30 Aug 2019

बधाई ही बधाई


आजादी दिवस पर देशभक्तों की देश भक्ति जितनी सोशल मीडिया पर दिखी,उतनी धरातल पर नहीं दिखी। शायद ही कोई ऐसी फेसबुक वॉल बची होगी,जिस पर तिरंगा नहीं लहराया हो। यहां पर लहराते तिरंगे को भले ही सलामी का सौभाग्य नहीं मिला हो,पर लाइक भरमार मिले हैं। जय हिंद की गूंज से कईयों की फेसबुक वॉल के कमेंट बॉक्स मोक्ष प्राप्ति की ओर अग्रसर होते हुए दिख रहे थे। मेरे व्हाट्सएप पर व्हाट्सएप ग्रुप तो आजादी के जश्न में इतने मग्न थे कि दिनभर आने वाले गुड मॉर्निंग जैसे महत्वपूर्ण मैसेज को भी नहीं देख पाए। देश भक्ति से मेरे फोन की इमेज गैलरी खचाखच भर गई थी। किसकी डिजिटल देशभक्ति को डिलीट करूं और किसकी को नहीं। इस दुविधा में मैं तो शाम को डेयरी से दूध लाना भी भूल गया था।
स्कूल व कॉलेजों में होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रमों को  देखने वाले प्रत्यक्षदर्शी उतने नहीं दिखे,जितने फेसबुक पर लाइव देखने वाले दिख रहे थे। यह तालियों की जगह लाइक और कमेंट करके बालक बालिकाओं का हौसला अफजाई तो कर रहे थे। मगर मंच तक इनकी हौसला अफजाई पहुंच नहीं पा रही थी। जो लाइव दिखा रहा था वही ग्रहण करके पुलकित हो रहा था। कई तो अपनी फेसबुक वॉल को ही लाल किले की प्राचीर समझकर देशवासियों को संबोधित कर रहे थे। जबकि इनका संबोधन कोई सुन ही नहीं रहा था। बस लाइक करके आगे निकल रहे थे।
फेसबुक पर रक्षाबंधन और स्वतंत्रता दिवस के उपलक्ष्य में शुभकामना देने वाली पोस्टर पोस्ट तो बहुतायत दिखी। मगर समस्त देशवासियों को शुभकामनाएं देने वाली पोस्ट उतनी नहीं दिखी,जितनी क्षेत्रवासियों को देने वाली दिखी। इन क्षेत्रवासियों की पोस्ट को देखकर ऐसा लग रहा था जैसे कि शुभकामना पर भी जीएसटी लगी हो। जिसके कारण यह समस्त देशवासियों के बजाय अपने ग्रामवासियों तथा शहरवासियों तक ही सीमित रहे हो। 
लेकिन इन क्षेत्रवासियों में कईयों की शुभकामनाएं यूं ही नहीं दी गई है। अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए दी गई है। इनमें से कोई चुनाव लड़ने का इच्छुक है तो कोई लड़ चुका है। इसलिए यह लोग इस तरह की शुभकामनाओं के जरिए अपने आप को जनता के समक्ष पेश करते हैं कि आगामी चुनाव में हम भी मैदान में होंगे। हमारा भी ध्यान रखिएगा। यह पोस्ट पर कमेंट्स की बढ़ोतरी देखकर उसी तरह मन ही मन प्रमुदित होते रहते हैं। जिस तरह मतगणना के समय मतों की बढ़ोतरी देखकर नेतागण होते हैं। हर दस मिनट बाद में फेसबुक नोटिफिकेशन देखते रहते हैं। दिल वाली आकृति की इमोजी से लाइक करके रिप्लाई देते हैं।

18 Aug 2019

नाम में कुछ नहीं रखा


कई दिनों से अपने नाम को लेकर हैरान हूँ। हैरान इसलिए हूँ कि एक दिन एक मित्र ने यह कह दिया-अपना नाम बदल लीजिए। मैंने उससे पूछा, 'नाम बदलने से क्या होगा?' उसने जवाब दिया,'एक बार बदलकर तो देखिए। फिर देखना होता क्या है?' दरअसल उसने ही बताया कि आपका नाम यानी की मेरा नाम मेरे मुताबिक जम नहीं रहा है। मैंने सुना है कि मित्र का मंतव्य ही गंतव्य तक पहुंचाता है। इसलिए मैंने अपना नाम बदल लिया। बदले नाम से एकाध रचना भी प्रकाशित करवा ली। मन में उत्कंठा उत्पन्न हुई कि,जो मूल नाम से यश-कीर्ति प्राप्त नहीं हुई,हो सकता है परिवर्तन नाम से हो जाए। यहीं सोचकर मैंने अपने नाम में से मध्यम हटा दिया। प्रथम और अंतिम रख लिया। सम्पूर्ण परिवर्तन तो कर नहीं सकता। सम्पूर्ण परिवर्तन करने का अभिप्राय है अपना जो अस्तित्व है उसे विलुप्त करना।

सुना है कि नाम की बड़ी महत्ता होती है। यह अलग बात है कि कईयों कि नाम के विपरीत मनोदशा होती है। जैसे कि नाम तो रोशन लाल है,पर रहता बेचारा अँधेरे में है। इसी तरह नाम तो शमशेर बहादुर सिंह है,पर मरे ना चूहा भी। कद का ठिगना है,पर नाम लम्बरदार है। रंग का काला है,पर नाम सुन्दर और रंग का गोरा है,पर नाम कालू है। देह दुबली पतली है और नाम मोटूराम है। अष्ट-पुष्ट,लम्बी-चौड़ी कद-काठी है,पर नाम छोटूराम। कई होते तो मर्द हैं,पर उनके नाम में औरत का नाम पहले आता हैं। जैसे कि दुर्गाप्रसाद,लक्ष्मी नारायण,सीताराम,आदि-इत्यादि। कईयों के नाम बड़े-अटपटे होते हैं,पर उनका नाम बड़ी इज्जत से लिया जाता है और कईयों के नाम भगवान के नाम पर होते हैं,फिर भी उन्हें आधे-अधूरे नाम से सम्बोधित किया जाता है। मसलन,नाम तो है ‘हनुमान’ और बुलाते है ‘हड़मान

मैंने अपना नाम परिवर्तन क्या कियाअड़ोसी-पड़ोसी आपत्ति जताने लगे। जबकि नाम मैंने परिवर्तन किया है और आपत्ति वे जता रहे हैं। पड़ोसी गंगाराम ने बताया कि भाई नाम परिवर्तन से कुछ नहीं होता। नाम तो काम से होगा। नाम तो मुंबई,कोलकाता,चेन्नई,वाराणसी,सहित कई शहरों के भी बदले गए है। लेकिन हुआ क्याक्या वे शहर इधर से उधर हो गएयहाँ फिर उनके पंख लग गए,जिधर मन किया उधर की उड़ चले। वे वहीं स्थित हैं,जहाँ थे। पड़सोसियों कि ओर से इस तरह के सुझाव सुनकर मैं असमंजस में हूँ। इस सोच में डूबा हुआ हूँ कि मित्र ने भी कुछ ना कुछ उधेड़बुन कर ही ऐसी राय दी होगी। अन्यथा आज के युग में भला ऐसी  राय कौन देता है?

एक पड़ोसी ने तो यह तक कह दिया,'भाई! नाम अमर रखने से कोई अमर नहीं हो जाता। उसे भी मरना तो पड़ता ही है। लक्ष्मी नाम है तो इसका मतलब यह थोड़ी है कि कुबेर का खजाना उसी के पास है। नाम सत्यराम है तो यह जरूरी थोड़ी है कि वह झूठ नहीं बोलेंगा। इसी तरह नाम दया है तो इसका मतलब यह नहीं कि उसे क्रोध नहीं आएंगा। भाई नाम तो नाम होता है। नाम चाहे बड़ा हो। चाहे छोटा हो। उसके काम के अनुरूप ही उसका नाम बड़ा होता है।'

इत्ती सी बात मेरे समझ में कैसे नहीं आयी और पड़ोसी ने कतिपय नामों के जरिए ही समझा दिया। लेकिन एक बात अब भी समझ में नहीं आयी। मित्र ने नाम परिवर्तन का सुझाव क्यों दियाखैर छोड़िएकई दिनों से जो उलझन बनी हुई थी वह सुलझ गई और नाम की महत्ता का भी ज्ञान हो गया।

2 Aug 2019

खूँटी का खोट


घर के स्टोर रूम में रखा छाता अपने ऊपर बने मकड़ी जाल को हटाकर और धूल मिट्टी को झाड़कर,बारिश से नाता जोड़ने के लिए,बरामदा की खूँटी पर आकर लटक गया है। कई दिनों से अकेलापन महसूस कर रही खूँटी भी छाता के टँगने के बाद फूली नहीं समा रही है। इसे पता है कि छाता बारिश में भीगकर आएगा तो मेरे ऊपर भी कुछ बूँदें तो मेहरबान होंगी। मैं भी बारिश के पानी से स्नान कर ही लूंगी। बारिश में नहाने का मन भला किसका नहीं होता है। हर किसी की इच्छा होती है कि झमाझम बारिश हो तो मैं भी स्नान करूं। स्नान का फेसबुक पर लाइव टेलीकास्ट करूं। अपने एफबी मित्रों को बूँद- बूँद का चित्र दिखाकर,उन्हें जोड़े रखू।
खूँटी पर लटका हुआ छाता भी कुछ इसी तरह के सपने संजोए हुए बादलों को निहार रहा है। बादल है कि कभी बन रहे हैं तो कभी बिगड़ रहे हैं। मगर झगड़ नहीं रहे हैं। मनुष्य की तरह एक-दूसरे की टाँग नहीं खींच रहे हैं। बल्कि हाथ पकड़कर साथ ले चल रहे हैं। जो पीछे रह रहा है उसे आगे वाला अपना हाथ आगे बढ़ाकर अपने साथ कर लेता है। बादलों का इतना आपसी प्यार देखकर छाता भी खूँटी से प्यार का इजहार करने लगता है। लेकिन खूँटी है कि आज तक किसी एक की हुई ही नहीं। कोई भी उसके संग दो-चार दिन से ज्यादा दिन तक टिकता नहीं है। चाहे राशन से भरा थेला हो या परिधान हो या फिर लटकने वाली अन्यत्र कोई भी वस्तु हो। इसमें खूँटी का भी खोट नहीं है। इसके प्यार का तो मनुष्य दुश्मन है,जो कि इस पर टंगी वस्तु से आँखें चार होते ही उसे इस पर से उतारकर अलहदा कर देता है। जबकि मनुष्य अपनी शर्म तक को खूँटी पर टांगते हुए नहीं शर्माता है। मगर जब खूँटी को शर्म से इश्क हो जाता है। तब खुद इतना बेशर्म हो जाता है कि शर्मिंदगी भी शर्म से पानी-पानी हो जाती है। 
छाता भी भली-भाँति जानता है कि बारिश हुई तब भी और नहीं हुई तब भी खूँटी के संग तो जिंदगी व्यतीत करना नामुमकिन है। मगर जब तक हैं,तब तक बादलों की तरह मिलजुलकर रहना चाहिए। जो गरजते भी साथ में हैं और बरसते भी साथ में है। एक हम हैं,जो कि गरजते साथ में है तो बरसते नहीं और बरसते हैं तो गरजते नहीं।
हर छाता खुद भीगकर अपने मालिक को बारिश से बचाकर उसके गंतव्य तक पहुँचाने में ही अपना जीवन सार्थक समझता है। मगर यह सौभाग्य भी हर किसी छाते को नसीब नहीं होता है। कई रंग-बिरंगे छाते तो बेचारे धूप में जलकर इतने काले पड़ जाते हैं कि आईने में अपनी शक्ल देखकर,अपनी जीवन लीला समाप्त कर लेते हैं। 
आज भी कई छातों की आत्मा इसलिए भटक रही है की उन्हें उनकी छोटी सी उम्र में बारिश का वह सुख प्राप्त नहीं हुआ जिसके लिए उनका जन्म हुआ था। इनकी आत्मशांति के लिए इनके वारिस मनुष्य के सिर के ऊपर सीना तानकर तने रहते हैं। दिनभर चिलचिलाती धूप में जलते रहते हैं,मगर बारिश को कभी भी नहीं कोसते। बल्कि बरसने के लिए,गुहार लगाने में लगे रहते हैं। फिर भी बारिश का दिल नहीं पसीजता है। हम पर नहीं तो कम से कम इन पर तो मेहरबान हो जाए। ताकि यह अपने पूर्वजों की अंतिम इच्छा के पुण्य से कृतार्थ हो जाए।
खूँटी पर लटका छाता अपने मालिक के हाथों का स्पर्श पाने के लिएखुद फर्श पर नीचे आ गिरा। ताकि मालिक भागकर आए और उठाकर कई दिनों से बंद पड़े को खोलकर दुनियादारी से परिचित करवाएगा। लेकिन सोचा जैसा हुआ नहीं। मालिक ने उसे उठाकर वापस खूँटी पर टाँग दिया। यह देखकर छाता ताकता ही रह गया। कहने सुनने की तो उसके मुँह में जबान नहीं थी।

31 Jul 2019

सावन की आई बहार रे...


चंद्रयान-2 चांद के समीप है, झूठ सुर्खियों में है। देश के कई इलाकों के नदी और नाले उफान पर हैं। घर-दालान में सीलन आ चुकी है। कल तक जहां पर पानी के लिए त्राहि-त्राहि मची हुई थी,अब वहां पर तबाही मची हुई है। उनके गगन तले की धरा जलमग्न हैं। पर्वत हरीतिमा की चुनरी ओढ़कर प्रमुदित हैं। जिन्हें देखकर,उनके संग सेल्फी लिए बिना रहा नहीं जा रहा हैं। क्‍योंकि सोशल मीडिया पर भी सावन की बहार छाई हुई है, जिसे फॉरवर्ड किए बिना रहा नहीं जा रहा है।
रोज-रोज हो रही बारिश से कोई खुशहाल है, तो कोई परेशान है। मगर छिपकलियों के सोने पर सुहागा है। कीड़े-मकोड़ों को धप से पकड़ने के लिए बिल्कुल भी मशक्कत नहीं करनी पड़ रही है। खुद ही मुंह में आ रहे हैं। मेंढक टर्र-टर्र करते हुए बिना बुलाए घरों में प्रवेश कर रहें हैं और जहां मर्जी वही घुस रहे हैं। बेडरूम तक पहुंच जाते हैं। पर वे इतने ईमानदार हैं कि किसी की सुई भी नहीं चुराते हैं। बस घर का मौका मुआयना करके फूदते हुए बाहर निकल जाते हैं। बारिश में जो माटी के चूल्हे जलने में आना-कानी करने लगे हैं,उन्हें मिट्टी के तेल से ललचाया जा रहा है। जो लोभ में आ रहा है। वह चैन पा रहा है। जो तेल पीकर भी आंख दिखा रहा है,  वह चिमटे खा रहा है। इनके लिए भी सावन मनभावन होता है। मगर जलना ही इनकी नियति।
इन दिनों सखी सहेलियां पहेलियां न बुझाकर झूला झूलने में मस्त मगन हैं। क्योंकि सावन के झूलों में न झोल है,न पोल है। मीठे बोल हैं। जिन्हें सुनकर ठिठक सकते हैं। लेकिन भटक नहीं सकते। सावन में मटकना जो रहता है। मेरा भी मन मयूर की तरह नाचने के लिए मचल रहा है। लेकिन सोशल मीडिया पर छाई बहार बाहर ही निकलने नहीं दे रही है। व्हाट्सएप से बाहर निकलता हूं,तो फेसबुक के नोटिफिकेशन बुला लेते हैं। उसके बाद कुछ याद रहता है भला? क्योंकि यही आजकल रमणीय एवं भ्रमणीय स्थल है। यहां से कभी याद करके बाहर आ भी गया,  तो इंस्टाग्राम का प्रोग्राम तैयार रहता है। फिर टि्वटर वाली नीली चिड़िया चहचहाने लगती है। अब अगर उसकी चहचहाहट नहीं सूनी,तो अपने नेताओं और अभिनेताओं के सुविचारों से महरूम रह जाऊं। इसलिए इसकी सबसे पहले सुननी पड़ती है।

28 Jul 2019

समय से पहले आने का नजरिया


यहाँ समय से पहले आने वाले को कौहतूल भरी निगाहों से निहारते हैं। जब तक पहले आने का कारण नहीं जान लेंगे। तब तक अपनी निगाहें नहीं हटाते हैं। हाथ भी तब मिलाते हैं,जब तसल्ली हो जाती है कि समय से पहले आने का कोई खास उद्देश्य नहीं है। समय था तो समय से पहले चले आए। मगर जिनके चले आए हैं,उनके पास तो समय से पहले आने का समय है ही नहीं। उनके पास तो जो समय दिया गया था,वह भी बड़ी मुश्किल से एडजस्ट किया है। इसलिए उन्हें समय से पहले आना अजीब लगता है। फिर वो करीबी से भी बात अजीबोगरीब ही करते हैं। 
घर पर मेहमान समय से पहले आ जाए,तो बवाल हो जाता है। कल आने वाला एक दिन पहले कहाँ से आ टपका! एक दिन पहले आना इतना अटपटा लगता है,जैसे दूधवाला महीने से पहले दूध के पैसे माँगने आ गया हो। हॉकर महीना बीता नहीं और पैसा लेने के लिए चला आए तो लोग उससे अखबार लेना बंद कर देते हैं। इसलिए बेचारा कभी भी भूलकर महीने से पहले नहीं आता है। बल्कि दो-चार दिन लेट ही आता है। उधारी लाल तकाजे से पहले चला आए,तो ब्याज की तो छोड़िए। मूल रकम हजम होने पर आतुर हो जाती है। इस भय के कारण बेचारा तकाज़ा के चार दिन बाद ही जाता है।
हमारे यहाँ पर तो नवदंपति के नौ माह से पहले बच्चा पैदा हो जाए तो सवाल उठने लगते हैं। अड़ोसन-पड़ोसन तरह-तरह की बातें बनाने लगती हैं। कानाफूसी होने लगती है। भले ही उसके चरित्र पर एक भी दाग नहीं हो। फिर भी दागदार बताकर बदनाम करने की साजिश रची जाती है। जब तक सच सामने नहीं आ जाता। तब तक कानाफूसी तो कायम ही रहती है।प्रेमिका अपने प्रेमी से मिलने के लिए,दिए गए समय से पहले आ जाए तो प्रेमी उसे संदेह दृष्टि से देखने लगता है। उस वक्त उसके मन में एक ही विचार आता है कि मेरे अलावा किसी अन्य के साथ तो प्रेम-प्रसंग नहीं चल रहा है। ब्रेकअप नहीं हो जाए। इस डर के मारे पूछताछ नहीं करता है। मगर खोजबीन शुरू कर देता है। खोजबीन में सुख-चैन खो देता है। जिसका सुख-चैन खो जाता है। उसका स्वाभाविक की ब्रेकअप हो जाता है। मायके गई बीवी वापस आने की निश्चित तिथि से पहले बिना सूचना के चली आए तो पति को दाल में कुछ काला लगने लगता है। कल आने वाली थी आज ही क्यों चली आई। कुछ दिन और रुक जाती। जैसे प्रश्न अपने आप से ही करने लगता है। पूछने की तो हिम्मत होती नहीं है। क्योंकि पत्नी के आने से तो जबान पर ताला लग जाता है।
किसी दिन समय से पहले नल में पानी आ जाए,तो दिनभर मोहल्ले में चर्चा बनी रहती है। उस दिन तो जलदाय विभाग को लंबी उम्र की दुआएं देते नहीं थकते हैं। अगले दिन उस समय से पहले ही बर्तन भांडे लेकर बैठ जाते हैं। लेकिन उस समय पर जब नल से एक बूँद पानी की नहीं टपकती है। तब जलदाय विभाग को कोसने लगते हैं। सड़क पर जाम लगाकर धरना देते हैं। मटका फोड़कर प्रदर्शन करते हैं। ज्ञापन देकर रसातल में गया जल स्तर को ऊपर उठाने की मांग करते हैं। जबकि अच्छी तरह से पता है। रसातल में गया जल ज्ञापन से तो क्या? विज्ञापन से भी ऊपर नहीं आएगा। किसी कारणवश सब्जीवाला अपने नियमित समय से पहले चला आए,तो यह समझते हैं कि जरूर सब्जियां बासी होंगी। जिन्हें बेचने के लिए चला आया है। इसलिए उसकी सब्जियों में मीनमेख निकालने लग जाते हैं। रोज बिना भाव-ताव तय किए खरीदने वाले भाव-ताव करने लगते हैं। जब तक एकाध रूपया कम नहीं कर देता उससे पहले सब्‍जी नहीं खरीदते हैं। उस दिन और दिनों से दुगुना धनिया लेना नहीं भूलते हैं।
यदि ट्रेन निर्धारित समय से पहले पहुँच जाए तो किसी आश्चर्य से कम नहीं लगती है। जो घर से यह सोचकर निकलते हैं ट्रेन निर्धारित समय पर तो आने से रही,अक्सर उनकी ट्रेन छूट जाती हैं। फिर वो टाइम की कीमत क्या होती है। बिना बताए ही जान जाते हैं। इसी तरह पुलिस वारदात से पहले पहुँच जाए,तो एक बार तो यकीन ही नहीं होता है। बल्कि शक होता है। कहीं वारदात में पुलिस की तो मिलीभगत नहीं। जो कि अपराधियों को भगाने के लिए समय से पहले आ गई या फिर सबूत मिटाने के लिए चली आई हो। 
अक्सर लेट आने वाला सरकारी कर्मचारी यदि किसी दिवस निर्धारित समय से पहले ऑफिस आ जाए तो चर्चा का विषय बन जाता है। उस दिन दिनभर कामकाज के बजाय उसकी चर्चा रहती है। सहकर्मी पहले आने का कारण जानने के लिए कुछ इस तरह के प्रश्न पूछे बिना नहीं रहते हैं,क्या बात है सर! आज सूर्य पश्चिम से निकला था क्या?जो कि आप ऑफिस टाइम से पहले ही चले आए या फिर कोई उच्चाधिकारी निरीक्षण करने आ रहा है। जिसके भय कारण चले आए। 
किसी भी कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि दिए गए समय से पहले पहुँच जाए,तो उसका उतना स्वागत-सत्कार नहीं होता है। जितना की देरी से आने पर होता है। अक्सर कार्यक्रमों में देरी से पहुँचने वाले माननीय नेता जी! यदि किसी कार्यक्रम में समय से पहले पहुँच जाए तो कई तरह की अटकले लगना शुरू हो जाती हैं। लोगों को उनकी खादी पर राजनीतिक स्वार्थ के फूल खेलते हुए दिखाई देने लगते हैं। समय से पहले आने पर चाकचौंबद व्‍यवस्‍थाएं आनन-फानन में तब्‍दील हो जाती है। 
मानसून समय से पहले आ जाए तो भविष्यवाणी करने वालों की वाणी को लकवा मार जाता है। क्योंकि उनकी भविष्यवाणी पर मानसून पानी फेर देता है। पानी फिरने के बाद उन पर से विश्वास उठ जाता है। एक बार विश्वास उठने के बाद फिर कोई भविष्य में भी उनकी भविष्यवाणी पर भरोसा नहीं करता है। वैसे तो भरोसा भरसक होता है। मगर जब बूंदाबांदी की कहेंगे और होती है मूसलाधार। मूसलाधार की कहेंगे और होती है  बूंदाबांदी। तब शक होता है। जब शक होता है। भरोसा होते हुए भी नहीं होता है।
समय से पहले आना जिनको अटपटा लगता हैं। उनके सिर के बाल जब समय से पहले सफेद हो जाते हैं। तब समझ में आता है। समय से पहले आने में समय का ही संयोग होता है। इसीलिए समय से पहले चले आते हैं। अन्यथा किसकी बिसात हैं,जो कि दिए गए समय से पहले चला आए।

26 Jul 2019

मैं नहीं बदला,मुझे बदल डाला


आप बदल गए हैं। यह पत्नी का कहना था। घर में रहना है,तो पत्नी के कथन में हां में हां और ना में ना मिलाना ही पड़ता है। नहीं मिलाए तो वैवाहिक जीवन तू-तू मैं-मैं में व्यतीत होगा। इस सबसे तनाव होगा। तनाव होगा तो खींचतान होगी। खींचतान होगी तो प्रेम का धागा टूटेगा। एक बार धागा टूट गया तो वापस जोड़ने के लिए फिर गांठ ही लगती है। कई ऐसे भी धागे होते हैं, जिनमें गांठ भी नहीं लगती। उनकी सीधी कोर्ट में पेशी लगती है।अधिकतर पेशियों का अंतिम परिणाम वही तीन बार बोलने वाला कुछ होता है,जिसके पीछे आजकल सरकार पड़ी है।
मुझमें ऐसा क्या बदलाव आ गया,जो मुझे ही दिखाई नहीं दे रहा है और पत्नी को दिख रहा है! न मोटा हुआ हूं ,न दुबला। न स्वभाव बदला है,न रंग-रूप। मूंछें भी इंची टेप से नापकर ही कटवा रहा हूं। सोचा पत्नी से ही पूछ लेता हूं। सो मैंने पूछ ही डाला।
वह बोली,‘देखिए जी! कई दिनों से देख रही हूं कि...मुझ चिर- जिज्ञासु ने बीच में ही टोक दिया,‘क्या देख रही हो?’ वह फिर बोली,‘ यही कि आप बदल गए हैं।अब मेरा गुस्सा होना नैतिक रूप से जायज था,मगर पत्नी के सामने कैसी नैतिकता। नैतिकता के सारे मानदंड पत्नियों के सामने ही तो टूटते हैं! इसलिए मैंने अपना गुस्सा लोकसभा स्पीकर की तरह पीते हुए मन व झक, दोनों मारकर कहा,‘हें...हें...हें... कहां बदला हूं पगली, वैसा का वैसा तो हूं। देख जरा! वही चाल वैसा ही बेहाल!
मेरी नकली मुस्कराहट को उसने वैसे ही लपक कर पकड़ लिया, जैसे दीवार पर छिपकलियां मासूम मच्छरों को धप से पकड़़ लिया करती हैं। मुझे गिरफ्त में आता और गिड़गिड़ाता देख मुझे गुलाम पर उसने तुरुप का इक्का चला दिया, ‘आजकल आप बहुत खिले-खिले रहते हो।
मैं चौंका!... और मैं क्या, मेरी सात पुश्तें चौंक गई। मैं तुरंत बोल पड़ा,‘तुम ही तो कहती थी,सूमड़े- सट्ट मत रहा करो, थोड़ा बोला-चाला करो, लोग पीठ पीछे आपको आलोकनाथ बोलते हैं। जब तुमने इतना सब कहा था तो अपन थोड़ा हंसने-बोलने लगे।’ 
हां, हंसो-बोलो, मगर इतना भी खुश मत रहो कि लोग मुझ पर शक करने लगें?’ 
इस बार मुझे अपनी सगी पत्नी, पत्नी वाले रोल में दिखाई दी। वह पत्नी ही क्या, जो पति को खुश रह लेने दे! मैं उसकी यह पीड़ा समझ गया था कि मैं उसका पति होने बावजूद पीड़ित जैसा क्यों नहीं लग रहा था! मैंने तुरंत अपना सॉफ्टवेयर बदला। उस दिन से मैं फिर  सूमड़ा-सट्ट हो गया।

22 Jul 2019

झमाझम बारिश का एक दृश्य


मानसून की मेहरबानी से झमाझम बारिश हो रही है। सड़क पानी से लबालब है। उसमें बच्चे कागज की कश्ती तैराकर धमाचौकड़ी मचा रहे हैं। मैं खिड़की में से इस नैसर्गिक सौंदर्य को निहार रहा हूँ। रामू काका साइकिल पर चले आ रहे है। वे एकदम से रपटकर गिर जाते है। जिसे देखकर बच्चे खिलखिलाने लगते हैं। काका को उठाने के लिए बच्चे हाथ बढ़ाते हैं मगर झुंझलाए से काका पहले ही लड़खड़ाते हुए चल देते हैं। इनके पीछे चली आ रही आंटी के हाथ से छाता ऐसे उछल कर गिरा,जैसे कि उसका भी मन झमाझम बारिश में भीगने को मचल रहा हो। यह तो शुक्र है कि एक बच्चे ने झट से छाता पकड़कर आंटी को सौंप दिया। अन्यथा छाता झमाझम बारिश का पूरा लुफ्त उठाता। इसी तरह सब्जी वाले की रेहड़ी से आलूटमाटर,टिंडे झमाझम बारिश में भीगने के लिए अपने ऊपर रखी खाली बोरी में से मुँह बाहर निकल रहे थे। इस दौरान एक बच्चे की कश्ती डूबने लगती है। वह अपनी कश्ती को बचाने का पुरजोर प्रयास करता है मगर उसका प्रयास विफल हो जाता है। बच्चा थोड़ी देर तो रोता है,उसके बाद बच्चों के संग नई कश्ती बनाकर धमाचौकड़ी मचाने में मशगूल हो जाता है।
यहाँ से मेरी नज़र एकाएक दीनू काका पर जा टिकती हैं,जो छत से टपकते पानी से उसी तरह परेशान है जिस तरह लोग दिन-ब-दिन बढ़ती महँगाई से परेशान हैं। दीनू काका को इस झमाझम बारिश में छाता नहीं मिल पा रहा है। सीबीआई की तरह घर के सभी सदस्य छाते को ढूंढने में लगे हुए हैं। छाता है कि किसी कुख्यात अपराधी की तरह न जाने कहाँ छुपा हुआ है। घर के बीहड़ इलाके तक में ढूँढ लिया पर छाता हाथ नहीं लग रहा। छाता मिल जाए तो छत का जायजा कर आए। जायजा हो जाए तो कुछ ना कुछ जुगाड़ ही कराए। यहीं से मेरी नजरें उनके पड़ोसी की रसोई पर जा टिकती हैं। भाई साहब झमाझम बारिश में कढ़ाई से गर्मागम पकौड़ी निकाल कर भाभी जी को खिला रहे थे। जिन्हें देखकर कर मेरे मुँह में भी पानी आ गया और पकौड़ी खाने के लिए जी ललचाने लगा। पकौड़ी से हटी नजरें उस लड़की को देखने लगीं जो अपनी बालकनी से हाथ निकालकर झमाझम बारिश के संग झूम रही थी। बौछारे उसके तन-मन को छूकर बेहद प्रफुल्लित हो रही थी। 
खिड़की से दृश्य बदलता है। देख रहा हूँ कि मास्टर आनंदीलाल जी बरामदे में बैठे हुए हैं और अखबार में देश-दुनिया की सैर पर हैं। देश-दुनिया की सैर सपाटे के बीच-बीच में झमाझम बारिश को इस कदर निहार रहे हैं,जैसे की चालान काटते हुए हवलदार ट्रैफिक निहारता है। मास्टरजी के सामने रहने वाली शारदा काकी के घर में भरा बारिश का पानी देश में फैले भ्रष्‍टाचार की तरह निकल नहीं रहा है। वो जेसीबी वालों की तरह भ्रष्‍टाचार रूपी बारिश के पानी को निकालने में लगी हैं। वो जितना पानी निकाल रही है उससे ज्यादा घुस रहा है।
मैं खिड़की से देख रहा हूँ कि झमाझम बारिश थम चुकी है लेकिन बच्चें अब भी धमाचौकड़ी में मशगूल हैं। दीनू काका छत पर आ पहुँचे है। मास्टर जी अखबारी देश-दुनिया की सैर कर पलंग पर खर्राटे भर रहे हैं। पकौड़ी वाले भाई साहब कढ़ाई मांज रहे हैं और भाभी जी छत पर सेल्फी ले रही है। बालकनी वाली लड़की जा चुकी है। शारदा काकी सरपंच को कोस रही है। उसने प्रधानमंत्री आवास का आश्वासन दिया था लेकिन बनवाया नहीं। मैं गर्मागर्म चाय का मजा ले रहा हूँ।


16 Jul 2019

बारिश के बहाने


बारिश का मौसम है। मगर इंद्रदेव की मेहरबानी कि बरखा रानी नानी के घर से छुट्टियां मनाकर लौटी ही नहीं।शायद इसीलिए मानसून लेट है। क्योंकि इसके बिना मानसून दो कदम भी आगे बढ़ता नहीं है। अब से पहले जिन खुशनसीब हिस्सों में हल्की-फुल्की बारिश हुई है। वह गरमी से राहत दिलाने के लिए हुई है। बच्चों द्वारा कागज की कश्ती बनाकर धमाचौकड़ी मचवाने वाली बारिश तो लगता है कि क्रिकेट वर्ल्डकप देखने में व्यस्त हैं। क्रिकेट वर्ल्डकप का क्रेज ही ऐसा है कि बिना देखे बगैर चैन पड़ता नहीं हैं।फिर चाहे बारिश हो या हम।
भारत-पाकिस्तान के वनडे मैच के दौरान भी दो मिनट बिजली गुल हो जाए तो गुस्सा सातवें आसमान पर चढ़ जाता है। जो कि गुस्सा नहीं होता है। बल्कि क्रिकेट के प्रति प्रेम होता है। इस खेल के प्रति देश में प्रेम ही कुछ ऐसा है। लेकिन अब इंद्रदेव को भी अपनी मेहरबानी की बरखा रानी को नानी के घर से बुला लेना चाहिए। अब तो छुट्टियां भी खत्म हो गई है। स्कूल खुल गई हैं। बच्चे नानी से सुनी कहानियां भूलकर अपने पाठ्यक्रम की कहानियां सुनने के लिए स्कूल जाने लग गए हैं। हम तो पलक पावडे भी बिछाए हुए हैं और पकोड़े तलने के लिए कढ़ाही को भी मांजकर चूल्हे के पास ही रख रखे हैं। ताकि बारिश का आगमन होते ही पकोड़े तलने लग जाए।

इंतजार की घड़ी की सुइयां भी इतनी धीमी गति से चलती है कि इंतजार करते-करते बारिश की पुरानी यादों में खो जाते हैं। बचपन के वो दिन याद आने लगते हैं। जब स्कूल की छुट्टी के समय बारिश होती थी तो बारिश में नहाते हुए घर पहुंचते। बैग में रखी कॉपी-किताबें भीग जाती थी तो उनके एक-एक पन्ने को हिला-हिलाकर सुखाते थे। कोई पन्ना फट जाता था तो उसके गोंद लगाकर चिपकाते थे। दो पन्ने आपस में चिपक जाते थे तो उनमें स्केल फंसाकर अलग करते थे। कागज की कश्ती बनाकर बस्ती में तैराते थे। जिसकी कश्ती की नैया पार लग जाती थी,वह इस तरह से उछलता था जैसे कि वर्ल्डकप की ट्रॉफी जीत ली हो। 
मगर अब स्थितियां बदल गई हैं। आजकल बच्चे पैदल नहीं साइकल रिक्शा,ऑटो एवं बाल वाहिनी वाहनों में सवार होकर स्कूल आते-जाते हैं। पर बारिश में भीगने का मन तो इनका भी बहुत करता है। यह यादें जब भी बारिश होती है तो फिर से तरोताजा हो जाती हैं और नहीं हो पाती है तो यादों में ही रह जाती हैं। यह कोई नहीं चाहता कि इस तरह की यादें यादों में ही रहे। सब चाहते हैं कि बरसात हो तो हम भी अपने संस्मरण फेसबुक पर लिखें और पुरानी यादों को ताजा करें। 

30 Jun 2019

किस्मत का खेल और बेचैनी


बचपन में एक ज्योतिषी महाराज ने मुझे बताया था कि तुम्हारी हस्तरेखाओं में भाग्य की रेखा तो बड़ी भाग्यवान हैं। कहीं से भी कटी-फटी हुई नहीं है। न टेढ़ी-मेढ़ी है।बिल्कुल सीधी सट्ट है। हथेली पर आड़ी तिरछी खींची हुई लकीरों में कौन सी लकीर भाग्य वाली है। मुझे तो आज तक पता नहीं लगा है। लेकिन मैंने जब से यह सुना है कि सब किस्मत का खेल है। तभी से किस्मत का खेल खेलने के लिए बेचैन हूँ। बस मौका नहीं मिल रहा है। कैसे भी करके एक बार मौका मिल जाए तो मेरा भी नसीब चमक जाए। क्योंकि मेरी हथेली पर भाग्य की लकीर है।
लोग कहते हैं कि जब किस्मत का ताला खुलता है न तो ऊपरवाला छप्पर फाड़कर देता है। मगर मैंने तो किस्मत पर ताला भी नहीं लगा रखा है। लगाऊंगा कहां से मेरी किस्‍मत के दरवाजे की तो छोड़िए,मेरे तो घर के दरवाजे में ढंग से सांकल नहीं लगी हुई है,जो कि मैं अपनी किस्मत पर ताला लगाऊंगा। वैसे भी ताला तो वे लोग लगाते हैं जिनके पास खजाना होता है। जिसका उन्हें चोरी होने का भय रहता है। मेरा तो वैसे ही कंगाली में आटा गिला हो रहा है। सच पूछिए तो मैंने अपना छप्पर भी फाड़ रखा है। ताकि ऊपरवाले को देने में किसी तरह का कष्ट नहीं हो। फिर भी ऊपरवाला देने में देरी कर रहा है। पता नहीं ऊपरवाले की फेहरिस्त में मेरा नंबर कितने नंबर पर हैंजो कि आ ही नहीं रहा है। या जानबूझकर नंबर नहीं लिया जा रहा हैं। मुझे तो यह भी पता नहीं सूची में मेरा नंबर है भी या नहीं। कहीं मैं वैसे ही तो प्रतीक्षा नहीं कर रहा हूँ। मेरे पास ऊपरवाले के संपर्क सूत्र भी तो नहीं हैं। अन्यथा पूछताछ कर ही लेता। फेसबुक पर भी तो नहीं है। होते तो फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजकर,इनबॉक्स में चैट करके मामला सेट कर लेता।
मेरा पड़ोसी कहता हैं कि भगवान के घर में देर है अंधेर नहीं। मगर मेरे तो घर में बिजली के बावजूद भी अंधेरा छाया हुआ है। मित्र कहता है कि सब्र रख,सब्र का फल मीठा होता है। आज नहीं तो कल तेरी भी किस्मत चमकेगी। मित्र को कैसे बताऊं कि मुझे सब्र के मीठे फल के बजाय बेसब्री फल पसंद है। फिर चाहे वह कड़वा ही क्यों ना होमैं खा लूंगा। खाने के बाद डकार तक नहीं लूंगा।

आप सोच रहे होंगे। भला किस्मत का भी कोई खेल होता है। भाई साहब! चाहे खेल कोई भी हो। उसमें असली खेल ही किस्मत का होता है। जो अपने प्रिय खेल का खिलाड़ी होने के साथ-साथ किस्मत के खेल का भी खिलाड़ी है। उसकी तो हर हाल में जीत ही होती है। भले ही खेल का खिलाड़ी अनाड़ी हो पर किस्मत के खेल का असली खिलाड़ी है तो उसे कोई भी माई का लाल पराजित नहीं कर सकता। विश्वास नहीं है तो कभी किसी किस्मत के खिलाड़ी के साथ अपना भाग्य आजमाकर देख लेना। चारों खाने चित नहीं आओ तो कहना।
ऐसा नहीं है कि मैं हाथ पर हाथ रखकर बैठा हूँ। रोज भाग्य से लड़ रहा हूँ। उससे हाथ जोड़कर विनती करता हूँ। मुझे भी किस्मत का खेल खेलना है। मैं भी किस्मत के खेल का खिलाड़ी बनना चाहता हूँ। लेकिन भाग्य है कि रोज मुझे लताड़कर खदेड़ने में रहता है। जैसे तैसे हिम्मत जुटाकर पूछता हूँ तो बोलता है कि अभी तेरा नसीब साथ नहीं दे रहा है। जिस दिन साथ देगा। उस दिन से तुझे भी खेलने का मौका दूंगा। ऐसा शायद ही कोई दिन गया होगा कि मैं अपने नसीब से यह नहीं पूछता हूँ कि मेरा साथ क्यों नहीं देता है? रोज उसका एक ही जवाब होता है कि मैं मेहनत के बगैर किसी के भी साथ नहीं देता हूँ। यह बात तेरी खोपड़ी में बैठती क्यों नहीं। जो कि रोज-रोज पूछता है। आदत से लाचार है क्यामेहनत से पूछता हूँ तो वह नसीब का ठीकरा मेरे सिर पर फोड़ती है। बोलती है कि तेरा नसीब ही खराब है। मैं तो अपनी तरफ से पूरी कोशिश करती हूँ। तेरे लिए तो जी तोड़ परिश्रम करती हूँ। उसके बावजूद भी तेरा नसीब साथ नहीं देता तो मैं क्या करूं?
समझ में यह नहीं आता है कि नसीब और मेहनत के बीच में ऐसा कौन सा छत्तीस का आंकड़ा फंसा हुआ है। जो कि मेरे भाग्य का ठीकरा एक-दूसरे के सिर पर फोड़ते हैं। मुझे साफ-साफ क्यों नहीं कह देते। यह खामियां हैं। इन्हें पूरी कीजिए। ग्रह नक्षत्रों के कारण बाधा आ रही है। किसी ज्योतिषी से सलाह मशवरा करके निवारण कीजिए। लगता है कि यह तो बताने से रहें। मुझे ही कुछ करना होगा। क्योंकि मैं भी हार मानने वालों में नहीं हूँ। किस्मत का खेल तो खेल कर ही रहूंगा। फिर चाहे अंजाम जो भी हो। देखा जाएगा।

16 Jun 2019

रसातल में रिश्वत भी नहीं चलती


जिसके पनघट पर जमघट लगा रहता था। पनिहारी 'मन की बात’ करती थी। कच्चे चिट्ठे खुलते थे। ब्रेकिंग न्यूज़ बनती थी। लाइव टेलीकास्ट होता था। वह सरकारी हैंडपंप मैं ही हूँ। लेकिन जब से पानी रसातल में गया है। कोई भी मेरी ओर झाकता भी नहीं। उन दिनों मैं तो दिन-रात मोहल्ले वासियों की सेवा में समर्पित रहता था। कभी किसी को पानी के लिए मना नहीं किया। एक बाल्टी की जगह दो बाल्टी भर कर देता था। मैं यह नहीं कह रहा कि मोहल्लेवासी मेरा ख्याल नहीं रखते थे। वे भी पूरा ख्याल रखते थे। जब भी सर्विस का मन होता था तो सर्विस करवा कर मेरी मनोकामना पूर्ण कर देते थे। 

लेकिन इंसान कितना खुदगर्ज हैइसका आभास मुझे तब हुआ,जब इनकी भरपूर जलपूर्ति करता था तो यह लोग प्रशंसा करते नहीं थकते थे और जब से जलपूर्ति बंद हुई है। कोई हालचाल भी पूछने नहीं आता। धरा के अंदर जल ही नहीं है तो मैं कहा से खींचकर लाऊं। जल रसातल में चल गया है। वहाँ तक पहुँच पाना मेरे बस की बात नहीं। रसातल में रिश्वत भी नहीं चलती,जो कि घूस देकर पानी ले आऊं और न ही ऐसा कोई जुगाड़ है,जिससे पानी ले आऊं। जुगाड़़ के मामले में भी भारतीय मानव सबसे आगे हैं। बस इसने तो जल बचाने का ही जुगाड़ नहीं किया। दो की जगह चार बाल्टी उड़ेलकर नहाते धोते थे। पशुओं को रगड़कर नहलाते थे। मोटरसाइकिल धोने में दुनिया भर का पानी व्यर्थ कर देते थे। अब बूंद-बूंद के लिए तरस रहे हैं। सरकार को कोस रहे हैं। जल सरकार की मुट्ठी में थोड़ी है,जो भींच कर बैठी है। देने से मना कर रही है। सरकार तो जल है,तो कल है...तथा जल ही जीवनकी अपील कर सकती है। सूखाग्रस्त इलाकों का जायजा लेने के लिए ज्यादा से ज्यादा जलमंत्री को भेज सकती है। इसमें जल मंत्री जी भी क्या कर सकते हैंसेल्फी लेकर अफसोस जता सकते हैं।
एक दिन एक स्थानीय पत्रकार की मेरे पर नजर क्या पड़ी, उससे  मेरी हालत देखी नहीं गई। अखबार में छाप दिया। मेरी खबर अखबार में क्या छपी,स्थानीय नेताओं में होड़ मच गई। मुझे दुरुस्त करवाकर श्रेय लेने की। इन्होंने खबर का ऐसा मुद्दा बनाया ग्राम पंचायत से पंचायत समिति तक हाहाकार मचा दिया। यह तो शुक्र है कि‍ बीडीओं साहब ने जलदाय विभाग से एक कर्मचारी भेज दिया था। अन्यथा यह तो मुझे लेकर सड़क पर चक्काजाम कर देते। अच्छा इनको भी मेरा ख्याल अखबार में छपने के बाद ही आया।
जलदाय विभाग से जो कर्मचारी आया था। वह मुझे देखकर बुदबुदाया। जो पहले से दुरूस्त है। उसे क्या दुरूस्त करूपर इत्ती दूर से आया हूँ तो कुछ ना कुछ ट्रीटमेंट तो करके ही जाऊंगा। उसने किया क्यादो-चार नये बोल्ट और ग्रीस करके चला गया। उसे भी अच्छी तरह से मालूम है और मुझे भी तथा लोगों को भी। जल जलस्तर तक रहा ही नहीं है। ट्रीटमेंट करना तो एक औपचारिकता है। अब तो मेरे पनघट पर जमघट तभी लगेगा जब जल स्तर ऊपर उठेगा।

14 Jun 2019

गरमी नहीं बरत रही नरमी


प्रचंड बहुमत के बाद गरमी भी प्रचंड पथ पर चल पड़ी है। चाहे इसे ईर्ष्या कहें या प्रतिस्पर्धा। अब तो जब तक बारिश से मुठभेड़ नहीं हो जाती उससे पहले रोकने से भी रुकने वाली नहीं है। चाहे आड़े अंधकार आए या तूफान आए। तब तक आगे बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता। जब तक सूर्यदेव का समर्थन प्राप्त है। इन दिनों सूर्य कुपित है। आग बरसा रहा है। इससे दुश्मनी मोल लेने पर वही हालत होगी। जिनकी इस समय प्रचंड बहुमत न मिलकर चंद मिलने पर हो रही है।

इनका मुखिया गम में डूबा हुआ है। चिंतन कर रहा है।अपना इस्तीफा देने को तैयार बैठा है। लेकिन लेने को कोई तैयार नहीं। अजीज यार भी हार की समीक्षा करने में लगे हुए हैं। आखिर चूक कहां पर हुई है। बादल बने भी थे। गरजे भी थे। बिजली भी चमकी थी। हवा भी चली थी। हल्की-फुल्की बौछार भी आई थी। इसके बावजूद मेघ हम पर मेहरबान न होकर उन पर इतने मेहरबान हो गएवो जलमग्न हो गए और हम सूखाग्रस्त ही रह गए। 
अब इन्हें कौन समझाएक्या इन्हें खुद को पता नहीं है। मेघ हवा का रुख देखकर बरसते हैं। जिधर की हवा चल रही होती है। उधर हो लेते हैं। हवा उसी दिशा में चलती है। जिस दिशा में उसका वेग होता है। बदलती तभी है,जब वेग मंद या तीव्र होता है। उस समय घनघोर काले बादलों को न देखकर हवा का रुख देख लिए होते तो इतनी बुरी स्थिति नहीं होती। खैर,जो हुआ,सो हुआ। मगर ऐसे ही चलता रहा तो आगे अकाल पड़ना निश्चित है। तब हम कहीं के भी नहीं रहेंगे। शायद यही सोचकर साठ पार्षदों ने अपने भविष्य का विकल्प निश्चित किया हो।
लेकिन प्रचंड पथ पर निकल पड़ी गरमी का क्या करेंसीलिंग फैन डिवाइडर पर भी ब्रेक नहीं लगा रही है। कूलर को कुचलती हुई इतनी तीव्र गति से चल रही है कि देखकर,एयर कंडीशनर की पतलून गीली होने को है।समय रहते हुए बारिश से मुठभेड़ नहीं हुई तो गरमी बिल्कुल भी नरमी नहीं बरतने वाली है। फिर तो प्रचंड बहुमत की तरह प्रचंड रिकॉर्ड कायम करके ही रुकेगी। 
कहीं ऐसा तो नहीं बारिश भी समुद्र किनारे बैठकर चिंतन में कर रही हो। अबके वर्ष बरसना है या नहीं बरसना है। बरसना है तो कहां पर बरसना है। इसको लेकर बादलों से मंथन कर रही हो। बादल कह रहे हो कि अभी तो गरमी अपने प्रचंड पथ पर हैं। इसको अबकी बार अपना लक्ष्य प्राप्त करने दे। हर बार हम इसके लक्ष्य में बाधा बन जाते हैं। क्यों ना अबकी बार बाधा न बनकर प्रोत्साहित करें और गरमी से कहीं की तू अपने लक्ष्य की ओर आगे बढ़ती रह। हम तो सांयकाल भी छाया नहीं करेंगे। भरी दोपहरी वाली ही तेज धूप ही बरकरार रखेंगे। अगर संभवतःऐसा संभव हो गया तो गरमी के पंंख लग जाएंगे। फिर यह प्रचंड पथ पर चलेगी नहीं,उड़ेगी। एक बार इसने उड़ान भर ली तो यह समझ ही अपना लक्ष्य पूरा करके ही लैंड करेगी।

12 Jun 2019

चिलचिलाती धूप में जिंदगी की चकमक


मेरी चलती बाइक के बाएं शीशे पर एकाएक चिलचिलाती धूप की ऐसी चमक पड़ी कि शीशा चटक गया,जिसमें से पीछे सरपट दौड़ते वाहनों को निहारना मुश्किल हो गया। समीप चलते वाहन दूर और दूर चलते समीप दिखने लगे। ट्रक बस दिखने लगी और बस ट्रक दिखने लगा। स्पीड सुई रूठकर अस्सी से चालीस की हो गई,जिसके कारण चलती बाइक पर भी चिलचिलाती धूप आलपीन की तरह चुभने लगी।
हेलमेट का शीशा उठाकर देखने लगा तो आंखें चौंधियाने लगी। बगैर शीशे में देखे बिना बाइक चलाना मौत को बुलाना है। यह सड़क किनारे लगे एक बोर्ड पर लिखा था। सड़क किनारे लगे बोर्डों पर लिखे आदर्श वाक्य को पढ़कर चलने वाले इतनी दूर चले जाते हैं कि कभी वापस नहीं आते और पढ़कर पालन करने वाले यही घूमते-फिरते रहते हैं।
दाएं शीशे को पीछे बैठी प्रेयसी के चेहरे पर सेट कर रखा था ताकि गरमी का एहसास नहीं हो। गरमी हैं कि रत्ती भर भी नरमी नहीं बरत रही थी। वह भी मेरी तरह अपने प्रचंड पथ पर तीव्र गति से चल रही थी। और उसकी प्रेयसी लू तो मेघ की छांव में भी पूरी वेग से चल रही थी। जबकि मेरी प्रेयसी चिपक कर बैठने के बजाय मुँह पर दुपट्टा बांधकर मेरी पीठ में मुँह छुपाए बैठी थी।
बाइक रोककर सड़क किनारे किसी पेड़ की छांव में पांव रखने का मन इसलिए नहीं कर रहा था कि धूप धूम मचाने लग गई थी। और बाएं शीशे ने स्पीड कम कराकर बाइक पर रोमांस का जो मजा था,उस पर साइड नहीं मिलने पर हॉर्न बजाकर आगे निकलने वाले वाहनों ने पानी फेर दिया था। उस समय घर पहुंचकर कूलर की गूलर जैसी हवा खाने की स्पीड पर भी बाइक नहीं चल रही थी और प्रेयसी सीलिंग फैन की स्पीड पर चलाने के लिए बार-बार जोर दे रही थी क्योंकि चिलचिलाती धूप उसे भी अपनी गिरफ्त में ले चुकी थी। उसके माथे पर पसीने की बुंदे मोती की तरह चमकने लगी थी। 
शुक्र है कि शीशा चटकर लटका नहीं। लटक जाता तो नीचे गिरता और नीचे गिरता तो पिछले टायर के नीचे आता और टायर के नीचे आता तो टायर पंचर होता। टायर पंचर हो जाता तो प्रेयसी से ब्रेकअप होना  सुनिश्चित था क्योंकि भरी दुपहरी में वह पैदल  चलती नहीं और मेरे अकेले से पंचर बाइक दो कदम भी नहीं चलती। ऐसी स्थिति में इजहार नहीं तकरार होती। तकरार में ब्रेकअप स्वाभाविक है।

9 Jun 2019

पड़ोसी ही पड़ोसी के काम आता है


मैं अपने पड़ोसी से उतना ही दुखी हूँ। जितना की आम आदमी बढ़ती महँगाई से है। गरीब गरीबी से है। बेरोजगार बेरोजगारी से है। उसकी रोज-रोज की उधारी से मुझे ब्लड प्रेशर की बीमारी हो गई है। वह इतना मीठा बोलता है,जैसे कि उसकी वाणी में मिश्री घुली हुई हो। उसके मीठे बोल सुनकर कहीं मुझे शुगर नहीं हो जाए। इस डर से वह जो भी चीज लेने आता हैं,मैं तत्काल दे देता हूँ। लेकिन वह तत्काल को आपातकाल में भी वापस नहीं करता है। कहता है कि मालामाल के क्या मांगे आपातकाल। उसके मुँह से मालामाल शब्द सुनकर मेरे मुँह से भी निकल जाता है कि तेरे मुँह में घी शक्कर। घी शक्कर का नाम सुनते ही उसके मुँह में पानी आ जाता है और वह उसी वक्त घी शक्कर मांग लेता है।
मौके पर चौका मारने में कभी नहीं चूकता है। मौके की तो वाइड गेंद को भी नहीं छोड़ता है। उस पर भी ऐसे घुमाकर मारता है कि गेंद सीधी मौके की बाउंड्री पर जाकर गिरती है। उस पर गुस्सा तो बहुत आता है। लेकिन वह मुझे गुस्सा थूकने वाला पान खिला देता है। जिसको खाने से मेरा सातवें आसमान पर चढ़ा गुस्सा भी उतर आता है और चेहरा चमक जाता है। चेहरे पर चमक देखकर वह नमक तक माँग लेता है। उसे माँगने में कतई शर्म नहीं आती है। शर्म को तो उसने खूँटी के टाँग रखा है। आएगी कहाँ से। बेझिझक आता है और जो चाहिए वह लिया जाता है। कोई मना कर दे तो मनुहार करके उसे खुश कर देता है। फिर वह खुशहाली में थाली भरकर देता है। खाली हाथ तो कभी नहीं लौटा है। बच्चों के गाल सहलाकर दाल तो इतनी ले जा चुका है,चुकाए तो उसके बाल तक बिक जाए। गृहस्थी की सरकार घाटे में चल रही है,ऐसा कहकर आटा तो आए दिन लेने आ जाता है। डाटा की तो पूछिए मत। हॉटस्‍पॉट ऑन करने के लिए सुबह चार बजे से ही  मिस कॉल पर मिस कॉल देने लगता हैं।
आदत से इतना लाचार हैं कि आचार तक नहीं छोड़ता है और विचार-विमर्श इस तरह करता है,जैसे कि बहुत बड़ा विचारक हो। जबकि विचारक कम प्रचारक ज्यादा है। क्योंकि वह गोपनीय बात का भी प्रचार-प्रसार करे बिना नहीं रहता है। सच पूछिए तो,मेरे तो किसी भी काम के लायक नहीं हैफिर भी मांगने पर उसे अपनी बाइक देनी पड़ती है। नहीं दूं तो भय रहता है,पड़ोसी धर्म संकट में नहीं पड़ जाए। क्योंकि मैं धर्म के मामले में बहुत धार्मिक हूँ। वह इसी का फायदा उठाता है। जामन के लिए भी आधी रात में आकर दरवाजा खटखटा देता है। गहरी नींद में सोया हो तो भी जगा देता है। वक्त की नजाकत देखकर भाषा शैली का प्रयोग करता है। डिस्टर्ब करके कहता है कि डिस्टर्ब के लिए क्षमा चाहता हूँ। दरअसल क्या है कि जावन को बिल्ली चाट गई। भले ही रखना भूल ही गया हो,लेकिन कहेगा हमेशा यही कि बिल्ली चाट गई।

इतना चतुर चालाक है कि लोमड़ी तक को अपनी गिरफ्त में कर लेता है। मुझे ही देख लो! मेरी उँगली पकड़ता-पकड़ता पहुँचा पकड़ लिया है। मुझे डर है कि गर्दन नहीं पकड़ ले। किसी दिन गर्दन पकड़ ली तो क्या होगाजो माँगेगा वही देना पड़ेगा। नहीं दिया तो जान से हाथ धोना पड़ेगा। लेकिन मेरी पत्नी को पूरा विश्वास है,वह विश्वासघात तो कभी नहीं करेगा। उसे क्या मालूम नहीं,तुमने कभी उसको आलू के लिए भी मना नहीं किया है। ईमेल बाद में किया है,पहले उसे तेल दिया है। तुम्हें मारकर वह अपनी उधार की दुकान क्यों बंद करेगाबल्कि वह तो तुम्हारी लंबी उम्र की दुआ करता होगा। वह और दुआ। कल ही मना कर दूं तो स्वाहा कर देगा।
मेरा यह पड़ोसी आलू प्याज ही नहींबल्कि ब्याज के नाम पर रुपया तक ले जाता है। लेकिन जब देने आता है तो मूल रकम तो अदा कर देता हैपर ब्याज जीम जाता है। मांगता हूँ तो बहानेबाजी कर जाता है। यह बहानेबाजी में भी अव्वल है। ऐसा बहाना बनाता है कि यकीन नहीं हो तो भी यकीन करना पड़ता है। कभी खुद तो कभी बीबी-बच्चों को बीमार कर देता है। खाँसी जुकाम को भी गंभीर बीमारी का रुप देकर घर बैठे को आईसीयू में भर्ती कर देता है। झूठ की पराकाष्ठा तक को लाँघने में कतई नहीं झिझकता है। आँख मूंदकर छलांग लगा देता है। क्योंकि यह  झूठपाखंड जैसी कलाओं में कलाकार आदमी है। सच कहूं तो यह पड़ोसी नहीं एक बला हैजो कि टालने से भी नहीं टलती है। 
मेरे इस पड़ोसी की एक अहम बात तो बताना भूल ही गया। इसका एक आदर्श वाक्य हैं,जिसका उच्चारण करना कभी नहीं भूलता है। जब भी कुछ लेकर जाएगा तो अपना आदर्श वाक्य 'पड़ोसी ही पड़ोसी के काम आता हैअवश्य बोलकर जाएगा। लेकिन मेरा यह पड़ोसी मेरे तो आज तक किसी काम नहीं आया है। सिर्फ नाम का पड़ोसी है। मेरा तो छोटा सा भी काम हो तो आनाकानी कर जाता है। खुद का काम हो तो थूक के आँसू लगाकर करवा लेता है। इससे कैसे पीछा छुड़ाऊ। समझ में ही नहीं आता है। किसी से राय-मशवरा करता हूँ तो वो भी वहीं सलाह देते हैं,जो कि उसके आदर्श वाक्य में निहित है। बोलते हैं कि आप भी कैसी बात करते होपड़ोसी के प्रीति मन में जो भ्रम है,उसे निकाल दो। एक पड़ोसी ही पड़ोसी के काम आता है। यह सुनकर मैं निरुत्तर हो जाता हूँ।

7 Jun 2019

गरमी के आगे सब फेल

इन दिनों गरमी जमकर कहर बरसा रही है। टेंपरेचर अपने पुराने रिकॉर्ड तोड़ने पर तुला हुआ है। धूप सुबह से ही चुभन भरी धूम मचाने लग रही है। लू मेघ की छांव में भी पूरे वेग से चल रही है। पेड़-पौधे झुलसकर औंधे मुंह हुए पड़े हैं। इनकी छांव में पांव रखने का भी मन नहीं कर रहा है।  टहनियां इतनी गरम हो रही हैं कि बेजुबान पक्षी उन पर बैठ नहीं पा रहे हैं। श्वानों की जीभ अंदर नहीं जा रही है। बाहर ही लटकी हुई लार टपका रही है। इस वजह से वो भौंक भी नहीं पा रहे हैं। हांफ रहे हैं। इनकी हांफ का चोर फायदा उठा रहे हैं। श्वान बाहुल्य क्षेत्र में भी चोरी करते हुए नहीं डर रहे हैं।

कल तक जोर-जोर से चिल्लाने वाले भी चिलचिलाती धूप के आगे चुप बैठे हुए हैं। उन्हें पता है कि चिलाएंगे तो गला सूखेगा। गला सूखेगा तो प्यास लगेगी। प्यास बुझाने के लिए,मटकेेेे तक जाना पड़ेगा। मटका है कि खाली पड़ा हैैं। फ्रिज में बोतल रखी है। लेकिन बिजली मनचली हो रही है। कब आ जाए और कब चल जाए कोई पता नहीं। इसलिए कोल्ड ड्रिंक की ढाई लीटर की बोतल पर बोरी की टांट बांधकर,उसमें पानी भरकर अपनेे सिरहाने रखे हुए हैं। एक घंटे में एक घूंट पीकर फिर वापस रख देते हैं। ताकि बोतल खाली नहीं हो जाए।
लेकिन पक्षियों को कोसों दूर उड़ान भरने के बावजूद भी दो बूंद पीने को पानी नहीं मिल रहा हैं। सूखी पड़ी टोंटियों में अपनी चोंच मार-मारकर चेक कर रहे हैं। इस चक्कर में कईयों की तो चोंच के मोच आ गई है। फिर भी हौसला बुलंद है। हतोत्साहित न होकर, अपनी प्यास बुझाने के लिए
यहां से वहां उड़ान भर रहे हैं। एक हम हैं,जो गरमी से जरा सा भी मुकाबला नहीं कर पा रहे हैं।गरमी को देखते ही सिर पर पांव रखकर सीलिंग फैन के नीचे आराम फरमाने में मशगूल हैं। लेकिन इन दिनों गरमी के आगे सीलिंग फैन भी फेल है। कूलर भी गूलर की हवा खानेेे निकल गया है और पीछे गर्म हवा छोड़ गया है।

5 Jun 2019

फेसबुकिया प्रकृति प्रेमी

उसे प्रकृति से प्रेम है। यह प्रदर्शित करने के लिए,रोज फेसबुक पर लाइव आता है। प्रकृति के बजाय अपने बारे में ज्यादा बताता है। मैंने यह किया। वह किया। एक ही बात को दस बार दोहराता है। फिर भी यह समझ में नहीं आता है कि आखिरकार कहना क्या चाहता है। मगर उसके हर वक्तव्य का एक ही तात्पर्य होता है कि मुझे प्रकृति से प्रेम है।

प्रकृति है कि उसे लाइक तक नहीं करती। प्रकृति का कहना है कि उसने मेरे लिए किया ही क्या है,जो कि उसे अपने लायक समझू। वह तो नालायक है। उसने जिंदगी में कभी एक पौधा तक लगाया नहीं और फेसबुक पर पूरा का पूरा उद्यान दिखा देता है। यह देखिए, मेरे द्वारा लगाया गए उद्यान का मनोरम दृश्य। दूसरों को पेड़-पौधे नहीं काटने की नसीहत देता है और खुद लकड़ियों का व्यापार करता है। फेसबुक पर जल व्यर्थ मत बवाइए का हैशटैग लगाकर जल बचाने की पहल करता है। जबकि खुद ट्यूबवेल चलाकर स्नान करता है। ऐसे प्रेमी से प्रेम करने से अच्छा है कि चारों ओर फैल रहे पर्यावरण प्रदूषण को पीकर अपनी जीवन लीला समाप्त कर लूं। लेकिन मुझे अपने लिए नहीं,इस सृष्टि के लिए जीना है। क्योंकि सृष्टि है तो मैं हूँ और मैं हूँ तो सृष्टि है। इसके जैसे प्रेमी तो न जाने कितने आए और कितने गए। ऐसी प्रवृत्ति के लोग सस्ती लोकप्रियता प्राप्त करने के लिए ही फेसबुक पर लाइव आते हैं। रियल लाइफ में कभी लाइव नहीं आते हैं।
यह प्रेमी को थोड़ी पता है। प्रकृति उसे पसंद नहीं करती है। पता होता तो अब से पहले सोशल मीडिया पर बवाल खड़ा कर देता। मैं प्रकृति को अपने आप से भी ज्यादा चाहता हूँ। फिर भी इग्नोर कर रही है। जबकि मैंने प्रकृति के लिए क्या नहीं किया। धरना दिया। प्रदर्शन किया। ज्ञापन सौंपा। रैलियां निकाली। स्कूल व कॉलेजों में सेमिनार आयोजित किए। अखबारों में प्रेस विज्ञप्ति देकर बिगड़ते पर्यावरण पर चिंता व्यक्त की। अखबार में छपी खबर को फेसबुक पर चिपकाकर आमजन को जागरूक किया। नहीं मैं सम्मान का भूखा हूँ और नहीं ही पुरस्कार का प्यासा हूँ। भारत का वासी हूँ। प्रकृति का ही सच्चा साथी हूँ। कुछ इस तरह से फेसबुक पर लाइव आकर बकवाद करता।

पर्यावरण दिवस की पूर्व संध्या पर तो प्रकृति प्रेमी अपना प्रेम उसी तरह इजहार करता है। जिस तरह एक प्रेमी वैलेंटाइन डे पर करता है। प्रकृति के बजाय फेसबुक लाइव के संग बिताए सुनहरे पलों को याद करते हुए लोगों से फरियाद करता है। प्रकृति संकट में हैं। समय रहते नहीं बचाया गया तो बहुत भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है। नदियों का गला सूख गया है। कुआँ बावड़ी तो कब की ही अपनी जीवन लीला समाप्त कर चुकी हैं। पहाड़ तिल-तिलकर अपनी जान गवा रहे हैं। जल रसातल में डूबकर मरने को तैयार बैठा है। यह फरियाद भी इस तरह से करता है,जैसे कि देश का प्रधानमंत्री देशवासियों को संबोधित कर रहा हो। इस दिन प्रकृति के संग जीने मरने की झूठी कसमें तो इस तरह से खाता है,जैसे कि गाजर मूली खा रहा हो। मगर प्रकृति इसकी रग-रग से वाकिफ है।
भले ही वह खुद के भले के लिए फेसबुक पर लाइव आता हो। मगर हम तो पर्यावरण दिवस के सिवाय प्रकृति के बारे में कभी सोचते भी नहीं है। उससे सुख दुख भी नहीं पूछते हैं। किस हालात में जी रही है। जबकि प्रकृति हमारा पूरा ख्याल रखती है। तो क्यों नहीं  इस पर्यावरण दिवस पर प्रण ले कि हम जब तक जिएंगे, तब तक प्रकृति के खरोंच भी नहीं आने देंगे।