9 Apr 2019

वंशवाद की बेल

उनकी वंशवाद की बेल मुरझाई गई थी। सूखकर गिर न जाए। इस चिंता में वे खुद सूखते जा रहे थे।मगर जैसे ही चुनावी मौसम ने दस्तक दी बेल फूटने लगी। जिसे देखकर बुझ चुका उम्मीद का दिया जल उठा। कल्पना की कोंपल टहनियों का रूप लेने के लिए मचलने लगी। अतीत के झरोखे की बंद पड़ी खिड़कियो को खोलकर उनमें से अपना राजनीतिक उज्ज्वल भविष्य देखने लगे। वंशवाद की बेल को सींचने वाले सोचने लगे,अगर पार्टी ने टिकट का खाद दे दिया तो बेल पूर्व की भाँति फिर से हरी-भरी हो जाएगी। एक बार बेल हरीतिमा का रूप ले ली तो फिर उसकी इस तरह से सार संभाल करते रहेंगे कि भविष्य में फिर कभी नहीं मुरझा पाएगी।
उन्होंने टिकट का खाद लेने के लिए,मुरझाने से पहले बेल ने विकास के खट्टे-मीठे अंगूर जनता को समर्पित किए थे,उनका पूरा विवरण बायोडाटा में लिखकर आलाकमान को सौंप दिया। मगर बायोडाटा में  यह कतई उल्लेख नहीं किया कि पराभव का कीड़ा लगने के कारण फलती-फूलती वंशवाद की बेल मुरझा गई थी। टिकट का खाद नहीं मिला तो हमने पानी देना भी मुनासिब नहीं समझा। शायद इसलिए भी मुरझा गई थी।
लेकिन आलाकमान को बायोडाटा सौंपते समय यह जरूर बताया था कि चुनावी मौसम में हमारी वंशवाद की बेल फूटने लगी है। आपने टिकट का खाद दे दिया तो यह समझिए कि बेल को खिलने में टाइम नहीं लगेगा। यह तो आप भी भली-भांति जानते हैं कि कितने वर्षों से सियासत के वृक्ष पर हमारी वंशवाद की बेल बढ़ती रही है। जिस को और आगे बढ़ाने के लिए टिकट का खाद मांग रहे हैं।
बायोडाटा की बजाए फूटती हुई बेल को देखने के लिए,आलाकमान ने तीन सदस्यों की टीम उनके संसदीय क्षेत्र में भेजी। टीम ने बेल को अच्छी तरह से देखने के बाद जनता की नब्ज टटोली तो नतीजा चौंकाने वाला सामने आया। अबकी बार वंशवाद की बेल को टिकट का खाद दे दिया तो पार्टी को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है। वंशवाद की बेल ने जनता को सिर्फ विकास के अंगूर दिखाएं हैं,खिलाए नहीं है। जबकि खुद ने विकास के अंगूर की बहुत सारी बेल लगा रखी है। 
एक नये युवा चेहरे ने भी ताल ठोक रखी है। जिसकी पैरवी पार्टी के कई कार्यकर्ता कर रहे हैं। मगर आलाकमान को नया चेहरा जम नहीं रहा है। क्योंकि नये चेहरे में इतनी ताकत नहीं है कि विपक्ष के प्रत्याशी से टक्कर ले सकें। सियासत के दांव-पेच नहीं जानता है। विपक्ष के प्रत्याशी से तो वंशवाद की बेल का उम्मीदवार ही टक्कर ले सकता है। इसलिए बिना समय गवाए प्रथम सूची में ही वंशवाद की बेल को टिकट का खाद दे दिया।
टिकट का खाद मिलते ही वंशवाद की बेल सत्ता के वृक्ष पर फलने-फूलने के लिए,मतदाताओं से मिलने-जुलने लगी। वायदों की पोटली खोलने लगी। अपने वंश की सियासत के गुणगान के गीत गाने लगी। लेकिन यह तो मतगणना के बाद ही पता लगेगा की वंशवाद की बेल पर फूल खिलते हैं या नहीं।

चुनावी कारवां गुजरने के गुबार

गरमी ने चुपके से आकर सीलिंग फैन का स्विच ऑन कर दिया है। पंखे पर जमी हुई धूल उड़कर नेताजी की गाड़ी के पीछे उड़ रही धूल में जा मिली। चुनावी धूल में मिलना या तो धूल चटाना है या फिर जीत के फूल खिलाना है।
चुनावी दौर में नेताओं की गाड़ी के पीछे उड़ती धूल बहुत मायने रखती है। उड़ती हुई धूल को देखकर एग्जिट पोल वाले नतीजे बता देते हैं। फलाना नेता आगे चल रहा है या ढिकाना। मीडिया वाले आकलन लगा लेते हैं और समाचार प्रकाशित कर देते हैं। ठुमका सिंह और झुमका सिंह के बीच ही कांटे की टक्कर रहेगी। झोपड़ी में बैठा वोटर दूर से ही पता लगा लेता है कि फलाने नेताजी गांव में पधार रहे हैं। डिमका नेताजी वोट मांगने जा रहे हैं।
सच पूछिए,तो उड़ती हुई धूल से नेताजी ही नहीं,वोटर तक की पहचान हो जाती है। बस पहचानने वाला चाहिए। जो मतदाता धूल उड़ाती गाड़ी को आते देखते ही एक तरफ साइड हो लेता है,संभवत: वह नेताजी का वोटर नहीं होता है। और जो गाड़ी के एकदम सामने आ जाने पर भी साइड में नहीं होता है, तो समझिए वह नेताजी का पक्का वोटर है।  
गाड़ी के पीछे दौड़ते बच्चों के चेहरों पर जमी धूल देखकर,बच्चों की मां समझ जाती है कि बच्चे लुका-छिपी खेलने नहीं,बल्कि नेताजी के प्रचार के परचे लूटने गए थे। लुटे हुए पर्चे व बिल्लों को देखकर मां-बाप बच्चों को डांटते नहीं है,बल्कि पूछते हैं कि आज गाँव की चौपाल में कौन नेता जी आए थे और क्या बोलकर गए हैं। भले ही बच्चों को मतदान करने का अधिकार नहीं है,मगर वे यह अवश्य जानते हैं कि वोट की कीमत क्या होती है। इसलिए कई बच्चे तो वोट डालने से पहले अपने घरवालों को यह बात अच्छी तरह से समझाकर भेजते हैं कि ईवीएम का बटन किस तरह से दबाना है।
 
धूल उड़ाती हुई गाड़ियों का काफिला जब रास्ते से गुजरता है,तो उस रास्ते पर विकास की गाड़ी चढ़ी भी है या नहीं,यह बिना पूछताछ किए ही मालूम हो जाता है। जब गाड़ी के टायर गड्ढों को बचाने के बावजूद गड्ढों में पड़ते हैं,तब गाड़ी ही बता देती है इस रास्ते पर तो विकास की गाड़ी क्‍या,विकास की साइकिल भी नहीं चली है।
लग्जरी गाड़ी में बैठे नेताजी जब अपना शीशा उतारकर पीछे देखते हैं,तो उड़ते धूल के गुब्‍बारों  में भले ही काफिले की गाड़ियां न दिखे,लेकिन कार्यकर्ताओं का जोश साफ-साफ दिखाई देता है। उनके द्वारा लगाए जा रहे,जिंदाबाद के नारे उन्‍हें लगातार आश्‍वस्‍त करते रहते हैं।

5 Apr 2019

चुनावी मौसम में वादों की टर्राहट

देखिए चुनावी मौसम है। वादों की बरसात तो होनी है। वादों के मेंढक टर्राने लगे हैं। नेता रूपी बादल वोटर को भिगोने के लिए गरजने लग गए हैं। वोटर वादों की बरसात में नहाने के बजाय यह देखना चाहता है कि वादों की बारिश हल्की बूंदाबांदी होकर ही थम जाएगी या मूसलाधार बरसेगी। एक बड़े राजनीतिक दल के मुखिया ने तो बीस फ़ीसदी गरीबों के लिए हर माह बारह हजार के वादे की बारिश कर दी है। लेकिन एक सर्वे के मुताबिक अबकी बार जिन दस चुनावी मुद्दों की बारिश होनी है,उनमें बेरोजगारी सबसे प्रमुख है। जो कि गत आमचुनाव में भी दस मुद्दों में प्रथम पायदान पर थी।
सच पूछिए तो रोजगार की बरसात की प्रतीक्षा में बेरोजगारी प्यासी मर रही है। प्यास के कारण गला सूखता जा रहा है। अगर समय रहते हुए बेरोजगारी की प्यास नहीं बुझाई गई,तो रोजगार के पानी की  तलाश में भटकती हुई दम तोड़ देगी। लेकिन  नेता चुनावी सीजन में तो आश्वासन का जल पिलाकर मतदान तक तो बचा लेते हैं। क्योंकि तब तक इन्हें वोट जो लेना रहता है। मगर मतगणना के बाद से ही चाहे बेरोजगारी दम तोड़े या किसान आत्महत्या करेंइन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता हैं। विपक्ष सत्ता पक्ष से जवाब मांगता है और सत्तापक्ष चुप्पी साध लेती है। जब विपक्ष सत्ता में आ जाती हैं और सत्ता विपक्ष पक्ष में होती है। तब भी वही प्रक्रिया रहती है। कुछ नहीं बदलता है। अगर कुछ बदलता है तो सिर्फ चेहरे बदलते हैं। यहां तक की कुर्सी भी वही की वहीं रहती है।
वैसे देखा जाए तो राजनीति में सारा खेल ही कुर्सी के लिए रचा जाता है। कुर्सी के लिए गठबंधन की नाव में बैठ जाते हैंतो गठबंधन की नाव से उतर भी जाते हैं। टिकट कट गया तो दूसरी पार्टी में सम्मिलित होकर उसी के सामने ताल ठोक देते हैं। बेटा बाप की संसदीय सीट पर अपना परचम लहराने के लिए बाप की सीट बदल देता है। बाप अपने बेटे एवं पुत्रवधू के लिए हाईकमान से पैरवी करता है। चायवाला चौकीदार बन जाता है। हाथी साइकिल पर सवार हो जाता है।   
नेता अपनी पत्नी,भाई-बहन,बेटा-बहू,भतीजा-भतीजी को राजनीति के मैदान में उतारकर अपनी वंशवाद की अमरबेल को सदैव हरी-भरी रखना चाहते हैं। राजनीति में वंशवाद की अमरबेल ऐसी बेल होती है,जो कि चुनाव के पेड़ पर ही फलती फूलती है और चुनाव के पेड़ को मतदाता ईवीएम की बाल्टी में वोट का पानी डालकर भरता है।
हमारे नेताजी की वंशवाद की बेल मुरझाई गई थी। सूखकर गिर न जाए। इस चिंता में वे खुद सूखते जा रहे थे। मगर जैसे ही चुनावी मौसम ने दस्तक दी मुरझाई बेल फूटने लगी। जिसे देखकर बुझ चुका उम्मीद का दिया जल उठा। कल्पना की कोंपल टहनियों का रूप लेने के लिए मचलने लगी। अतीत के झरोखे की बंद पड़ी खिड़कियों को खोलकर उनमें से अपना राजनीतिक उज्ज्वल भविष्य देखने लगे। वंशवाद की बेल को सींचने वाले सोचने लगे,अगर पार्टी ने टिकट का खाद दे दिया तो बेल पूर्व की भाँति फिर से हरी-भरी हो जाएगी। एक बार बेल हरीतिमा का रूप ले ली तो फिर उसकी इस तरह से सार संभाल करते रहेंगे कि भविष्य में फिर कभी नहीं मुरझा पाएगी।

2 Apr 2019

देश के भविष्य का आमचुनाव

देश के आगामी भविष्य के आमचुनाव ने धीरे-धीरे बढ़ते हुए रफ़्तार पकड़ ली है। नेताओं की भाषा शैली भी चुनावी लहजे में ढलने लगी हैं। एक-दूसरे पर कीचड़ उछालने कि प्रक्रिया मौके की तलाश में खादी के अंदर से बाहर निकलने के लिए मचल रही है। झूठ का पुलिंदा चुनावी दरिया में छलांग लगाने के लिए कपड़े उतारकर अर्धनग्न खड़ा हैं। नेताओं ने वादों की पोटली अपने सिर पर रख ली। बस उसकी गांठ खोलना बाकी है। 

नेताओं के राजनीतिक विशेषज्ञ वोट हथियाने का लोकलुभावन सलीका खोजने में जुटे हुए हैं। क्योंकि अबकी बार भ्रष्टाचार, महंगाई,गरीबी, शिक्षा, पानी, बिजली, सड़क  इत्यादि मुद्दे चुनावी मुद्दे बने या नहीं बने।लेकिन एयर स्ट्राइक,राफेल,राम मंदिर,बुलेट ट्रेन,रुपया वर्सेस डॉलर,बेरोजगारी,धारा 370,स्मार्ट सिटी,नोटबंदी,जीएसटी,जैसे मुद्दे चुनावी मुद्दे बनने की पूरी संभावनाएं दिख रही है। सत्ताधारी इन मुद्दों के गुणगान के गीत गाएगा तो विपक्ष आलोचना के ढोल बजाएगा। 
देश अपना भविष्य संवारने के लिए,आमचुनाव के आईने के सामने खड़ा हो गया है,लेकिन आम चुनाव का आईना धुंधलाया हुआ है। अभी तक उस पर किसी ने साफ करने के लिए पानी के छींटे तक नहीं मारे हैं। लगता है कि देश का वोटर ही सात चरणों में वोट रुपी पानी के छींटे मारकर रद्दी अखबार से ऐसा साफ करेगा की पांच साल तक धूल व दाग-धब्बे लगेंगे नहीं। 
लेकिन क्या आमचुनाव ही देश का भविष्य संवारने का एकमात्र माध्यम है? क्या देश के नेताओं के हाथ में ही देश का भविष्य है?क्या आम आदमी देश का भविष्य नहीं बना सकता है? सही मायने में देश का भविष्य को संवारने की जिम्मेवारी देश के प्रत्येक नागरिक हैं। लेकिन हम देश के भविष्य के बारे में तो क्या अपने भविष्य के बारे में नहीं सोचते हैं। सही पूछिए तो मुझ जैसा तो भविष्य की तो छोड़िए अपने वर्तमान को सही ढंग से व्यतीत नहीं कर पाता है। किसी ने कहा भी है कि जिसने अपना वर्तमान सही ढंग से व्यतीत कर लिया,उसका भविष्य अपने आप ही उज्ज्वल है। 
आप कुछ भी कहिए या सोचिए, लेकिन नेता अपना भविष्य संवारने के लिए हमेशा चिंतित रहता है। चुनावी मौसम में तो अपना पंचवर्षीय भविष्य बनाने के सिवाय और कुछ सोचता नहीं है। अपना भविष्य बनाने के लिए वोटर से हाथ मिलाने से लेकर उसके पांव पकड़ने तक की प्रक्रिया से गुजरने से नहीं सकुचाता है। चुनावी दौर में तो आप नेताजी से चांद सितारे जमीन पर उतारने के लिए कहेंगे तो एक बार तो उनके लिए भी मना नहीं करेगा। अमूल्य वोट के लिए तो निहायत गरीब या दलित के घर का भोजन भी करना पड़े तो मौके को गंवाएगा नहीं। अमूल्य वोट का भी मूल्य निर्धारित करके उसे खरीदनेे की पूरी कोशिश करते हैं। क्योंकि अच्छे दाम लगने पर बिकने वालों की भी कमी नहीं है। सच पूछिए तो नेता खुद का भविष्य सुधारने के लिए किसी का भी भविष्य बिगाड़ सकते हैं। देश का भविष्य बनाना तो इनका एक बहाना है। असल में तो यह खुद का भविष्य बनाने में लगे रहते हैं।

1 Apr 2019

एक अदद ‘झूठ’ की तलाश में हूं

मैं कई दिनों से उस ‘झूठ’ की तलाश में हूँ,जिसे बोलकर लोग अपना कार्य आसानी से करवा लेते हैं। नौकरी पा लेते हैं। कारोबार खड़ा कर लेते हैं। प्रेम-प्रसंग चला लेते हैं। शादी रचा लेते हैं। चुनाव जीत जाते हैं। रिश्‍वत ले लेते हैं। पुरस्कार पा लेते हैं। अखबार में छप जाते हैं। टीवी पर दिख जाते हैं। सुर्खियों में बने रहते हैं। खास ऐसा ही झूठ मुझे भी बोलना आता,तो मैं दर-दर की ठोकरें नहीं खा रहा होता। कहीं न कहीं कुछ न कुछ जॉब कर रहा होता। मैं जब भी झूठ बोलता हूँ,पकड़ा जाता हूँ। एक दफा तो पकड़ा ही नहीं गया,अच्छे से धुनाई भी हुईवह भी बिना वॉशिंग पाउडर के। जिस ‘झूठ’ की मुझे तलाश है,उस के लिए मैंने बहुत पापड़ बेले। उन तमाम लोगों से मिला जो झूठ बोलने में पीएचडी हैं। झूठ बोलने के गुर सिखाते हैं। झूठ की बुनियाद पर अपना कारोबार चलाते हैं। इन सभी ने एक ही बात बताई,झूठ बोलने में है बड़ी कठिनाई। हमने तो झूठ बोलकर कईयों को फंसाया,तेरी तू जान भाई। ऐसा झूठ बोलने वालों ने मुझे बताया।

जिसने भी झूठ बोलने का नायाब तरीका बताया,मैंने वहीं अपनाया पर अपने आप को नाकामयाब पाया। इसका कारण मेरी समझ में आज तक नहीं आया। लेकिन मैं हार नहीं मानूंगा। किसी ने मुझे यह भी बताया है कि झूठ बोलने के लिए कसम भी खानी पड़ती हैं। मैं कसम खाने के लिए तैयार हूँ। माँ-बाप। बीवी-बच्चे। भाई-बहिन। यार-दोस्त रिश्‍तेदार की कसम तो मैं ऐसे खा जाऊंगा जैसे लोग गाजर-मूली खाते हैं। झूठी कसम खाने से पहाड़ थोड़ी टूट जाएंगा। लोग तो भरी अदालत मेंगीता’ पर हाथ रखकर न जाने कैसी-कैसी और किस-किस की कसम खा जाते हैं। उन पर न तो पहाड़ टूटता है और नहीं वे पहाड़ तले दबते हैं। झूठ बोलने वाले तो स्वर्गवासी माँ-बाप की कसम तक खा जाते हैं। मुझे ‘आपकी कसम’,‘मेरी कसम’ खाने में भला मेरा क्या जाता हैं। बस,मुझे तो वह ‘झूठ’ बोलना आना चाहिए। जिसे बोलकर लोग बड़ी-बड़ी मछली यूं ही फंसा लेते हैं।

झूठ बोलकर कैसे फंसाते हैं, इसकी खुफिया जानकारी एक महाशय ने दी। उसने बताया कि झूठ बोलने में न हींग लगती हैं,न फिटकिरी। रंग चोखा आता है। न तेरे बाप का। न मेरे बाप का कुछ जाता हैं। जो भी आता है। उसी से आता है,जिसके सम्मुख हम झूठ बोल रहे हैं। झूठ बोलने से अगर कुछ भी नहीं आता है,तो कोई बात नहीं। कम से कम झूठ बोलने का अभ्यास ही हो जाता है,जो आगे काम आता हैं। अपने आप कोई नहीं फंसता हैं। उसे फंसाया जाता हैं। कैसे फंसाया जाता हैं, यह तरीका भी उसने ही बताया। जिस तरह से बकरे को हलाल करने से पूर्व उसे कुछ खिलाते-पिलाते हैं उसके बाद हलाल करते हैं। उसी तरह से झूठ से किसी को फंसाना है,तो पहले उसकी अच्छी तरह से खातिरदारी करों फिर मौका देखकर बातों ही बातों में वह ‘झूठ’ बोल दो। जिससे अपना स्वार्थ सिद्ध होता है। बातों ही बातों में इसलिए,क्योंकि  उसे शक नहीं हो कि बंदा झूठ बोलकर अपने को फंसा रहा है। शक हो गया तो पकड़ा जाएंगा और पकड़ा गया तो मार पड़ना स्‍वभाविक है। इस कला में निपुण हो गया तो समझ ले फिर कहीं भी हिचकिचाने की जरूरत नहीं।
उसी ने बताया कि आज कौन झूठ बोल रहा है और कौन सच,यह परखना जरा मुश्किल है। झूठ सच लगता हैं और सच झूठ। तू तो आँख मूंद कर झूठ बोल। किसी सामने नहीं बोल सकता है,तो मोबाइल पर झूठ बोल। मोबाइल पर तो ज्ञानी से ज्ञानी भी मूर्ख बन जाता है।

मसलन,दस- बीस किलोमीटर दूर बैठा व्यक्ति भी मोबाइल पर यही कहता है- दो मिनट में आ रहा हूँ। पांच मिनट में पहुंच रहा हूँ। नजदीक ही हूँ। बस आ गया। इत्ती स्पीड तो हवाई जहाज की नहीं होती जित्ती इन दो,पांच मिनट वालों की होती हैं। मैंने सलाह तो मान लीलेकिन मुझसे  मोबाइल पर भी झूठ नहीं बोला जा रहा। सोचता हूँझूठ हम बोलते हैं,बदनाम मोबाइल होता है। वह मोबाइलजो हमारे सुख-दुख का साथी है। ऐसे साथी को भी हम झूठ बोलने में क्‍यों शामिल करें। उसने हमारा क्‍या बिगाड़ा है!  

20 Mar 2019

कलरफुल स्ट्राइक सबूत के साथ


लोगों के चेहरों पर होली उत्सव का उत्साह साफ दिख रहा है। रंग-बिरंगे रंग-गुलाल के ढेरों के पीछे बैठे दुकानदार के होठों पर रंगीन मुस्कान बिखरी हुई है। जिसको देखो वहीं फागुन की मस्ती में मस्त दिख रहा है। यहां तक की मौसम में भी होली की मस्ती छाई हुई है। फागुनी राग से आसमान गुंजायमान हैं। धरा रंग-बिरंगी रंग-गुलाल की चुनरी ओढ़ने के लिए,कब से पलक पावडे बिछाई हुई हैं। प्रकृति अपने प्रकृति प्रेमियों के साथ होली खेलने के लिए बेताब है। देवर-भाभी,जीजा-साली एक-दूसरे को रंगने के लिए योजना बना चुके हैं। टोली के संग होली खेलने वाले अपनी-अपनी टोलिया गठित कर चुके हैं। बस अब तो योजनाओं को अंजाम देना है।
नेताजी भी होली खेलने के लिए पूरा मन बना चुके हैं। क्योंकि होली के बाद लोकतंत्र का सबसे बड़ा त्योहार आमचुनाव नजदीक है। अबकी बार लोगों के संग होली नहीं खेली तो मतदाता अपना असली रंग दिखा देगा। इस डर के मारे आम आदमी के संग होली खेलने के लिए,अपने आपको समर्पण कर दिया है। हालांकि नेताजी को रंग-गुलाल से सख्त एलर्जी है लेकिन वो भली-भांति जानते हैं कि वोटर के पास जो वोट का रंग है वह होली के रंगों से कहीं ज्यादा रंग-बिरंगा होता है। मतदान के दिन उंगली पर लगने वाली स्याही का नीला रंग कई नेताओं के चेहरे का रंग उड़ा भी देता है तो कईयों के चेहरों पर रंग जमा भी देता है। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को मजबूत करने वाला अगर कोई रंग है तो वह नीला रंग है। सरकार बनाने में और गिराने में भी नीले रंग की महती भूमिका रहती है।
मैं भी सोच रहा हूँ कि क्यूँ ना होली पर्व पर एक छोटी सी स्ट्राइक कर ही डालू। चाहे किसी के रंग-गुलाल लगे या नहीं लगे। सुर्खियों में तो आ ही जाऊंगा। सुर्खियों में छा गया तो समझ लीजिए मेरी कलरफुल स्ट्राइक की भी सर्जिकल स्ट्राइक और एयर स्ट्राइक से कम टीआरपी नहीं आएगी। शहर में नहीं तो कम से कम अपनी कॉलोनी में तो चर्चाएं आम हो ही जाएंगी। चर्चा आम हो गई तो आम से खास आदमी बन जाऊंगा।
स्ट्राइक के बाद रंग-गुलाल में रंगी अपनी एक सेल्फी सोशल मीडिया पर डालकर कैप्शन में लिख दूंगादेखिए मैंने भी होली पर्व पर कलरफुल स्ट्राइक की है। कोई कमेंट करके पूछेगा कि कितनों के रंग-गुलाल लगाया तो ऐसा आंकड़ा बताऊंगा कि सबूत मांगने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। फिर भी किसी ने सबूत मांग लिया तो अपने मोबाइल के कैमरे से पहले से ही वीडियो रिकॉर्डिंग करके रखूंगा। जरूरत पड़ी तो दिखा दूंगा अन्यथा मोबाइल में पड़ा रहेगा। 

कलरफुल स्ट्राइक करने के लिए,मैंने हरा,पीलानीला,लाल,गुलाबी रंगो का गठबंधन करके एक ही थैली में मिश्रित कर लिया है। ताकि स्ट्राइक के वक्त इसी प्रकार की समस्या उत्पन्न नहीं हो। क्या है कि अलग-अलग रंगों को अलग-अलग थैलियों में लेकर स्ट्राइक के समय होली खेलते हुए किसी टोली से सामना हो गया तो एकाध रंग की थैली शहीद ना हो जाए। यह डर रहता है। होली के रंगों में किसी भी रंग का शहीद होना समाज व देश के लिए हानिकारक है। 
क्योंकि हमारी जिंदगी में रंगो का बहुत बड़ा महत्त्व है। दुनिया में ऐसी कोई चीज नहीं है जिसका रंग नहीं है और प्रत्येक रंग किसी ना किसी का प्रतीक है। रंगो के बिना तो हम सोच भी नहीं सकते हैं। जिस तरह बिना प्राण का शरीर किसी काम का नहीं हैवैसे ही बिना रंगो के जीवन रंगहीन होता है।
होली के रंग एक-दूसरे के चेहरों को रंगने का काम ही नहीं करते हैं,बल्कि गिले-शिकवे भी दूर करते हैं। सालभर से रूठे हुए को मनाने में महती भूमिका निभाते हैं। हंसी-मजाक के माध्यम हैं। रिश्ते-नाते व सगे-संबंधियों में सामाजिक सौहार्द बनाए रखते हैं।
दरअसल में अपने पड़ोसियों को बताना चाहता हूँ कि छप्पन इंच का सीना नहीं,बल्कि छबीस इंच का सीना भी स्ट्राइकर सकता है। जो रंग-गुलाल लगवाने से डरते हैं उन्हें भी रंग-गुलाल से सराबोर कर दूंगा। फिर वे अपने आप ही मेरे द्वारा की गई कलरफुल स्ट्राइक की फोटो खींचकर अपनी-अपनी फेसबुक वॉल पर लगाकर पूरी दुनिया को बता देंगे कि अबकी बार हम भी होली के रंग में रंगे गए। बस फिर क्‍या सबको पता लग ही जाएगा।

15 Mar 2019

देश के भविष्य का चुनाव

आमचुनाव की उद्घोषणा हो चुकी है। फागुन के गीत गाए जा रहे हैं। पेड़ों से पत्तियां झड़ने लगी है। मौसम का मिजाज बदल रहा है। राजनीतिक सरगर्मियों से बाजार गुलजार हो गया है। मतदाता बदलाव की बयार में ईवीएम का बटन दबाने के लिए तैयार बैठा है। जूतम-पैजार वाले माननीय जूते को सलाम कर रहे हैं। जूता आमचुनाव में अपनी भागीदारी निभाने के लिए जुगाड़ की जुगत तलाश रहा है।
सियासत के मैदान में टिकटों का खेल आरंभ हो चुका है। टिकट के खिलाड़ी लोकसभा नामक खेल खेलने के लिएहाईकमान से अनुनय-विनय करने में लगे हुए हैं। हाईकमान है कि जिताऊ उम्मीदवार की तलाश में पानी के ग्लास के ग्‍लास पिए जा रहा हैं,फिर भी अंतिम निर्णय पर नहीं पहुँच पा रहा है। किसको को मैदान में उतारा जाए और किसको नहीं। युवा को उतारा जाए या फिर पुराने को या फिर नया चेहरा जीत का सेहरा बांध सकता है?कुछ इस तरह का संशय बना हुआ है। जिन नेताओं को अपने टिकट के कटने का भय सता रहा हैं,वे आलाकमान स्तरीय तांत्रिक से अपना भय दूर करवाने के लिए उनकी शरण में दिल्‍ली में डेरा डाले हुए हैं। 

इस बार होली का रंग चुनावी रंग में मिलकर एक नए रंग में नजर आएगा। राजनीतिक पार्टियां अपनी-अपनी रंग-बिरंगी योजनाओं की पिचकारिओं से मतदाताओं को रंगने की कोशिश करेंगी। लेकिन इस बार मतदाता के हाथ में भी लोकलुभावन योजनाओं को रंगने का रंग-गुलाल रहेगा। आज का मतदाता बहुत समझदार है। वह अच्छी तरह से जानता है कि किसको किस रंग में रंगना है। उसे पता है कि देश के भविष्य का चुनाव है,इसलिए ईवीएम का बटन दबाने से पहले सौ बार सोचेगा। 
 मगर राजनीतिक पार्टियां भी देश के भविष्य को मजबूत हाथों में देने के बात बार-बार कहेंगी।बरगलाने के लिए एड़ी से चोटी तक का जोर लगाएंगी। जुमले के झूले में झुलाने के लिए मतदाताओं को रिझाएंगी। हो सकता है खरीद-फरोख्त की रोक के बावजूद भी अमूल्य वोट का  मूल्य निर्धारित करके उसे खरीद लिया जाए। क्योंकि यहाँ पर अच्छे धाम लगने पर बिकने वालों की भी कमी नहीं है। यह लोग खुद का भविष्य सुधारने के लिए किसी का भी भविष्य बिगाड़ सकते हैं। देश का भविष्य बनाना तो इनका एक बहाना है। असल में तो यह खुद का भविष्य बनाने में लगे रहते हैं।
 सही मायने में देश का भविष्य नेताओं के हाथ में नहीं हैबल्कि मतदाता की उस ऊंगली पर है,जिससे ईवीएम का बटन दबाया जाता है। लेकिन कई बार मतदाता की उंगली को पता नहीं क्या हो जाता है,जो बहुतों की उम्‍मीदों पर पानी फेर देती है। 

14 Mar 2019

उम्मीदों पर पानी फेरती उंगलियां


फागुन के गीत गाए जा रहे हैं। पेड़ों से पत्तियां झड़ने लगी हैं। मौसम का मिजाज बदल रहा है। राजनीतिक सरगर्मियों से बाजार गुलजार हो गया है। मतदाता बदलाव की बयार में ईवीएम का बटन दबाने के लिए तैयार बैठा है। जूतम-पैजार वाले माननीय जूते को सलाम कर रहे हैं। जूता आम चुनाव में अपनी भागीदारी निभाने की जुगत तलाश रहा है। टिकटों का खेल आरंभ हो चुका है। टिकट के खिलाड़ी लोकसभा नामक खेल खेलने के लिए हाईकमान से अनुनय-विनय करने में लगे हुए हैं। हाईकमान है कि जिताऊ उम्मीदवार की तलाश में पानी के ग्लास के ग्लास पिए जा रहा है, फिर भी अंतिम निर्णय पर नहीं पहुंच पा रहा। किसको मैदान में उतारा जाए और किसको नहीं। युवा को उतारा जाए या फिर पुराने को या फिर नया चेहरा जीत का सेहरा बांध सकता है? जिन नेताओं को अपने टिकट के कटने का भय सता रहा है, वे आलाकमान स्तरीय तांत्रिक से अपना भय दूर करवाने के लिए उनकी शरण में दिल्ली में पड़े हुए हैं।
इस बार होली का रंग चुनावी रंग में मिलकर एक नए रंग में नजर आएगा। राजनीतिक पार्टियां अपनी-अपनी रंग-बिरंगी योजनाओं की पिचकारियों से मतदाताओं को रंगने की कोशिश करेंगी। लेकिन इस बार मतदाता के हाथ में भी लोक-लुभावन योजनाओं को रंगने का रंग-गुलाल रहेगा। आज का मतदाता बहुत समझदार है। वह अच्छी तरह से जानता है कि किसको किस रंग में रंगना है। उसे पता है कि देश के भविष्य का चुनाव है, इसलिए ईवीएम का बटन दबाने से पहले सौ बार सोचेगा। मगर राजनीतिक पार्टियां भी देश के भविष्य को मजबूत हाथों में देने के लिए बरगलाने की एड़ी से चोटी तक की कोशिश करेंगी।
सही मायने में देश का भविष्य मतदाता की उस उंगली पर है, जिससे ईवीएम का बटन दबाया जाता है। लेकिन कई बार मतदाता की उंगली को पता नहीं क्या हो जाता है, जो बहुतों की उम्मीदों पर पानी फेर देती है।



13 Mar 2019

जिसके हाथ जूता,काटेगा वो फीता



जूता तब से सुर्खियों में है,जब एक इराकी पत्रकार ने जॉर्ज बुश पर जूता फेंका था। तब से अब तक न जाने कितनों पर जूता उछाला जा चुका है। सस्ते से सस्ता व फटा-पुराना जूता भी सुर्खियां बटोर चुका है। खबरिया चैनलों की ब्रेकिंग न्यूज़ बन चुका है।वैसे तो टमाटर,अंडा व स्याही ने भी खूब सुर्खियां बटोरी हैं,लेकिन सुर्खियों का असली सुख जूते ने ही लिया है। क्योंकि जब भी सियासी गलियारों में जूता उछला है या उछाला गया है। जूता समाचार पत्रों के मुखपृष्ठ की हेड लाइन बना है। सोशल मीडिया के युग में तो जूते ने सुर्खियां नहीं,बल्कि लाइक व कमेंट के हीरे-जवाहरात तक लूटा है।
अब जूता पैर की जूती ही नहीं रहा है,बल्कि जूते मारने में भी सिद्धहस्त हो गया है। अपना नाम सुनतेे ही काम तमाम करने को आतुर रहता है। पैर से हाथ में आने तक का सफर तय करने में पलभर ही लगाता है। हाथ में आने के बाद तो दो-चार जूते मारे बिना नहीं रहता है। जिसके सिर पर जूते पड़ते हैंवह जूते खाने के बाद चैन से नहीं बैठता है। वह भी उस दिन के बाद जूते मारने की फिराक में रहता है। मौका लग गया तो वह भी किसी ना किसी बदन की मालिश कर देता है। अन्यथा जूते के पॉलिश करता रहता है। पॉलिश करते रहने से बदले की भावना कायम रहती है।
देख लेना,अब वे दिन दूर नहीं है। भविष्य में जिसके हाथ में जूता होगा वही फीता काटेगा। शिला पट्ट पर उसी का नाम होगा जो जूतम-पैजार में सुपर होगा। पार्टियां भी उसी को टिकट देंगी,जो जूता उछालने में सर्वश्रेष्ठ होगा। कार्यकर्ता भी उसी का प्रचार-प्रसार करेंगे,जो जूते मारने में अव्वल रहा है। हो सकता है आने वाले समय में कोई नई नवेली पार्टी जूते को अपना चुनाव चिह्न भी बना ले। अगर चुनाव चिह्न जूता रहा तो पार्टी का नारा कुछ इस तरह से होगा। जूता का बटन दबाइए और जूता सरकार बनाइए। गलती से जूते की सरकार बन गई तो जूतम-पैजार मंत्रालय भी बना दिया जाएगा। जूतम-पैजार मंत्री उसी को बनाया जाएगाजिसको जूते मारने का अनुभव सबसे ज्यादा रहा होगा। 
जूता निर्माता कंपनियों के इश्तिहार भी कुछ इस तरह से होंगे,हमारी कंपनी का जूता पहनने में ही नहीं,बल्कि मारने में मजबूत है। सियासत में अपना कैरियर संवारना है तो हमारी कंपनी का जूता अवश्य पहनिये और सत्ता का सुख भोगिए। विज्ञापन में जूते का चित्र भी माननीय द्वारा जूता मारते हुए दिखाया जाएगा। जिसे देखकर कस्टमर खरीदने के लिए मजबूर हो जाएगा। कंपनियां अपना ब्रांड एम्बेसडर  भी उस माननीय को ही बनाएंगीजिसने जूते मारने में रिकॉर्ड कायम किया हो।

8 Mar 2019

पड़ोसी ही पड़ोसी के काम आता है


मैं अपने पड़ोसी से उतना ही दुखी हूँ। जितना की आम आदमी बढ़ती महँगाई से है। गरीब गरीबी से है। बेरोजगार बेरोजगारी से है। उसकी रोज-रोज की उधारी से मुझे ब्लड प्रेशर की बीमारी हो गई है। वह इतना मीठा बोलता है,जैसे कि उसकी वाणी में मिश्री घुली हुई हो। उसके मीठे बोल सुनकर कहीं मुझे शुगर नहीं हो जाए। इस डर से वह जो भी चीज लेने आता हैं,मैं तत्काल दे देता हूँ। लेकिन वह तत्काल को आपातकाल में भी वापस नहीं करता है। कहता है कि मालामाल के क्या मांगे आपातकाल। उसके मुँह से मालामाल शब्द सुनकर मेरे मुँह से भी निकल जाता है कि तेरे मुँह में घी शक्कर। घी शक्कर का नाम सुनते ही उसके मुँह में पानी जाता है और वह उसी वक्त घी शक्कर मांग लेता है।
मौके पर चौका मारने में कभी नहीं चूकता है। मौके की तो वाइड गेंद को भी नहीं छोड़ता है। उस पर भी ऐसे घुमाकर मारता है कि गेंद सीधी मौके की बाउंड्री पर जाकर गिरती है। उस पर गुस्सा तो बहुत आता है। लेकिन वह मुझे गुस्सा थूकने वाला पान खिला देता है। जिसको खाने से मेरा सातवें आसमान पर चढ़ा गुस्सा भी उतर आता है और चेहरा चमक जाता है। चेहरे पर चमक देखकर वह नमक तक माँग लेता है। उसे माँगने में कतई शर्म नहीं आती है। शर्म को तो उसने खूँटी के टाँग रखा है। आएगी कहाँ से। बेझिझक आता है और जो चाहिए वह लिया जाता है। कोई मना कर दे तो मनुहार करके उसे खुश कर देता है। फिर वह खुशहाली में थाली भरकर देता है। खाली हाथ तो कभी नहीं लौटा है। बच्चों के गाल सहलाकर दाल तो इतनी ले जा चुका है,चुकाए तो उसके बाल तक बिक जाए। गृहस्थी की सरकार घाटे में चल रही है,ऐसा कहकर आटा तो आए दिन लेने जाता है। डाटा की तो पूछिए मत। हॉटस्पॉट ऑन करने के लिए सुबह चार बजे से ही  मिस कॉल पर मिस कॉल देने लगता हैं।
आदत से इतना लाचार हैं कि आचार तक नहीं छोड़ता है और विचार-विमर्श इस तरह करता है,जैसे कि बहुत बड़ा विचारक हो। जबकि विचारक कम प्रचारक ज्यादा है। क्योंकि वह गोपनीय बात का भी प्रचार-प्रसार करे बिना नहीं रहता है। सच पूछिए तो,मेरे तो किसी भी काम के लायक नहीं हैफिर भी मांगने पर उसे अपनी बाइक देनी पड़ती है। नहीं दूं तो भय रहता है,पड़ोसी धर्म संकट में नहीं पड़ जाए। क्योंकि मैं धर्म के मामले में बहुत धार्मिक हूँ। वह इसी का फायदा उठाता है। जामन के लिए भी आधी रात में आकर दरवाजा खटखटा देता है। गहरी नींद में सोया हो तो भी जगा देता है। वक्त की नजाकत देखकर भाषा शैली का प्रयोग करता है। डिस्टर्ब करके कहता है कि डिस्टर्ब के लिए क्षमा चाहता हूँ। दरअसल क्या है कि जावन को बिल्ली चाट गई। भले ही रखना भूल ही गया हो,लेकिन कहेगा हमेशा यही कि बिल्ली चाट गई।
इतना चतुर चालाक है कि लोमड़ी तक को अपनी गिरफ्त में कर लेता है। मुझे ही देख लो! मेरी उँगली पकड़ता-पकड़ता पहुँचा पकड़ लिया है। मुझे डर है कि गर्दन नहीं पकड़ ले। किसी दिन गर्दन पकड़ ली तो क्या होगाजो माँगेगा वही देना पड़ेगा। नहीं दिया तो जान से हाथ धोना पड़ेगा। लेकिन मेरी पत्नी को पूरा विश्वास है,वह विश्वासघात तो कभी नहीं करेगा। उसे क्या मालूम नहीं,तुमने कभी उसको आलू के लिए भी मना नहीं किया है। ईमेल बाद में किया है,पहले उसे तेल दिया है। तुम्हें मारकर वह अपनी उधार की दुकान क्यों बंद करेगाबल्कि वह तो तुम्हारी लंबी उम्र की दुआ करता होगा। वह और दुआ। कल ही मना कर दूं तो स्वाहा कर देगा।
मेरा यह पड़ोसी आलू प्याज ही नहींबल्कि ब्याज के नाम पर रुपया तक ले जाता है। लेकिन जब देने आता है तो मूल रकम तो अदा कर देता हैपर ब्याज जीम जाता है। मांगता हूँ तो बहानेबाजी कर जाता है। यह बहानेबाजी में भी अव्वल है। ऐसा बहाना बनाता है कि यकीन नहीं हो तो भी यकीन करना पड़ता है। कभी खुद तो कभी बीबी-बच्चों को बीमार कर देता है। खाँसी जुकाम को भी गंभीर बीमारी का रुप देकर घर बैठे को आईसीयू में भर्ती कर देता है। झूठ की पराकाष्ठा तक को लाँघने में कतई नहीं झिझकता है। आँख मूंदकर छलांग लगा देता है। क्योंकि यह  झूठपाखंड जैसी कलाओं में कलाकार आदमी है। सच कहूं तो यह पड़ोसी नहीं एक बला हैजो कि टालने से भी नहीं टलती है। 
मेरे इस पड़ोसी की एक अहम बात तो बताना भूल ही गया। इसका एक आदर्श वाक्य हैं,जिसका उच्चारण करना कभी नहीं भूलता है। जब भी कुछ लेकर जाएगा तो अपना आदर्श वाक्य 'पड़ोसी ही पड़ोसी के काम आता हैअवश्य बोलकर जाएगा। लेकिन मेरा यह पड़ोसी मेरे तो आज तक किसी काम नहीं आया है। सिर्फ नाम का पड़ोसी है। मेरा तो छोटा सा भी काम हो तो आनाकानी कर जाता है। खुद का काम हो तो थूक के आँसू लगाकर करवा लेता है। इससे कैसे पीछा छुड़ाऊ। समझ में ही नहीं आता है। किसी से राय-मशवरा करता हूँ तो वो भी वहीं सलाह देते हैं,जो कि उसके आदर्श वाक्य में निहित है। बोलते हैं कि आप भी कैसी बात करते होपड़ोसी के प्रीति मन में जो भ्रम है,उसे निकाल दो। एक पड़ोसी ही पड़ोसी के काम आता है। यह सुनकर मैं निरुत्तर हो जाता हूँ।