19 Jul 2020

Saavan and frog


Every day the cuckoo is saying cuckoo, that the spring has come, get out of the house and look at the all-round greenery. But nobody is listening to him. All are entangled in their respective actions in such a way that they are not listening to their loved ones. Even when a cuckoo starts crying in people's ears, they will not listen. Because nowadays people are more fond of earrings than Karnapriya.
Now peacocks are dancing not only in the jungle but also on the roof of houses. People are even calling people after drinking. Come and see our dance. Still people are not watching their dance. Perhaps this is why people are not able to feel like Mayur. As long as the human mind is not like a peacock, he does not even enjoy the sawn bhads.
Forever the frogs enter the homes of the savannahs to tell them that it is their beauty that does not suit you. But there is no human being that is not living without a twist. When you see, then it keeps on talking. Whereas frogs tend to tread in the rainy season.
In Saavan Bhadas, Nag-Nagin dances by telling them that in marriage, people imitate us and dance on the ground and dance on the ground, and they do not dance the serpent. The way we are doing it does not happen. But people are scared to see their dance and away from them. Whereas serpent-nagins dance not to dance, but to teach serpent dance.
In the month of Sawan Bhadas, the clouds do not show their mercy, but they show themselves the way they show them, and sometimes showers. We are far from obliged, but we also do self-interest. Perhaps this is why the clouds are not kind to us soon. Despite the thunder, they will not rain thinking of this, we are kind to them and it is people that do not exist.

The wind that blows in the month of Sawan Bhadas to the wind blowers will be able to convince them that it is better to fly in the wind, do your tasks only by keeping a foot on the ground. Otherwise, you will fall down from the pit, neither will you sink inside the ground. But people don't understand that. There is no fear of talking in the air and building an air fort.
In the months of the monsoon months, the dampness that comes in the house-hallway also teaches us that nothing happens by building luxurious houses. Periodic repairs are also very important. It is the dampness that compels us to repair. If the damp does not come, then we do not look at the walls. Who does not ignore the seals even during the rainy days, nor does his house remain dashed.
Similarly, coming to the river and drain, it tells us that nothing is kept in anger. Anger is the destruction of ourselves and others like us. Once devastated, it takes years to recover. But we are not able to control our anger even after seeing the river and rivulets.
Mohanlal maurya

9 Jul 2020

महज शब्द नहीं हैं प्लीज़ और सॉरी


प्लीज और सॉरी महज दो शब्द ही नहीं है,बल्कि जीवन पथ पर सदैव साथ निभाने वाले सहायक हैं। इन दोनों शब्दों को बोलकर खलनायक भी नायक बन जाता है। कई बार इनके उच्चारण मात्र से ही घर-परिवार,समाज और देश की बहुत सी समस्याओं का समाधान हो जाता है।
प्लीज और सॉरी कोई क्लिष्ट शब्द नहीं है,बल्कि ये तो सहज और सरल शब्द है। जिन्हें कोई भी,कभी भी बोल सकता है,जरूरी नहीं जिनको इंग्लिश आती हैं,वही बोल सकते हैं,इनको तो अनपढ़ भी आसानी से बोल सकते हैं। सब जानते हैं कि हिंदी में प्लीज का अर्थ कृपया और सॉरी का क्षमा होता है। मगर कृपया और क्षमा बोलने पर प्लीज और सॉरी जैसी अनुभूति नहीं हो पाती है। इन दोनों शब्दों को बोलने में न हींग लगती है,न फिटकिरी। रंग चोखा आता है। फिर बोलने से परहेज क्यों
जो लोग इस गलतफहमी में रहते हैं कि प्लीज और सॉरी बोलने से उनका कद घट जाएगा,तो मैं उन्हें बता दूं कि इन दोनों शब्दों को बोलने से कद घटता नहीं,बल्कि बढ़ता है। एक बार बोलने से काम नहीं बन रहा हो तो बार-बार बोलिए और फिर कमाल देखिए। चमत्कार जैसा महसूस नहीं हो तो कहना। एक बार चमत्कार हो गया,तो फिर प्लीज और सॉरी बोलकर नित्य नए-नए अविष्कार किए बगैर नहीं रहेंगे। यह मैं नहीं,मेरा तजुर्बा कह रहा है। 
प्लीज और सॉरी ऐसे शब्द है,जिन्हें बोलकर पोल खोलने वाले का भी मुँह बंद कर सकते हैं। दुश्मन को दोस्त बना सकते हैं। आपसी मनमुटाव दूर कर सकते हैं। टूटे रिश्ते जोड़ सकते हैं। कलह को सुलह में बदल सकते हैं। सातवें आसमान पर चढ़े गुस्से को उतार सकते हैं। पत्थर दिल को पिघला सकते हैं। रूठे को मना सकते हैं। झूठे से सच बुलवा सकते हैं। दूध का दूध और पानी का पानी करवा सकते हैं। मुश्किल और देरी से होने वाले काम आसानी से करवा सकते हैं। डांट-फटकार की जगह सत्कार पा सकते हैं।
लोग प्लीज और सॉरी बोलकर तो बात का बतंगड़ और राई का पहाड़ बनाने वालों को भी ऐसा करने से रोक देते हैं। मौके पर चौका मारने वालों को मारने नहीं देते हैं। अकड़कर चलने वालों को झुका देते हैं। बात-बात में मीनमेख निकालने वालों को ऐसा करना बंद करवा देते हैं। हठधर्मियों का हठ हटा देते हैं। हर कार्य को झटपट करने वालों को आहिस्ता-आहिस्ता से करने पर विवश कर देते हैं। लोक निंदा करने वालों से प्रशंसा करवा लेते हैं। आरोप-प्रत्यारोप लगाने वालों को लगाने से रोक देते हैं।
जो इन दोनों शब्दों को बोलने में बिल्कुल भी नहीं हिचकिचाहते हैं,वो गलती करके भी नहीं पछताते हैं। क्योंकि उनके पास प्लीज और सॉरी जैसे सशक्त हथियार हैं,जिनके जरिए,वे कोई भी दरिया पार कर सकते हैं। हर उस मुश्किल घड़ी की सुई को तेज कर सकते हैं जो धीमी चलती है। कई तो प्लीज और सॉरी के बल पर ही अपना कारोबार चला रहे हैं और खूब कमा रहे हैं।
मोहनलाल मौर्य

Please and Sorry are not just two words


Please and Sorry are not just two words, but are always helpful to follow along on the path of life. By speaking both these words the villain also becomes a hero. Many times, many of the problems of home, family, society and country are solved by mere pronunciation.
Please and sorry is not a word, but it is a simple and easy word. Whomever can speak anytime, not necessarily those who know English, they can speak it, even illiterate can speak it easily. Everyone knows that please in Hindi means please and sorry for sorry. But please and forgiveness, there is no feeling like please and sorry. It does not take asafetida or alum to speak these two words. Color comes sharpened. Why then refrain from speaking ?  
Those who live in the misconception that speaking and sorry will decrease their stature, then let me tell them that speaking these two words does not decrease their stature, but increases. Once speaking is not going to work, then speak again and again and watch it. If you do not feel like a miracle, say it. Once a miracle has happened, then please speak and sorry and will not live without constantly innovating. It is not me, my experience is saying. 
Please and sorry are such words which can also be silenced by the person speaking the pole. The enemy can be made friends. Can overcome mutual estrangement. Broken relationships can add up. Can turn discord into reconciliation. Climbing the seventh sky can vent anger. Stones can melt the heart. Can celebrate anger. Can call the truth from a liar. You can get milk of milk and water of water. Difficult and late work can be easily done. You can get hospitality instead of scolding.
People, by speaking please and sorry, also prevent those who make a talk and mountain of rye from doing so. The fours on the spot do not let those who kill. Swingers tend to tilt those who walk. In conversation, the people who make Meenmakh are stopped. Remove the persistence of dogma. They force everyone to do the work quickly and slowly. People get praise from condemners. Accusations prevent the imposters from applying. 
Those who do not hesitate to speak these two words they do not regret even by mistake. Because they have strong weapons like please and sorry, through which they  can cross any river. You can sharpen every difficult clock needle that  runs slow. Many are running their own business on the strength of please and sorry and are earning a lot.
Mohanlal maurya

7 Jun 2020

सड़क की आपबीती


मैं सड़क हूँ। अब यह मत पूछिएगा कि कहाँ की हो। नेशनल हाईवे की हो या स्टेट हाईवे की। या फिर जिला,तहसील,शहर,कस्बा,देहात की हो। इसी देश की हूँ। यही के रोड़ी,कंकड़,तारकोल से निर्मित हूँ। मेरे निर्माता मजदूर,ठेकेदार,इंजीनियर भी यही के ही हैं। लेकिन यह सब मैं क्यों बता रही हूँ। यह तो आपको भी पता है और सरकार को भी। मैंने आप लोगों से ही सुना है कि दुख-दर्द बाँटने से कम हो जाते हैं,इसलिए सोचा कि क्यों न अपना दुख-दर्द बाँटकर थोड़ा कम ही कर लूं,क्योंकि इन दिनों मैं पैदल चल रहे अपने देश के मजदूर भाई-बहनों की हालात देखकर इतनी दुखी हूँ कि लफ्जों के जरिए बता पाना मुश्किल हो रहा है। सच पूछिए तो मैं इतनी दुखी तो तब भी नहीं होती,जब बारिश के दौरान मेरे सीने में गड्ढे पड़ जाते हैं। चिलचिलाती धूप से मेरी तारकोल रूपी चमड़ी पिघलने लग जाती है। 
मैं अपने जीवन काल में न जाने कितनी बार टूटी-फूटी हूँ,पर कभी भी मुझ पर चलने वाले लोगों को प्रवासी मजदूरों की जितनी तकलीफ नहीं उठानी पड़ी होगी। मैंने साइकिल से लेकर ट्रक तक का भार वहन किया है,पर आजकल मुझसे मजदूर भाई-बहनों का मामूली सा भार वहन नहीं हो रहा है। मुझ पर चलने से उनके नंगे पैरों में मेरे कंकड़ चुभ रहे हैं। जिससे मुझे भी उतनी ही तकलीफ हो रही है। जितनी उन्हें हो रही है। लेकिन मैं भी मजदूरों की तरह मजबूर हूँ। माना कि मेरा दिल कंकड़-पत्थर से निर्मित है,लेकिन मैं पत्थर दिल नहीं हूँ।मजदूरों के पैरों में छाले पड़ते ही मेरी आँखों से आँसू छलक पड़ते हैं। मजदूर महिलाओं के सिर पर अपनी जिम्मेदारियों का बोझ और गोद में देश का भविष्य को देखकर मैं स्तब्ध हूँ। सरकार को खूब कोस रही हूँ,पर मेरी सरकार ने कब सुनी है जो कि अब सुन लेगी। सरकार को चुनने में मेरा योगदान होता तो शायद मेरी सुन भी लेती। लेकिन सरकार चुनने में इन मजदूरों का तो बहुत बड़ा योगदान रहता है। फिर भी इनके लिए बस या रेल की व्यवस्था नहीं की।  सरकार जनता द्वारा चुने हुए जनप्रतिनिधि बनाते हैं,ये मजदूर नहीं। मुझे तो लगता है कि शायद जनता में ये प्रवासी मजदूर आते ही नहीं हैं। अगर आते तो ये भूखे-प्यासे पैदल नहीं चल रहे होते। 
आपने तो मजदूरों की वही तस्वीर देखी होंगी,जो कि मीडिया या सोशल मीडिया पर वायरल हुई है। मैं तो लॉकडाउन लगे दिन से ही नित्य लाइव देख रही हूँ। कोई अपनी बीवी को,तो कोई अपने बच्चे को कंधे पर बैठाकर ले जा रहा है। कोई अपनी माँ को गोद में तो कोई अपने बाप को पीठ पर लादकर चल रहा है। कोई अकेला तो कोई झुँड के साथ चल रहा हैं। थोड़ी बहुत देर मेरे किनारे किसी पेड़ की छाँव तले बैठे तो बैठे अन्यथा चले जा रहे हैं। किसी से कोई गिला-शिकवा नहीं कर रहे हैं। किसी न्यूज़ चैनल के रिपोर्टर ने पूछ लिया तो अपनी व्यथा बता दी। लेकिन जितना समय रिपोर्टर के साथ व्यतीत किया है न उसे कवर करने के लिए पूर्व की अपेक्षा तेज चलने लगते हैं और तब तक इसी स्पीड से चलते रहते हैं। जब तक अपने साथियों के साथ नहीं हो जाए। समय का एक पल भी गँवाना नहीं चाहते हैं। बस जल्दी से जल्दी अपने घर पहुँचना चाहते हैं। घर पहुँचने की जल्दी में न धूप से डर रहे हैं और न भूख से व्याकुल हो रहे हैं। भूखे या फिर रूखी सूखी खाकर मेरे पर चले जा रहे हैं।
मैं रोज यही सोचती हूँ कि आज शायद ही कोई मजदूर मेरे ऊपर से गुजरेगा। लेकिन कारवाँ टूट नहीं रहा हैं। रोज मजदूर भाई-बहनों की पदचाप मेरे कानों में पड़ रही हैं। जिसे सुनकर मैं सुन्न हो जाती हूँ। न जाने क्या-क्या सोचने लगती हूँ। दिनभर उधेड़बुन में ही रहती हूँ। मजदूरों की देह से मेरी देह पर इतना पसीना पड़ रहा है कि चिलचिलाती धूप न हो तो दरिया की तरह बहने लग जाए। लेकिन पसीना सुखाने के बजाय चले जा रहे हैं। कोई पानी की बोतल या भोजन का पैकेट देने के लिए रोकता है,तब भी रुकते नहीं है चलते-चलते ही ले लेते हैं।
एक दिन तो वो मजदूर मेरे पर चलकर अपने घर जा रहे थे,जिन्होंने मेरा निर्माण किया था। उनके चरण अपने पर पाकर मैं धन्य तो हो गई। मगर मुझ पर लग रहे उनके चरणों के खून के धब्बे देखकर मेरे मुख से धन्यवाद तक प्रस्फुटित नहीं हुआ। उस समय उन्हें धन्यवाद से कहीं ज्यादा मरहम पट्टी की आवश्यकता थी।जो मैं चाहकर भी नहीं कर पाई। कर भी कैसे पातीमेरे पास रोड़ी,कंकड़,पत्थर,तारकोल के सिवाय कुछ भी नहीं है। जिनसे मरहम पट्टी नहीं,बल्कि घाव होते हैं।  काश,निर्जीव न होती,तो शायद कुछ न कुछ बंदोबस्त अवश्य करती। 

गर्मी व कूलर


3 Jun 2020

रोटी ‘दो जून’ की ही क्यों !


अभी 02 जून बिता,तो सबको ‘दो जून की रोटी’ वाला मुहावरा खूब याद आया। लेकिन आज तक यह समझ में नहीं आया कि रोटी दो जून की ही क्यों होती है दो जनवरी, दो फरवरी, दो मार्च,दो अप्रैल या दो मई की क्यों नहीं होती? जून में भी दो जून ही क्यूंएक या तीन जून की भी तो हो सकती थी। दो जुलाई की रोटी कहने में क्या बुराई हैं। क्या दो जुलाई पराई हैअगर यह पराई है,तो दो अगस्त या दो सितंबर की रोटी रख लेते। इनमें भी खोट थी,तो दो अक्टूबर या दो नवंबर-दिसंबर की  रोटी का मुहावरा बना देते।
रोटी के साथ सब्जी शामिल क्यों नहीं की गईजबकि रोटी और सब्जी का तो जन्म-जन्मांतर का साथ है। मुहावरा दो जून की रोटी-सब्जी हो जाता, तो क्या धरती-आसमान ऊपर-नीचे हो जाते हैंरोटी-सब्जी न सही,दाल-रोटी रख लेते। तब मुहावरा बनता ‘दो जून की दाल-रोटी’। और अगर तब भी दाल महंगी थी,तो चटनी सम्मिलित कर लेते। दो जून की चटनी-रोटी का मुहावरा और भी बेहतर लगता। वैसे भी दो जून की रोटी वालों के नसीब में चटनी-रोटी ही होती है। साग- सब्जी तो कभी-कभार ही खाने को मिलती हैं। 
दो जून तो आटे के किसी ब्रांड का नाम भी नहीं। ब्रांड होता,तो बात सहज समझ आती कि दो जून ब्रांड के आटे में जरूर कुछ क्वालिटी होगी, कि गूंथने और बेलने में आसानी रहती होगी,कि तवे पर गिरते ही रोटी खुदेई फूल के गोलगप्पा बन जाती होगी, कि खाते ही गप्प दने से पच जाता होगा। फिर तो उसका विज्ञापन भी आता ‘दो जून का आटा,खाते हैं बिरला-टाटा’। मगर ये ब्रांड-वांड़ का मामला लगता नहीं क्योंकि ये मुहावरा उस वक्त से है, जब बाजार घर में घुसा नहीं था।
इंसान रोज ही, मतलब पूरे साल, जनवरी से दिसंबर तक की हर तारीख को रोज़ी-रोटी के लिए परिश्रम करता है,मगर क्रेडिट कमबख्त दो जून को मिल जाता है कि ‘दो जून की रोटी कमाने को हाड़तोड़ मेहनत कर रहे हैं बाबूजी’।
आखिर वह किस वर्ष की सौभाग्यशाली दो जून थी,जो मुहावरा बन गई। कहीं ऐसा तो नहीं कि जून में बहुत गर्मी पड़ती है और गर्मी में मेहनत करने पर पसीना आता है, इसलिए पसीने से कमाई गई रोटी को कह दिया गया हो, ‘दो जून की रोटी’। मगर गर्मी तो मई में भी रहती है। फिर मई ने क्या बिगाड़ा था? हें जी?
खैर,बात दो जून की रोटी की हो रही थी। तो सवाल यह भी उठता है कि दो जून की रोटी मोटी हो या पतली,गोलमटोल हो या टेढ़ी-मेढ़ी,अधजली हो या अधपकी, जिसे जैसी मिल जाए,कोई उसे छोड़ता नहीं। हां,इसके लिए लोग घर-परिवार जरूर छोड़ देते हैं। खुद के ही देश में प्रवासी बन जाते हैं। जिस दो जून की रोटी के लिए,गांव छोड़कर शहर गए थे, लॉकडाउन में उसी रोटी के लिए मोहताज हो गए। शहर से वापस गांव भूखे प्यासे ही सैकड़ों किलोमीटर पैदल चले। मगर ये लोग जून में पैदल नहीं चले, बल्कि दो जून की रोटी के लिए अप्रैल और मई में पैदल चले। वैसे कुछ भी कहिए,पर भूख यह कभी नहीं देखती कि रोटी किसकी और कब की है।
यह सब शोध का विषय है। मगर इस पर शोध करे कौन? अपन तो करने से रहे क्योंकि अपन तो लेखक हो गए हैं। और जो आदमी एक बार लेखक हो जाता है, फिर वह किसी और काम का नहीं रहता।
वैसे दो जून की रोटी पर मंथन करते-करते अब मुझे तो भूख लग आई है। अगर आगे का शोध आप लोग कर लो, तो मैं जाकर रोटी खा लूं। कबीर दास जी कह गए हैं-‘रूखी-सुखी खाए के ठंडा पानी पीव,देख पराई चुपड़ी मत ललचावे जीव’।

1 Jun 2020

गर्मी,कूलर और असमंजस


पंखा गर्म हवा देने लगा है। जिसके नीचे लेटना तो दूर बैठ तक नहीं सकते। तुम हो कि सुनते ही नहीं। सुनकर अनसुनी कर जाते हो। क्या तुम्हें गर्म हवा नहीं लगतीबताइएबहरे हो क्याया फिर जान-बूझकर बन गए हो। जो कि बता भी नहीं रहे हो। गूंगा-बहरा बनने से पार नहीं पड़ेगी। मैं कोई आभूषण तो लाने के लिए कह नहीं रही हूं। न हाथी घोड़ा। न हवाई जहाज के लिए कह रही हूं। बस एक कूलर के लिए कह रही हूं। जो कि कोई लाख दो लाख का तो आएगा नहीं। यही कोई पांच-सात हजार रुपए का आएगा।’  
जब मेरी जीवनसंगिनी मुझसे यह कहा तो मैंने उसे समझाते हुए कहा,‘पंखा गर्मी की वजह से गर्म हवा फेंक रहा है। वरना यह पंखा इत्ती ठंडी हवा देता है कि इसके आगे तो एसी भी फेल है। कूलर की तो बिसात ही क्या है?’ 
यह सुनकर पत्नी बोली,‘उपलब्धि मत गिनाओं। तुम तो यह बताओं। कूलर लाना है या नहीं।
कूलर लाकर करेंगे क्याएक बार बरसात हो जाने दे। फिर देखना,यह पंखा ही कूलर बन जाएगा। इसे ही मीडियम पर चलाना पड़ेगा। चद्दर और ओढ़नी पड़ेगी।
यह मैंने पत्नी से कहा तो वह भृकुटी चढ़ाते हुई बोली, ‘इस खटारे पंखे की ज्यादा महिमामंडित मत करिए,वरना नीचे उतारकर कबाड़ी को बेच दूंगी।
तुझे पता भी है। यह पंखा कितना पुराना है। अब तक सिर्फ दो बार ही खराब हुआ है।’  
यह मैंने कहा तो वह गुस्से से लाल पीली हो गई और बोली,‘मुझे सब पता है। बताने की जरूरत नहीं है। जिसकी जरूरत है न उसके संदर्भ में तो बता नहीं रहे हैं। पंखे का गुणगान किए जा रहे हो। तुम तो सारी दोपहरी नीमड़ी तले बैठकर ताश पत्ती पीटते रहते हो। तुम्हें क्या पतागर्म हवा तो मैं खाती हूं न।
मैंने कहा,‘तू सीढ़ी लगा। मैं अभी दो बाल्टी पानी की छत पर डाल आता हूं। छत ठंडी होते ही देखना,पंखा ठंडी हवा नहीं देने लगे तो कहना।
वह बोली, ‘तुम मूर्ख हो या फिर मुझे मूर्ख समझते हो। दो बाल्टी तो दो मिनट में उड़ जाएंगी। दिख नहीं रहा धूप कित्ती तेज पड़ रही है। सूर्य की ओर देखा तक नहीं जा रहा है। एक दिन पानी डालने से क्या होगारोज-रोज तो डालने से रहे। छत पर डालने के बजाए कूलर लाकर उसी में डालिए न।
मैंने कहा, ‘कूलर तो ले आएंगे। पर उसे रखेंगे कहांइस छोटे से कमरे में रखने की जगह तो है ही नहीं। सारी जगह तो बेड,अलमारी और संदूक ने रोक रखी है।
पत्नी बोली,‘लेकर तो आए नहीं और रखने की पहले ही सोचने लग गए। जंगले के बाहर रख लेंगे।
तुम्हें पता भी है। जंगले के बाहर रखेंगे तो हवा अंदर पार ही नहीं होगी। जंगले की जाली बहुत ही बारिक है।
मेरी बात को बीच में ही काटती हुई पत्नी बोली, ‘जंगले की जाली काट लेंगे। तुम कूलर तो लेकर आओं।’ 
मैंने कहा,‘थोड़ी देर के लिए मान लीजिए कूलर आ ही गया। उसे जंगले के बाहर रख भी दिया। पर मुझे यह बताइए बाहर धूप से कूलर गर्म नहीं होगा क्यागर्म होने के बाद फिर वह भी गर्म हवा ही फेंकेगा। फिर तुम एसी के लिए कहोगी। एसी लाने की मेरी औकात नहीं है।
जिसकी औकात है न वो तो ला नहीं रहे हो और  बेमतलब की बातें बनाते जा रहे हो। सीधे-सीधे यूं ही क्यों नहीं कर देते कि कूलर लाने की औकात नहीं है। तुमसे अच्छा तो हमारा पड़ोसी ही सही है,जो कि अपनी बीवी के एक बार कहने पर ही कूलर लाकर लगा दिया। जबकि वह तो हमारे से भी गरीब है।यह कहकर पत्नी रसोई में चली गई और मैं सोच रहा हूं कि कूलर लाऊं या फिर नहीं लाऊं। अब आप ही बताइए।
मोहनलाल मौर्य

25 May 2020

लॉकडाउन में बुजुर्ग दंपति की व्‍यथा

हमारे मोहल्ले में एक खंडहर नुमा हवेली में रहने वाले नि:संतान बुजुर्ग दंपति हवेली के सामने से गुजरने वाले से दूर से ही यही पूछते हैं कि यह लॉकडाउन कब खुलेगा। गुजरने वाले यही कहते हैं कि जल्दी ही खुलेगा।जब दंपति द्वारा आगे तो नहीं बढ़ेगा पूछने पर बगैर कुछ बताए,वहां से खुद आगे बढ़ जाते हैं। तब आगे बढ़ते को देखकर उनके चेहरे पर चिंता की लकीरें साफ दिख जाती हैं। उनकी खोपड़ी में कोरोना काल के चलचित्र चलने लगते हैं। 
इनको तो कोरोना वायरस के बारे में भी तब पता चला था जब एक संस्था के लोग उन्हें राशन देने आए थे और  समझाकर गए थे कि भूलकर भी हवेली की चौखट मत लांघना। लांघ गए तो हवेली के दरवाजे हमेशा के लिए बंद हो जाएंगे। साथ में कईयों के सिर पर से बाप का साया उठ जाएगा और न जाने कितने ही विधवा व विधुर हो जाएंगे। उस दिन से कोरोना क्या बला है। यह अच्छी तरह से समझ गए थे।
दरअसल में क्या है कि खंडहर नुमा हवेली में इनका दिन में दम घुटता है। दिन में दम इसलिए घुटता है कि खट-खट करते हुए चलने वाला सीलिंग फैन तो है,लेकिन उसे चलाने के लिए बिजली नहीं है। कोरोना काल से पहले लाइनमैन ने बिजली का बिल जमा नहीं कराने के कारण उनका कनेक्शन काट दिया था। बिल इसलिए जमा नहीं करा पाए थे कि बिल की राशि उनको मिलने वाली वृद्धा पेंशन से कहीं ज्यादा आई थी। दोनों को वृद्धा पेंशन इतनी ही मिलती है,जो कि लून,तेल व लकड़ी में ही खर्च हो जाती है। यह तो शुक्र है कि कोटे के गेहूं समय पर मिल गए हैं। वरना खाने के लाले पड़ जाते।

आम दिनों में तो दोनों का दिन कभी इसके तो कभी उसके पास उठने बैठने से आराम से कट जाता था। पर अब काटना मुश्किल हो रहा है। सब घरों के अंदर कैद है। आवाज मारने पर भी बाहर नहीं निकलते हैं। कोई निकल भी आता है तो अपनी शक्ल नहीं दिखाता है। मुंह पर मास्क लगाए रहता है। जिससे पहचानना मुश्किल हो जाता है। यह कौन है? मोहन या सोहन। दिनभर दीवार पर चढ़ती छिपकलियों को देखते रहते हैं। चिड़िया के घोंसले से चू-चू करते बच्चों को निहारते रहते हैं। चहुँओर पसरे सन्नाटे के बीच कभी-कभार कबूतरों की गुटरगू और नीम के पेड़ पर बैठी कोयल की कू-कू की आवाज कानों में पड़ती है,तो उनकी ओर टकटकी लगाकर देखने लग जाते हैं। 
सुबह-शाम हवेली की चौखट पर मुंह पर हस्तनिर्मित मास्क लगाकर बैठ जाते हैं और सूने पड़े रास्ते पर कुत्तिया के पिल्लों की अठखेलियां देखकर थोड़ा बहुत हंस लेते हैं। जब पिल्ले दिखाई नहीं देते हैं,तो नीले गगन के तले उड़ते पक्षियों को गिनने लग जाते हैं। पर किसी से भी मिलने-जुलने नहीं जाते हैं। यहां तक कि चौखट लांघकर पड़ोसी की देहरी तक भी नहीं जाते हैं। जबकि पड़ोसी की देहरी हवेली से पचास फुट दूर भी नहीं है।उन दोनों का कहना है कि चौखट लांघना कोरोना को न्योता देना है।
 मो‍हनलाल मौर्य

17 May 2020

एक व्हाट्सएप ग्रुप की कहानी


मैं एक ऐसे साहित्यिक व्हाट्सएप समूह का सदस्य हूँ,जिसके सदस्यों की सदाशयता देखने लायक है। वे संसद के सदस्यों की तरह साहित्य पर चर्चा करते हैं। चर्चा के दौरान जो सदस्य विषय से हटकर चर्चा करता है, तो उसे ग्रुप के संविधान रिमूव अनुच्छेद के तहत  बाहर निकाल दिया जाता है। 
उसके बाहर जाने के बाद अंदर वाला कोई भी माननीय सदस्य उसे फिर से वापस लाने के लिए  ‘प्रत्यावर्तन विधेयक ग्रुप में पेश कर देता है,तो संसद की तरह उस पर विचार-विमर्श होता है। पक्ष-विपक्ष में उसके साहित्यिक योगदान पर बहस होती है। बहुमत प्राप्त होने के पश्चात विधेयक को ग्रुपपति के पास भेजा जाता है। ग्रुपपति के हस्ताक्षर होने के बाद उस माननीय सदस्य को ससम्मान ऐड पार्टिसपेंटअनुच्छेद के तहत वापस सम्मिलित कर लिया जाता है।ग्रुपपति महोदय अपने विचार विषम परिस्थितियों में ही रखते हैं,क्योंकि सामान्य परिस्थिति में वो विचार रखने की स्थिति में नहीं रहते हैं,साहित्य साधना में तल्लीन रहते हैं। 
ग्रुप में दो माननीय सदस्य को अन्य सदस्यों की प्रकाशित रचनाओं को अलसुबह ही ग्रुप में डालने का गौरव प्राप्त है। यह दोनों सुबह उठते ही सबसे पहले अखबारों के ई-पेपर देखते हैं। अपने ग्रुप सदस्य की रचना दिखते ही क्रॉप करके सीधे ग्रुप में डाल देते हैं। साथ में बगैर पढ़े ही बधाई भी चेप देते हैं। इनकी बधाई के बाद बधाई का सिलसिला देर रात तक जारी रहता है।
कई बार बधाईयों पर प्रतिबंधविधेयक पेश किया गया है और पूर्ण बहुमत से पास भी हुआ है,लेकिन इनका सिलसिला पूर्व की भांति सुचारू रूप से प्रारंभ हो जाता है। इस संदर्भ में ग्रुप का संविधान लचीला है,जिसे कठोर बनाने के लिए एक कोर कमेटी गठित की गई है। 
ग्रुप में एकमात्र वरिष्ठ माननीय सदस्य हैं,जो प्रकाशित रचना पर अपनी आलोचनात्मक टिप्पणी के साथ ही अपने विचार रखते हैं,अन्यथा फिर वह रखते ही नहीं है। यह बधाई में विश्वास नहीं रखते हैं। ऐसा भी नहीं है कि वह बधाई विरोधी है,लेकिन यह रचना का आलोचनात्मक पोस्टमार्टम करना अपना धर्म समझते हैं। वह अपने के प्रति सदैव सजग रहते हैं। थोड़ी सी भी आंच नहीं आने देते हैं। आ जाए तो डिबेट के लिए तैयार रहते हैं।
ग्रुप में तीन-चार माननीय वरिष्ठ सदस्य ऐसे भी हैं,जो सदैव कनिष्ठ सदस्यों की रचनाओं में खामियां निकालकर वाहवाही लूटने में रहते हैं।  गिद्ध की तरह अशुद्ध शब्द पर नजर गड़ाए रखते हैं। दिखते ही पकड़कर रख देते हैं। चाहे शब्द टाइपिंग मिस्टेक की वजह से अशुद्ध हुआ हो,लेकिन ये लोग मानते हैं कि लेखक को शुद्ध शब्द लिखना नहीं आता है।
दो माननीय सदस्य ऐसे हैं,जो कि घटिया से घटिया प्रकाशित लेख को भी प्रशंसा प्रमाण पत्र देकर सम्मानित किए बगैर नहीं रहते हैं। इनकी दृष्टि में प्रकाशित होना भी अपने आप में बहुत बड़ी उपलब्धि है,चाहे उस अखबार का एक भी पाठक नहीं हो। एक लेखक के लिए प्रकाशित का परम सुख ही काफी है। इनके पास ग्रुप के सभी सदस्यों के प्रशंसा प्रमाण पत्र  रखे हुए हैं। बस निकालकर देना ही रहता है। दोनों देने में सदैव अग्रणी रहते हैं। दोनों देते भी अलग-अलग हैं।

कुछेक सदस्य ऐसे हैं,जो कि ग्रुप की हर गतिविधि देखते रहते हैं। लेकिन चुप रहते हैं, कभी भी कुछ भी साझा नहीं करते हैं। ऑनलाइन उपस्थित होने के बावजूद भी अपनी हाजिरी तक नहीं बोलते हैं। जब कभी एडमिन या किसी वरिष्ठ सदस्य द्वारा कार्यवाही करने की धमकी दी जाती है,तब भले ही इमोजी डालकर अपनी उपस्थिति प्रस्तुत कर देते हैं।
इस साहित्यिक ग्रुप में सात-आठ नवांकुर लेखक हैं, जिन्हें कुछेक वरिष्ठ तो सदैव सींचने में रहते हैं और कुछेक टांग पकड़कर खींचने में लगे रहते हैं। ज्यादातर हम नवांकुरों को देश के किसी भी प्रमुख अखबार में लहलाते देखकर हतप्रभ रह जाते हैं।
ग्रुप में दो एडमिन है। एक कनिष्ठ और दूसरा वरिष्ठ हैं। दोनों में से एक भी बगैर बीन बजाए नहीं आते। आने के बाद सबको अपने ज्ञान का लिफाफा देकर ही जाते हैं। इनके लिफाफे को देखकर कई सदस्‍य तो कई दिनों तक संशय में रहते हैं।

14 May 2020

कोरोना काल में कहानी घर-घर की


वाह रे कोरोना तूने तो अदृश्यमान हो वो कमाल कर दिया जो आजतक कोई नहीं कर पाया। तूने एक ही झटके में बाहुबली कद्दावर मुल्कों को आसमान दिखा दिया। सबको घर के अंदर बैठा दिया। दिनभर बंदर की तरह उत्पात मचाने वाले भी चारदीवारी के भीतर जिगर थामे चुपचाप बैठे हैं। एक घंटे भी चैन से नहीं बैठने वाले भी महीनों से आराम से बैठे हुए हैं। तेरा इतना खौफ है कि जो किसी से भी नहीं डरते थे,वो म्याऊं बने बैठे हैं। चोर,उचक्के,गुंडे व मवाली भी सहमे हुए हैं। बाहर निकलने से कतराते हैं। जेब कतरे भी तुझे खतरा समझकर खुद की जेबों में ही हाथ दिए टहलते  हैं। उन्हें पता है कि लोगों की जरखेज जेबे तो खूंटी या हैंगर के टकी हुई हैं। बाहर इंसान तो क्याउसकी छाया भी दिखाई नहीं पड़ती है। माया-मोह में फंसे हुए भी अपनी काया पर तेरा साया नहीं पड़ जाएइसलिए सोच-विचार में डूबे हुए हैं। जो कभी चिंतित नहीं हुए,वो भी चिंता के दरिया में गोते लगा रहे हैं।
जिसे देखों,वहीं एक-दूसरे को समझा रहा है और तेरे से बचने के कारगर उपाय बता रहा हैं। ताज्जुब की बात है कि नासमझ भी समझ रहा है और बचाव के तमाम उपाय अपना रहा है। अक्सर हाथ मिलाकर अभिवादन करने वाले हाथ जोड़कर आदर सत्कार कर रहे हैं। जिसने कभी धूप से बचने के लिए भी मुंह पर रूमाल तक नहीं बांधी , वह भी मास्क लगाए रहता है। जो बाथरूम जाने के बाद सादा पानी से भी हाथ नहीं धोते थे। वे भी बीस सेकंड से भी ज्यादा समय तक साबुन लगाकर हाथ धो रहे हैं। सिर्फ धोते ही नहीं उसे निचोड़ते भी हैं. बहुतायत में मच्छर होने के बावजूद भी उन्हें मारने की दवा का कभी स्प्रे नहीं किया। पर तेरे विषाणु के कारण तमाम तरीके के रसायनों का जर्रे जर्रे में छिडकाव कर रहे हैं।
तेरे डर के मारे अपने भी अपनों से दूरी बनाकर रह रहे हैं। लापरवाह भी पूरी एहतियात बरत रहे हैं। जो अपने बाप की मृत्यु पर भी सिर नहीं मुंडवाए थे,वो तेरे कारण लगे लॉकडाउन में अपना सिर मुंडवा रहे हैं। जिसने कभी इधर का तिनका उधर नहीं किया,वो भी घर के सारे कामकाज कर रहे हैं। जिन्हें यह नहीं पता था कि चाय में पहले दूध पड़ता है या पानी,वे रसोई संभाल रहे हैं। दफ्तर में अपने अधीनस्थों पर हुक्म चलाने वाले चुपचाप झाड़ू पोंछा लगा रहे हैं। हमेशा हवा में उड़ान भरने घरेलू टाइप के हलवाई बने हुए हैं और बेचारे पेशेवर हलवाई हाथ पर हाथ धरे  मायूस बैठे हैं।
कोरोना तेरे भय से कई तो इतने भयभीत हो चुके हैं कि अपने सगे बाप की साधारण मौत पर उसे कंधा देना तो दूर उसके अंतिम संस्कार में सम्मिलित नहीं हो रही हैं। जो मृतक के घर जाकर श्रद्धांजलि अर्पित करने में सदैव अग्रणी रहते थे,वो पड़ोसी के स्वर्ग सिधारने पर भी उनके घर पर सांत्वना देने भी नहीं पधार रहे हैं। दिन में दस बार हाल-चाल पूछने वाले भी कहीं नहीं जा रहे हैं। उन्हें भी डर है कि हाल-चाल पूछने के चक्कर में कहीं मैं चपेट में नहीं आ जाऊं। ताश पत्ती खेलकर अपना टाइम पास करने वाले दिनभर मोबाइल में टाइम देखकर ही टाइम पास कर रहे हैं। मगर खेलने से डर रहे हैं। उन्हें पता है कि खेलने गए तो सेहत का खेल बिगड़ सकता है। इन दिनों सेहत बिगड़ गई और वह एंबुलेंस में बैठकर हॉस्पिटल चला गया,तो उसको कोरोना दृष्टि से देखते हैं।
कल तक डेंगू,मलेरियाचिकनगुनिया के मरीज की खबर पड़ोसी को भी नहीं लगती थी। कोरोना तेरे पॉजिटिव के मरीज की खबर पूरे शहर को मालूम हो जाती है कि फला कॉलोनी में एक और पॉजिटिव मिल गया है। आजकल पॉजिटिव सुनकर इतना डर लगता है कि सब सुन्न हो जाते हैं। अपने इलाके का पॉजिटिव से नेगेटिव आ जाता है न तब कहीं जाकर राहत की सांस लेते हैं। उससे पहले तो सांसे फूली ही रहती हैं।
कोरोना तूने कईयों को मालामाल तो कईयों को कंगाल कर दिया हैं। सदैव गुलजार रहने वाले बाजार बंद और कालाबाजार शुरू करवा दिया। शटर के नीचे से शराब बिकती देखी थी। मगर तूने तो गुटका,पानमसाला,तंबाकू,बीड़ी-सिगरेट भी शटर के नीचे से खरीदनेे पर मजबूर कर दिया है। 
कल तक नशेड़ियों का जो नशा दस रुपए में मिलता था। आज वह सौ रुपए में मिल रहा है।
फिर भी नशेड़ी खरीदे बगैर नहीं रह रहे हैं। माना कि तेरे कारण अपराध का ग्राफ घटा है और जल व वायु शुद्ध हुई है। लेकिन तेरे से लड़ने के लिए,समूचे विश्व में न जाने कितने योद्धा युद्ध लड़ रहे हैं। फिर भी तू पस्त नहीं हो रहा है। आखिर तू चाहता क्या हैतेरी मंशा क्या हैअब बहुत हो गया है। रहम कर। अपनी दृष्टि इस सृष्टि पर मत पटक। किसी अन्य ग्रह में जाकर अपनी भड़ास निकाल ले।

24 Mar 2020

वरना यह हाथ धोकर पीछे पडे़गा


सोशल मीडिया से पता लगा है कि कोरोना वायरस कोई ऐरा-गैरा नत्थू-खैरा नहीं है। न बेशर्म है, न आदत से लाचार। स्वाभिमानी और आत्मसम्मान वाला वायरस है। जब तक आप घर से बाहर नहीं निकलेंगे, वह घर के अंदर नहीं आएगा। घर से निकल गए, तो बंदर की तरह उछलकर घर के अंदर आ जाएगा और बंदर की तरह ही उत्पात मचाएगा। एक मित्र का सुझाव है कि भविष्य में अपनों के पास रहना है, तो कुछ समय के लिए दूरियां बनाकर रहिए। अगर दूरी बनाकर नहीं रहेंगे, तो कोरोना नजदीकी का फायदा उठा लेगा। यह फायदा उठाने में बहुत ही उस्ताद है।
सरकार की गाइडलाइन फॉलो करें, अन्यथा कोरोना आपकी सेहत को अनफॉलो कर देगा। बचाव ही उपाय बताया जा रहा है। बचाव न किया, तो कोरोना का बर्ताव बहुत बुरा है। खांसी या छींक आए, तो मुंह पर तुरंत रूमाल लगाइए, नहीं लगाएंगे, तो कोरोना अपना कमाल दिखाए बगैर नहीं रहेगा। मुंह पर मास्क लगाकर रहिए, वरना कोरोना माफ नहीं करेगा। किसी से भूलकर भी हाथ मत मिलाइए, वरना कोरोना हाथ पकड़कर खींच लेगा। बार-बार साबुन या हैंडवॉश से हाथ धोते रहिए। अगर हाथ धोने में जरा सी भी कोताही बरती, तो कोरोना हाथ धोकर पीछे पड़ जाएगा। पीछे पड़ गया, तो कहीं भी चले जाइए या छिप जाइए, यह पीछा नहीं छोडे़गा। पकड़कर ही रहेगा। इसने पकड़ लिया, तो उससे छुड़वाना बहुत ही मुश्किल है। लॉकडाउन में लोकगीत गाकर टाइम पास कर लीजिए, मगर घर से बाहर मत निकलिए। निकले, तो खुद के लिए और घरवालों के लिए खतरा साबित हो सकता है। खतरे का तो कतरा भी खतरनाक ही होता है।
जिस तरह जनता कर्फ्यू के दिन घरों में कैद रहे थे। ठीक उसी तरह से कुछ दिन और घर के अंदर कैद रह लीजिए। जहन्नुम में जाने से बच जाएंगे। इस खाली समय में कुछ भी नहीं कर सकते, तो जनता कर्फ्यू की शाम की तरह थाली और ताली बजाते रहिए। हो सकता है कि कोरोना को रोना आ जाए और हमारे देश से भाग जाए।

बुढ़ापे की लाठी


कई दिनों से देख रहा हूँ। भाटी जी लाठी को जमकर तेल पिला रहा हैं। लाठी भी तेल पीकर अंबुजा सीमेंट से बनी दीवार की मानिंद इतनी मजबूत हो गई है कि तोड़ने से भी नहीं टूटे। जिसके हाथ में इतनी मजबूत लाठी हो। उसकी भैंस की ओर कोई आँख उठाकर देख ले। किसी की मजाल है। आँख उठाकर देखने की तो छोड़िए,कोई आँखें झुकाकर भी नहीं देख सकता। ऐसी मजबूत लाठी को देखकर तो पानी में गई हुई,भैंस वापस आ जाए।
लेकिन भाटी जी के पास तो बकरी का बच्चा भी नहीं है। फिर लाठी को इतनी ठोस करके क्या करेगायह प्रश्न मेरे मन में कौंधा। सोचा कुत्ता-बिल्ली को भगाने के लिए या चोर-उचक्को को डराने के लिए ठोस किया होगा। क्योंकि हाथ में मजबूत लाठी होती है तो मरियल में भी हिम्मत आ जाती है। वह भी अकड़ कर चलता है। लाठीधारी से पहलवान भी डरता है। कहते हैं कि लाठी के आगे तो भूत भी काँपता है। दुम दबाकर भाग जाता है। इस रहस्य का राज जानने के लिए,मैंने भाटी जी से पूछा। पहले तो हंसकर टाल गए। फिर से पूछा तो बताया। यह आम लाठी नहीं। खास लाठी है। इसकी ख़ासियत अभी नहीं। कुछ दिनों पश्चात दिखाई देने लगेंगी। बहरहाल तो परवरिश का तेल पिला रहा हूँ। संस्कार का तेल पिलाना शेष है। अब मैं इसकी सेवा कर रहा हूँ। बाद में यह मेरी करेगी। यही सेवा की मेवा है। 
मैं समझ गया था। यह बुढ़ापे की लाठी है। बुढ़ापे की लाठी जितनी मजबूत होती है। बुढ़ापा उतना ही आसानी से कटता है। इसीलिए तो व्यक्ति बुढ़ापे की लाठी से अथाह प्यार-प्रेम करता है। ताकि लाठी को किसी घाटी पर भी साथ लेकर चढ़ने को कहें तो आनाकानी नहीं करें। बल्कि तत्काल चढ़ने के लिए कहे। चलिए चलते हैं।
भाटी जी की उम्र ढल रही थी और लाठी जवानी के मजे ले रही थी। भाटी जी ने सोचा लाठी कहीं किसी के प्रेम प्रसंग में नहीं पड़ जाए। प्रेम-प्रसंग में पड़ गई तो बाहर नहीं निकल पाएगी। बाहर नहीं निकली तो बुढ़ापा बिना लाठी के सहारे ही काटना पड़ेगा।यही सोचकर पाणिग्रहण संस्कार कर दिया। शादी के कुछ माह बाद भाटी जी द्वारा पिलाया गया तेल सूखने लगा और नई नवेली द्वारा लगाया गया तेल रमने लगा। देखते ही देखते लाठी गिरगिट की तरह रंग बदलने लगी। आँखें चुराने वाली आँखे बात-बात में आँख दिखाने लगी। कल तक जुबान नहीं उपड़ती थी। आज कतरनी से भी तेज चलने लगी है। मिमियाने की जगह गरयाने लगी। 
हद तो तब हो गई। जब उसने एक दिन भाटी जी पर लाठी उठा ली। यह देखकर मैं भी आश्चर्यचकित रह गया। सोचने लगा कैसा घोर कलि‍युग आ गया है। जिस पर बचपन से लेकर जवानी तक। किसी तरह की कोई आँच नहीं आने दी। आज वही आग बबूला हो रही है। कल तक जिसके मुखमंडल से सभ्य व संस्कारी बोल प्रस्फुटित होते थे। अब उसी मुखमंडल से बुरे-भले बोल मुखर होने लगे हैं। ऐसी बुढ़ापे की लाठी से तो लाख गुना अच्छा है। छोटे-मोटे डंडों के सहारे ही बुढ़ापा काट लिया जाए।

21 Mar 2020

नाक का सवाल और मूँछ का बाल


उसकी भी वहीं नाक है,जो कि एक आम भारतीय की होती है। मूँछ भी कोई खास नहीं पर वह मूँछों पर हाथ ऐसे फेरता है,जैसे राउडी राठौर फिल्म में अक्षय कुमार फेरता है। सच पूछिए तो उँगली और अँगूठे के बीच में चार बाल भी नहीं आते होंगे। लेकिन वह छोटी सी बात को भी मूँछ का बाल तथा नाक का सवाल बना लेता है। एक बार बना लिया तो बना ही लिया। फिर पीछे नहीं हटता। पक्का हठधर्मी है। नाक के सवाल पर तो घरवालों की ही नहीं अगल-बगल वालों की भी नाक में दम कर देता हैं। और जब तक नाक के सवाल का जवाब नहीं मिल जाता। तब तक नासिका पर मक्खी भी नहीं बैठने देता है। इसी तरह मूँछ के बाल पर जब तक बाल में से खाल नहीं निकाल लेता। तब तक बाल को खाल से अलग नहीं होने देता हैं। 
अगर किसी ने हँसी-मजाक में भी कह दिया फलाने सिंह ने ढिमका काम क्या कर दियाउसका नाम हो गया। इतना सुनते ही फलाने सिंह का काम तमाम करने में और खुद का नाम करने में जुट जाता है। चाहे परिणाम शून्य ही निकले पर जोर सैकड़ा का लगा देता है। खर्चा-पानी की भी परवाह नहीं करता। नाक का सवाल और मूँछ के बाल पर तो पानी की तरह पैसा बहा देता है। वैसे एक रुपया नाली में गिर जाए तो उसे भी निकालने लग जाता है। एक नंबर का मक्खीचूस है।
पड़ोसी के लाल से अपना लाल क्रिकेट मैच हार गया तो समझता है कि नाक कट गई। हर जगह अपनी नाक ऊँची रहे। इसलिए अपने बेटे पर भी बाजी लगा देता है। उसकी हार को जीत में बदलने के लिए। जीत गया तो इस तरह ढिंढोरा पीटता है,जैसे कि पुत्र वर्ल्ड कप जीत गया हो। चुनावी मौसम में कोई यूं ही कह दे कि तुम्हारे प्रत्याशी चुन्नीलाल के तो चुनाव में चूना लगेगा। फिर भले ही चुनाव वार्ड पंच का ही क्यों ना हो?अपने उम्मीदवार को जिताने का मिशन ही मूँछ का बाल होता  है।
उसकी नाक और मूँछ का दायरा खुद तक ही सीमित नहीं है। घर-परिवार,गली-मोहल्ला,गाँव- देहात,कस्बा,शहर,राजधानी से लेकर सोशल मीडिया तक विस्तृत है। जब मोहल्ले की खुशी किसी खुशीराम के साथ भाग गई थी। तब नाक अपनी न होकर मोहल्ले की हो गई थी। उसकी खोजखबर में चिरपरिचित से लेकर अपरिचित तक से पूछताछ कर डाली और  तीन दिन में ही ढूँढ़ निकाली थी। इसी तरह फेसबुक मित्र के चित्र पर मित्र चतरसिंह की लड़की चित्रकला फिदा हो गई तो समझा कि मित्र की नाक ही मेरी नाक है। इसलिए जुदाई का कमेंट लिखकर दूर रहने की चेतावनी दे डाला। नहीं माना तो पिटाई की चटनी चटा दी। पिटाई की चटनी ऐसी होती है कि एक बार जिसने चाट ली। फिर वह भूलकर भी इश्क चाट भंडार की ओर नहीं देखता। 
ऐसी प्रवृत्ति का व्यक्ति अकेला यही ही नहीं है। आपके भी आसपास में कोई ना कोई जरुर होगा। अगर नहीं है तो आप स्वयं होंगे। चौंकिए मत। अपनी मूँछों पर हाथ फेरकर देखिए और उस बाल को पकड़िए जो मूँछ के बालों का बाप है। मूँछ नहीं है तो कतई शर्मिंदा मत होइए। ऐसा नहीं है कि बिना पूछ की घोड़ी अच्छी नहीं लगती है तो बिना मूँछ का मर्द भी अच्छा नहीं लगता है। आज के दौर में तो बिना मूँछ वाला ही अच्छा लगता है। यकीन नहीं हो तो अपनी घरवाली या प्रेमिका से पूछ लीजिए। खैर छोड़िए,मूँछ नहीं है तो क्या हुआनाक तो है। नाक को तो कोई भी मूँछों की तरह कतरनी से नहीं काटता है। इसलिए नाक को निहार लीजिए। उसका अक्‍स दिख ही जाएगा।