24 Jul 2017

समझने का सलीका सीखना होगा

हम स्कूल में पढ़ते थे तब हिंदी के गुरुजी बहुत समझाते थे। नालायको समझ जाओं। अन्यथा बहुत पश्चताओंगे। उस वक्त गुरुजी बताते थे कि समझना और समझाना में बस एक मात्रा का फर्क है।  ‘झ’ वर्ण में लगी ‘आ’ की मात्रा का और ‘झ’ वर्ण में न लगी ‘आ’ की मात्रा का। यहीं रत्तीभर फर्क जिसकी समझ में गया,उसकी नैया पार है और जिसकी समझ में नहीं आता उसका बेड़ा गरक है। गुरुजी प्यार से भी समझाते और मार से भी। हिंदी के गुरुजी के अलावा अन्य गुरुजी समझाते नहीं थे। अंग्रेजी के गुरुजी तो सीधे मीनिंग लिखवाते और सेंटेंस में प्रयोग करवाते। गणित के गुरुजी सवाल निकलवाते और जिस दिन सवाल नहीं निकलवाते उस दिन सिर से जूं निकलवाते।
दौर बदला और आज जिसे देखों,वहीं समझाने में आमादा है। कोई बात से तो कोई लात से समझाने पर अड़ा हैं। जरा सी चूक हुई तो समझाना और चूक नहीं भी हुई तो भी समझाना। उन्हें कौन समझाए। भाई! समझाना जित्ता सुगम है उत्ता ही समझना मुश्किल है। जिस भाषा में आप समझा रहे हो। वह अगले के समझ में आ रही है या नहीं। पहले यह तो जान लो। उसके बाद समझा लेना। वह भी समझने को तैयार हो तब। जबरन समझाओंगे तो समझदार के भी समझ में नहीं आएंगा। समझना मनुष्य के हाथ में थोड़ी है। यह तो मानव मस्तिष्क पर निर्भर करता है। उसके दिमाग कि क्षमता कित्ती है। स्पेस कितना है। दिमाग में रजिस्टर्ड टोटल सिक्योरिटी एंटी वायरस है या नहीं। एंटी वायरस की वैधता समाप्त तो नहीं हो गई। यह सब जाने रहित ही समझाना तो मूर्खता है।
समझाने का क्षेत्र व्यापक होता जा रहा है। ऐसा लगता मानो समझाना तो एक कारोबार बन गया है। इसके कारोबारी सुबह से लेकर शाम तक अपना माल बेचने में लगे रहते हैं। इनको इनके माल को खरीदने वाला खरीदार नहीं मिलता तब भी यह मायूस नहीं होते हैं। इनका माल साग-सब्जी की तरह तो है नहीं,जो सड़-गल जाएंगी। इनका माल तो खरा सोना है। आज नहीं तो कल बिक ही जाएंगा। इनकी टैग लाइन ही ऐसी है-‘समझ में नहीं आता क्‍या?’ जहां कहीं भी इस टैग लाइन का प्रयोग हो जाता है। वहां इनका माल या तो बिकता नहीं या फिर ऐसा बिकता है कि माल ही कम पड़ जाता है। इनके माल की कोई गारंटी या वारंटी भी नहीं होती फिर भी यह अपने माल का सरेआम बेचान कर कर देते हैं।

मेरे को समझाने वाले समझाने की जिन विधियों का प्रयोग करते हैं। वे तमाम विधियों 64 जेबी दिमाग मेमोरी युग में मेरी एक जेबी दिमाग मेमोरी में घुसती ही नहीं। मैं तो बहुत कुछ समझने चाहता हूं। दिमाग पर जोर भी खूब डालता हूं। पर ज्यों ही जोर डालता हूं,दिमाग की नसे फुलने लगती है। नसे फुलते ही थोड़ा बहुत समझ में आ रहा होता है,वह भी समझ नहीं आता है। जब समझाने वाला पूछता है कि कुछ समझ में आया। तब मैं हां कहकर झूठी सहमति दे देता हूं। अब आप भी बताए समझने में मेरा कसूर है या फिर समझाने वाले का सलीका अलहदा है। या फिर मुझे भी समझने का वह सलीका सीखना होगा,जो समझाने वाले को आता है। मुझे आपकी राय की प्रतिक्षा है। 

14 Jul 2017

घनघोर मेघ बरसते-बरसते रह गए

मानसून आ नहीं रहा है। उसकी प्रतीक्षा में वसुधा का गला सूखता जा रहा है। आंखों से निकलने वाली अश्रुधारा बह-बह कर सूख गई हैं। अश्रु निकाले से भी नहीं निकल रहे हैं। बार-बार होंठों पर जीभ फेरी जा रही है। ताकि कम से कम गला तो अधगीला रहे वसुधा अपना गला गीला करने के लिए बदरा से कह रही है- बदरा भाई! बरस जाओं। मेरा कंठ सूख रहा है। गले में पानी नहीं गया तो मैं मर जाऊंगी।
बदरा समीर के संग झूमता हुआ कहता है- देखों,बहिना तरस तो तुम पर बहुत आ रहा है। पर क्या करू, विवश हूं। मेरे उच्च अधिकारी एक-एक बूंद का लेखा-जोखा रखते हैं। कहां कितना पानी बरसाना है। यह सब पहले बाकायदा रजिस्टर में दर्ज होता है। उसके बाद उस क्षेत्र में बारिश होती है। कुछ दिन पहले घनघोर मेघ साहब की गैर हाजिर में बिना अनुमति के राजस्थान सूबे पर मेहरबानी कर दी। जब साहब आए तो इतनी लताड़ लगाए कि पूछों मत। एक भी बूंद इधर-उधर नहीं कर सकता। मुझे बूंद-बूंद का हिसाब देना होता है। तुम कहती हो कि बरस जाओं। मेरी भी नौकरी का सवाल है।
बदरा भाई! कुछ भी करों। कैसे भी करों। मेरे गले में थोड़ा सा पानी तो डाल दो। अन्यथा मैं मर जाऊंगी। मैं मर गई तो। सम्पूर्ण पृथ्वी का विनाश हो जाएंगा। पृथ्वी का विनाश हो। ऐसा मैं कदाचित भी नहीं चाहती।
अरे,वसुधा बहिना तुम समझती कैसी नहीं। अब तुम्हें कैसे समझाऊं? जिनके लिए तू बूंद-बूंद के लिए तरस रही हैं। उन्हीं तेरे बांशिदों ने तेरा विदोहन किया है। जिनसे तेरी हरीतिमा है। उन पेड़-पौधों से सम्मोहित होकर मैं बरसने को मजबूर हो जाता हूं। वे उन पर ही स्वार्थलिप्सा की कुल्हाड़ी चला रहे हैं। जिससे तेरे पर ही नहीं। अपितु हमारे समूचे बदरा समुदाय पर भी काले बादल मंडरा रहे हैं।
बदरा भाई! तेरी बात कटू शाश्वत है। प्राकृतिक आपदाओं के माध्यम से मैं भी इन्हें समझाने की कोशिश करती हूं। लेकिन इस बार कैसे भी करके मुझ पर रहम कर। मानसून का दौर है। जमकर बरस जा। हो सकता तेरी मेहरबानी से मेरे बांशिदों का दिल पसीज जाए। उनके ज्ञान चक्षु खोल जाए।
वसुधा की बेबस हालात देखकर बदरा को तरस आ गया। उसने पूछा बताओं! कहां-कहां बारिश करवानी है। यह सुनकर वसुधा का चेहरा खिल उठा और उसने वह फाइल सौंप दी जिसमें राज्यवार बारिश की सूची थी। समीर के माध्यम से फाइल एक बदरा बाबू से दूसरे बदरा बाबू तक पहुंची। दूसरे से तीसरे तक पहुंची। एक तरफ बारिश फाइल यहां से वहां पहुंच रही थी और दूसरी तरफ घनघोर मेघ बरसने के लिए आतुर हो रहा था। तबी घनघोर मेघ साहब के पास बारिश फाइल पहुंच गई। भारत मुल्क की फाइल देखकर घनघोर मेघ काला-पीला हो गया और बरसते-बरसते रह गया और वसुधा गगन की ओर मुंह करके बारिश के प्रतीक्षा में हैं कि बस,मेघ मेहरबान होने वाले ही है। 

18 Jun 2017

बीमारी नहीं महामारी है


बीमारी कैसी भी हो। वह अच्छे भले इंसान को इंसान से मरीज बना देती है। जब व्यक्ति किसी भी बीमारी से ग्रस्त होता है। तब वह मनुष्य न होकर एक मरीज होता है। उस वक्त उसे लोग ही नहीं,अपने चिरपरिचित भी उसको मरीज की दृष्टि से निहारते हैं। उसकी देखभाल भी इंसान की तरह नहीं करके मरीज की तरह करते हैं। ताकि वह शीघ्र स्वस्थ हो जाए। मुल्क में एक बीमारी ऐसी है। जिसकी चपेट में आने पर व्यक्ति बीमार तो नहीं होता। पर हालत बीमार से बदतर हो जाती है। आजीविका की गाड़ी सही ढंग से चल नहीं पाती है। घर में आए दिन गृहकलह रहता है। उस बीमारी का नाम है बेरोजगारी। जो सब बीमारियों पर भारी है। यह मौसमी बीमारी नहीं है। मौसमी बीमारी होतो रोकथाम की संभावना रहती है। पर यह तो बारहमासी है। इससे पीडि़त व्यक्ति नहीं सही ढंग से जी पाता है और नहीं मृत्यु को पाता है। रोजगार दवा हेतु दर-दर की ठोकर खाता फिरता है।
बंदा बेरोजगारी बीमारी की चपेट में कैसे आता है। जब रोजगार की तलाश में पस्त हो जाता है। तब बेरोजगारी बीमारी से ग्रस्त हो जाता है। शिक्षित बेरोजगार इस बीमारी की चपेट में कैसे आता है। यह शिक्षित बेरोजगार दीनू की मनोदशा से समझ सकते है। विविध डिग्रीधारी दीनू ने पहली बार कंपटीशन दिया तो एकाध अंक से लुढ़क गया। दूसरी बार दिया तो मामला कोर्ट में अटक गया। तीसरी बार दिया तो पेपर लीक हो गया। चौथी बार आवेदन किया तो भर्ती निरस्त हो गई। इसके बाद सिलसिला ऐसे ही गुजरता रहा। कभी पेपर लीक तो कभी मामला कोर्ट में चलता रहा और कभी खुद एकाध अंक से लुढ़कता रहा। फिर भी कभी पस्त नहीं हुआ। समय का पहिया अपनी गति से चलता रहा। जो ख्वाब संजोए थे। वे समय के पहिए के तले कुचलते गए। नौकरी पाने के चक्कर में कब बेरोजगारी बीमारी से पीडि़त हो गया। खुद को भी पता नहीं। ऐसा भी नहीं है कि दीनू होशियार नहीं था। दीनू प्रथम जमात से प्रतिभा का धनी रहा है। आज वहीं प्रतिभा का धनी। धन के पीछे भाग रहा है। फिर भी धन पकड़ में नहीं आ रहा है। जो पकड़ में आ रहा है। वह घर-गृहस्थी से होकर वापस जा रहा है। बचत के नाम पर ठेंगा है। यह कहानी अकेले दीनू की ही नहीं। बल्कि हर उस शिक्षित बेरोजगारी की है,जो बेरोजगारी बीमारी से ग्रस्त है।

‘पहले नौकरी बाद में छोकरी’ का प्रण लेने वाले। इस बीमारी से पीडि़त होने के उपरांत शीघ्र ही प्राणिग्रहण संस्कार में बंध जाते हैं। इनके घरवाले शादी जल्दी इसलिए कर देते हैं। नौकरी चक्कर में कहीं छोकरी भी नहीं मिली तो जिंदगी भर कुंवारा बैठा रहेगा। इस बीमारी से पीडि़त,चाहकर भी घरवालों के खिलाफ नहीं जा सकता। खिलाफ चल तो जाए। पर खिलाफ जाने के सभी रास्ते अवरुद्ध होते हैं। जाए तो किधर से जाए। दुस्साहस करके अवरूद्ध रास्ते से चल भी गया तो काम से गया। काम से गया तो तमाम से गया। इसलिए अवरूद्ध रास्ते से कोई नहीं जाना चाहता है।

शादी के उपरांत धर्मपत्नी को क्या-क्या चाहिए होता है। इससे तो आप अच्छी तरह से वाकिफ है। पत्नी पतिदेव को आए दिन रसोई से लेकर अपने सौंदर्य प्रसाधनों तक की फेहरिस्त थमाती रहती है। जो इस बीमारी के पीडि़त से कभी पूरी नहीं हो पाती है। जब पत्नी द्वारा दी गई फेहरिस्त पूरी नहीं होती है। तब गृहकलह होता है। गृहकलह होता है तो न जाने पति को क्या-क्या सुनना पड़ता है। कहने की तो हिम्मत नहीं होती। चुपचाप सुनना ही पड़ता है। सुनने में भलाई है। अन्यथा शामत नहीं।
महंगाई की मार का भार शिक्षित बेरोजगार उठा नहीं पाता है। बड़ी मुश्किल से उठाने की कोशिश करता है तो लडख़ड़ा कर गिर जाता है। गिरे हुए को कोई उठाने भी नहीं आता है। सब देखकर चलते बनते हैं। खुद को ही उठना पड़ता है। फिर से खड़े होकर जैसे-तैसे महंगाई की मार का भार उठाना ही पड़ता है। क्या करें? बेरोजगारी बीमारी से पीडि़त है। जिसका इलाज भगवान भरोसे हो जाए तो हो जाए। अन्यथा वह इस बीमारी से जूझता रहता है। इस बीमारी का कोई अस्पताल तो होता नहीं। नहीं कोई डॉक्टर होता है। इसकी नहीं कोई दवा। दुआ ही इसकी दवा है। जो कुछ चमत्कार होता है,वह भगवान भरोसे होता है। होने को तो भरोसा भरसक होता है। पर जिस पर भरोसा होता है और वह भरोसेमंद नहीं निकले। तब भरोसा भरसक न होकर भूसा हो जाता है। भूसा भी ऐसा होता है। पशु मुंह मारकर दूर हट जाते हैं। किंतु भगवान पर भरोसा तो भरोसा ही होता है।

जो शिक्षित बेरोजगार बेरोजगारी बीमारी से पीडि़त है। वह जब देखों तब ही किस्मत का रोना रोता रहता है। उसकी दिलोदिमाग की शक्ति निर्बल पड़ जाती है। वह चाहकर भी अपनी स्थिति सुधार नहीं पाता है। उसको अपनी अर्हता के अनुरूप कार्य मिलता नहीं और देहाड़ी मजदूरी होती नहीं। अर्हता के मुताबिक कार्य मिलता है तो वेतन अर्हता के अनुरूप नहीं मिलता है। ऐसी स्थिति में यह बीमारी दिन-ब-दिन बढ़ती जाती है। हां इस बीमारी का एक रामबाण उपाय है। अपनी अर्हता के मुताबिक प्रतियोगिता परीक्षाओं की निर्धारित आयु सीमा से पूर्व नौकरी मिल जाए तो निजात मिल जाती है। अन्यथा यह बीमारी महामारी बन जाती है। जब महामारी बन जाती है तो इसका इलाज लाइलाज है। जिंदगी भर सताती है। अपनी साथ ओर बीमारियों को भी बुला लेती हैं। 

17 Jun 2017

रामभरोस का भरोसा रामभरोसे

मित्र! रामभरोस यथा नाम तथा गुण चरितार्थ है। उस पर कोई भरोसा करें ना करें। वह तो आंख मूंदकर भरोसा कर लेता है। फिर चाहे सामने वाला भरोसेमंद ही नहीं हो। कई लोग इत्ते भरोसे के साथ यकीन दिलाते हैं कि आपका अमुख कार्य। अमुख तारीख को सुनिश्चित हो जाएंगा। यह सुनकर हम भी सुनिश्चित की चादर ओढ़कर सो जाते हैं। सुनिश्चित की अवधि समीप आने पर हमारी आंखे खुलती हैं तो सुनिश्चित की चादर अनिश्चित में समेटी हुई मिलती है। अनिश्चित में समेटी हुई चादर को आप हम तो दोबारा ओढ़ना मुनासिब नहीं समझते। पर मित्र ! रामभरोस अनिश्चित में समेटी हुई चादर को भी फैलाकर दुबारा सो लेता है। अब रामभरोस को कौन समझाए? वह किसी कि मानता भी तो नहीं। कहता है,बेचारे की कुछ मजबूरी रही होगी। वह तो तकरार में भी इनकार नहीं करता। इनकार ही किया है। इकरार तो यथावत है। इकरार है तो भरोसा भरसक है। इसे क्या मालूम? ऐनवक्त पर मना करने पर वहीं स्थिति होती है। जो चुनाव में नेताजी की ऐनवक्त पर टिकट कटने पर होती है।
कहते है कि जिस पर भरोसा होता है। वहीं मुसीबत में काम आता है। लेकिन भरोसा देकर ऐनवक्त पर टालमटोल कर जाना। मुसीबत में एक ओर मुसीबत झेलना पड़ता है। फिर एक ओर एक मुसीबत मिलकर ग्‍यारह का काम करती हैं। मौका मिलने पर काम भी तमाम कर देती है। मुसीबत यहां तो आती नहीं और आती है जल्दी सी जाती नहीं। खुद तो आती है,जो आती है,अपने संग मानिसक तनाव और ग्रह क्लेश भी साथ लाती है। जेल से कैदी का बाहर निकलता आसान है पर मुसीबत का निकलना मुश्किल है। मुसीबत तो मुसीबत है।
रामभरोस का जिस पर भरोसा कायम है। उसे रामभरोस के नाम में,जो ­‘राम’ है उसमें मर्यादा पुरुषोत्तम ­‘राम’ तो नजर आता है। पर राम के पीछे जुड़ा ‘भरोस’ में भरोसा दिखाई नहीं देता। वह सोचता होगा। जिसका नाम ही राम के भरोसे है यानी रामभरोस है। उस पर क्या भरोसा करें?विश्वास कुमार होतो। कम से कम नाम पर तो विश्वास रहता है। फिर चाहे वह नाममात्र का ही विश्वास कुमार क्यूं ना हो। इसमें रामभरोस का दोष थोड़ी है। मां-बाप दोषी है। जिन्होंन ऐसा नाम रखा। मां-बाप भी क्यूं दोषी है? दोषी तो ज्योतिषी है। ज्योतिषी भी क्यूं दोषी? वह तो पंचाग के मुताबिक चलता है। दोषी तो ग्रह है जिसमें इसका जन्म हुआ था। ग्रहों का भी क्या दोष है? दोष तो तुला राशि का है जिसने यह नाम प्रदान किया। इसमें तुला राशि का भी क्या दोष है? तुला राशि ने थोड़ी कहा था कि रामभरोस ही नाम रखना। तुला में रामभरोस के अलावा ओर भी अनेकानेक नाम थे। उनमें से भरोसा लायक नाम रख लेते। खैर,छोड़ों।
रामभरोस ऐसा क्या करें? उसका जिस पर भरोसा है। वह भी उस पर भरोसा कर ले। आप ही कोई सुझाव दीजिए। हो सकता है,आपका सुझाव। उसके दिमाग में घुस जाए और वह भरोसा कर ले। एक भाई साहब! ने बहुत अच्छा सुझाव दिया। भरोसा तो भरोसा है। करें ना करें उसकी मर्जी। इसमें आप-हम क्या कर सकते है सरजी। आप भी किसी के भरोसे आश्वस्त है तो जान लीजिए भाई साहब का सुझाव शाश्वत है। इसके बावजूद भी भरोसा करते हैं तो जिम्मेवारी खुद की होगी। एक दूसरे भाई साहब ने सुझाव दिया- भरोसे पर दुनिया कायम है। भरोसा है तो सब कुछ है। अन्यथा कुछ भी नहीं। सुझाव तो इनका भी वाजिब है। ऐतबार ही है,जिसकी बुनियाद पर रिश्तों की इमारत टिकी हुई है। अन्यथा कब की ध्वस्त हो गई होती। ऐतबार नहीं होता तो प्रेमी-प्रेमियों में प्रेम ही नहीं होता। प्रेम नहीं होता तो प्रेमी-प्रेमिका नहीं होती। ऐतबार है तो प्रेम है और प्रेम है तो प्रेमी-प्रेमिका है।
रामभरोस जिस पर अटूट भरोसा करता है। उसने मुझे बताया कि अधुनातन में भरोसा रहा ही कहां? जो निहायत कम बचा हुआ है। उसके भी स्वार्थ की दीमक लग गई है। जो भरोसे को धीरे-धीरे चट कर रही है। जिस पर खुद से ज्यादा विश्वास है। वहीं विश्वास का गला दबा रहा। इसीलिए तो भाई भाई से आंखे नहीं मिला रहा है। उसी ने आगे बताया कि भाई साहब ! होने को तो भरोसा तो भरसक होता है। लेकिन जिस पर भरोसा होता है। वहीं विश्वासघात निकल आए तो इसमें भरोसा भी क्या करे?रही बात रामभरोस की,जिसका नाम ही रामभरोस है। उस पर भरोसा करना भी रामभरोसे ही है।

6 Jun 2017

पर्यावरण संरक्षित खुद के बदलने से संभव

हर वर्ष पांच जून को हम विश्व पर्यावरण दिवस मनाते हैं और पर्यावरण के प्रति चिंता जाहिर करते हैं। विचार-विमर्श करते हैं। लोगों में जागरूता लाने के लिए रैलियां निकालते हैं। लेकिन खुद इस दिन के अगले दिन ही भूल जाते हैं। जबकि बचाव और बदलाव खुद के बदलने से ही संभव है। जब तक खुद आगे आकर पहल नहीं करेगें तो दूसरा कैसे करेंगा। यह सोचनीय और विचारणीय प्रश्र है। जिसका उत्तर किसी ओर के पास नहीं है। बल्कि खुद के पास ही है। लेकिन हमारी मानसिकता होती है कि मेरे अकेले से क्या होगा? यह सोचकर कदम पीछे रख लेते हैं। लेकिन अब हमें कदम आगे बढ़ना होगा है। प्रकृति ने हमको जीवन दिया। जीने का अधिकार दिया है। हमारे साथ उन तमाम जीव-जन्तुओं को भी जीवन दिया है,जो प्रकृति पर ही निर्भर हैं। पर समझ से परे है कि मनुष्य को पता भी है कि पर्यावरण है तो जीवन है। उसके बावजूद भी अपने स्वार्थ की खातिर प्रकृति से खिलवाड़ कर रहा है। प्रकृति से खिलवाड़ करना खुद पर कुठाराघात करना हैं। अब भी वक्त हैं बिगड़ते पर्यावरण को संरक्षित करने का। अगर अब भी नहीं चेते तो समझों विनाश भी नजदीक ही है।

आज हम बिगड़ते पर्यावरण के कारण,जो संकट झेल रहे हैं। उनसे हम सब अच्छी तरह से वाकिफ हैं। जल रसातल में पहुंच गया। पीने योग्‍य पानी नहीं बचा है। वायु दूषित हो रही है। श्वास लेने भी लकलीफ होती। स्वार्थलिप्सा की कुल्हाड़ी पेड़-पौधों पर इस कधर चल रही है कि जंगल के जंगल विलुप्त हो रहे हैं। जीवनदायिनी नदियां मिटने के कगार पर हैं। पहाड़ ध्वस्त हो गए है। ग्लोबल वार्मिंग बढ़ता जा रहा है। इत्ता ही नहीं विकास के नाम पर भी पर्यावरण का विनाश हो रहा है। विकास की राह में जो भी पर्यावरण संसाधन आ रहे हैं उन्हें बचाने के बजाय उनका नेस्तनाबूद कर रहे हैं। जबकि जल,जंगल,नदियां,पहाड़ के बिना जीवन अधूरा है।
रोजमर्रा के कार्यों में हम ऐसे कृत्य करते हैं,जिससे पर्यावरण दूषित होता है। घर का कूड़ा-कचरा पड़ोसी की ओर सरका देते और पड़ोसी अपनी ओर सरका देता है। जिससे मृदा प्रदूषण फैलता है और मक्खी,मच्छर पनपते हैं। अपने आस-पास मच्छर पनपने का अभिप्राय है,मलेरिया,डेंगू,चिकनगुनिया,जैसी जानलेवा बीमारियों को बढ़ावा देना। पड़ोसी की ओर कूड़ा-कचरा सरकाने की बजाय अपना एवं अपने आस-पास कूड़े के लगे ढेर को जला दे। जिससे अपने आस-पास स्वच्छता होगी और प्रदूषण भी नहीं फैलेगा। हम सब करने लग जाए,तो पर्यावरण कितना संरक्षित हो सकता है। इसका आकलन आप खुद कर सकते हैं।
इसी तरह पॉलिथीन के बढ़ते प्रभाव पर नियंत्रण करना होगा। क्योंकि हम साग,सब्जी,फल व अन्य वस्तुओं के साथ जो पॉलिथीन ला रहे हैं। उसी पॉलिथीन का बहुतायत में दुरुपयोग होता है। हम सामान तो रख लेते हैं और पॉलिथीन को घर से बाहर फेंक देते हैं। जो पर्यावरण के साथ-साथ पशुओं के लिए भी नुकसान दायक है। यह नष्ट न होने की वजह से भूमि की उर्वरता क्षमता को भी कम करती है। इसके जलाने से निकलने वाली धुआं ओजोन परत को क्षति पहुंचा रही है। जिससे ग्‍लोबल वार्मिग एक बड़ा कारण है। इसके कचरे के जलाने से कार्बन मोनोऑक्साइड व कार्बन डाईऑक्साइड जैसी विषैली गैस उत्सर्जित होती हैं। अगर पॉलिथीन का पूर्णतया उपयोग बंद हो जाए तो पर्यावरण तो संरक्षित होगा ही,साथ में पॉलिथीने से होने वाला दुष्प्रभावों से भी बचाव होगा।
आज सबसे महत्ती आवश्यकता है बहुतायत में पेड़-पौधे लगाने की। क्योंकि जितने अधिक पेड़-पौधे होंगे। उतना ही पर्यावरण संरक्षित होगा। इसके लिए हमें कुछ अलहदा करना होगा। जैसे कि जन्मदिन,शादी में उपहार के साथ एक पौधा देने की रवायत भी बना ले तो आने वाले समय में पर्यावरण को बचाया जा सकता है। उपहार में मिले पौधे को लगाना और उसकी देखभाल करना एक बच्चे के पालन-पोषण के समतुल्य है। एक पौधे का ख्याल भी अपने बच्चे की तरह करेंगे तो वह पौधा एक दिन पेड़ का रूप धारण करके हमें वह सब प्रदान करेंगा। जिसकी हमें अपेक्षा रहती है। बहुतायत पेड़-पौधे होंगे तो हमें शुद्ध वायु मिलेगी। समय पर बारिश होगी। समय पर बारिश होगी तो जल स्तर ऊपर उठेगा। पेड़-पौधे लगाना और उनकी रक्षा करना मनुष्य के हाथ में ही है। इसमें लागत और श्रम की आवश्यकता नहीं होती है। बस समय पर देखभाल करनी होती है।


31 May 2017

उफ! गरमी के तीखे तेवर

भाई साहब! गरमी ने अपने तीखे तेवर दिखाना शुरू कर दिया है। अरे,भाई! मई चल रही है। जून आने को आतुर है। इन दिनों में ही गरमी अपने तेवर नहीं दिखाएंगी तो फिर कब दिखाएंगी। जाड़े के दिनों में तो दिखाने से रही। मई-जून ही तो इसके प्रिय माह हैं और इन महीनों में ही इसका मिजाज बिगड़ जाता है। मिजाज बिगड़ते ही यह कुपित हो उठती है। जब यह कुपित होती है,तो अपने  सीधे तेवर बदलकर तीखे कर लेती हैं। इसके तीखे तेवर देखकर इससे पंखा,कूलर,एसी,भी डरने लगती हैं। डरके मारे यह सब ठंडी हवा देते-देते एकदम से गर्म हवा देने लगते हैं। जब यह एकदम से गर्म हवा देने लगते हैं,तो हमें इनमें कुछ ना कुछ मिस्टेक नजर आने लगती है। जबकि मुख्य वजह मिस्टेक न होकर गरमी के तीखे तेवरों का प्रहार होता है।
भाई साहब! गरमी अपने तेवर अपने-आप नहीं बदलती है। सूर्यदेव गगन से इत्ती तपन धरा पर भेज देता है। जिससे औसत तापमान से तापमान चालीस डिग्री सेल्सियस से भी ऊपर पहुंच जाता है। तापमान चालीस डिग्री पार जाते ही गरमी बेकाबू हो जाती है। बेकाबू होने पर इसके सामने सब जतन फेल है। फिर तो नींबू पानी,जूस,से भी राहत नहीं मिलती। इनदिनों तो भाई साहब! उफ! गरमी कब अपनी त्यौरियां बदल ले। कहना मुश्किल है। अपने रोजमर्रा के कार्य इसके तेवर बदलने से पूर्व ही करले वहीं फायदेमंद है। अन्यथा यह तो किसी को भी नहीं बख्शती। इसकी दृष्टि में सब समतुल्य हैं। किसी से कोई भेदभाव नहीं। नहीं परोपकार की भावना। इससे बचने के लिए तो खुद को ही जुगत करनी पड़ती है।
तीव्रगति से चलने वाली गरमी की बहिन ‘लू’। गरमी से भी खतरनाक है। जो ‘लू’ की चपेट में आ गया। उसे अपनी नानी की याद बिना याद किए ही आ जाती है। कई बार ‘लू’  ग्रस्त स्वर्गवासी होकर नानी के पास पहुंच जाता है। नवासे को इस तरह से एकाएक देखकर नानी भी अवाक रह जाती है। नवासे से नानी इहलोक से परलोक आने की वजह पूछती है। नवासा ‘लू’ का हवाला देता है। यह सुनकर नानी को भी अपनी नानी याद आ जाती है। ‘लू’  से तो खुद यमराज भी डरता हैं। वह भी अपने दूतों को ‘लू’ से बचने की हिदायत देकर इहलोक भेजता हैं। क्योंकि ‘लू’ का मारा दूत भी बिस्तर पकड़ लेता है।
भाई साहब! आपको क्या बताओं? गरमी के तीखे तेवर देखकर तो हैंडपम्प मुंह लटकाए खड़े हैं। कुआं,बावड़ी,जोखड़ सूखे पड़े हैं। बेजुबान पशु-पक्षी बूंद-बूंद के लिए तरस रहे हैं। पर मेघ नहीं बरस रहे। भाई साहब! गरमी के तीखे तेवरों से तो बचना। किंतु पशु-पक्षियों के लिए पानी की व्यवस्था अवश्य करना। इसके तीखे तेवर दोपहर में तो ओर भी तीखे हो जाते हैं। जिन्हें देखकर सड़के सूनी पड़ जाती हैं। बाजार में सन्नाटा पसर जाता है। अपने आप ही देह से पसीनो छूटने लगता है। पर भाई साहब! उस मजदूर का क्या होगा? जो भयंकर गरमी में भी काम करता है। यह सुनकर भाई साहब तो निरुत्तर हो गए। लेकिन आप इसे मजदूर की मजबूरी कहे या फिर पेट की भूख। यह तो हरेक मौसम में काम करता है और इसकी देह से हरके मौसम,ऋतु में पसीना निकलता रहता है। मजदूर तो अपना पेट पसीने की कमाई से ही भरता है। मजदूर की तरह ही किसान है और यहीं हाल गरीब का है। यहीं लोग हैं,जो कैसे भी करके। गरमी क्या? गरमी के बाप के भी तीखे तेवर सहन करते हैं। क्या करे? भाई साहब मजबूर भी है और मजदूर भी है। गरमी के तीखे तेवर भी अमीर आदमी ही सहन नहीं कर पाता। अमीर पैसों की गरमी तो सहन कर लेता है।

भाई साहब! गरमी आती ही क्‍यूं है? वसन्‍त ऋतु के उपरांत वर्षा ऋतु ही आ जाए तो कितना अच्‍छा रहे। गरमी में तपन से झुलसने वाले पेड-पौधे प्रफुल्लित हो जाए। सड़क से पिघलने वाला तारकोल बंद हो जाए। गरमी में कुत्‍तों की जीभ बाहर निकल आती हैं उसका निकल बंद हो जाए। छःकी छः ऋतु अपने ऋतुकाल में आती हैं। गरमी भी आती तो अपने ही ऋतु काल में है। जितना बैचेन गरमी ऋतु करती है उतना कोई सी ऋतु नहीं करती। इसके तो तेवरों से ही डर लगता है। हाथ पांव उठा ले तो शामत आ जाए। इसके तीखे तेवर तो इन्द्रदेव ही नीचे कर सकता है। उसके आगे तो यह टिकती ही नहीं। पर भाई साहब! इन्द्रदेव तो आपके और हमारे बुलावे से तो आने से रहे। उनका तो जब मन करेगा। तब ही आएंगे। तब तक तो गरमी हाल-बेहाल कर देगी। 

30 May 2017

सूर्यदेव के साथ लू का कोहराम

उफ ! क्‍या गरमी है। बेचैनी कम होने के बजाय बढ़ती जा रही है। सूर्यदेव गगन से इत्‍ती तपन बरसा रहा है कि औसत तापमान से तापमान चालीस डिग्री सेल्सियस से भी ऊपर पहुंच रहा है। पुराने रिकॉड़ टूटकर गिर रहे है और नये स्‍थापित हो रहे है। गरमी का जलवा है। वैसे इस मौसम में गरमी नहीं तो क्‍या सर्दी होगी? हर साल होती है। इस साल भी हो रही है,तो क्‍या नई बात हो गई। लेकिन बार-बार कहा जा रहा है,कूलर, गर्म हवा फेंक रहे हैं।
तीव्रगति से चलने वाली गरमी की बहिन ‘लू’। गरमी से भी खतरनाक है। जो ‘लू’ की चपेट में आ गया। उसे अपनी नानी की याद बिना याद किए ही आ जाती है। कई बार ‘लू’  ग्रस्त नानी को याद करते-करते स्वर्गवासी नानी के पास पहुंच जाता है। नवासे को इस तरह से एकाएक देखकर नानी भी अवाक रह जाती है। नवासे से नानी इहलोक से परलोक आने की वजह पूछती है। नवासा ‘लू’ का हवाला देता है। यह सुनकर नानी को भी अपनी नानी याद आ जाती है। ‘लू’  से तो खुद यमराज भी डरता हैं। वह भी अपने दूतों को ‘लू’ से बचने की हिदायत देकर इहलोक भेजता हैं। कहता है, थोड़ी थोड़ी देर बाद पानी पीते रहना, खाली पेट बाहर मत निकलना। खाली पेट वाले को लू सबसे पहले लगती है। संभलकर काम करना चाहिए।‘लू’ का मारा दूत भी बिस्तर पकड़ लेता है।

भाई साहब! आपको क्या बताओं? गरमी तो गरमी सूर्यदेव के तीखे तेवर देखकर तो हैंडपम्प मुंह लटकाए खड़े हैं। कुआं,बावड़ी,जोखड़ सूखे पड़े हैं। बेजुबान पशु-पक्षी बूंद-बूंद के लिए तरस रहे हैं। पर मेघ नहीं बरस रहे। भाई साहब! सूर्यदेव के तीखे तेवरों से तो बचना। किंतु पशु-पक्षियों के लिए पानी की व्यवस्था अवश्य करना। इसके तीखे तेवर दोपहर में तो ओर भी तीखे हो जाते हैं। जिन्हें देखकर सड़के सूनी पड़ जाती हैं। बाजार में सन्नाटा पसर जाता है। अपने आप ही देह से पसीनो छूटने लगता है। पर भाई साहब! उस मजदूर का क्या होगा? जो भयंकर गरमी में भी काम करता है। यह सुनकर भाई साहब तो निरुत्तर हो गए। लेकिन आप इसे मजदूर की मजबूरी कहे या फिर पेट की भूख। यह तो हरेक मौसम में काम करता है और इसकी देह से हरके मौसम,ऋतु में पसीना निकलता रहता है। मजदूर तो अपना पेट पसीने की कमाई से ही भरता है। मजदूर की तरह ही किसान है और यहीं हाल गरीब का है।
भाई साहब! गरमी आती ही क्‍यूं है? वसन्‍त ऋतु के उपरांत वर्षा ऋतु ही आ जाए तो कितना अच्‍छा रहे। सूर्यदेव की तपन से झुलसने वाले पेड-पौधे प्रफुल्लित हो जाए। सड़क से पिघलने वाला तारकोल बंद हो जाए। गरमी में कुत्‍तों की जीभ बाहर निकल आती हैं उसका निकल बंद हो जाए। यह सूर्यदेव भी ना गरमी ऋतु में अपनी त्‍यौरियां चढ़ाता है ओर ऋतुओं से तो यह भी डरता है। गरमी याद दिलाती है,तुम जितना प्रकृति के साथ छेड़छाड़ करोगें,मैं तुम्‍हें उतना ही सताऊंगी। बंद करो ये विकास के नाम पर विनाश।

22 May 2017

दो फीसदी का मलाल

बच्चों के परिणाम आने शुरू हो गए हैं। अकों की मारा-मारी मची हुई हैं। अकों का अंक गणित हिचकोले खा रहा है। अंकों की घटत-बढ़त हो रही है। इस घटत-बढ़त के अनुरूप माता-पिता के चेहरे खिले हुए हैं। खिलता हुआ चेहरा उसे चिढ़ा रहा,जिसके बच्चे की दो प्रतिशत कम रही,अपने बच्चे से। खिलता हुआ चेहरा भी खुलकर नहीं खिल रहा। उसके बच्चे की पड़ोसी के बच्चे से दो प्रतिशत कम रही। पड़ोसी प्रफुल्लित तो है,मगर चिंतित भी है। उसका बेटा कक्षा में टॉपर आया है,पर मेरिट में न आ सका। बेटा दो प्रतिशत से मेरिट में आने से महरूम हो गया। यह मलाल उन माता-पिता को चिंतित कर रहा है। जिनके लाल अपने अड़ोसी-पड़ोसी के लाल से दो प्रतिशत तले दब गए।
बच्चों के माता-पिता घटत-बढ़त के हिसाब-किताब में लगे हुए हैं। अपने के कैसे घटे? उसके बच्चे के कैसे बढ़े? एक-एक प्रतिशत पर मंथन जारी है। बार-बार मार्कशीट को देखा जा रहा है। विषय वार बच्चे की कमजोरी ईजाद कर रहे हैं। किस विषय में बच्चे के अंक कम है। जिस विषय में अंक कम है। उस पर शोध किया जा रहा है। उस विषय का तो ट्यूशन भी करवाया था। उसके बावजूद भी अंक कम कैसे आए? इस संदर्भ में बच्चे से सवाल-जवाब किया जा रहा है। उस पर हुआ व्यय खर्च उसे गिनाया जा रहा है। बच्चा निरूत्तर है। वह सोच नहीं पा रहा है कि वह जवाब भी दे, तो क्‍या दे? उसके जवाब से उसके मां-बाप कितना संतुष्‍ट होंगे। माता-पिता उसकी नजाकत को भाप नहीं पा रहे है।

प्रतिस्पर्धा की दौड़ में बच्चा कहीं फिसल गया होगा। क्योंकि इस उम्र में बच्चे फिसल भी जाते हैं। यह तो सामान्‍य की बात है। अनोखा क्‍या है इसमे। आंखे चार हुई और बच्चा फिसला। आंखे चार नहीं हुई,तो बच्चा कहीं ओर फिसल गया होगा। इंटरनेट का युग है। मोबाइल,लैपटॉप पर उंगलियां ज्यादा चल गई होंगी। परीक्षा में लेखन स्पीड़ धीमी रही हो होगी। स्मरण शक्ति जाम में फस गई होगी। जब तक जाम खुला,परीक्षा का समय पूर्ण हो गया होगा। प्रतिस्पर्धा के मैदान में मेहनत की दौड़ करते वक्त पैरे तले कुछ आ गया होगा। जिससे पैर फिसल गया होगा। फिसल कर गिरता है,तो एकाध प्रतिशत की चोट या खरोंच आयी जाती है। शायद इसलिए,दो प्रतिशत दूर जाकर गिरा हो।

ऐसी स्थिति में बच्चे को मरहम पट्टी की जरूरत होती है। उसे पुचकार की जरूरत होती है। लेकिन हम चोट व खरोंच की अनदेखी कर,गिरने की वजह पूछते है। फिर बच्चे अटपटे जवाब देते हैं। चिंटू से दो प्रतिशत कम है,तो क्या हुआ? बिट्टू से तो दो प्रतिशत ज्यादा है। वह तो क्या है कि चिंटू परीक्षा में नकल-वकल कर दो प्रतिशत ज्यादा ले आया। उसकी क्या बिसात,जो मेरे से दो अंक ज्‍यादा ले आए। जो भी हो या हुआ हो। माता-पिता को इसकी परवाह नहीं। उन्हें,तो दो प्रतिशत का मलाल है। वे दो प्रतिशत कम आना अपनी तौहीन समझते हैं।

19 May 2017

घड़ी वाले का बच्चा 95.60 अंक लाया

सच्ची लगन से मेहनत की जाए तो सफलता को भी मोहताज होना पड़ता है। फिर चाहे कैसी भी मुसीबत क्यों ना आ जाए। सफलता स्थापित होकर ही रहती है। उक्त उक्ति को चरितार्थ किया है। अलवर जिले के थानागाजी तहसील के डहरा गांव के कमलेश खटुम्बरिया पुत्र श्री रामवतार खटुम्बरिया ने। इसने राजस्थान बोर्ड अजमेर के आए 12 वीं विज्ञान वर्ग के परिणाम में 95.60 अंक अर्जित किए है। कमलेश ने बताया कि मैं छ:-सात घंटे नियमित अध्ययन करता था। एक बार पढ़ने बैठ जाता था तो तीन-चार घंटों से पहले नहीं उठता था। मैं और मेरी बहिन व मेरे ताऊजी का लड़का,हम तीनों एक ही कमरे में अध्ययन करते थे। पढ़ाई के दौरान कोई किसी से वार्तालाप नहीं करता था। किसी को कुछ पूछना होता था तब ही मुंह खोलते थे। हम तीनों भाई-बहिन थानागाजी में स्थिति ज्योति एकेडमी में पढ़ते थे।
कैसे होता था दिनचर्या की आविर्भाव
कमलेश ने बताया कि हम तीनों भाई-बहिन सुबह चार बजे उठते थे। उसके बाद नित्‍य कार्य करके थोड़ी बहुत देर व्‍यायाम करते थे। उसके बाद नाश्‍ता करके पढ़ने बैठ जाते थे। स्‍कूल से लौटकर शाम को स्‍कूल का होम वर्क करते थे। रात को दस बजे तक पढ़ते थे। परीक्षा के दौरान देर रात तक पढ़ाई करते थे।
ताऊजी के घर पढ़ाई करता था

कमलेश विराटनगर में स्थिति अपने ताऊजी हरिराम रैगर के घर पर रहकर पढ़ाई करता था। आपको बताते दे कि कमलेश उसी पुष्पराज भारती का चचेरा भाई है,जिसने विज्ञान वर्ग में 98.00 प्रतिशत अंक अर्जित किए है। कमलेश की बहिन प्रिती खटुम्बरियां भी इनके साथ ही पढ़ती थी। उसने भी 12 वीं विज्ञान वर्ग में 84 प्रतिशत अंक अर्जित किए है। कमलेश के ताऊजी हरिराम ने बताया कि तीनों बच्चे शुरू से पढ़ने में अव्वल रहे हैं।
किक्रेट व पेंटिग का शौक
कमलेश को पढ़ाई के अलावा किक्रेट खेलना और पेंटिग बनाना अच्छा लगता है। किंतु पहले पढ़ाई उसके उपरांत समय मिलता था तो कभी-कभार पेंटिग या किक्रेट खेल लेते थे। अन्यथा फोक्स पढ़ाई पर ही होता था। कमलेश ने बताया कि हम तीनों भाई-बहिनों का एक ही मकसद था। उच्च अंक अर्जित करना। जिसमें हम कामयाब ही हुए।
पिता की घड़ी दुकान
कमलेश के पिताजी की विराटनगर कस्बे में घड़ी की दुकान है। इसी से उनके घर की आजीविका चलती है। मां कविता देवी ग्रहणी है। कमलेश के पिताजी ने बताया कि कमलेश शुरू से पढ़ाई में अव्वल रहा है। उसने दसवीं में भी 93.33 अर्जित किए थे। और इस बार उसने हिंदी में 99 में अंग्रेजी में 96 फिजिक्‍स में,90 केमिस्‍ट्री में 97, मैथ्‍स में 96 एवं कुल 500 में से 478 अंक अर्जित कर 95.60 प्रतिशत लाए है।
                                                भविष्य में आईएएस बनना

पुष्पराज भारती की तरह ही कमलेश का भी भविष्य में आईएएस बनने का सपना है। कमलेश ने बताया कि मैं आईएएस बनकर गरीब,असहाय लोगों की मदद करना चाहता हूं। प्रतिस्पर्धा के दौर में किस तरह से पढ़ाई करनी चाहिए। मैंने कमलेश से यह प्रश्र किया तो उसने उत्तर दिया- प्रतिस्पर्धा की परवाह न करके सच्ची लगन और मेहनत से अध्ययन करते रहे। सफलता अपने आप आपके कदम चूमेगी।
सफलता का श्रेय ताऊजी व माता-पिता को
कमलेश ने अपनी सफलता का श्रेय अपने दादा बाबूलाल रैगर दादी विद्या देवी,ताऊजी-ताईजी,सहित पूरे परिवार जनों व स्कूल के अध्यापकों को दिया।

17 May 2017

जूती बनाने वाले की बेटी अंजेश ने लाए 91.20 प्रतिशत

अंजेश का सपना डॉक्टर बनना
कुछ कर गुजरने की क्षमता हो और अपने लक्ष्य के मुताबिक मेहनत कि जाए तो सफलता खुद चलकर चली आती है। झुंझुनू जिले के उदयपुरवाटी तहसील के पौंख निवासी अंजेश रसगनिया पुत्री श्री प्रकाश चन्द रसगनिया ने राजस्थान बोर्ड अजमेर के 12 वीं विज्ञान वर्ग के आए नतीजे में 91.20 प्रतिशत अंक उस हालात में अर्जित कर दिखाया है,जो बच्चे तमाम साधन-सुविधाओं के उपरांत भी नहीं ला पाते हैं। अंजेश रसगनिया ने बताया कि मैं नियमित चार-पांच घंटे पढ़ाई करती थी। पढ़ाई के दौरान बीच-बीच में पिताजी के कार्य में भी हाथ बंटाती थी। अंजेश के पिताजी जूतिया बनाने का कार्य करते हैं और इनकी मां छोटी देवी ग्रहणी है। घर की हालत दयनीय है। जिसके चलते अंजेश अपने पिताजी के कार्य में सहयोग करती है। अंजेश ने बताया कि परीक्षा से एक सप्ताह पहले पापा का एक हादसे में पैर फेक्चर हो गया था। यह देखकर मैं घबरा गई। मैंने परीक्षा देने से इनकार कर दिया था। पर घरवालों ने हिम्मत बढ़ाई तो मैंने परीक्षा दी और नतीजा आपके सामने है ही। अभी पापा के पैर में राड़ लगी हुई है। जिससे वे पहले की तरह सही ढग़ से चल नहीं पाते हैं। अंजेश के पिताजी 12 वीं तक पढ़े है और घर पर ही जूतियां बनाकर अपने परिवार की आजीविका चलाते हैं।



अंजेश के पिता ने बताया कि अंजेश अपनी चार भाई-बहिनों में सबसे छोटी है। अंजेश से बड़ी पूजा रसगनियां भी उसी के साथ पढ़ती थी। पूजा ने भी 78 प्रतिशत अंक अर्जित किए हैं। अंजेश के भाई-बहिनों में सबसे बड़े नरेन्द्र रसगनिया बहरहाल सीकर से बीटेक कर रहा। इससे छोटा विजय रसगनिया नेवी की तैयारी में जुटा हुआ है। 
अंजेश के भाई विजय रसगनिया ने बताया कि अंजेश के शुरू से पढऩे में अव्वल रही है। उसने दसवीं में 69 प्रतिशज अंक अर्जित किए थे। इस बार अंजेश के हिंदी में 91,अंग्रेजी में 74, फिजिक्‍स में 93, केमिस्‍ट्री में 98 एवं बायोलॉजी में 100 अंक आए है। कुल 500 में से 456 अंक आए है।
डॉक्‍टर बनने का सपना
अंजेश ने बताया कि मैं भविष्‍य में डॉक्टर बनकर गरीब,असहाय लोगों की मदद करना चाहती हूं। उसने अपनी सफला का श्रेय अपने माता-पिता,भाई-बहिन एवं गुरुजनों को दिया।
लोगों ने मोबाइल पर दी बधाई
अंजेश के पिता के मोबाइल पर जैसे अंजेश का परिणाम आया। लोगों के फोन आने शुरू हो गए। परिणाम वाले दिन लोगों देर रात तक बधाई दे रहे थे। सो‍शल मीडिया पर भी अंजेश को बधाई देने वालों का तांता लगा हुआ है। लोग अंजेश की आर्थिक मदद करने के लिए भी आगे आ रहे है और फोन कर बैंक खाते की जानकारी मांग रहे है।

आर्थिक मदद इस खाते में भेज सकते है 
अंजेश रसगनिया के परिवार की माली हालात दयनीय है। आप अपनी इच्छानुसार इस गरीब परिवार की आर्थिक मदद निम्न खाते में कर सकते है।

बैंक का नाम - बड़ोदा राजस्थान क्षेत्रिय ग्रामीण बैंक

खाता धारक नाम अंजेश रसगनिया

खाता संख्या -43190100009070  IFSC CODE- BARBOBRGBXX       MICR CODE- 333647543





16 May 2017

कड़ी मेहनत का परिणाम 98 प्रतिशत

पुष्पराज भारती का सपना आईएएस बनना
पुष्पराज भारती ने राजस्थान बोर्ड के 12वीं विज्ञान वर्ग में परीक्षा में 98 प्रतिशत अंक अर्जित कर अपनी स्‍कूल एवं परिजनों का नाम रोशन किया है। पहली बार माध्‍यमिक शिक्षा बोर्ड ने राज्‍य स्‍तरीय व जिला स्‍तरीय मेरिट सूची जारी नहीं की है। हाल विराटनगर जयपुर व मूल डहरा,थानागाजी निवासी पुष्पराज की इस कामयाबी पर उनके परिवार जन काफी उत्साहित नजर आ रहें हैं। पुष्पराज के पिताजी जो राजकीय माध्यमिक विद्यालय पापड़ा,विराटनगर में सरकारी शिक्षक हैं, वे अपने बच्चों पर फ़ख़्र करते हुए बोले कि बच्चों की सफलता की वजह से ही आस-पास के माननीय का आना-जाना लगा रहता हैं, क्योंकि पिछले चार वर्षों से उनके दोंनो बच्चों में से कोई न कोई मेरिट लिस्ट में सम्मिलित होते आए हैं। सोमवार को जैसे परिणाम घोषित हुआ तो उनके घर पर बधाई देने वालों का तांता लगा रहा।

पुष्पराज ने जहां गणित में 100 वहीं हिंदी में 100, इंग्लिश में 94 फिजिक्स में 98 और कमेस्ट्री में 98 अंक प्राप्त किए हैं। कुलमिलाकर पुष्पराज ने 500 अंकों में से 490 अंक प्राप्त किए हैं। पुष्पराज के पिता श्री हरिराम वर्मा के मुताबिक उनके परिवार में पति-पत्नी के साथ दो बच्चे हैं, और दोनों ही कुशाग्र बुद्धि के धनी हैं। उनका बड़ा लड़का प्रशासनिक सेवाओं की तैयारी के साथ दिल्ली विश्वविद्यालय में बीएससी द्वितीय वर्ष का छात्र हैं।
पुष्पराज भारती ने अपनी सफलता का राज कड़ी मेहनत और शिक्षा के प्रति अपने रुझान को बताया को बताया।पुष्पराज ने बताया के परिवार का माहौल ही कुछ इस तरह का है जिससे पढ़ाई के अलावा कोई भटकाव ना हो। इसके लिए धन्यवाद के पात्र माता-पिता हैं। जिन्होंने ऐसा माहौल उपलब्ध करवाया। इस परीक्षा के पहले दसवीं बोर्ड परीक्षा में भी पुष्पराज ने 94.33 प्रतिशत अंक प्राप्त किए थे। उनके पिता जी से बात करने पर पता चला कि जिस परिवेश में शहर के बच्चे मोबाइल- फोन और टेलीविजन के बीच घिरे रहते हैं उसके इतर बच्चों ने पढ़ाई के आगे इन चीजों की कभी मांग ही नहीं की।  
पुष्‍पराज भारती के पिता हरिराम रैगर ने बताया कि उनके घर पर पिछले 6 वर्षों से TV तक नहीं चालू की गई और साथ में शहर में रहने के बावजूद भी उनके बच्चे नियमित तरीके से दिनचर्या का अनुसरण करते रहे सुबह 4:00 बजे उठने के साथ ही सुबह की सैर-यात्रा और व्यायाम को नियमित करते हैं,जो भी उनके मानसिक संतुलन को बनाए रखता हैं। 
पुष्पराज ने अपनी सफलता के राज के पीछे अपने माता पिता और घर के पूरे माहौल को जिम्मेवार बताया। उसी ने बताया कि वह आगे चलकर प्रशासनिक सेवाओं की तैयारी करके देश और समाज के लिए कुछ करने की चाहत रखता है।

पुष्पराज की माता श्री मंजू देवी जो कि गृहणी हैं। जिनसे बात करने पर पता चला, कि उन्होंने अपने दोनों बच्चों को पढ़ने के लिए कभी भी विवश नहीं किया। साथ में उन्होंने बताया की बच्चों को घर की किसी भी जिम्मेदारियों से दूर रखा गया। बच्चों का जब मन हुआ तभी पढ़ाई किया और जब मन हुआ तब सोए। पढ़ाई के लिए अभिवावकों की तरफ से कोई अतिरिक्त दबाव नहीं डाला गया। पुष्पराज की पढ़ाई के अतिरिक्त अभिरुचि चित्रकारी में हैं। 
इसके पहले पुष्पराज का सिलेक्शन IIT मेंस में भी हो गया था और आगामी दिनों में एडवांस की परीक्षा भी होने वाली है लेकिन पुष्पराज ने बातचीत में बताया कि उनका रुझान इंजीन्यरिंग की तरफ नहीं हैं। उन्होंने मात्र परीक्षा इसलिए दी की परीक्षा में प्रश्न पत्र किस दृष्टिकोण पर आधारित होते हैं। इसका प्रारंभिक ज्ञान हो सके। क्योंकि आने वाले दिनों में पुष्पराज कई परीक्षाओं को देना चाहता हैं। इन सभी बातों के इतर गौर करने वाली बात यह है कि पुष्पराज ने 10वीं, 12वीं और IIT मेंस एग्जाम को बिना किसी कोचिंग सेंटर को ज्वाइन किए उत्तीर्ण किया है। जिसने आज के परिवेश में बढ़ते कोचिंग के क्रेज़ को झुठला दिया हैं। पुष्पराज ने अपने हमउम्र बच्चों को संदेश में कहा कि जीवन पथ पर संघर्ष के साथ आगे बढ़ते रहो, सफलता खुद-ब-खुद चलकर आएंगी।

लोगों ने पिता को मोबाइल पर दी बधाई  

थानागाजी में पुष्‍पराज भारती के 98 प्रतिशत आने एवं ज्योति बाल विद्या मंदिर सीनियर सेकेंडरी स्कूल थानागाजी में विज्ञान वर्ग में सबसे अव्‍वल आने पर शाला निदेशक चन्‍द्रशेखर सैनी व प्रधानाचार्य धर्मेंन्‍द्र महलावत की ओर से मंगलवार को थानागाजी कस्‍बे में जुलूस यात्रा निकाली गई। जिसमें कस्‍बेवासी एवं स्‍कूल स्‍टाफ,छात्रों ने डीजे बजाकर कस्‍बे के मुख्‍य मार्गो पर  जुलूस निकाला और आत्मिय बधाई दी। आपको बता दे कि परिणाम घोषित होते पुष्‍पराज के पिता के मोबाइल फोन पर बधाई देने वालों के देर रात तक फोन आ रहे थे।