम थे। उनमें से भरोसा लायक नाम रख लेते। खैर,छोड़ों।
रामभरोस ऐसा क्या करें? उसका जिस पर भरोसा है। वह भी उस पर भरोसा कर ले। आप ही कोई सुझाव दीजिए। हो सकता है,आपका सुझाव। उसके दिमाग में घुस जाए और वह भरोसा कर ले। एक भाई साहब! ने बहुत अच्छा सुझाव दिया। भरोसा तो भरोसा है। करें ना करें उसकी मर्जी। इसमें आप-हम क्या कर सकते है सरजी। आप भी किसी के भरोसे आश्वस्त है तो जान लीजिए भाई साहब का सुझाव शाश्वत है। इसके बावजूद भी भरोसा करते हैं तो जिम्मेवारी खुद की होगी। एक दूसरे भाई साहब ने सुझाव दिया- भरोसे पर दुनिया कायम है। भरोसा है तो सब कुछ है। अन्यथा कुछ भी नहीं। सुझाव तो इनका भी वाजिब है। ऐतबार ही है,जिसकी बुनियाद पर रिश्तों की इमारत टिकी हुई है। अन्यथा कब की ध्वस्त हो गई होती। ऐतबार नहीं होता तो प्रेमी-प्रेमियों में प्रेम ही नहीं होता। प्रेम नहीं होता तो प्रेमी-प्रेमिका नहीं होती। ऐतबार है तो प्रेम है और प्रेम है तो प्रेमी-प्रेमिका है।
रामभरोस जिस पर अटूट भरोसा करता है। उसने मुझे बताया कि अधुनातन में भरोसा रहा ही कहां? जो निहायत कम बचा हुआ है। उसके भी स्वार्थ की दीमक लग गई है। जो भरोसे को धीरे-धीरे चट कर रही है। जिस पर खुद से ज्यादा विश्वास है। वहीं विश्वास का गला दबा रहा। इसीलिए तो भाई भाई से आंखे नहीं मिला रहा है। उसी ने आगे बताया कि भाई साहब ! होने को तो भरोसा तो भरसक होता है। लेकिन जिस पर भरोसा होता है। वहीं विश्वासघात निकल आए तो इसमें भरोसा भी क्या करे? रही बात रामभरोस की,जिसका नाम ही रामभरोस है। उस पर भरोसा करना भी रामभरोसे ही है।


4 Apr 2018

मूर्ख नहीं डेढ़ गुणा समझदार


मोहनलाल मौर्य
आप भले ही उसे मूर्ख समझते होंगे। वह तो अपने आपको समझदार समझता है। समझता क्या है? समझदार है। उसका अभिनय देखकर मूर्ख समझना आपकी ही मूर्खता हैं। वह तो मूर्खता के नेपथ्य में अभिनयचातुर्य है। मूर्खता ही उसका पेशा है और वह अपने पेशे में सिद्धहस्‍त है। सच में मूर्खता का अभिनय तो कोई उससे ही सीखे। सीखे नहीं तो देखे अवश्‍य। किस तरह मूर्खता का अभिनय करता है। मूर्ख नहीं डेढ़ गुणा समझदार

वह निरुत्तर रहता है। लेकिन उसके निरुत्तर में प्रत्युत्तर होता है। अब आप सोच रहें होंगे प्रत्‍युत्‍तर होता है तो देता क्‍यूं नहीं? क्‍योंकि वह आपको ही मूर्ख समझता है। इसलिए प्रत्‍युत्‍तर नहीं देता। आपको विश्‍वास नहीं होगा। एक दफा उसने मुझे बताया था कि उस मूर्ख के मुंह लगना मूर्खता है। यह सुनकर एक बार तो मैं भी हक्‍का-बक्‍का रह गया। आप उसे मूर्ख समझते है और वह आपको। समझ में नहीं आता कि आप दोनों में से मूर्ख कौन है और ज्ञानी कौन है? वह या आप। वह लगता नहीं और आप होंगे नहीं। आप अपने आपको समझदार जो समझते हो। इस असमंजस से मैं खुद असमंजस में हूं। खैर छोडों।
कहीं आप मुझे भी तो मूर्ख नहीं समझ रहे है। कुछ लोग मूर्खो जैसी वार्ता करने वालों को भी मूर्ख समझ लेते हैं। आपने ज्ञानी जनों से सुना भी होगा। देखों कैसी मूर्खो जैसी बात कर रहा हैं। आप मुझे भी मूर्ख समझ रहे है तो ठीक ही समझ रहे है। क्‍योंकि मूर्ख से कोई जल्‍दी सी उलझता नहीं है। उलझता है तो गुत्थी झुलझती नहीं। इसलिए मेरी तो मूर्खता में ही समझदारी है। मूर्खता में समझदारी का फायदा एक नहीं,अनेक है। एक तो ज्‍यादा माथापच्‍ची नहीं करनी पड़ती है। दूसरा अपना काम आसानी से हो जाता है। और किसी को संदेह भी नहीं होता कि बंदा मूर्ख नहीं समझदार है।
आप जिसे मूर्ख समझते होना उसे ही देख लो। आपसे अपना स्वार्थ नि:स्वार्थ करवाना उसकी फितरत है। चेहरे पर भोलापन और जुबान में मिठापन नैसर्गिक लगे ऐसे बोल बोलता है,जो उसका हुनर है। अजीबोगरीब वार्ता कर अपना उल्लू सीधा करना उसकी मूर्खता नहीं,चालाकी है। अब तो आप समझ गए ना कि वह मूर्ख नहीं है। बल्कि मूर्खता के नेपथ्‍य में डेढ़ गुणा समझदार है। अब भी आपको यकीन नहीं हुआ है तो ऐसा कीजिए खुद ही उसकी मूर्खता की तहकीकात कीजिए। अपने आप ही आभास हो जाएंगा।
आप जैसे समझदार को क्‍या समझाए? फिर भी एक बात अवश्‍य ध्‍यान रखएंगा। जिसमें आपकी भलाई है। अपनी समझदारी अपने पास ही रखिये। कहीं ओर काम आएंगी। यहां ही व्यर्थ कर दी तो कहीं ओर किससे काम चलाओंगे। क्‍योंकि समझदार होना तो बनता है पर समझदारी दिखाना कहां चलता है। जहां चलता है वहां चलाए। किंतु देखकर चलाए। कहीं कोई चालान नहीं काट दे। चालान कट गया तो समझ लो जुर्माना भरना ही पड़ेगा। और समझदारी दिखाने का जुर्माना बहुत महंगा पड़ता है। अब भी आपको समझ में नहीं आई तो कभी आएंगी भी नहीं।

25 Mar 2018

आपकी अंतिम यात्रा मंगलमय हो


प्रिय मित्र,
               सप्रेम नमस्‍ते।

इंटरनेट के युग में भारतीय डाक सेवा से आपका पत्र प्राप्‍त हुआ। बड़ी प्रसन्‍नता हुई। आपने पत्र में लिखा कि मैं परलोक की सैर करना चाहता हूं। उसके लिए क्‍या करना होगा? प्रिय मित्र! मित्र होने के नाते मैं आपको बता दू कि परलोक की सैर कोई सैर-सपाटा नहीं हैं कि आप घुम-फिरकर वापस घर लौट आए। यह जिंदगी की अंतिम यात्रा है,जो एक ना एक दिन हम सभी को करनी होती है। यहीं एकमात्र ऐसी यात्रा है जिसमें यात्री का किराया भत्‍ता यात्री से वहन नहीं किया जाता है। और ना ही यात्रा में यात्री को किसी भी तरह की सुविधा से महरूम होने दिया जाता है। कर्मफल के मुताबिक वे तमाम सुविधाएं प्रदान की जाती है जिनका यात्री हकदार है। किसी कारणवंश सुविधाएं नहीं भी मिले तब भी दुखी होने की जरूरत नहीं हैं। परलोक के मुख्‍य प्रबंधक यमराज के द्वारा बिना कहे-सुने ही अपने आप ही व्‍यवस्‍था हो जाती है।

इस यात्रा कि और यात्राओं की तरह पूर्व तैयारी नहीं करनी होती हैं और ना ही पूर्व में रिजर्वेशन करवाने की जरूरत है। जिस दिन की यात्रा होती है,उसी दिन तत्‍काल में टिकट तथा सीट मिल जाती है। ना ही किसी तरह के सामान की जरूरत हैं। इहलोक से परलोक चलने वाली गाड़ी भारतीय रेल की तरह नहीं है,अपने निर्धारित समय से चलती है। एक सेकण्‍ड भी लेट नहीं होती है। इस गाड़ी में यात्री को भारतीय रेल के यात्रि‍यों की तरह हिदायत नहीं दी जाती है कि सहयात्री से किसी भी तरह का खान-पीन नहीं करें। इसमें आप  किसी भी सहयात्री के साथ खान-पीन कर सकते है। खूब मौज-मस्‍ती कीजिए। जो मन में आए कीजिए। किसी तरह की कोई रोक-टोक नहीं है। बेरोकटोक है। लेकिन सहयात्री का सौभाग्‍य हर किसी के भाग्‍य में नहीं होता। यह तो किसी भाग्‍यशाली यात्री को ही प्राप्‍त होता है।

ये मित्र! एक बार फिर से बता रहा हूं कि परलोक की यात्रा करना आपके हाथ में नहीं। और यात्राओं की तरह नहीं है कि टिकट विंडों पर गए। लाइन में लगे। टिकट कटवाया और यात्रा के लिए चल दिए। इस यात्रा की यात्रा तो अचानक होती है। इसलिए इसकी चिंता अभी से मत कीजिए। चिंता से उनमुक्‍त हो जाए और जिंदगी का आनंद लीजिए। इसके बावजूद भी परलोक की यात्रा करना चाहते है तो जाने से पहले एक ओर बात बता दू कि किसी भी निजी या अजीज को कुछ भी मत बताकर जाना। चुपचाप ही निकल जाना। तब तो आपकी यात्रा मंगलमय होगी। बताकर गए तो पिछे वालों पर तलवार लटकती रहेंगी। किसी से लेनदेन होतो चुकती कर जाना। अन्‍यथा पिछे वालों पर ब्‍याज की गाज गर्जती रहेंगी। मोहमाया में फंसे हुए पेंचों को निकालकर जाना। अन्‍यथा पेंच यात्रा में बाधा उत्‍पन्‍न कर सकते हैं।

आपके जाने के बाद बहुत सी सामाजिक रवायत होगी। जिनमें दकियानूसी ज्‍यादा होगी। उनकी आपको जरा भी फिक्र नहीं करनी है। जिन्‍हें फिक्र करनी हैं,वे अपने आप कर लेगे। बारह दिन तक तो करते भी हैं। तेरहवें दिन फिक्र मुक्‍त हो जाते हैं। लिखने को तो और भी बहुत कुछ बाकी रह गया हैं। लेकिन इन्‍हीं कामनाओं के साथ आपकी अंतिम यात्रा मंगलमय हो।
                                                                   - आपका मित्र

17 Mar 2018

अंतिम मैसेज ‘बिलकुल’ लिखकर ‘वलेस’ कुल को छोड़कर चल बसे व्‍यंग्‍यकार सुशील सिद्धार्थ



मोहनलाल मौर्य  
उत्‍तर प्रदेश के सीतापुर के भीरा,बिसवां में 2 जुलाई 1958 को जन्‍में प्रख्‍यात व्‍यंग्‍यकार सुशील सिद्धार्थ का शनिवार सुबह निधन हो गया। 60 वर्ष की उम्र में इस तरह से चले जाना व्‍यंग्‍य जगत में शोक की लहर दौड़ गई। उनके निधन की खबर जिसने भी सुनी विश्‍वास नहीं हुआ कि अद्भुत व्‍यक्तित्‍व के धनी अप्रत्‍याशित अलविदा कैसे हो गए। मैं खुद स्‍तब्‍ध हूं।


नए-पुराने,नवोदित स्‍थापित व्‍यंग्‍कारों को एक मंच पर लाने के लिए वे अ‍हर्नशि आमादा रहते थे। इसके लिए उन्‍होंने 22 जुलाई 2015 को वलेस (व्‍यंग्‍य लेखक समिति) के नाम से वाट्सऐप ग्रुप बनाया था। जिससे मुझ जैसे नवोदित से लेकर समकालीन व्‍यंग्‍य शिरोमणि पद्मश्री ज्ञान चतुर्वेदी सहित बहरहाल 61 सदस्‍य है। इस ग्रप में वे नित्‍य व्‍यंग्‍य में नवाचार एवं आगामी योजनाओं पर प्रकाश डालते रहते थे तथा व्‍यंग्‍यकारों की प्रकाशित,अप्रकाशित व्‍यंग्‍य रचनाओं पर बेबाक टिप्‍पणी देकर उन्‍हें अवगत करवाते थे। व्‍यंग्‍य विधा में उनके अमूल्‍य योगदान को कभी भूलाया नहीं जा सकता है। वे व्‍यंग्‍य पर बहुत बारीक से अपना वक्‍तव्‍य रखते थे तथा सदैव व्‍यंग्‍य के संदर्भ में समर्पित रहते थे। नवोदितों व्‍यंग्‍यकारों के तो वे एक तरह से भगवान ही थे। क्‍योंकि नवोदितों पर उनका विशेष फोक्‍स रहता था।


वलेस ग्रुप में सबसे पहले वरिष्‍ठ व्‍यंग्‍यकार अं‍जनी चौहान का मैसेज आया सुशील सिद्धार्थ नहीं रहे। ये देखकर तमाम वलेसी स्‍तब्‍ध रह गए। वलेस ग्रुप में वरिष्‍ठ व्‍यंग्‍यकार निर्मल गुप्‍त की एक पोस्‍ट के नीचे बीती रात 8.53 पर अंतिम मैसेज ‘बिलकुल’ लिखकर ‘वलेस’ कुल को छोड़कर चल बसे। इससे पूर्व उन्‍होंने ‘सुदर्शन जी अपने व्‍यंग्‍य का टेक्‍स्‍ट लगाओं’ लिखा था। और फेसबुक पर उनकी अंतिम पोस्‍ट ‘लिखे जा रहे व्‍यंग्‍य आखेट का अंश’ था तथा ‘आखेट’ नाम से उनका नवीनतम व्‍यंग्‍य सग्रंह प्रकाशन की तैयारी में है। जिसमें इकलातीस व्‍यंग्‍य हैं। जिसका आवरण सुशील सिद्धार्थ ने सोशल मीडिया पर पोस्‍ट किया था।


वे मेरे सबसे प्रिय व्‍यंग्‍यकार नहीं अपितु मेरे गुरु भी थे,जो कि मुझे समय-समय पर मार्गदर्शित करते रहते थे। उनसे मेरा जुड़ाव फेसबुक के जरिए हुआ था। वलेस ग्रुप में जुड़ने के बाद तो अक्‍सर वार्तालाप होती रहती थी। उनके साक्षात दर्शन 23 दिसम्‍बर 2017 को प्रथम ज्ञान चतुर्वेदी सम्‍मान के अवसर पर भोपाल के स्‍वराज भवन में हुए थे। जिसमें खासतौर से उन्‍होंने आमंत्रि‍त किया था। और में इस कार्यक्रम मैं सबसे पहले आने वाले आगंतुक के रूप में उपस्थित हुआ था। वहां दो दिन तक उनके साथ रहा। उनके साथ बिताए वे पल हरपल याद रहेंगे।


साधारण सादगी से सराबोर सुशील सिद्धार्थ की अब तक प्रीति न करियों कोय, मो सम कौन, व्‍यंग्‍य संग्रह में नारद की चिंता,मालिश महापुराण,हाशिये का राग,सुशील सिद्धार्थ के चुनिंदा व्‍यंग्‍य,राग लन्‍तरानी,दो अवधी कविता संग्रह। इनके अलावा इनके संपादन में पंच प्रपंच, व्‍यंग्‍य बत्‍तीसी,श्रीलाल शुक्‍ल संचयिता,मैत्रेयी पुष्‍पा रचना संचयन,नये नवेले व्‍यंग्‍य,व हिंदी कहानी का युवा परिदृश्‍य (तीन खंड) आदि किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं।


साहित्‍य क्षेत्र में सुशील सिद्धार्थ का नाम जाना पहचान था। खासतौर पर व्‍यंग्‍य विधा में। वे किसी परिचय का मोहताज नहीं थे। उनका परिचय देना सूर्य को दीपक दिखाना है। हाल ही में उनको कोटा में व्‍यंग्‍यश्री सम्‍मान से नवाजा गया था। इससे पूर्व वे हिंदी संस्‍थान उत्‍तर प्रदेश से दो बार व्‍यंग्‍य में और दो बार अ‍वधी कविता के नामित पुरस्‍कारों से सम्‍मानित हो चुके हैं। इनके अलावा लखनऊ से अवधी शिखर सम्‍मान,भोपाल से स्‍पंदन आलोचना सम्‍मान,और दिल्‍ली से शरद जोशी से सम्‍मान से नवाजे जा चुके हैं। उनको मेरे तरफ से भावभीनी श्रद्धांजलि।

1 Mar 2018

होली की होली, भड़ास की भड़ास

मोहनलाल मौर्य

वह ‘बुरा न मानों होली है’ कहता हुआ घर से निकला है। रंग-गुलाल हाथ में हैं तथा मन में भड़ास की भावना है। वह जिस पर रंग-गुलाल लगाकर भड़ास निकालने के फिराक में है उस पर भी कोई ना कोई भड़ास निकालने के लिए आतुर है। वह भी कह देगा, ‘बुरा न मानों होली है।’होली पर्व पर होता भी ऐसा ही है। जिसके रंग-गुलाल लगाना चाहते हैं,उसके तो लगता नहीं। किसी ओर के लग जाता है। होली खेलने का मजा भी तभी आता है जब इसके उसके रंग लगता है। फिर मजे-मजे में भड़ास तो स्वत: ही निकल जाती है।  होली की होली भड़ास की भड़ास

भड़ास निकालने वाले का सलीका अलहदा होता है। उसकी विशेषता हस्तकौशल में परिपूर्ण होता है,उसके हाथों में अपेक्षाकृत ज्यादा रंग-गुलाल होता है। पहले आलिंगन प्रवृत्ति अपनाता है। उसके उपरांत होली खेलते-खेलते भड़ास निकाल लेता है। अपनी भड़ास पूर्ण नहीं हो। जब तक रंग-गुलाल लगाता रहता हैं। किसके रंग-गुलाल लगाना है और किससे नहीं। यह नहीं देखता,जो मिल गया वहीं सही। अलबत्ता कई बार विपरीत हो जाता है। सेर को सवा सेर मिल जाता है। जब सेर सवा सेर से मुखातिब होता है। तब भड़ास तो भाड़ में घुस जाती है और दोनों रंग-गुलाल की बौछार से सराबोर हो जाते हैं। फिर होली खेलते-खेलते हमजोली हो जाते हैं। 

हमजोली मिलकर टोली बनाते हैं। टोली बनाकर हल्ला-गुल्ला करते हुए घर-घर होली खेलने जाते हैं। होली पर टोली की टोली आती देखकर जो दरवाजा बंद कर लेता है। उसको रंगने के लिए अपने-अपने हथकंडे अपनाते हैं। जिसका हथकंडा लगा गया और दरवाजा खुल गया। वह दरवाजा खुलते ही रंग-गुलाल लगाता है और भड़ास निकालने वाला रंग-गुलाल की आड़ में होली खेलते-खेलते भड़ास भी निकाल लेता है।

मन की भड़ास निकालने का सुअवसर होली पर्व पर जो मिलता है। ऐसा अवसर ओर दिन कहां मिलता हैमन से भड़ास निकल जाती है और तन पर रंग-गुलाल चढ़ जाती है। मन-तन की अभिलाषा पूर्ण हो जाती है। जो प्राय: हो नहीं पाती। मन की अभिलाषा पूर्ण होती है तो तन की नहीं होती और तन की होती है तो मन की नहीं होती। जब मन-तन की अभिलाषा एक साथ पूर्ण होती है। तब उसके लिए वह दिन होली दिवाली से कम नहीं होता। जब दिन ही होली का मिल रहा है तो वह अभिलाषा पूर्ण क्यों नहीं करेगावह तो अवश्य करेगा। सालभर से वह इसी दिन के इंतजार में तो रहता है। कब होली आए और कब भड़ास निकालु।

टोली के संग होली का आनंद


मोहनलाल मौर्य
मुझे तो अकेले होली खेलना कतई पसंद नहीं है। मैं घर से अकेला होली खेलने निकलता हूं तो घर से निकलते ही दबोच लेते हैं। टोली की टोली तैनात जो रहती हैं। गत वर्ष सीना तानकर होली दंगल में उतरा था। पर जो हाल हुआ था वह मैं ही जानता हूं। होली दंगल में उतरते ही ऐसी पटकनी दी कि चारों खाने चित आया। रंग-गुलाल से सराबोर होकर घर आया और आकर आईने में चेहरा देखा तो आईना भी मुझ पर हस रहा था। जो ओर दिनों खामोश रहता था। आईने से झूठ भी नहीं बोल सकता। उसे सब पता रहता है। वह वहीं बताता है जो खुद देखता है और आईना ही तो है,जो सच बोलता है। खैर,छोड़ों। होली पर्व ऐसा तो होता आया है। पर जो टोली बनाकर होली खेलने में मजा आता है वह भला अकेले में कहां आता हैटोली के संग होली  का आनंद
होली पर टोली अनायास ही बन जाती है। टोली बनते ही पूरी की पूरी टोली जिस गली से निकलती है तो अच्छे-अच्छों की रंग-गुलाल फीकी पड़ जाती है। बंदा सोचता रह जाता है कि किसके रंग-गुलाल लगाऊं और किसके नहीं लगाऊं। वह एक के लगाएंगा तो उस पर पूरी-पूरी टोली हमला कर देती हैं। इसलिए बचकर निकलना ही मुनासिब समझता है। पर उसका बचना नामुनासिब है। ट्रैफिक हवलदार से बचकर निकल सकते हैं। पर होली पर टोली से बचकर निकलना मुमकिन नहीं नामुमकिन है। क्योंकि उसके पीछे ग्यारह मुल्कों की पुलिस नहीं। बल्कि गली-मोहल्ले के वे लडक़े होते हैं,जो एक साथ टूटकर पड़ते हैं। ऐसा रंगते है कि वह भी टोली में शामिल हो जाता है।
जब टोली की हुड़दंग और होली की मस्ती मिल-बैठते हैं। तब पिचकारी पिचक जाती है और काला पेंट परवान चढ़ जाता है। रंग-गुलाल मुंह ताकते रह जाते हैं। सोचते है कि किसी खूबसूरत लोहे पर जाकर तो मुंह काला नहीं करता। अपुन के पर्व पर आकर अपनी टांग फंसा देता है,कमबख्त कहीं का। होली पर टोली वालों के सम्मुख कोई समझदारी दिखाता है,तो वे कीचड़ को भी रंग-गुलाल समझकर उसके चेहरे पर पोत देते हैं। इनका मानना है कि कीचड़ में कमल खिल सकता है तो कीचड़ से होली खेलने में क्या बुराई है? जो समझदारी नहीं दिखाता है और हंसी-खुशी से टोली के संग होली खेलता है,उसे रंग-गुलाल से सराबोर कर देते हैं। फिर उसका चेहरा नहीं,उसके सफेद दंत भी रंग-बिरंगे दिखते हैं।
अबकी बार मैं भी टोली के संग होली दंगल में उतरुगा। इसके लिए चाहे मुझे गठबंधन क्यों ना करना पड़े? जब राजनैतिक पार्टियां ही चुनावी दंगल में गठबंधन करके उतर सकती हैं,तो भला मैं क्यूं नहीं होली दंगल में उतर सकता? देखना मैं भी किसी ना किसी टोली से गठबंधन करके होली पर ऐसा धमाल मचाऊंगा की सब मेरे रंग में रंग जाएंगे। देखने वाले देखते रह जाएंगे और रंग-गुलाल लगाने वाले रंग-गुलाल लगाकर चले जाएंगे।