21 Mar 2020

नाक का सवाल और मूँछ का बाल


उसकी भी वहीं नाक है,जो कि एक आम भारतीय की होती है। मूँछ भी कोई खास नहीं पर वह मूँछों पर हाथ ऐसे फेरता है,जैसे राउडी राठौर फिल्म में अक्षय कुमार फेरता है। सच पूछिए तो उँगली और अँगूठे के बीच में चार बाल भी नहीं आते होंगे। लेकिन वह छोटी सी बात को भी मूँछ का बाल तथा नाक का सवाल बना लेता है। एक बार बना लिया तो बना ही लिया। फिर पीछे नहीं हटता। पक्का हठधर्मी है। नाक के सवाल पर तो घरवालों की ही नहीं अगल-बगल वालों की भी नाक में दम कर देता हैं। और जब तक नाक के सवाल का जवाब नहीं मिल जाता। तब तक नासिका पर मक्खी भी नहीं बैठने देता है। इसी तरह मूँछ के बाल पर जब तक बाल में से खाल नहीं निकाल लेता। तब तक बाल को खाल से अलग नहीं होने देता हैं। 
अगर किसी ने हँसी-मजाक में भी कह दिया फलाने सिंह ने ढिमका काम क्या कर दियाउसका नाम हो गया। इतना सुनते ही फलाने सिंह का काम तमाम करने में और खुद का नाम करने में जुट जाता है। चाहे परिणाम शून्य ही निकले पर जोर सैकड़ा का लगा देता है। खर्चा-पानी की भी परवाह नहीं करता। नाक का सवाल और मूँछ के बाल पर तो पानी की तरह पैसा बहा देता है। वैसे एक रुपया नाली में गिर जाए तो उसे भी निकालने लग जाता है। एक नंबर का मक्खीचूस है।
पड़ोसी के लाल से अपना लाल क्रिकेट मैच हार गया तो समझता है कि नाक कट गई। हर जगह अपनी नाक ऊँची रहे। इसलिए अपने बेटे पर भी बाजी लगा देता है। उसकी हार को जीत में बदलने के लिए। जीत गया तो इस तरह ढिंढोरा पीटता है,जैसे कि पुत्र वर्ल्ड कप जीत गया हो। चुनावी मौसम में कोई यूं ही कह दे कि तुम्हारे प्रत्याशी चुन्नीलाल के तो चुनाव में चूना लगेगा। फिर भले ही चुनाव वार्ड पंच का ही क्यों ना हो?अपने उम्मीदवार को जिताने का मिशन ही मूँछ का बाल होता  है।
उसकी नाक और मूँछ का दायरा खुद तक ही सीमित नहीं है। घर-परिवार,गली-मोहल्ला,गाँव- देहात,कस्बा,शहर,राजधानी से लेकर सोशल मीडिया तक विस्तृत है। जब मोहल्ले की खुशी किसी खुशीराम के साथ भाग गई थी। तब नाक अपनी न होकर मोहल्ले की हो गई थी। उसकी खोजखबर में चिरपरिचित से लेकर अपरिचित तक से पूछताछ कर डाली और  तीन दिन में ही ढूँढ़ निकाली थी। इसी तरह फेसबुक मित्र के चित्र पर मित्र चतरसिंह की लड़की चित्रकला फिदा हो गई तो समझा कि मित्र की नाक ही मेरी नाक है। इसलिए जुदाई का कमेंट लिखकर दूर रहने की चेतावनी दे डाला। नहीं माना तो पिटाई की चटनी चटा दी। पिटाई की चटनी ऐसी होती है कि एक बार जिसने चाट ली। फिर वह भूलकर भी इश्क चाट भंडार की ओर नहीं देखता। 
ऐसी प्रवृत्ति का व्यक्ति अकेला यही ही नहीं है। आपके भी आसपास में कोई ना कोई जरुर होगा। अगर नहीं है तो आप स्वयं होंगे। चौंकिए मत। अपनी मूँछों पर हाथ फेरकर देखिए और उस बाल को पकड़िए जो मूँछ के बालों का बाप है। मूँछ नहीं है तो कतई शर्मिंदा मत होइए। ऐसा नहीं है कि बिना पूछ की घोड़ी अच्छी नहीं लगती है तो बिना मूँछ का मर्द भी अच्छा नहीं लगता है। आज के दौर में तो बिना मूँछ वाला ही अच्छा लगता है। यकीन नहीं हो तो अपनी घरवाली या प्रेमिका से पूछ लीजिए। खैर छोड़िए,मूँछ नहीं है तो क्या हुआनाक तो है। नाक को तो कोई भी मूँछों की तरह कतरनी से नहीं काटता है। इसलिए नाक को निहार लीजिए। उसका अक्‍स दिख ही जाएगा।

20 Mar 2020

कोरोना की करनी और चाइनीज करतूत


कहते हैं कि चाइना का माल चले तो चांद तक और नहीं चले तो शाम तक भी नहीं। लेकिन चाइना का वायरस कोरोना तो कुछ ज्यादा ही चल पड़ा है। हर तरफ इसके ही किस्से सुनने को मिल रहे हैं। हर कोई इसके बचाव के उपाय वाली पोस्ट की कॉपी पेस्ट कर रहा है। यह सोशल मीडिया पर जितना फॉरवर्ड हो रहा है उतना तो देश में नहीं फैला है। अखबार का ऐसा कोई पन्ना नहीं जिसमें कोरोना की खबर नहीं। मगर खबर का असर नहीं पड़ रहा है। शीर्षक पढ़कर ही आगे बढ़ रहे हैं और सनसनीखेज खबरें ढूंढ रहे हैं। नहीं मिलने पर अखबार छोड़कर टीवी में देख रहे हैं। पर उसमें भी कोरोना की ही खबरें चल रही हैं। डिबेट हो रही है। कोरोनो से लड़ने के बजाय खुद लड़ रहे हैं।
रोज सरकार इश्तहार के माध्यम से सतर्क रहने की सलाह दे रही है। हाथ न मिलाए। नमस्ते से काम चलाइए। मास्क लगाइए। भीड़ का हिस्सा न बने। दिन में कई बार साबुन से हाथ धोए। पर कई लोगों का कहना है कि हम हाथ न मिलाएं तो हमारे घर का चूल्हा न जले। मास्क क्या खाक लगाएं। बाजार में 20 पैसे का मास्क 20 रुपए में मिल रहा है। रही बात भीड़ की तो ब्याह शादी में भीड़ तो होती ही है। साले की शादी में जीजा नहीं जाए तो साला घोड़ी पर कैसे बैठे। उसे घोड़ी पर बिठाने के लिए,भीड़ का हिस्सा बनना ही पड़ता हैं। हाथ जोड़कर नमस्ते करते हैं तो कोई समझता ही नहीं है कि अभिवादन कर रहा है। जहां पर पीने के लिए पानी नहीं,वो लोग कह रहे हैं कि हाथ धोने के लिए पानी कहां से लाएं।
टेलीकॉम कंपनियों की कोरोना कॉलर ट्यून लोगों में जागरूकता लाने के लिए खांसकर बता रही है। लेकिन सोशल मीडिया पर लोग मजाक बना रहे हैं कि कोरोना वायरस से लोग मरे या ना मरे,पर खांसने वाला कॉलर ट्यून जरूर लोगों को मार डालेगा।
सोशल मीडिया पर कोरोना वायरस को लेकर एक से बढ़कर एक चुटकुले वायरल हो रहे हैं। कल जैसे ही मैंने अपनी फेसबुक खोली तो पहला कोरोना चुटकुला कुछ इस तरह से था,गुस्सा तो तब आता है। जब कोरोना की पूरी कॉलर ट्यून सुनने के बाद भी अगला फोन नहीं उठाता है। यहां से आगे बढ़ा दो एक छोड़कर दूसरी पोस्ट पर इससे भी मजेदार थी,स्कूल-कॉलेज व कोचिंग सेंटरो में तो कोरोना आ जाएगा और ऑफिस वाले क्या डेटोल से धुले हुए हैं,जिनमें नहीं आएगा। इतने में ही व्हाट्सएप पर एक मित्र ने यह वाला भेज दिया,कोरोना वायरस इसलिए नाराज है कि चेचक माता की उपाधि से अलंकृत हैं,तो मुझे फूफा की उपाधि से अलंकृत क्यों नहींव्हाट्सएप से बाहर निकला ही था कि इंस्टाग्राम पर एक निराला ही मिला। देशवासी तब तक कोरोना को सीरियसली नहीं लेंगेजब तक जागरूकता के लिए तारक मेहता का एक पूरा एपिसोड नहीं आ आता। सोशल मीडिया पर कोरोना वायरस का मजाक भी खूब उड़ाया जा रहा है। फिर भी इतना बेशर्म है कि देश से बाहर नहीं निकल रहा है। चुटकुलों से भी बाज नहीं आ रहा है।मोहनलाल मौर्य

मोबाइल पर खांसने का संक्रमण


इन दिनों मैं जब भी किसी के पास फोन लगाता हूं, मेरे मोबाइल में बुजुर्ग व्यक्ति की तरह पहले तो कोई खांसता है, उसके बाद में एक युवती कोरोना वायरस के बचाव के उपाय बताती है। आजकल तो नॉर्मल खांसी भी कोरोना वाली लगती है। इसलिए मोबाइल के खांसने पर एक बार तो डर सा लगता है। कहीं मुझे भी कोरोना अपनी गिरफ्त में न ले ले। मोबाइल के खांसते ही युवती के बताए निर्देशानुसार उसे एक मीटर दूर कर देता हूं और जेब से रूमाल निकालकर अपने मुंह पर लगा लेता हूं। जब तक अगला फोन उठा नहीं लेता, तब तक मोबाइल को कान नहीं लगाता हूं। रूमाल तो फोन कटने के बाद ही मुंह से हटाता हूं। वैसे तो फोन के भीतर वाली युवती की बताई एक-एक बात गांठ बांधने वाली है। जिसने नहीं बांधा, उसकी जिम्मेदारी खुद की है।
जब सामने वाला फोन उठाते ही खांसने लगता है, तब और ज्यादा डर लगता है। कहीं कोरोना मोबाइल में घुसकर न आ जाए। अब तो किसी के पास फोन भी लगाता हूं, तो डरते-डरते लगाता हूं। फोन उठाते हेलो की जगह भैया खांसी आए, तब भी खांसना मत बोले बगैर नहीं रहता। यह सुनकर कई तो इतने नाराज हो गए हैं कि उनकी नाराजगी दूरभाष पर दूर नहीं होगी। उनके पास ही जाना पड़ेगा, मगर इन दिनों पास जाना खतरे से कम नहीं है।
कल ही एक जिगरी दोस्त के पास गया, तो वह मुंह फुलाए बैठा था। कारण पूछा, तो बगैर मुंह पर रूमाल रखे जोर-जोर से खांसने लगा। उसके खांसते ही कारण जाने बगैर, जरूरी काम का हवाला देकर वहां से चला आया। उसने तुरंत मुझे फोन लगाया, लेकिन मैं जान-बूझकर नहीं उठाया, क्योंकि वह फोन पर भी खांसे बगैर नहीं रहता। आजकल मुझे जितना डर खांसी से लगता है, उतना फांसी से भी नहीं लगता।
एक वह दौर भी था। खांसकर घर में प्रवेश करने पर घर की बहुएं बिना बताए समझ जाती थीं कि कोई घूंघट वाला ही आया है। आजकल खांसने से लोग भाग निकलते हैं। मोहनलाल मौर्य

18 Mar 2020

हाथों हा‍थ कमल का कमाल


देश के मध्य में प्रदेश के एक युवा नेता के बरसों से हाथ में हाथ था और अब उनके हाथ में कमल है। उनको हाथ वाला कमल साथ लेकर नहीं चला,तो वो अपनी दादी और बुआये के वाले कमल की गोद में जाकर बैठ गए। गोद में बैठते ही उनको राज्यसभा का टिकट दे दिया।
क्या यही कारण थाहोली के मौके पर भगवा रंग में रंग जाने का या फिर नेपथ्य में और ही कुछ है। खैर,यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा। उन पर भगवा रंग परवान चढ़ता है या नहीं। लेकिन जिनका रंग बदरंग करके गए हैं। वो बंद कमरे में बैठकर मंत्रणा कर रहे होंगे। महाराज के खेमे वाले भी उनके साथ चले गए तो क्या होगा। कैसे भी करके खेमे वालों को लाना होगा। अन्यथा खेमे वाले सरकार गिरा देंगे। सरकार गिर गई तो जल्दी सी उठेगी नहीं। उठ भी गई तो यह जरूरी नहीं है कि हमारी ही हो जाएगी। गिराने वालों की गोद में जाकर बैठ जाए। बस इसे तो बहुमत का सहारा चाहिए। फिर चाहे गठबंधन के द्वारा सहारा दिया जाए या फिर अकेले दिया जाए।
वैसे तो उन्होंने सरकार को गिरने से बचाने के लिए  अपने विधायकों को होली भी नहीं खेलने दिया। जिस स्थिति में थे उसी स्थिति में विशेष विमान में बिठाकर रिसोर्ट में पहुंचा दिया है। रिसोर्ट में ठहरे विधायक कड़ी निगरानी में है। निगरानी में इसलिए है कि एक भी विधायक इधर-उधर नहीं हो जाए। इधर से उधर हो गया तो उधर से फिर इधर लाना मुश्किल हो जाता है। मुश्किल होने के बाद फ्लोर टेस्ट का मैच खेलना भारी हो जाता है। जीते हुए भी हारे के बराबर हो जाते हैं। 
रिसोर्ट से कई विधायक इधर से उधर जाने में रहते हैं। मौका मिलते ही चले भी जाते हैं। सियासत में मौका कोई नहीं छोड़ना चाहता है। सब के सब मौके पर चौका मारने में रहते हैं। लेकिन चौका उसी का लगता है,जो राजनीति का मंझा हुआ खिलाड़ी होता है। दल बदलने में देरी नहीं करता है। ऑफर मिलते ही हाथ मिला लेता है। गिरगिट की तरह रंग बदलने में अग्रणी रहता है।
अब विधायक गायब होने लगे हैं। गायब वाले नायाब होते हैं। ऐन मौके पर आते हैं और आते ही  मलाईदार विभाग हथिया लेते हैं। मुझे तो लगता है कि यह मलाई खाने के लिए ही गायब होते होंगे हैं। यह गायब होते हैं तो इनके परिजन बिल्कुल भी चिंतित नहीं होते हैं और नहीं पुलिस को इत्तला करते हैं। माननीय जी गायब हो गए या किसी ने अपहरण कर लिया है। क्योंकि उन्हें भी पता है कि गायब हुए हैं तो,प्रमोशन होकर ही आएंगे। प्रमोशन नहीं भी होकर आए तो सूटकेस भरकर लेकर आएंगे।
ऐसे अवसर पर हॉर्स ट्रेंडिंग भी होती है। बिकने वाली बिक जाते हैं और नहीं बिकने वाले रह जाते हैं। कहते हैं कि बिकता हर कोई है,बस उसकी कीमत लगाने वाला चाहिए। सबकी अपनी अलग-अलग कीमत होती हैं। कई तो हिनाहिना कर अपनी कीमत बता देते हैं और कईयों की कीमत खरीदार को ही आकलन करनी होती है। सियासत के खरीददार सबसे पहले उन घोड़ों को खरीदते हैं,जो पंचवर्षीय रेस में बीच में रह नहीं जाए। मोहनलाल मौर्य

9 Mar 2020

अब न होली की लपटें न ढफ की थाप पर नागिन डांस


पहले जैसी होली का उत्सव अब कहां बचा है। होली डांडा रोपण के दिन से ही फाग का राग शुरू हो जाता था और होली दहन तक चलता था। पूरी रात नाचते गाते थे। डफ की थाप पर नागिन डांस करते थे। महिलाएं होली के गीत गाया करती थी। अब न तो होली का डांडा गड़ता है न कोई फाग का राग गाता है और न कोई नृत्य करता है। बस होली के दिन डीजे बजा लेते हैं और नाच लेते हैं। डीजे पर भी सिर्फ छोरे-छापरे थिरक लेते हैं।  
पहले मोहल्ले के सारे टाबर दिन ढलते ही एक जगह इकट्ठे हो जाते थे और स्वाँग निकालने का कार्यक्रम बनाते थे। रोज घर-घर जाकर स्वाँग दिखाते थे। बड़े-बुजुर्ग एक-दो रुपया देकर आशीर्वाद देते थे। उन रुपयों की मिठाइयां खाते थे। आज के टाबर स्वाँग जानते ही नहीं। यह तो रंग-गुलाल लगाने का अभिप्राय भी नहीं जानते हैं। बस एक-दूसरे की देखा देखी को देखकर लगा देते हैं। अपने स्मार्टफोन से सेल्फी ले लेते हैं और सोशल मीडिया पर टांक देते हैं।
लोग रात्रि को लुकाछिपी का खेल खेलते थे और लोगों की बाड़ उठा लाते थे होलिका टिब्बा लाकर पटक देते थे। लेकिन बाड़ का मालिक चू नहीं करता था। अब यह सब बीते दिनों की बात  हो गई। तभी आज होली की लपटें ज्यादा ऊपर नहीं उठती हैं। जबकि पहले एक गांव कि होली की लपटें दूसरे गांव में दिख जाती थी। क्योंकि भर भोलिए और लकड़ियों का ढेर लग जाता था। अब ढेर तो लगता नहीं हैं और लपटें उठती नहीं है। पहले पूरे गांव की एक ही जगह होली होती थी और अब ढाणी-ढाणी में होली मंगलने लगी है।
होली दहन के बाद बच्चे बड़े बुजुर्ग सब घर-घर जाकर एक-दूसरे के गले मिलते थे। शिकवे-गिले दूर भगाते थे। अपनों से बड़ों के चरण स्पर्श करके आशीर्वाद लेते थे। अब तो पड़ोसी के नहीं जाते हैं। बस व्हाट्सएप पर ही आशीर्वाद आदान-प्रदान कर लेते हैं। धुलेंडी के दिन रंग ही नहीं लगाते थे। बल्कि कीचड़ तक उड़ेल देते थे। देवर-भाभी और जीजा-साली तो एक-दूसरे के मुंह में रंग ठुस देते थे और चेहरे पर कालिख पोत देते थे। आज कालिख पोत दे तो कलह हो जाए। मोहनलाल मौर्य                                                   


1 Mar 2020

एक लेखक की दिनचर्या


आपने अपने पसंदीदा अभिनेता या नेता की दिनचर्या के बारे में तो खूब पढ़ा होगा। लेकिन,क्या आपने कभी किसी लेखक की दिनचर्या के संदर्भ में पढ़ा हैअगर नहीं पढ़ा है तो पढ़िए अधुनातन युग के एक लेखक की दिलचस्प दिनचर्या। जिसका नाम छोटे लाल 'छोटू' है। छोटू उसका तख़ल्लुस है। साहित्य में तख़ल्लुस बहुत मायने रखता है। तख़ल्लुस से वह तकलीफ दूर हो जाती है,जो कि साहित्यिक पथ पर चलने के दौरान आती है।
छोटू के मोबाइल में जैसे ही सुबह पाँच बजे की अलार्म बजती है। उसका हाथ उसी तरह से सिरहाने रखें मोबाइल पर पहुँच जाता है। जिस तरह से खुजली चलने पर पहुँच जाता है। क्या है कि वह अपने सुख-दुख के संगी साथी मोबाइल को हमेशा सिरहाने रखकर ही सोता है। पता नहीं कब किसकी घंटी बज जाए। रिसीव करने से पहले ही घंटी मिसकॉल की नहीं हो जाए। यह उसे कतई पसंद नहीं है। इसी तरह से अलार्म के समय पड़ोसी का मुर्गा बांग नहीं मार दे। इंटरनेट के युग में मुर्गे की बांग सुनकर जगना वह अपनी तौहीन समझता है।इसलिए नींद में ही अलार्म बंद करके मोबाइल को रजाई में ले लेता है। फिर रजाई के अंदर ही आँखें मसलते हुए सबसे पहले उन अखबारों का ईपेपर देखता है। जिन्हें अपनी रचना भेज रखी है। जब किसी भी अखबार में अपनी रचना के दर्शन नहीं होते हैं तो अन्य लेखकों की रचना के दर्शन करके उन्हें सेव कर लेता है। 
खुद बाद में पढ़ता हैं। पहले लेखक को हार्दिक बधाई के साथ व्हाट्सएप करता है। क्योंकि छोटू लेखकों के कई व्हाट्सएप ग्रुपों से जुड़ा है। वहीं से नंबर सर्च करके प्रेषित कर देता है। प्रेषित करने से भी प्रसिद्धि प्राप्त होती है। ऐसा उसे लगता है। जो अपरिचित है,उसे बगैर पूछे ही अपना लेखकीय परिचय भेजकर परिचित कर लेता है। परिचित होने के बाद आए दिन परिचर्चा करता रहता है। परिचर्चा से चर्चित होता है। ऐसा उसका मानना है। उस लेखक की फेसबुक वॉल पर अपना नाम सूचनार्थ के रूप में देखकर फूले नहीं समाता है। फुले नहीं समाने का कोई रहस्य पूछता है तो उसे भानगढ़ के भूतहा किला की कहानी सुनाने लग जाता है। जिसे सुनने पर रूह कांपने लगती है।
बिस्तर बाद में छोड़ता है पहले सेव की हुई रचनाओं का आनंद लेता है। आनंद के बाद नित्यकर्म के लिए जाता है। नित्यकर्म के दौरान आज किस विषय पर लिखना है के संदर्भ में सोचता है। वहाँ पर विषय मिल गया तो खिलखिलाता हुआ बाहर निकलता है। नहीं मिला तो मुरझाया हुआ नहीं। गेट को जोर से बंद करके निकलता है। इसके बाद टूथब्रश एवं स्नान के समय खोजता है। इस समय मिल गया तो फिर चाय सुड़कते-सुड़कते ही प्रस्तावना तो लिख डालता है। उसके बाद पूरी दोपहरी विस्तार में लगा रहता है। संध्याकालीन तक भी लेख पूरा नहीं होता है तो कार्य मध्यरात्रि तक प्रगति पर रहता है। जब तक कार्य प्रगति पर रहता है। घर-बाहर के किसी भी कार्य में हाथ नहीं बट आता है। चाहे घरवालों से खरी खोटी ही क्यूँ नहीं सुननी पड़े। लेकिन पहले अपने लेखन कार्य को ही प्राथमिकता देता है।
वैसे तो वह जब चाहे तभी पूर्ण कर सकता है। लेकिन क्या है कि बीच-बीच में फेसबुक तथा व्हाट्सएप की शरण में भी जाना होता है। इसलिए पूरा होने में मध्यरात्रि तक लग जाती है। क्योंकि फेसबुक और व्हाट्सएप इतने रमणीय स्थल हैं कि एक बार वहाँ पर जाने के बाद  जल्दी सी वापस आने का मन ही नहीं करता है। जिस दिन लिखने लायक विषय नहीं मिलता है। उस दिन दिनभर फेसबुक से व्हाट्सएप पर व्हाट्सएप से इंस्टाग्राम पर इंस्टाग्राम से ट्विटर पर यह देखता रहता है कि देश-दुनिया में क्या घटित हो रहा हैकौन सुर्खियां बटोर रहा हैसाथी लेखक का हाथी पर लिखा व्यंग्य देश के प्रमुख अखबार में कैसे छप गयाउस दिन इसी खोज खबर के चक्कर में घर पर आने वाला अखबार भी नहीं पढ़ता है। बेचारा अखबार दिनभर दालान में ही पड़ा-पड़ा फड़फड़ाता रहता था। कई बार तो उसके अपने पन्ने भी जुदा होकर गुमशुदा हो जाते हैं।
जिस दिन खुद की रचना प्रकाशित हो जाती है। उस दिन नित्यकर्म बाद में करता है। पहले प्रकाशित के प्रकाश को अपनी फेसबुक वॉल पर पहुँचाता है। उसके बाद में व्हाट्सएप वाया इंस्टाग्राम होते हुए ट्विटर पर ले जाता है। उस दिन लिखता-विकता नहीं है। बस दिनभर लाइक और कमेंट पर आँखें गड़ाए रखता है। कमेंट आते ही तुरंत रिप्लाई देता है। उस दिन उसके आभार का द्वार खुला ही रहता है। पोस्ट पर आने वाले कमेंटार्थियों को थैंक यू,धन्यवाद व शुक्रिया के दर्शन करवाए बगैर जाने नहीं देता है। जबकि बाकी दिन आभार के द्वार खोलता ही नहीं है। उस रोज अपनी प्रकाशित रचना के सिवाय किसी अन्य लेखक की रचना नहीं पढ़ता है और नहीं ही किसी को लाइक व कमेंट की घास डालता हैं। बस खुद की प्रकाशित रचना का ही राग अलपाता रहता है। बस यही उसकी दिलचस्प दिनचर्या है।

27 Feb 2020

आरोप-प्रत्यारोप


मेरे अड़ोस में अतिभाषी और पड़ोस में कटुभाषी रहता है। दोनों के आचार-विचार कभी मेल नहीं खाते हैं। अकेले में ही नहीं,मेले में भी मेल नहीं खाते हैं। एक रोज भूल से खा गए। लेकिन खाने के थोड़ी देर बाद ही दोनों को कजबहस की उल्टी होने लगी। उल्टी भी इतनी बार हुई,जिसकी कोई गिनती नहीं। दोनों की उल्टी से कुभाषाई दुर्गंध इतनी आ रही थी कि उनके समीप जाने का मन नहीं कर रहा था। दूर से ही समझाइश के पानी का ग्लास लिए खड़ा था। मगर वो ग्लास को पकड़ नहीं रहे थे।
मैं दुविधा में पड़ गया। दुविधा में सुविधा भी नहीं सूझती है। क्या किया जाएअंततोगत्वा मुझे उनके समीप जाना ही पड़ा। नहीं जाता तो दोनों हाथापाई की दवाई खाकर मर जाते। मर जाते तो मुझे गवाही देनी पड़ती। मैं किसकी गवाही देता। अतिभाषी की देता,तो कटुभाषी के परिजन कड़वे वचन सुनाते और कटुभाषी की देता,तो अतिभाषी के परिजन खरी-खोटी सुनाते। जिन्हें सुनकर मेरे परिजन कुपित हो जाते हैं।  कुपित होने के बाद कुछ भी घटित हो सकता है। घटित होने के बाद अफसोस के सिवाय कुछ कर नहीं सकते। कुछ करें,तो करनी की भरनी भुगतनी पड़ती है। जिसके लिए मैं कभी अग्रणी नहीं रहता।
जाते ही दोनों को संभालने लगा,पर संभलने में आए नहीं। संभलने में नहीं आए तो मैंने अपने मित्र मितभाषी को बुलाया। जिसने कटुभाषी को और मैंने अतिभाषी को संभाला। जब दोनों कि कजबहस की उल्टियां बंद हुई। तब मैंने दोनों से पूछा,‘क्या खाए थे,जो कि कजबहस की उल्टी हो गई।’ दोनों एक साथ बोले,‘आचार-विचार खाए थे।’ मैं बोला,‘आचार-विचार खाने से भी भला कभी किसी के उल्टी हुई है।’
यह सुनकर अतिभाषी बोला,‘इस कटुभाषी का आचार दूषित था।’ कटुभाषी बोला,‘ मेरा आचार नहीं,इस अतिभाषी का विचार दूषित था।’ 
दोनों एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाने लगे। मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि आचार दूषित था या विचार। आचार-विचार में से थोड़ा बहुत बचा-खुचा भी नहीं था। जिन्हें सूँघ कर पता लगा लेते कि आचार दूषित है या विचार। 
मैंने अतिभाषी से पूछा,‘तेरा विचार कब का था।’
वह तपाक से बोला,‘ मेरा विचार तो एकदम ताजा था। इसका ही कई दिनों का आचार था।’
‘मेरे आचार को कई दिनों का बताने वाले सच-सच क्यों नहीं बताता है। मेरा विचार कई दिनों का था। तेरे विचार का एक ग्रास खाते मुझे आभास हो गया था कि दूषित है। पर मैं मन मसोसकर इसलिए खाने लग गया था कि किसी के खाने में मीनमेख निकालना शोभा नहीं देता है। अगला बुरा मान जाता है।’
यह कटुभाषी ने कहा,तो अतिभाषी से बगैर बोले रहा नहीं गया और बोला,‘सच तो यह है कि तेरे आचार में न सभ्यता का नमक था,न संस्कृति की मिर्च-हल्दी और न संस्कार का तेल था। न जाने कब से तूने अपने दिमाग़ी डिब्बे में बंद कर रखा था। मैं तो डिब्बे का ढक्कन खोलते ही समझ गया था यह तो बहुत पुराना है। पर मैं तो इसलिए खा लिया था कि तू मेरा विचार बड़े चाव से खा रहा था।’
कटुभाषी बोला,‘मैं और तेरा विचार...। और वह भी बड़े चाव से। कदाचित नहीं। अभी बताया नहीं मन मसोसकर खाया था। तेरे विचार में सुविचार का मसाला तो रत्ती भर भी नहीं था।’ 
दोनों के आरोप-प्रत्यारोप से मुझे प्रतीत हो गया था कि दोनों के ही आचार और विचार दूषित थे। जिन्हें खाने से दोनों को कजबहस की उल्टी हुई थी। मैंने दोनों को समझाया और कहा,‘एक-दूसरे का खाना खाने से पहले अच्छी तरह से देख लेना चाहिए। खाना शुद्ध है या नहीं।’
                                                                मोहनलाल मौर्य

21 Feb 2020

व्यंग्य जगत का चमकता सितारा मोहन लाल मौर्य


मनुष्य अपने भावों को शब्दों के जरिए प्रस्तुत करता है। शब्द को हिंदी काव्यशास्त्र में शक्ति मानकर तीन भागों में विभाजित व स्वीकृत किया गया है। इन तीन में व्यंजना शब्द शक्ति भी शामिल है। व्यंजना में किसी शब्द के अभिप्रेत अर्थ का बोध न तो मुख्यार्थ से होता है और न ही लक्ष्यार्थ से, अपितु कथन के संदर्भ के अनुसार अलग-अलग अर्थ से या व्यंग्यार्थ से प्रकट होता है। व्यंजना को हम सामान्य तौर पर व्यंग्य के रूप में जानते-पहचानते हैं। व्यंजक शब्दों के माध्यम से व्यंग्यकार विसंगतियों, मिथ्याचारों और पाखंडों का पर्दाफाश करता है। व्यंग्य का वास्तविक उद्देश्य समाज की बुराइयों और कमजोरियों की हंसी उड़ाकर पेश करना होता है। प्रसिद्ध व्यंग्यकार और आलोचक सुभाष चंदर के शब्दों में - व्यंग्य वह गंभीर रचना है जिसमें व्यंग्यकार विसंगति की तह में जाकर उस पर वक्रोक्ति, वाग्वैदग्ध आदि भाषिक शक्तियों के माध्यम से तीखा प्रहार करता है उसका लक्ष्य पाठक को गुदगुदाना न होकर उससे करुणा, खीज अथवा आक्रोश की पावती लेना होता है। अतः व्यंग्य लेखन तलवार की धार पर चलने जैसा है। इसके लिए साहस, समझ और हौसला चाहिए होता है।

व्यंग्य विधा के एक ऐसे ही हस्ताक्षर हैं मोहन लाल मौर्य। राजस्थान के अलवर जिले के चतरपुरा गांव में रहने वाले मोहन लाल मौर्य एक दशक से अपने सामाजिक व राजनीतिक विषयों पर रचे व्यंग्यों के माध्यम से समाज में जागरूकता ला रहे हैं। साथ ही ग्रामीण समस्याओं के प्रति भी गंभीर होकर अपने दायित्वों का निर्वहन कर रहे हैं। अपनी लेखन यात्रा के बारे में बात करते हुए मौर्य कहते हैं - मेरे लेखन की शुरुआत तब से हुई जब मैं ग्यारहवीं में पढ़ता था। तब मैंने अपने समाज के एक पाक्षिक अखबार में 'राजनीति का भंवरा' शीर्षक से कविता भेजी थी। लेकिन वह तो छपी नहीं और किसी और की कविता मेरे नाम से प्रकाशित हो गई। मुझे बधाई भी प्राप्त हुई। वह कविता भी छपी। लेकिन काफी दिनों के बाद में। इसके बाद लंबे अंतराल तक कुछ भी नहीं लिखा। अक्टूबर 2011 से मैंने समाज के ही पाक्षिक अखबार रघुवंशी रक्षक पत्रिका के लिए सामाजिक खबरें, सामाजिक उत्थान एवं सामाजिक कुरीतियों पर आलेख लिखने लगा। इन्हें दिनों से यदा-कदा स्थानीय समाचार पत्रों के पाठक पीठ में भी छपने लगा। 10 फरवरी, 2015 को एक समाचार पत्र में मेरी पहली व्यंग्य रचना 'सम्मान समारोह में शिरकत' प्रकाशित हुई और इसके बाद में साल भर के लिए अंतराल का ताला लग गया। मैं अनवरत व्यंग्य लिखता रहा। न छपने पर कभी भी हताश नहीं हुआ। इस दौरान फेसबुक के जरिए मेरी मित्रता निर्मल गुप्त सर से हुई और उन्होंने मेरा मार्गदर्शन किया। जिनकों मैं अपना व्यंग्य गुरु मानता हूं।

14 Feb 2020

जहां धन,वहीं प्रेम


आज वैलेंटाइन डे है। प्रेमियों की जेब ढीली करने का उत्सव हैं। अपनी महबूबा पर जी भर के खर्च करेंगे। जितना खर्चा करेंगे,उतना ही प्यार पाएंगे। क्योंकि आजकल प्यार मन से कम,मनी से ज्यादा होने लगा है। जिसके पास मनी है,वह रेस्तरां एवं होटल में सेलिब्रेट करेगा और जिसके पास मनी नहीं है,वह किसी गार्डन में झाड़ी के पीछे बैठकर प्यार भरी बातें करने की कोशिश करेगा। क्योंकि बीच-बीच में प्रेम विरोधियों को भी देखना पड़ता है। भय रहता कहीं कोई विरोधी आकर दबोच नहीं ले। दबोच लिया तो हाथ साफ करके ही जाएंगा।
पता नहीं इनके हाथों में क्यूँ खुजली चलती है,जो कि वैलेंटाइन डे पर ही मिटती है। मुझे तो लगता है कि यह नित्यकर्म के बाद साबुन से हाथ नहीं धोते होंगे। इसलिए इनके हाथों में खुजली चलती है और यह वैलेंटाइन डे पर अपनी खुजली मिटाने के लिए गार्डन दर गार्डन घूमते फिरते रहते हैं। कोई प्रेमी जोड़ा गिरफ्त में आ गया तो सालभर का कोटा एक ही दिन में पूरा करने की कोशिश में रहते हैं। लेकिन इनको सौगात में जो भाँति-भाँति बददुआएं मिलती हैं। उन्हें पाकर जहन्नुम जाने जैसा महसूस करते होंगे।
अच्छा यह प्रेम विरोधी सिर्फ और सिर्फ वैलेंटाइन डे पर्व पर ही विरोध करते हैं। बाकी दिन चाहे इनके सामने खुलेआम प्यार का इजहार कीजिए। बिल्कुल भी रोक-टोक नहीं करेंगे,बल्कि समर्थन करेंगे। कहेंगे कि लगे रहिए,एक दिन कामयाबी अवश्य मिलेगी। इनमें भी एकाध ही होते हैं जो नेतृत्वकर्ता होते हैं। बाकी तो वैलेंटाइन पर भी दिल से विरोध नहीं करते हैं। जबान से करते हैं। जबान पर दबाव रहता है। अपने दल को सुर्खियों में लाने के लिए विरोध का नाटक रचना पड़ता है। नाटक नहीं रचे तो सुबह अखबार में बांचने के लिए अपना नाम नहीं मिलता है। व्यक्ति नाम के लिए क्या नहीं करता है। विरोध ही नहीं,बल्कि अनुरोध भी करता है। पर ऐसे लोग समय के अनुकूल चलते हैं। जिधर नाम होने लगता है,उधर ही हो लेते हैं। इसलिए ऐसी प्रवृत्ति के लोग इधर-उधर ताक-झांक करते रहते हैं।
ऐसा कदाचित भी नहीं है कि वैलेंटाइन के विरोधी प्यार नहीं करते हैं। यह लोग प्यार तो बहुत करते हैं, मगर दिखावा नहीं करते हैं। बस इनके नयन दूसरों के नैन-मटक्का देख नहीं सकते। जबकि खुद पलके भी नहीं झपकाते हैं। एक बार देखने लग गए तो टकटकी लगाए रहते हैं।
प्रेम के पंछियों को माता-पिता,यार-दोस्त व रिश्तेदार उड़ान के लिए प्रोत्साहित करें या नहीं करें,पर रेस्तरां तथा होटल वाले अवश्य करते होंगे। चूंकि वो अपना कारोबार चलाने के लिए शुभाशीष देने में कभी पीछे नहीं रहते हैं। क्योंकि इनके द्वारा एक बार दिया शुभाशीष न जाने कितनी बार फिर से वापस बुलाता है। जब प्रेमी कस्टमर बार-बार आता है तो कारोबार में बढ़ोतरी होती है। बढ़ोतरी होती है तो बढ़ावा देने में इनके होटल से क्या जा रहा है। थोड़ी-सी चीनी और सूप। जिनके बदले में प्रेम और धन आ रहा है। अधुनातन में जहाँ धन है,वहाँ प्रेम है। जहाँ पर धन और प्रेम हैं,वहाँ पर रतन तो दौड़कर चला आता है। रतन आने के बाद होटल में जाना स्वाभाविक है।


वैलेंटाइन डे और सरप्राइज गिफ्ट



प्रेमियों के आदर्श संत वैलेंटाइन को शत-शत नमन,जिन्होंने प्यार का जश्न मनाने के लिए वर्ष का एक दिन प्रेमियों के नाम किया। साथ ही रेस्तरां और होटलों को एक दिन अतिरिक्त रोजगार दिया। गिफ्ट्स और  पुष्प विक्रेताओं की आमदनी में एक सप्ताह के लिए बढ़ोतरी की। इनके लिए यही तो एक ऐसा सप्ताह है,जिसमें उनके लूट-खसोट करने पर कोई प्रतिबंध नहीं। माथापच्ची नहीं। जो प्राइस बता दी,वही मिल जाती है। क्योंकि सरप्राइज़ गिफ्ट की प्राइस कम कराना प्यार पर प्रश्नवाचक लगाना है। प्रश्नवाचक लगने का अभिप्राय ब्रेकअप भी हो सकता है। दमड़ी के चक्कर में ब्रेकअप कोई नहीं चाहता है। इसलिए प्राइस की जो वॉइस कानों में पड़ी,उसे कर्णप्रिय समझकर तुरंत भुगतान इस अनुष्ठान का पहला नियम है।
यह विक्रेता वैलेंटाइन सप्ताह में अपने इष्ट देव की पूजा अर्चना करते हैं या नहीं करते हैं,यह तो इल्‍म नहीं है। लेकिन संत वैलेंटाइन की तो अवश्य करते होंगे। इसी के नाम की अगरबत्ती लगाते होंगे। माला जपते होंगे। ‘ संत वैलेंटाइन महाराज तेरी जय होके उच्चारण से ही उनकी सुबह शुरू होती होगी।
प्यार में कीमत कीमती नहीं होती हैं। प्यार कीमती होता है। प्यार पाने के लिए कीमती से कीमती चीज भी न्योछावर करनी पड़े तो पीछे नहीं हटते हैं,बल्कि उसके लिए यार-दोस्त से पैसे उधार लेकर समर्पित कर देते हैं। जहाँ त्याग है,वहाँ प्यार है। प्यार में सब कुछ जायज है। अपनी जायदाद भी मांगे तो देने में कोई बुराई नहीं है। जब दिल दे ही बैठे हैं तो जमीन जायदाद देने में क्या हर्ज है। बल्कि यह तो प्यार का फर्ज है। जिसको निभाना प्रेमियों का कर्तव्य है। जो अपने कर्तव्यों को भूल जाता है। उससे उसके अधिकार स्वत:ही ब्रेकअप में रूपांतरण हो जाते हैं।
लेकिन आजकल ब्रेकअप होने के बाद दुखों का पहाड़ नहीं टूटता है। बल्कि दूसरे ही दिन किसी और के साथ प्रेम की पहाड़ी की सैर पर निकल पड़ते हैं। हाँ,जो सॉरी का मैसेज करके,कॉल प्राप्त करने के लिए राजी कर ले और कॉल प्राप्त करते ही रोने का नाटक कर ले उसका तो ब्रेकअप बच सकता है। अन्यथा नहीं। क्योंकि प्रेमी जुदाई सह लेते हैं,पर रुलाई नहीं। वैसे भी रुदन किसी को भी अच्छा नहीं लगता है।
वैसे आजकल प्यार करना जितना आसान है। उतना ही उसके खर्चे उठाना मुश्किल है। आँखें चार होते ही चार हजार की शॉपिंग तय हो जाती है। भले ही बंदे के पास भुगतान करने के लिए पॉकेट में मनी नहीं हो और मन मसोसकर गूगल पे या पेटीएम के जरिए भुगतान करना ही पड़े। नहीं किया,तो जो आँखें चार हुई थी, दो ही रह जाती हैं। 
मोबाइल रिचार्ज करवाना पहली प्राथमिकता होती है। अगर पहली प्राथमिकता को तुरंत प्रभाव से पूरा नहीं किया,तो प्रेमिका रूठ जाती है। एक बार रूठी,तो रिचार्ज करवाने के बाद भी नहीं मानेगी। फिर कई दिनों तक मान-मनुहार का दौर चलता है,जो कि भोर से लेकर अर्धरात्रि तक जारी रहता है। यह प्रेम का ऐसा दौर होता है,जिसमें सोना,बाबू,जानू जैसे प्रियतम शब्दों का सर्वाधिक उपयोग होता है।
संत वैलेंटाइन के अनुयायी का प्यार या तो परवान चढ़ता नहीं है या चढ़ता है, तो फिर उतरता नहीं। यह इश्क के सागर में गोते नहीं लगाते हैं,बल्कि उसमें डूबे रहते हैं। कई बार तो सांस लेना भी भूल जाते हैं। जिससे कईयों की तो हृदय गति भी रुक जाती है।

15 Dec 2019

सर्दी


सर्दी धीरे-धीरे ही सही,मगर बढ़ने लगी है। जब ठण्डक बढ़ती है तब मूंगफली,पकौड़ी एवं अंडेवालों की बन आती है। मगर जेबकतरों की कमाई घटने लगती है क्योंकि लोग जेब में से हाथ बाहर निकालते ही नहीं।  जेबों के अंदर ही डालें रहते हैं। पर चोरों की पौ बारह हो जाती है। जनता रजाई में दुबकी रहती है,चोर आराम से चौर्यकर्म कर निकल जाते हैं। भोर को भी शोर नहीं करते हैं कि घर में चोर घुस गए हैं। हमारे चोरी हो गई है। शोर तब मचाते हैं। जब गुनगुनी धूप निकल आती है। तब तक चोर बहुत दूर जा चुके होते हैं।

पुलिस इत्तला होने के बाद भी देरी से क्यों आती है। क्योंकि पुलिस की जीप ठंड के कारण जल्दी सी स्टार्ट ही नहीं हो पाती इसलिए देर हो जाती है। वर्दी को भी सर्दी तो लगती है। वर्दी के अंदर है तो एक इंसान ही।उसके भी जाड़ा तो चढ़ता ही है। जब जाड़ा चढ़ता है न तब गाड़ी तेज नहीं धीमी ही चलती है। सर्दी में गश्त करना मटरगश्ती तो है नहीं। डंडा लेकर घूम फिरकर आ गए। यह भी नहीं है कि वर्दी को देखकर सर्दी भाग जाती हैं। सर्दी वर्दी तो क्या? किसी से नहीं डरती है। बल्कि इससे ही जनता भयभीत रहती हैं। इसीलिए तो सर से पांव तक गरम परिधान पहने रहते हैं। कइयों को तो सर्दी से इतना डर लगता है कि रात को सोते समय भी जुराब पहनकर सोते हैं। पूरी रात जुराब की महक लेते रहते हैं। महक से इतने मदहोश हो जाते हैं कि जब दिन सर पर आ जाता है तब बिस्तर छोड़ते हैं।
सर्दी ही है,जो रोज बदन पर सरसों के तेल की मालिश करवाती हैं। जो मालिश करने का आलस्य करता है। उसके खुजली चला देती है। फिर वह झक मारकर करता है। सर्दी के दिनों में ही व्यक्ति दबाकर खाता है। इसका आगमन होते ही देसी घी की मांग बढ़ जाती हैं और भाव आसमान पर पहुंच जाता हैं।
सर्दी में कुत्ते भी नहीं भोंकते हैं। वो भी अंग्रेजी वाला आठ बने रहते हैं। इनके समीप होकर भी कोई गुजर जाए,तो भी वे आठ से सतर्क एक में तब्दील नहीं होते। कौन जा रहा है,यह देखकर भी क्या करनाभौंकना तो है नहीं। फिर क्यों किसी को रोके। इनकी भी मजबूरी है। भौंकने को तो खूब भौंक ले,पर भौंकने के लिए मुंह तो खुले। मुंह ठण्ड के मारे खोलने से भी नहीं खुलता।
सर्दी में जितना परिवार एक जगह बैठे दिखता है उतना अन्य किसी ऋतु में नहीं दिखाई देता है। चूल्हे के चारों ओर घेरा बनाकर घर के छोटे-बड़े सब हाथ तापते रहते हैं और तवे पर रोटी सिकती रहती हैं। रोटी बदलते समय किसी के हाथ के चिमटा लग जाता है तो नाराज नहीं होता है। बल्कि हाथ मसलकर मुस्कुरा देता है। यह सर्दी का ही कमाल है,जो कि गर्म चिमटा लगने के बावजूद भी कहासुनी नहीं होती। अन्यथा गर्म चिमटा छू जाए तो लोग घर को सिर पर उठा लेते हैं। 
सर्दी में पानी की बचत भी बहुत होती है। मुझ जैसा तो सप्ताह में एकाध बार ही स्नान करता है। जब ड्राइक्लीनिंग से ही काम चल जाता है तो क्यों कोई पानी बर्बाद करें। पानी बर्बाद करने के लिए थोड़ी है। गर्मियों के लिए सहेजकर रखने के लिए है।

29 Nov 2019

जिसका बहुमत,उसकी सत्ता सुंदरी


एक माह से चल रहा महाराष्ट्र का महानाटक इस तरह से संपन्न होगा। यह किसी ने स्वप्न में भी नहीं सोचा होगा।समापन का पार्ट संपन्न होने वाला ही था कि एकाएक मुख्य पात्र बदल गए। किरदार निभा रहे पात्र भी आश्चर्यचकित हैं। पात्र बदल कैसे गए। वो भी एक ही रात में। जो सुबह सुहावनी होनी थी। वह सुनामी में बदल गई। बगैर ढोल नगाड़े बजे ही शपथ ग्रहण समारोह हो गया। मुख्यमंत्री की भूमिका निभानी किसी और को थी और निभा ली किसी और ने। जिसने निभानी थी वह तो चादर तानकर सो गया और जिसने अलसुबह ही शपथ लेकर निभा ली,वह पूरी रात जागकर यह बता दिया कि जो सोवत है। वह खोवत है।

जिसने उपमुख्यमंत्री की भूमिका निभाई,उसने तो कमाल ही कर दिया। सगे चाचा को ही गच्चा देकर यह बता दिया है कि अब मैं कोई दूध पीता बच्चा तो हूं नहीं। जो कि सियासत का खेल खेलना नहीं जानता हूं। मुझे सियासी खेल खेलना अच्छी तरह से आता है। समय और मौके का फायदा उठाना गद्दारी नहीं। राजगद्दी पर बैठने की समझदारी है। मैंने मौके पर जो चौका मारा है,उससे चौंकिए मत। सोचिए,मौके पर चौका इसी तरह से मारा जाता है। माना कि आप मंजे हुए खिलाड़ी हैं। पर कब और कैसे पलटी मारनी है। यह मुझसे से सीखिए। भविष्य में काम आएगी। हमेशा राजनीतिक तजुर्बा ही काम नहीं आता है। कई बार अपना सरनेम भी पावर क्या होती है दिखा देता है। अपन दोनों का एक ही  सरनेम होने के बावजूद भी उसका इस्तेमाल नहीं कर रहे थे। इसलिए मैंने इस्तेमाल करके सरनेम को अखबारों की हेडलाइन बना दिया। जो कि हेडलाइन बनने के लिए कब से मचल रहा था। सुर्खियां बटोरने के लिए भी गठबंधन का जोड़-तोड़ करना पड़ता है। बगावत करनी पड़ती है। पाला पलटना पड़ता है। विरोधियों से हाथ मिलाना होता है। तब कहीं जाकर सुर्खियां प्राप्त होती हैं।

लेकिन यहां पर चाचा भी कमतर नहीं है। उसने भी होटल में शक्ति प्रदर्शन करके दिखा दिया कि यह देखिए बहुमत। पूरे एक सौ बासठ हैं। यह देखकर भतीजा भौंचक्का रह गया। उसे इस्तीफा देना ही पड़ा। साथ में जितने शपथ ली थी उसे भी देना पड़ा। अब उसके अच्छी तरह से समझ में आ गई होगी कि चाचा चाचा ही होता है। लेकिन तीन तिगड़ा और काम बिगाड़ा वाली कहावत चरितार्थ होती है या नहीं। यह समय के गर्भ में है।

सियासत में कुर्सी से बढ़कर कोई रिश्ता नहीं है। कुर्सी है तो रिश्ते तो थोक के भाव में मिल जाते हैं। जिन्हें जब तक मन करे निभाओ और जब मन करे तोड़ डालो। कोई बुरा नहीं मानता है। अगर कोई बुरा मान भी जाए तो अवसर पड़ने पर उसे प्रलोभन देकर मना लो। कोई प्रलोभन से भी नहीं माने तो उसके सामने कुर्सी का प्रस्ताव रख दो। फिर देखिए,वह अपनों को छोड़कर गैरों के पास कैसे दौड़ा चला आता। क्योंकि कुर्सी है तो सत्ता सुंदरी है। सत्ता सुंदरी के साथ भला कौन नहीं रहना चाहता है। हर किसी की इच्छा होती है कि सत्ता सुंदरी मेरी हो जाए। लेकिन यह होती उसी की है जिसके पास बहुमत होता है। फिर चाहे वह अकेली पार्टी का हो या गठबंधन द्वारा हो। जोड़ तोड़ कर किया हो या खरीद-फरोख्त के द्वारा हो। पर होना होना चाहिए पूरा बहुमत। आधे अधूरे से तो यह हाथ भी नहीं मिलाती है। इसने सबको अपने संग रहने का बारी-बारी से मौका दिया था। पर बहुमत नहीं होने के कारण मौका नहीं ले पाए।
मोहनलाल मौर्य

21 Nov 2019

बोतल में सांसे


दिल्ली एनसीआर के वातावरण में घुली जहरीली हवा को देखते हुए अब वे दिन ज्यादा दूर नहीं हैं। जब बोतल बंद पानी की तरह शुद्ध हवा भी बोतल में मिलिया करेगी। बस स्टैंड व रेलवे स्टेशन पर बेचने वाले  कुछ इस तरह से बेचते हुए नजर आएंगे। यह लीजिए मात्र दस रुपए में ताजा शुद्धतम एयर बोतल। हर छोटी-बड़ी दुकान पर पानी की बोतल के समीप एयर बोतल सजी संवरी हुई रखी रहेंगी। जिन्हें देखकर निर्धन भी खरीदे बगैर नहीं रहेगा। क्योंकि दमघोट वायु से राहत पाने के लिए उसे भी चौबीस घंटे एयर बोतल पास में रखनी पड़ेगी। साग सब्जी के भाव-ताव की भाँति ग्राहक कहेगा कि भैया सही-सही लगा लो। दो-तीन बोतल ले लेंगे। दुकानदार कहेगा कि भाई साहब इस पर आप सोच रहे है न जितनी बचत नहीं है। बस एक रुपए का मार्जिन है। चाहे तो आप मार्केट में ट्राई करके देख लीजिए। उसके बाद खरीद लीजिएगा।
एक यात्री दूसरे यात्री से कहेगा भाई साहब आपकी एयर बोतल दीजिए दम घुट रहा है। दूसरा कुछ इस तरह से कहेगा कि यह लीजिए,लेकिन पूरा मत लीजिएगा। मेरे लिए भी बचा कर रखिएगा। या फिर कहेगा सफर करने से पहले साथ लेकर क्यों नहीं चलते हो। तुम्हें मालूम नहीं है कि पानी बगैर रह सकते हैं। लेकिन एयर बोतल बगैर कदाचित नहीं रह सकते हैं।
जिस तरह से स्कूल जाने वाले छोटे बच्चे के बैग में परिजन पानी की बोतल रखना कभी नहीं भूलते हैं। उसी तरह से एयर बोतल भी रखना कभी नहीं भूलेंगे। अपने बच्चे को स्कूल छोड़ने से पहले कहेंगे बेटा जब भी दम घुटने लगे तो बोतल में से एयर ले लेना। बोतल का ढक्कन नहीं खुले तो सर से खुलवा लेना। लेकिन एयर लिए बगैर मत रहना। स्कूल वाले भी दाखिले के दौरान अपनी उत्तम व्यवस्थाओं में एयर की व्यवस्था को सबसे पहले बताएंगे। हमारी स्कूल में शुद्धतम एयर कूलर हैं।
जिस तरह से धर्मार्थी सार्वजनिक स्थलों पर वाटर कूलर या प्याऊ लगाते हैं। उसी तरह से एयर कुलर लगाएंगे। इसके लिए लोग भामाशाहों से अनुरोध भी करेंगे। फलानी जगह शुद्ध एयर का अभाव है। एक  एयर कूलर लगा दीजिए। आपका भला होगा। यह सुनकर कोई नाम के लिए तो कोई सेवा भाव से लगाने के लिए आगे आएंगे। स्कूल-कॉलेजों के लिए अभिभावक जनप्रतिनिधियों से निवेदन करेंगे कि हमारे बच्चों का शुद्ध एयर के अभाव में उनका दम घुटता रहता है। सही ढंग से पढ़ाई ही नहीं कर पाते हैं। इस समस्या का शीघ्र समाधान नहीं हुआ तो बच्चे बीमार पड़ जाएंगे। लोग अधिकारियों को ज्ञापन देंगे। ज्ञापन में चेतावनी देंगे। इतने दिन में शुद्धतम एयर की व्यवस्था नहीं करवाए तो हम आंदोलन करेंगे। धरने पर बैठेंगे। 
चुनावी सीजन में शुद्धतम हवा का मुद्दा ही सुर्खियों में रहेगा। नेतागण शुद्धतम हवा की उत्तम व्यवस्था के लिए एक से बढ़कर एक वायदे करेंगे। कोई कहेगा इसकी आप बिल्कुल भी चिंता मत कीजिए,मैं जीत गया तो  एयर टंकी बना दूंगा। वहां से पाइपलाइन दबाकर घर-घर में पानी के नल की तरह एयर नल लगवा दूंगा। कोई कहेगा मैं एयर टैंकर की व्यवस्था करवा दूंगा। रोज आपके द्वार पर एयर टैंकर आ जाया करेगा और आप अपनी आवश्यकता अनुसार एयर ले लीजिएगा। यह मेरा आपसे वादा है। वोट मुझे ही दीजिएगा।
मोहनलाला मौर्य

12 Nov 2019

फिर बाहर निकलेगा नागिन डांस



चार माह की लंबी निद्रा के बाद देव जाग गए हैं। बैंड-बाजा और बारात का सीजन आरंभ हो गया है। अब रोज कर्णप्रिय शहनाई की गूंज,बैंड-बाजे की ध्वनि और कानफोड़ डीजे की आवाज हर गली-मोहल्ले में सुनाई देने लगेंगी। कई दिनों से लोगों के अंदर ही अंदर हिचकोले मार रहा नागिन डांस बाहर निकलेगा। आज मेरे यार की शादी है गाने पर दूल्हे का बाप भी नाचता नजर आएगा। छोटे-छोटे भाइयों के बड़े भैया गाने पर दूल्हे की बहिन-भाभी, देवरानी-जेठानी कमर में लचक होने बावजूद भी जमकर ठुमके लगाएंगी।
विविध पकवानों की महक से महकने वाले मैरिज गार्डनों में वीआईपी भी हाथ में प्लेट लेकर लाइन में लगे हुए दिखेंगे और डायबिटीज वालों के मुंह में भी गुलाब जामुन दिखेगी। घर पर अक्सर जिन पति-पत्नियों में अनबन होती रहती है, वे भी एक-दूसरे की प्लेट से व्यंजन का आदान-प्रदान करते दिखेंगे। पड़ोसन की साड़ी पहनकर आई वह महिला साड़ी पर पनीर गिरते ही लोगों को अपनी ओर किस तरह से आकर्षित करती हैं, उस तरह के दृश्य भी देखने को खूब मिलेंगे। आधा खाना पेट में, आधा प्लेट में छोड़कर चलने वाले भी जूतों की पॉलिश करके तैयार बैठे हैं।
दुल्हन की बहन का एटीट्यूड देखकर उस पर फिदा होने वाले पिटते भी दिखेंगे और दूल्हे के भाई को झूम शराबी झूम गाने पर थिरकते देखकर उसे शराबी समझने वाले खुद पव्वा पीकर औंधे मुंह पड़े दिखेंगे। फीता कटाई और जूता छुपाई की रस्म अदायगी के समय सालियों और दूल्हे के यार-दोस्तों के बीच होने वाली हंसी-ठिठोली में सत्तर साल के बुड्ढे भी शामिल हुए बगैर नहीं रहेंगे और ग्यारह हजार का नेग ग्यारह सौ नहीं हो जाए, तब तक जाएंगे नहीं। पर सुबह विदाई के समय नजर नहीं आएंगे। समधिनों के हाथों में गुलाल देखते ही जिस तरह से एकदम से बिजली गुल हो जाती है, ठीक उसी तरह से गुल हो जाएंगे। लेकिन गाड़ी में बैठते समय पीठ पर उड़ेल दिए जाने वाले गुलाल से वे भी नहीं बच पाएंगे। लगता है, देवता यही रंग देखने-दिखाने के लिए जागे हैं।
मोहनलाल मौर्य

3 Nov 2019

नियति नहीं,सिर्फ इत्तेफाक


बिल्लू दिल्ली जाने के लिए घर से बाहर निकला ही था कि बिल्ली ने रास्ता काट दिया। अपशगुन हो गया।अपशगुन हो गया तो अनहोनी का भय व्याप्त होना ही था। सो हो गया। जनाब जिन पैरों से बाहर निकला था,उन्हीं से वापस घर के अंदर हो लिया। अब इसमें बिल्ली का क्या दोष है। उसने जान-बूझकर रास्ता थोड़ी काटा था। उसके पीछे एक कुत्ता पड़ा था,जिससे अपनी जान बचाने के लिए उस गली से इस गली में भागकर आ रही थी। रास्ता पार करने के दौरान कोई सामने आ गया तो इसमें बिल्ली की क्या गलती है? बिल्‍लू इसको अपशगुन मान बैठा है।
अपशगुन के कारण जाना स्थगित था,मगर काम ही कुछ ऐसा था कि जाना अत्यंत आवश्यक था। सो दोबारा निकलना चाहा,लेकिन बिल्ली ने फिर से रास्ता काट दिया। इस बार भी उसका कसूर नहीं था। कुत्ता पैर धोकर उसके पीछे पड़ा था। उसे ऐसी सुरक्षित जगह मिल नहीं रही थी,जहाँ पर छिपने के बाद कुत्ते से पिंड छूट जाएं। इसलिए सिर पर पैर रखकरइस गली से उस गली में ही भाग रही थी। 
अभी तक बिल्लू नहीं तो आगे बढ़ा था, नहीं पीछे मुड़ा था। वहीं का वहीं खड़ा था और यह सब देख रहा था। पर बिल्ली की बिल्कुल भी मदद नहीं की। बल्कि,भौं-भौं करके कुत्ते को उकसाने लगा। बिल्ली भी सयानी थी,यह चाल भाँप गई थी। भागकर पोल पर चढ़ गई। चढ़ते ही उसे एक बार तो ऐसे लगा,जैसे कि गढ़ जीत लिया हो। पर जब नीचे देखी,तो होश उड़ गए। कुत्ता नीचे ही खड़ा था। 
बिल्ली,बिल्लू को कोसने लगी और मन ही मन सोचने लगी-मैंने ही थोड़ी रास्ता काटा था। इस कुत्ते ने भी तो काटा था। इसका रास्ता काटना अपशगुन क्यों नहीं? जबकि इसमें और मुझमें कोई खास अंतर नहीं है। इसके भी वही चार पैर हैं,जो मेरे हैं। वहीं आँख और कान है। यह भौंकता हैं और हम म्याऊं करते हैं। बस इसमें और मुझमें यही तो अंतर है। बाकी तो सब समान है,फिर हमारे साथ ही दुर्व्यवहार क्योंयह तो अन्याय हो रहा है। नीचे उतरने के बाद मुझे ही बिल्लियों को एकजुट करके इसके खिलाफ आवाज उठानी होगी। पर यहाँ से यह कुत्ता नहीं गया तो मेरा क्या होगा। कब तक खंभे के चिपकी रहूंगी? यह तो शुक्र है कि उस समय बिजली गुल थी। अन्यथा बिल्ली चिपकी की चिपकी ही रह जाती। कुत्ता यह सोचकर भौं-भौं करके भौंकने लगा कि डरकर नीचे उतर आएगी। पर काफी देर भौंकने के बाद भी नीचे नहीं उतरी तो मन मसोसकर चल दिया। यह  देखकर बिल्ली तत्काल नीचे उतर आई। 
लेकिन जो मन में सोचा था, वह तो नीचे उतरते ही भूल गई। क्योंकि उसे भूख लग गई थी। भूख के समय भोजन के अलावा कुछ भी याद नहीं रहता है। बिल्ली भोजन की तलाश में उस घर में घुस गई, जिसमें दूध का ग्लास रखा था। मगर उसके नसीब में दूध नहीं लिखा था। उस घर की मालकिन ने दूध के ग्लास के पास पहुँचने से पहले ही उसे जूता फेंक कर मारा। डरकर बेचारी भाग रही थीकि एक सज्जन आ गए। बिल्ली ने उसका रास्ता काट दिया। किसी का भी रास्ता काटना बिल्ली की नियति नहीं,सिर्फ इत्तेफाक है।