19 Aug 2018

मृत्युभोज की लपटें


मुर्दे की राख ठंडी भी नहीं हुई थी। मृत्युभोज की लपटें उठने लगी। उठती लपटों को बुझाने के बजाय सुलगाने लगे। लपटें श्मशान से घर तक आ गई। परिजनों को चपेट में लेने लगी। मृतक की पत्नी बेसुध थी। बच्चे विलाप में डूबे हुए थे। मृत्युभोज की लपटे छूते ही तिलमिला उठे। समाज बोल उठा,‘यह लपटें तो सहनी पड़ेगी। आज नहीं तो कल। इनसे बचना मुश्किल है। हर हाल में सहना होगा। बहरहाल सह लिया तो हर तरह से बच जाओगे।’

सांत्वना देने आए नाते-रिश्तेदारों ने भी समाज के वक्तव्य को विहित बताया। अपने वक्तव्य से चेताया भी। यहाँ हस्तियों को कब तक रखेंगेइन्हें गंगा में विसर्जित करनी होंगी। तभी मृतकी आत्मा को आत्मशांति मिलेगी। नहीं तो भूत-प्रेत बन जाएगा। भूत-प्रेत बन गया तो तुम्हें ही हैरान करेगा। मानते हैं इस वक्त लपटे तीव्र है पर जब तक सहन नहीं करोगे। तब तक धधकती रहेगी। बुझेगी नहीं। बल्कि बाद में तो समाज तानो का केरोसिन डालकर ज्यादा दहकाता रहेगा। उस वक्त तिलमिलाओगे ही नही। तड़पोगे भी। बाद में एक दिन चुपचाप सहन भी करोगे। तो अभी कर लो। मृत्युभोज भारी बोझ है। लंबे समय तक उठाए रखना मूर्खता है। इस बोझ को तो तेरहवीं पर ही उतार देना चाहिए। जो तेरहवीं पर नहीं उतारते हैं। वे इस के बोझ तले दबकर मर भी जाते हैं। कई मर भी गए हैं। जो इस बोझ तले दबकर मरते हैं,वे बोझ पर बोझ छोड़ जाते हैं। जो फिर पीछे वालो से उतारने से भी नहीं उतरता। इसलिए ज्यादा सोच-विचार मत करो,सहन कर लो।
सबकी सुनकर मृतक की पत्नी साड़ी के पल्लू से आँसू पोंछती हुई बोली,‘सहन कैसे करेसहने के लिए पैसा चाहिए। पैसा है नहीं। जो था मृतक की बीमारी में लग गया। एकमात्र पचास हजार की एफडी बची है,जो बच्चों के भविष्य को संवारने में काम आएगी। एफडी तुड़वाकर सहन कर लिया तो बच्चों का भविष्य चौपट हो जाएगा। जब बच्चे काबिल होंगे। तब सहन कर लेंगे। बहरहाल तो मृत्युभोज की उठती लपटों पर पानी डालिए। हमें बचाइए। यहीं हमारे प्रति तुम्हारी सांत्वना होगी।’
उसकी संवेदना पर किसी ने भी सांत्वना की बाल्टी से पानी नहीं डाला। मरने वाला मर कर भी नहीं मरा था। बस उसका शरीर पंचतत्व में विलीन हुआ था। मर गया होता तो मृत्युभोज की लपटें नहीं उठती। पता नहीं कब और किसकी मृत्यु पर यह लपटे उठी थी,जो आज तक नहीं बुझ पाई है। लपटे बेकाबू होने लगी। काबू में करने के लिए परिजनों ने संवेदना के पानी से भरी मटकिया उड़ेलने लगे। फिर भी मृत्युभोज की लपटें बुझी नहीं। बल्कि ज्यादा दहकने लगी। दहकती हुई चारों तरफ फैल गई। बचना मुश्किल था। अपनी आगोश में ले उससे पहले ही एफडी व कर्ज की फायर ब्रिगेड से नियंत्रण किया। 

यह देखकर खामोश हस्तियां भी हंसने लगी। बोली,‘यह कैसी रवायत है? हमें गंगा में विसर्जित करने के लिए इस तरह तामझाम। कुटुंब सहित गंगा स्नान। मृत्युभोज के नाम पर सामूहिक भोज। जिसमें एक से बढ़कर एक पकवान। मेहमानों को स्मृति भेट। जानवर भी अपने साथी के मरने पर वियोग करते हैं और यहाँ मनुष्य अपने सगे-संबंधी के मरने पर भोज करने पर तुले हैं। खुशी के मौके पर तो मिठाइयां चलती है पर मरने पर शर्मनाक है। यह व्यर्थ खर्च नहीं तो और क्या है? यह तो पीड़ादायक कुरीति है।’

पर हस्तियों की सुनने वाला कौन था? वे तो मटकी के अंदर थी। ऊपर से मुँह सफेद कपड़े से  बंधा हुआ था। बाहर तो आवाज ही नहीं पहुँची होगी। जिस दिन मटकी के मुँह पर से सफेद कपड़ा हट गया। खुद हस्तियां ही मृत्युभोज पर प्रतिबंध लगा देंगी। अंततः अस्थियां गंगा में विसर्जित की गई और तेरहवीं पर मृत्युभोज होकर ही रहा।

29 Jul 2018

एक पाठक की धमकी


मुझे मोबाइल पर किसी ने धमकी दी है। धमकी दी है तो अंजाम भी देगा। सोचा मिली धमकी की सूचना पुलिस को इतला कर दूं,क्‍योंकि जान है तो जहान है।बिना समय गवाए पुलिस थाने पहुँच गया। थानेदार साहब से घबराते हुए बोला, ‘साहबअब आप ही कुछ कीजिए। वरना ज़िंदगी की पिच पर बिना रन लिए ही आउट हो जाऊंगा। यह सुनकर थानेदार साहब ने कहा कि घबराईए मत। आहिस्‍ता-आहिस्‍ता बताइए,आखिरकार हुआ क्‍या है,तबी हम कुछ कर पाएंगे।
मैं बोला,साहब! सुबह-सुबह भगवान का स्‍मरण कर रहा था। तबी मोबाइल थरथराया। भगवान से स्‍मरण टूटकर मोबाइल से स्‍मरण जुड़ा। कॉल रिसीव की,स्‍मरण मरण में बदल गया।
अच्‍छा तो पहले यह बताओं कि तुम करते क्‍या हो?
साहब! मैं तो एक अदना सा लेखक हूँ। यदा-कदा लिखता हूँ। पत्र-पत्रि‍काओं में लगभग रोज छपता हूँ।
यदा-कदा लिखते हो तो रोज कैसे छपते हो। 
साहबवह क्‍या है कि सप्‍ताह में एक रचना लिखता हूँ और वही ही किसी ना किसी अखबार में रोज सप्‍ताह भर छपती रहती है। इसलिए रोज छपता हूँ। 
जरूरी तुम्‍हारी सम्‍पादकों से सांठगांठ होगी। 
नहीं साहब! सांठगांठ नहीं हैं। उनकी ईमेल आईडी हैं। जिन पर रचना प्रेषित कर देता हूँ। अगले दिन छप जाता हूँ। अगले दिन नहीं,तो उससे अगले दिन छप जाता हूँ। उससे भी अगले दिन नहीं छपु तो अन्‍यत्र भेज देता हूँ। लेकिन सम्‍पादक की ओर  से कोई रिप्‍लाई नहीं आती।
जरूर तुमने किसी के खिलाफ उल्‍टा-सीधा लिखा होगा।
साहबउल्‍टा-सीधा का क्‍या मतलब? मैं तो सीधा लिखता हूँ। आप चाहे तो मेरी हैंड राइटिंग देख सकते है।
अरेमूर्ख मैं हैंड राइटिंग की बात नहीं कर रहा। किसी लेख-वेख में उल्‍टा-सीधा तो कुछ नहीं लिखा ना। 
साहब!लेख तो मैं लिखता ही नहीं हूँ।
थानेदार साहब! झुंझलाते हुए बोले, ‘अबे तो तून अभी कहा ना मैं लेखक हूँ। लेखक लेख नहीं लिखता तो ओर क्‍या लिखता है? भजन लिखता है क्‍या? साहब मैं तो व्‍यंग्‍यलिखता हूँ। 
तो किसी व्‍यंग्‍य में उल्‍टा-सीधा लिख दिया होगा। 
साहबव्‍यंग्‍य सीधा-सीधा थोड़ी लिखा जाता हैं। व्‍यंग्‍य तो उल्‍टा-सीधा ही लिखा जाता है।
अब आया ना ऊॅट पहाड़ के नीचे। जरूर तुने सरकार के खिलाफ व्‍यंग्‍य कसा होगा। 
नहीं साहब! 
तो किसी राजनेता के खिलाफ...या किसी भू माफिया के खिलाफ... या किसी डॉन या चोर उचक्‍के के खिलाफ...।
 नहीं साहब! 
जरूर किसी वरिष्‍ठ या गरिष्‍ठ साहित्‍यकार के खिलाफ व्‍यंग्‍य कसा होगा। 
नहीं साहबव्‍यंग्‍य तो विसंगतियों पर लिखा जाता है। 
तो तुझे अभी मैंने जो बताए उनमें विसंगतियां नहीं दिखती?
दिखती है ना साहब! तो लिखता क्‍यों नहीं? लिखता हूँ, ना साहब!
अबे मुझे क्‍यूं कंफ्यूज कर रहा है। कभी कहता है नहीं लिखता हूँ,साहबकभी कहता है लिखता हूँ,साहबखैर छोड़। यह बताओं धमकी देने वाले ने क्‍या कहा था?
साहबठीक से याद नहीं,पर इत्‍ता जरूर याद है कि उसने यह कहा था कि अपने मन के मुताबिक मत कर वरना अंजाम बहुत बुरा होगा।
तो तुमने क्‍या बोला?
मैंने उससे कहा कि मैंने क्‍या गुनाह किया है? फिर वह क्‍या बोला? थानेदार साहब ने यह मुझसे पूछा। बोला क्‍या? कॉल कट गई या काट दी गई।
थानेदार साहब! ने अपने मुखबिर को सूचित किया। एक घंटे बाद मुखबिर ने धमकी देने वाले का नाम,पता बता दिया। थानेदार साहब ने उससे बात की। उसने धमकी की यह वजह बताई, जो उस वक्‍त मेरे समझ में नहीं आ रही थी। थानेदार ने मुझसे कहायह तुम्‍हारा प्रिय पाठक है। लो इससे बात करों।’ 
मैंने फोन लियाहैलों...लेखकजी मैंने धमकी नहीं हिदायत दी थी कि तुम जब भी लिखते हो अपना की रोना रोता रहते हो। कभी हमारी भी सुन लिया करों। रोजी-रोटी,रोजगार,महामारी,महंगाई,भ्रष्‍टाचार,की बात कर लिया करों। तुम्‍हें अपने रोने-धोने से,पुरस्‍कार पाने से, साहित्‍यक राजनीति से फुर्सत मिले तो कभी हमारें गाँव आकर देखना। हमारें यहाँ पर पानी नहीं। बिजली नहीं। सड़क नहीं। अस्‍पताल नहीं। बैंक नहीं। स्‍कूल नहीं। आवागमन के लिए बस नहीं। गरीबी,भूखमरी,तथा बेरोजगारी से जनता त्रस्‍त और सरकार मस्‍त हैं। लेकिन तुम तो पुरस्‍कार के लिए लड़ते हो। अध्‍यक्षता के लिए भिड़ते हो। वरिष्‍ठता का बखान करते हो। कलम सिर्फ कागज पर घिसने के लिए नहीं होती। इसे संगीन बनाओं तो ही असर करती है। कहकर उसने फोन काट दिया।
उसकी बातें सुनकर मैं थाने से वापस आ गया। तब से मैं यह सोच-सोचकर कोमा में हूँ कि अगर सारे पाठक ऐसे ही लेखकों को धमकाने लगे,उन्‍हें सच का आईना दिखाने लगे तो हम लेखकों का क्‍या होगा?

24 Jul 2018

घर बैठे समस्या का समाधान

आजकल सबको घर बैठे-बिठाए समाधान चाहिए। खर्चा-पानी भले ही चार गुना लग जाए। लेकिन समस्या का समाधान घर बैठे ही होना चाहिए। रोज व्यक्ति को अनेकानेक समस्याओं से लड़ना पड़ता है। इस दौरान कभी चारों खाने चित तो कभी हार का मुंह देखना पड़ता है। इस हार-जीत से छूटकारा पाने के लिए,वह घर बैठे समाधान चाहता है। घर बैठे समस्या का समाधान 

आजकल घर बैठे समाधान करने वाले भी,हर जगह दुकान खोले बैठे हैं। इन्‍होंने अपना कारोबार ऑनलाइन से लेकर ऑफलाइन तक फैला रखा है। इनकी दुकान कस्टमर को पटाने के तमाम नायाब तरीकों से खचाखच भरी हुई रहती है। एक बार जो कस्टमर आ गया। वह समाधान खरीद कर ले ही जाएगा। यह समस्या का समाधान गारंटी के साथ करने का दावा भी करते हैं।

मसलन, गृह-क्लेश,आपसी मनमुटाव,पति-पत्नी में अनबन, गुप्त रोगी आदि इत्यादि समस्याओं का गारंटी के साथ घर बैठे समाधान। श्रीश्री गुरुजी द्वारा तैयार किया कवच मंगवाए। उसे पहनिए और समस्याओं से छूटकारा पाए। समस्या का समाधान नहीं हो तो पूरे पैसे वापस। तो देर किस बात की मोबाइल उठाइए और नीचे दी गई स्क्रीन पर दिए गए नंबरों पर लगाइए और घर बैठे हमारा प्रोडक्ट मंगवाए। जब टीवी स्क्रीन पर इस तरह का विज्ञापन बार-बार आता है तो लोग उसे ललचाए निगाहों से देखते हैं। और देखते-देखते ही ऑडर कर देते हैं। 

चाचा ग्यारसी लाल कई दिनों से किसी समस्या से जूझ रहे थे। चाचा ने लगा दिया फोन। एक सप्ताह उपरांत आया पार्सल। चाचा ने पार्सल खोला। पार्सल में घास-फूस और एक चिट्ठी थी। जिस तरह बस में लिखा हुआ होता है,‘सवारी अपने सामान की रक्षा स्वयं करें।’ उसी तरह चिट्ठी में लिखा हुआ था,‘अपनी समस्या का समाधान स्वयं करें।’ यह पढ़कर चाचा अपना सिर पीटने लगे। मैंने कहा, ‘चाचाश्री! सिर  पीटने से अब कुछ नहीं होगा। ऐसे समाधान होने लगे तो पता है न आपको देश में कितनी समस्याएं हैं। गिनाने लगे तो सुबह से शाम हो जाएगी। अगर ऐसे समाधान होते तो हमें दुश्मन से लड़ने की जरूरत ही नहीं होती। समस्याओं का ऐसे समाधान होने लगता तो मुल्क में भ्रष्टाचारमहंगाईबेरोजगारी, ऐसे खुलेआम नहीं घूमती। हमारे यहां तो टोल फ्री हेल्प लाइन पर समस्याओं का समाधान नहीं होता। सौ बार फोन लगाओं तो बड़ी मुश्किल से एक बार लगता है। जब तक पूरी जन्‍म कुण्‍ड़ली नहीं जान लेंगे उससे पहले शिकायत दर्ज नहीं करते। शीघ्र आपकी समस्‍या का समाधान कर दिया जाएंगा। यह कहकर पूरी बात सुनने से पहले फोन काट देते हैं।’  
चाचा बोले,‘बेटे मेरे तीन हजार रुपए का क्या होगा?’ मैंने चाचा को सांत्वना देते हुए कहा,‘जिस तरह श्मशान में गई हुई लकड़ी वापस नहीं आती। उसी तरह उनके पास गए हुए पैसे वापस नहीं आते।’
मेरा पड़ोसी भी एक बार झांसे में आ गया था। उसके घर पर चूहों ने हमला बोल दिया था। एक व्यक्ति चूहे मारने की दवा बेच रहा था। उसने उससे दस पैकेट खरीदे। घर आकर खोले तो हर पैकेट में एक ही बात लिखी हुई थी,चूहे पकड़िए और मारिए। आप भी ऐसे समाधानों से दूर रहेंगे तो बेहतर है। 

12 Jul 2018

चार लोग क्या कहेंगे!


व्यक्ति चार लोगों से डरता है। इन चार का न हो तो मनुष्‍य क्या से क्या कर डाले। कभी ना कभी इन चार से आपका भी पाला पड़ा होगा क्‍योंकि ये ‘चार लोग आप हम में से ही होते हैं। जरूरी नहीं पुरूष ही हो। महिलाएं भी हो सकती हैं,बल्कि महिलाएं ज्‍यादा होती हैं। ये चारों नारदीय गुणों से युक्‍त होते हैं। राई का पहाड़ और बात का बतंगड़ बनाना इनका ‘ऑल आइम फेवरेट’ काम होता है। ये किसी के फटे में ही टांग नहीं अड़ाते, बल्कि कई बार तो अच्‍छे-भले को पहले खुद फाड़ते हैं,फिर उसमें टांग अड़ाकर उसे चीर ही डालते हैं। ये पुराने से पुराने और नए से नए में भी अपनी टांग फंसाने हा हुनर रखते हैं। ये चरित्र से लेकर इज्‍जत और अफवाह से लेकर कानाफूसी तक को उछालने,उड़ाने और हवा देने में गजब के माहिर होते हैं। चार लोग क्या कहेंगे!
यदि आप यह सोच रहे हैं कि ‘ये चार’ कहां पाए जाते हैं,तो ज्‍यादा दूर जाने की जरूरत नहीं। आप नजरें उठाकर देखिए,‘ये चारों’ आपको आपपास ही मिल जाएंगे। यदि चार न दिखकर तीन ही दिखें तो भी चिंतित मह होइए,क्‍योंकि कभी-कभी तो आप स्‍वयं भी इन्‍हीं चार में से एक होते हैं।
दरअसल, ये चार लोग अपनी शातिर निगाहों से चलते-चलते कब अपने मतलब की बात ताड़ जांए, खुद उन्‍हें भी पता नहीं चलता। शास्‍त्रों में ‘ताड़न के अधिकारी’ इन्‍हें ही कहा गया है,क्‍योंकि ‘ताड़ जाने पर इनका खासा अधिकार होता है।’
    
कौन कब घर आ रहा है, कब जा रहा हैकहां से आ रहा है,कहां जा रहा हैकिसके नल में ज्यादा पानी आता है, किसके में कम? रामू के घर में क्या चल रहा हैश्यामू की बीवी बेलन से उसकी रोज मरम्‍मत क्‍यों करती हैमदन की बीवी अपनी पड़ोसिनों कमला और विमला से क्‍या कानाफूसी करती हैजेठाराम का लड़का किसकी लड़की से नैन मटक्‍का कर रहा हैइन सब बातों की भनक लगते ही ‘ये चार’ इन रहस्‍यों को किसी सैटेलाइट की तरह अफवाह की कक्षा में प्रेक्षपित कर देते हैं। बाकी का काम ‘मोहल्‍ले का सौरमंडल’ कर देता है।
इनकी पहली शर्त होती है देख, तुझे बता रहा हूं, किसी से कहना मत।’ यदि आप कह भी दें कि ‘मैं तो बताऊंगा’, तब भी इनके पेट में कुछ टिकेगा नहीं, ये आपको सब बताकर ही चैन लेंगे। वस्‍तुतः इन चारों की पाचन शक्ति बहुत कमजोर होती है। इन्‍हें कोई बात बताकर भले ‘कसम का चूर्ण’ खिला दो, बात पचेगी नहीं। मरोड़ उठेगी और ये तुंरत किसी के कान में उल्‍टी कर देंगे।
लोग सलाह देते हैं कि समाज में इज्‍जत और शांति से रहना है तो इन चार लोगों से बचों, लेकिन सलाह देने वाला भी तो इन चार में से एक होता है। अब उससे कैसे बचें?

9 Jul 2018

झमाझम बारिश का दृश्य


मानसून की मेहरबानी से झमाझम बारिश हो रही है। सड़क जल से लबालब है। उसमें बच्चे कागज की कश्ती तैरा-तैराकर धमाचौकड़ी मचा रहे हैं। मैं खिड़की में से इस नैसर्गिक सौंदर्य को निहार रहा हूँ। रामू काका साइकिल पर चले आ रहे है। वे एकदम से रपटकर इस तरह गिरते हैंजैसे गठबंधन से बनी सरकार एकाएक टूटकर गिर जाती है। यह देखकर बच्चे खिलखिलाने लगते हैं। काका को उठाने के लिए बच्चे हाथ बढ़ाते हैं उससे पहले वह खुद ही लड़खड़ाते हुए चल देता है। इनके पीछे चली आ रही आंटी के हाथ से छाता ऐसे उछल कर गिराजैसे कि उसका भी मन झमाझम बारिश में भीगने को मचल रहा हो। यह तो शुक्र है कि एक बच्चे ने झट से पकड़कर छाता आंटी को सौंप दिया। अन्यथा छाता झमाझम बारिश का पूरा आनंद लेता। इसी तरह सब्जी वाले की रेहड़ी से आलूटमाटर,टिंडे झमाझम बारिश में भीगने के लिए अपने ऊपर रखी खाली बोरी से बाहर निकल रहे थे।
इस दरमियान एक बच्चे की कश्ती डूबने लगती है। वह अपनी डूबती कश्ती को उसी तरह बचाने का पुरजोर प्रयास करता है। जिस तरह लोकतंत्रवादी लोकतंत्र को बचाने के लिए प्रयास करते हैं। उसका प्रयास उसी भाँति विफल हो जाता है,जिस भाँति एक लोकतंत्रवादी का हो जाता है। बच्चा थोड़ी देर तो रोता है। उसके बाद बच्चों के संग नई कागज की कश्ती बनाकर धमाचौकड़ी मचाने में मशगूल हो जाता है।
यहां से मेरी नज़र एकाएक दीनू काका पर जा टिकती हैंजो छत से टपकते पानी से उसी तरह परेशान है। जिस तरह लोग दिन-ब-दिन बढ़ती महंगाई से परेशान हैं। उसके सारे बिस्तर भीग गई गए हैं। और खुद भी भीग गया है। जिस तरह महंगाई का कोई हल नहीं निकल पा रहा है। उसी तरह दीनू काका को इस झमाझम बारिश में छाता नहीं मिल पा रहा है। सीबीआई की तरह घर के सभी सदस्य छाते को खोजने में लगे हुए हैं। छाता है कि किसी कुख्यात अपराधी की तरह न जाने कहां छुपा हुआ है। घर के बीहड़ इलाके तक में ढूंढ लिया पर हाथ नहीं लग रहा। छाता मिल जाए तो छत का जायजा कर आए। जायजा हो जाए तो कुछ ना कुछ जुगाड़ ही कराए।
यहीं से मेरी नजरें उनके पड़ोसी की रसोई पर जा टिकती हैं। भाई साहब जी झमाझम बारिश में इस तरह से कढ़ाई में से गरमा-गरम पकौड़ी निकाल कर भाभी जी को खिला रहे थे। जिन्हें देखकर कर मेरे भी मुंह में पानी आ गया और पकौड़ी खाने के लिए जी ललचाने लगा। लेकिन ललचाता जी उस लड़की को देखकर झूमने लगाजो अपनी बालकनी में से हाथ निकालकर झमाझम बारिश के संग झूम रही थी। बौछारे उसके तन-मन को छूकर इतनी प्रफुल्लित हो रही थी कि धरा पर ही नहीं गिर रही थी। 
खिड़की से दृश्य बदलता है देख रहा हूँ कि मास्टर आनंदीलाल जी कुर्सी पर बरामदे में बैठे हुए हैं और अखबार में देश-दुनिया की सैर पर हैं। देश-दुनिया की सैर सपाटे के बीच-बीच में झमाझम बारिश को इस कधर निहार रहे हैंजैसे की चालान काटते हुए ट्रैफिक हवलदार निहारता है। मास्टरजी के सामने रहने वाली शारदा काकी के घर में भरा बारिश का पानी उसी तरह नहीं निकल रहा है। जिस तरह देश से भ्रष्टाचार नहीं निकल रहा है। वह उसी तरह बारिश के पानी को घर से बाहर निकालने में जुटी हुई है। जिस तरह से एसीबी वाले भ्रष्टाचार को निकालने में लगे रहते हैं। पर वह जितना पानी निकाल रही है उससे ज्यादा घुस रहा है।
मैं खिड़की से देख रहा हूं कि झमाझम बारिश थम चुकी है। लेकिन बच्चें अब भी धमाचौकड़ी में मशगूल हैं। दीनू काका छत पर आ पहुंचा है। मास्टर जी अखबारी देश-दुनिया की सैर कर पलंग पर खर्राटे भर रहे हैं। पकौड़ी वाले भाई साहब जी कढ़ाई मांज रहे हैं और भाभी जी छत पर जाकर सेल्फी दर सेल्फी ले रही है। फेसबुक पर चिपकाने के लिए। बालकनी वाली लड़की बालकनी से गायब है।शारदा काकी सरपंच को कोस रही है। उसने प्रधानमंत्री आवास का आश्वासन दिया था लेकिन बनवाया नहीं। और मैं गरमा-गरम चाय के मजा ले रहा हूँ।


27 Jun 2018

महंगाई,भ्रष्टाचार दोनों बेलगाम घोड़े


मुद्दा तो कुछ नहीं चाहता। जो कुछ चाहता है वह मुद्दईगिरी चाहता है। मुद्दा तो अवाम के बीच में रहना चाहता है। लेकिन मुद्दईगिरी उसे घसीटकर धरना  स्‍थल पर ले आता है। कुछेक मुद्दे तो बेचारे मुद्दों जैसे दिखते जरूर हैं,पर मुद्दे होते नहीं। उनको भी तिकड़म-अकड़म लगाकर मुद्दों की बिरादरी में शामिल कर देता है। एक बार मुद्दों की बिरादरी में शामिल हो गया फिर उसकी हालत भी धोबी के कुत्‍ते जैसी हो जाती है,जो न घर का न घाट का रहता है। 
महंगाई,भ्रष्टाचार
सच्‍चा मुद्दईगिरी वहीं है,जो मद्दे से निजात दिलाने से पूर्व उसे मीडिया से कवरेज करवाता है। विषय विशेषज्ञों से विश्‍लेषण करवाता हैं। विश्‍लेषण के दौरान तर्क-तर्क नहीं रहती और वितर्क-‍विर्तक हो जाती है। सच्‍चा मुद्दईगिरी वहीं है,जो लाठीजार्च की शुभ घड़ी में,अपनी टोपी किसी ओर के सिर पर रखकर रफूचक्‍कर हो लेता हैं। जिसके सिर पर टोपी होती है। उसकी लाठीचार्ज से भेंट होती है। लाठीचार्ज भेंटवार्ता में जिसकी भेंटपूजा ज्‍यादा होती है। वह लाठीचार्ज से ऐसा चार्ज होता है। फिर अस्‍पताल से ही डिस्‍चार्ज होता है।
कुछ भी कहों,जो भी किसी भी मुद्दे पर मुद्दईगिरी करता हैं। सबसे पहले अपना उल्‍लू सीधा करता है। मुद्दे का क्‍या है? उसे निजात मिले या ना भी मिले। उसका श्रेय मिलना चाहिए। श्रेय मिल गया तो मुर्दा व्‍यक्ति को भी मुद्दा बना देता है। उसको तो मुद्दे से मतलब है। फिर चाहे मुद्दा जिंदा हो या मुर्दा। लेकिन हो मुद्दा।
मुद्दों का क्‍या है? इनका आवागमन तो जारी रहता है। एक परलोक नहीं पहुंचता। उससे पहले दूसरे का आविर्भाव हो जाता है। मुल्‍क में मुद्दों की भरमार है। कोई इस पार है,तो कोई उस पार है और कई आर-पार है। जो आर-पार है,वे सदाबार हैं। जैसे महंगाई और भ्रष्‍टाचार। यह दोनों बेलगाम घोडे़ हैं। जिधर मन करता है उधर ही दौड़ पड़ते हैं। इनकी राह में जो भी आता हैं। उसे यह अपने पैरों तले कुचल देते हैं। इन पर तो वह भी सवार नहीं होता,जो अश्‍वरोही होता है। ये दोनों घोड़े तो चाबुक मारने पर भी काबू में नहीं आते,बल्कि बिदक जाते हैं। और इनसे तो मुद्दईगिरी भी डरता है। वह भी ऐसे मुद्दों पर मुद्दईगिरी करता हैं। जिन पर करना कुछ भी ना पड़े और पूरा का पूरा श्रेय खुद को मिले। इन बेलगाम घोड़ों पर लगाम तो अवाम ही लगा सकती है। अवाम के पास वह चाबुक है,पर उसका इस्‍तेमाल नहीं करती। जिस दिन चाबुक उठा ली। उस दिन ये घोड़े तो क्‍या इनके बाप भी हिनहिनाएंगे तक नहीं। मुद्दईगिरी का क्‍या है?इसलिए बस वो मौके की तलाश में रहता है। जैसे कोई तनिक सा अवसर मिला मुद्दईगिरी शुरू। खास बात यह कि मौका और अवसर ऐसा वैसा नहीं होना चाहिए।मौका ऐसा हो जिससे पूरा लाभ उसे ही मिले। अगर ऐसा नहीं है तो फिर क्‍या फायदा। उसे तो किसी ना किसी मुद्दे पर मुद्दईगिरी ही करना है। किसी भी मुद्दे का नेस्‍तनाबूद तो आप और हम ही कर सकते हैं।

20 Jun 2018

रायचंदों के वेश में छलचंदों से दूर रहे


इस मुल्‍क में फ्री कुछ मिले ना मिले लेकिन ‘राय’ अवश्‍य मिल जाती है। यहाँ ‘राय’ देने वाले रायचँदो की कमी नहीं हैं। ये तो राह चलते राहगीर को भी राय दे देते हैं। फिर चाहे इनकीराय’ में ‘राई’ भर भी राय नहीं हो। सबसे बड़ी बात तो यह है कि इन रायचँदो की  हैड़ ऑफिस या कोई ब्रांच ऑफिस नहीं होता हैं। और ना ही इन तक पहुंचने के लिए गूगल मैप की जरूरत हैं। ये तो हर नुक्‍कड़,गली,मोहल्‍ले,में अहर्निश विराजमान हैं।  ये हम-आपकी तरह नहीं हैं,जो मौका मिलने पर भी छोड़ देते हैं। ये तो मौके का भरपूर फायदा उठाते हैं तथा मौका-ए-वारदात पर ही राय का रायता फैला देते हैं।

अगर हमारे देश में रायचँद नहीं हो तो यह मानों देश ही नहीं  चले। देश की तो छोड़ों। अपना घर ही नहीं चले। आप मानों या ना मानों,आज अपना घर या देश चल रहा हैं ना तो रायचँदों की वजह से चला रहा हैं। किसी ओर कि तो कह नहीं सकता पर हमारे रायचँद की राय सर्वमान्‍य है। यह अलग बात है कि उसकी राय में राय कम राय का फैलाव इस कान से उस कान तक होता है।
अच्‍छा कुछ रायचँद तो राय देते-देते इत्‍ते एक्‍सपर्ट हो जाते हैं कि रायचँद से सलाहकार बन जाते हैं। सलाहकार बनने के बाद ये ‘राय’ नहीं, ‘सलाह’ देते हैं। वह भी शुल्‍क लेकर। इस भ्रम में मत रहना कि रायचँद से बने सलाहकार,सलाह के साथ उस राय के अच्छे-बुरे परिणाम में ‘साथ’ भी देते हैं। ये सलाह तो दे देते हैं लेकिन 'साथकभी नहीं देते। इन्‍हें तो दी गई सलाह की शुल्‍क से मतलब हैं। शुल्‍क है तो सलाह है। इनके यहाँ निःशुल्‍क तो अभिवादन भी नहीं हैं। शुल्‍क से तो आप इनके सीलिंग फैन की हवा भी ले सकते हो। एक गिलास पानी भी पी सकते हो।
बात रायचँदों की राय की हो रही थी तो उसी पर आते हैं। दरअसल रायचँद मानव के जन्‍म से लेकर मृत्‍यु तक राय देते हैं। इसमें कोई दोहराय नहीं हैं। बच्‍चा गर्भ में होता है तभी से दाई-माई दस तरह की राय इस तरह से देने लगती हैं जिन्‍हें सुनकर बच्‍चे कि माँ कन्‍फ्यूज हो जाती है। किस की राय माननी चाहिए और किसी को इग्‍नोर किया जाए। कुछ इसी तरह व्‍यक्ति के मृत्‍यु के उपरांत होता हैं। रायचँद चिता पर लेटे हुए मुर्दे को फूँकने की भी दस तरह की राय देने लगते हैं। उस वक्‍त मुखाग्‍नि देने वाला कन्‍फ्यूज हो जाता हैं और कन्‍फ्यूजन में मुख के बजाय पैरों की ओर मुखाग्नि दे देता हैं। 
वैसे हमारे मुल्‍क में तकरीबन रायचँद तो हम-सभी हैं लेकिन यहां रायचँदों के वेश में छलचँदों की भी कमी नहीं हैं। ये चँद चालाक छलचँद ही समाज के नाम पर समाजचँद,जाति के नाम पर जातिचँदधर्म के नाम पर धर्मचँदइंसानियत के नाम पर हैवानचँदबनकर बैठ हैं। इन चँदों की तो राय ही नहींपरछाई भी खतरे से कम नहीं। ये तो ऐसा दिग्‍भ्रमित करते हैं कि जिसके दिमाग में जंग लगी होती है वह भी इनकी राय की राह पर चलने को आतुर हो जाता हैं। इसलिए भाईयों,बहनों,देवियों,सज्‍जनों आपसे अपील है...। बस अपील है....। बाकी आपकी मर्जी।

12 Jun 2018

मानसून के पहले आने की चर्चा


केरल में मानसून समय से पहले आ गया है। यहां समय से पहले आने वाले को कौतूहल भरी निगाहों से निहारते हैं। अक्सर लेट आने वाला सरकारी कर्मचारी यदि किसी दिवस निर्धारित समय से पहले आ जाए, तो चर्चा का विषय बन जाता है। यदि ट्रेन निर्धारित समय से पहले पहुंच जाए, तो चर्चा का विषय बन जाती है। हमारे यहां तो मेहमान तय वक्त से पहले आ जाए, तो बवाल हो जाता है। एक दिन पहले कहां से आ टपका! एक दिन पहले आना इतना अटपटा लगता है, जैसे दूधवाला महीने से पहले पैसे मांगने आ गया हो। मानसून के पहले आने की चर्चा 

मौसम विभाग के मुताबिक, मानसून तीन दिन पहले आ गया। यहां तीन दिन पहले आना तो चर्चित विषय बन जाता है। बादलों तक को खबर हो जाती है। अबकी बार धरावासियों को उस नेता की तरह बेवकूफ बनाना मुश्किल है, जो चुनाव में बादलों की तरह गरजता तो खूब है, पर जीतने के बाद पांच साल में बरसता एक बूंद भी नहीं है। अबकी बार गरजने से पार नहीं पड़ेगी, बरसना पड़ेगा।
लेकिन मानसून जल्दी क्यों आ रहा है? सोचा, इसका जवाब मानसून से ही क्यों न पूछा जाए? बरसते हुए मानसून से ही पूछा- अबकी समय से पहले कैसे?
आप भी क्या पूछ रहे हो? पूछने वाली बात पूछिए। यह सुनकर मैं एक बार तो ठिठक गया। मैंने अपने आप से पूछा- कहीं मानसून को डिस्टर्ब तो नहीं कर दिया?
मैं बोला- पूछने वाली बात ही पूछी है। इस पर वह हंसने लगा। फिर गंभीर होते हुए बोला- धरावासियों की यही तो प्रॉब्लम है। समय से पहले आ जाएं, तो सवाल पूछते हैं, और लेट हो जाएं, तो जी भर कोसते हैं।.
मेरे मुंह से निकल गया। आप वक्त पर आ जाया करें। सवाल पूछने का और कोसने का सवाल ही नहीं रहेगा। यह सुनकर वह कुपित होते हुए बोला- पहले अपने गिरेबान में झांककर देखो। खुद वक्त के कितने पाबंद हो? कभी टाइम से कोई काम किया भी है? .मोहनलाल मौर्य.

7 Jun 2018

राय के रायचँद


इस मुल्‍क में फ्री कुछ मिले ना मिले लेकिन रायअवश्‍य मिल जाती है। यहाँ रायदेने वाले रायचँदो की कमी नहीं हैं। ये तो राह चलते राहगीर को भी राय दे देते हैं। फिर चाहे इनकी रायमें राईभर भी राय नहीं हो। सबसे बड़ी बात तो यह है कि इन रायचँदो की  हैड़ ऑफिस या कोई ब्रांच ऑफिस नहीं होता हैं। और ना ही इन तक पहुंचने के लिए गूगल मैप की जरूरत हैं। ये तो हर नुक्‍कड़,गली,मोहल्‍ले,में अहर्निश विराजमान हैं। बस इन्‍हें तो एक बार सेवा का मौका भर मिल जाए।ये तो खुद मौके की तलाश में रहते हैं। ये हम-आपकी तरह नहीं हैं,जो मौका मिलने पर भी छोड़ देते हैं। ये तो मौके का भरपूर फायदा उठाते हैं तथा मौका-ए-वारदात पर ही राय का रायता फैला देते हैं।
राय के रायचँद
ऐसा नहीं कि जमाने के चलन के मुताबिक सोशल मीडिया पर आप-हम ही सक्रिय नहीं हैं। रायचँद भी ऑनलाइन उपलब्‍ध हैं। यहाँ भी यह ऑनलाइन रायचँद हैं। हालांकि सोशल मीडिया पर इनकी राय की पब्लिक पोस्‍ट एक के बाद एक आती-जाती रहती हैं। कुछ तो कुछेक लाइक,कमेंट लेकर चलती बनती हैं तो कुछ लाइक,कमेंट के बाद भी इतराती रहती हैं। इनकी भी अपनी-अपनी‍ किस्‍मत हैं। फेसबुक पर  रायचँद नित्‍य रायकी एक अलहदा राय के साथ आते हैं और देर रात तक ऑनलाइन उपलब्‍ध रहते हैं। वाट्सएप पर तो ये गुड मॉर्निंग,गुड आफ्टरनून,गुड़ इवनिंग,गुड़ नाइट भी किसी ना किसी तरह की राय के साथ ही करते हैं। इंस्‍टाग्राम पर तो इनकी बात ही निराली हैं। यहाँ इनकी कोई राय माने या ना माने इनको तो बतानी है तो बताते हैं। ये तो इत्‍ते शातिर है कि टि्वटर पर उसकी तय शब्‍द सीमा में भी घुसकर अपनी राय का ढिंढोरा पीटते रहते हैं।
अगर हमारे देश में रायचँद नहीं हो तो यह मानों देश ही नहीं  चले। देश की तो छोड़ों। अपना घर ही नहीं चले। आप मानों या ना मानों,आज अपना घर या देश चल रहा हैं ना तो रायचँदों की वजह से चला रहा हैं। किसी ओर कि तो कह नहीं सकता पर हमारे रायचँद की राय सर्वमान्‍य है। सर्वप्रिय है। यह अलग बात है कि उसकी राय में राय कम राय का फैलाव इस कान से उस कान तक होता है।
अच्‍छा कुछ रायचँद तो राय देते-देते इत्‍ते एक्‍सपर्ट हो जाते हैं कि रायचँद से सलाहकार बन जाते हैं। सलाहकार बनने के बाद ये रायनहीं, ‘सलाहदेते हैं। वह भी शुल्‍क लेकर। इस भ्रम में मत रहना कि रायचँद से बने सलाहकार,सलाह के साथ उस राय के अच्छे-बुरे  परिणाम में ‘साथभी देते हैं। ये सलाह तो दे देते हैं लेकिन 'साथ' कभी नहीं देते। इनकी दी गई सलाह से चाहे सुलह हो या विद्रोह हो। चाहे घोटाला हो या मोटापा हो। चाहे भ्रष्‍टाचार हो या कोई बेरोजगार हो। किसी पर अत्‍याचार हो। चाहे महँगाई की मार हो या चाहे बीमार हो। इन्‍हें तो दी गई सलाह की शुल्‍क से मतलब हैं। शुल्‍क है तो सलाह है। इनके यहाँ निःशुल्‍क तो अभिवादन भी नहीं हैं। शुल्‍क से तो आप इनके सीलिंग फैन की हवा भी ले सकते हो। एक गिलास पानी भी पी सकते हो।
बात रायचँदों की राय की हो रही थी तो उसी पर आते हैं। दरअसल रायचँद मानव के जन्‍म से लेकर मृत्‍यु तक राय देते हैं। इसमें कोई दोहराय नहीं हैं। बच्‍चा गर्भ में होता है तभी से  दाई-माई दस तरह की राय इस तरह से देने लगती हैं जिन्‍हें सुनकर बच्‍चे कि माँ कन्‍फ्यूज हो जाती है। किस की राय माननी चाहिए और किसी को इग्‍नोर किया जाए। कुछ इसी तरह व्‍यक्ति के मृत्‍यु के उपरांत होता हैं । रायचँद चिता पर लेटे हुए मुर्दे को फूँकने की भी दस तरह की राय देने लगते हैं। उस वक्‍त मुखाग्‍नि देने वाला कन्‍फ्यूज हो जाता हैं और कन्‍फ्यूजन में मुख के बजाय पैरों की ओर मुखाग्नि दे देता हैं। 
वैसे हमारे मुल्‍क में तकरीबन रायचँद तो हम-सभी हैं लेकिन यहां रायचँदों के वेश में छलचँदों की भी कमी नहीं हैं। ये चँद चालाक छलचँद ही समाज के नाम पर समाजचँद,जाति के नाम पर जातिचँद, धर्म के नाम पर धर्मचँद, इंसानियत के नाम पर हैवानचँद, बनकर बैठ हैं। इन चँदों की तो राय ही नहीं, परछाई भी खतरे से कम नहीं। ये तो ऐसा दिग्‍भ्रमित करते हैं कि जिसके दिमाग में जंग लगी होती है वह भी इनकी राय की राह पर चलने को आतुर हो जाता हैं। इसलिए भाईयों,बहनों,देवियों,सज्‍जनों आपसे अपील है...। बस अपील है....। बाकी आपकी मर्जी।

6 Jun 2018

सियासी तपिश से बेहाल लोकतंत्र


समझ में नहीं आता चुनावीं मौसम में ही ईवीएम से गड़बड़ियों का भूत क्यों निकलता हैपहले कहां मर जाता हैं। पहले क्याउसे भी कोई भूत पकड़े रखता है,जो चुनावी मौसम में छोड़ देता है। लोकतंत्र हैंहो सकता है। गड़बड़ी को गड़बड़ी पकड़ ले। कान में फूंक मार दे,अभी कहां निकल रही है। बाहर तो भीषण गर्मी पड़ रही है। टेंपरेचर हाई हो रहा है। आग बरस रही है।  मतदान के दिन निकलेंगे। ठीकरा किसी के भी सिर पर फोड़ देंगे।सियासी तपिश से बेहाल लोकतंत्र

ईवीएम से गड़बड़ियों  का भूत निकलता है तो निकले। लेकिन ठीकरा तो अपने सिर पर फोड़े।सियासती एक दूसरे के सिर पर ठीकरा फोड़ते हैं तो बीच-बचाव में लोकतंत्र को आना पड़ता है। बीच-बचाव में सियासती तो अपना सिर बचा लेते और लोकतंत्र का सिर फूट जाता है। लोकतंत्र का सिर फूटता है तो लोकतंत्रवादी भी मरहम पट्टी नहीं करवाते।
पिछले दो-तीन साल में ईवीएम जितनी बदनाम हुई है। उतनी तो मुन्नी भी बदनाम नहीं हुई होगी। कभी छेड़खानी के आरोप लगे है तो कभी इसकी विश्वसनीयता को लेकर सवाल उठे हैं। लेकिन लू पहली बार लगी है। इन दिनों मौसमी टेम्परेचर इतना बढ़ रहा है कि पंखे,कूलर व एसी गले में फांसी का फंदा लटकाए हुए हैं। इनसे भीषण गर्मी बर्दाश्त नहीं हो रही हैं। यह तो गर्मी से इतने तंग आ गए हैं। इनका बार-बार खुदकुशी करने का मन करता है। लेकिन हर बार घंटा आध घंटा स्विच ऑफ करके बचा लिया जाता है।  
यह तो शुक्र है की ईवीएम के लू ही लगी। गर्मी से तंग आकर खुदकुशी नहीं की। वरना सवाल ही नहीं उठतेसुलगते भी। जब सवाल सुलगते हैं तो आग उगलते हैं। उगलती आग किसी को भी निगल सकती। मौसमी टेम्परेचर की तरह सियासी टेम्परेचर भी इतना बढ़ रहा हैं। जिससे लोकतंत्र को मुंह पर दुपट्टा बांधकर चलना पड़ रहा है।
अभी तो  सियासी लू 2019 तक तीव्रगति से चलेंगी। संभावना है आमचुनाव तक तो सियासी टेम्परेचर अड़तालीस डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुँच जाएगा। अड़तालीस डिग्री सेल्सियस में लोकतंत्र का क्या हाल होगाइसका अंदाजा भी नहीं लगा सकते। फिर भी लोकतंत्र जनतंत्र के लिएअड़तालीस डिग्री सियासी सेल्सियस  रेगिस्तान में सेना के जवान की तरह तैनात रहता है।

ईवीएम लू की चपेट में आई  तो उसकी दूसरी ईवीएम बहन उसकी जगह आ गई। कल को लोकतंत्र लू की चपेट में आकर बीमार पड़ गया तो इसकी जगह कौन आएगालोकतंत्र के तो कोई भाई-भतीजा भी नहीं है,जो आ जाएगा। सियासत की तरह कुटुंब परिवार भी नहीं है,जो पीढ़ी दर पीढ़ी विरासत में मिली सियासत की सीढिया चढ़कर चला आएंगा।  लोकतंत्र तो इकलौता है। 
सच पूछिए तो वे भी पूछने नहीं आएंगे,जो बात-बात में कहते हैं,लोकतंत्र खतरे में हैं। लोकतंत्र की हत्या हो रही है। जब वाकई में खतरे में होता है ना तब कोई भी खतरा मोल नहीं लेता। सब पतली गली से निकल लेते हैं। लोकतंत्र में लोककी हत्या हो जाती है। लेकिन तंत्रके खरोच भी नहीं आती हैं।