26 Jul 2019

मैं नहीं बदला,मुझे बदल डाला


आप बदल गए हैं। यह पत्नी का कहना था। घर में रहना है,तो पत्नी के कथन में हां में हां और ना में ना मिलाना ही पड़ता है। नहीं मिलाए तो वैवाहिक जीवन तू-तू मैं-मैं में व्यतीत होगा। इस सबसे तनाव होगा। तनाव होगा तो खींचतान होगी। खींचतान होगी तो प्रेम का धागा टूटेगा। एक बार धागा टूट गया तो वापस जोड़ने के लिए फिर गांठ ही लगती है। कई ऐसे भी धागे होते हैं, जिनमें गांठ भी नहीं लगती। उनकी सीधी कोर्ट में पेशी लगती है।अधिकतर पेशियों का अंतिम परिणाम वही तीन बार बोलने वाला कुछ होता है,जिसके पीछे आजकल सरकार पड़ी है।
मुझमें ऐसा क्या बदलाव आ गया,जो मुझे ही दिखाई नहीं दे रहा है और पत्नी को दिख रहा है! न मोटा हुआ हूं ,न दुबला। न स्वभाव बदला है,न रंग-रूप। मूंछें भी इंची टेप से नापकर ही कटवा रहा हूं। सोचा पत्नी से ही पूछ लेता हूं। सो मैंने पूछ ही डाला।
वह बोली,‘देखिए जी! कई दिनों से देख रही हूं कि...मुझ चिर- जिज्ञासु ने बीच में ही टोक दिया,‘क्या देख रही हो?’ वह फिर बोली,‘ यही कि आप बदल गए हैं।अब मेरा गुस्सा होना नैतिक रूप से जायज था,मगर पत्नी के सामने कैसी नैतिकता। नैतिकता के सारे मानदंड पत्नियों के सामने ही तो टूटते हैं! इसलिए मैंने अपना गुस्सा लोकसभा स्पीकर की तरह पीते हुए मन व झक, दोनों मारकर कहा,‘हें...हें...हें... कहां बदला हूं पगली, वैसा का वैसा तो हूं। देख जरा! वही चाल वैसा ही बेहाल!
मेरी नकली मुस्कराहट को उसने वैसे ही लपक कर पकड़ लिया, जैसे दीवार पर छिपकलियां मासूम मच्छरों को धप से पकड़़ लिया करती हैं। मुझे गिरफ्त में आता और गिड़गिड़ाता देख मुझे गुलाम पर उसने तुरुप का इक्का चला दिया, ‘आजकल आप बहुत खिले-खिले रहते हो।
मैं चौंका!... और मैं क्या, मेरी सात पुश्तें चौंक गई। मैं तुरंत बोल पड़ा,‘तुम ही तो कहती थी,सूमड़े- सट्ट मत रहा करो, थोड़ा बोला-चाला करो, लोग पीठ पीछे आपको आलोकनाथ बोलते हैं। जब तुमने इतना सब कहा था तो अपन थोड़ा हंसने-बोलने लगे।’ 
हां, हंसो-बोलो, मगर इतना भी खुश मत रहो कि लोग मुझ पर शक करने लगें?’ 
इस बार मुझे अपनी सगी पत्नी, पत्नी वाले रोल में दिखाई दी। वह पत्नी ही क्या, जो पति को खुश रह लेने दे! मैं उसकी यह पीड़ा समझ गया था कि मैं उसका पति होने बावजूद पीड़ित जैसा क्यों नहीं लग रहा था! मैंने तुरंत अपना सॉफ्टवेयर बदला। उस दिन से मैं फिर  सूमड़ा-सट्ट हो गया।

22 Jul 2019

झमाझम बारिश का एक दृश्य


मानसून की मेहरबानी से झमाझम बारिश हो रही है। सड़क पानी से लबालब है। उसमें बच्चे कागज की कश्ती तैराकर धमाचौकड़ी मचा रहे हैं। मैं खिड़की में से इस नैसर्गिक सौंदर्य को निहार रहा हूँ। रामू काका साइकिल पर चले आ रहे है। वे एकदम से रपटकर गिर जाते है। जिसे देखकर बच्चे खिलखिलाने लगते हैं। काका को उठाने के लिए बच्चे हाथ बढ़ाते हैं मगर झुंझलाए से काका पहले ही लड़खड़ाते हुए चल देते हैं। इनके पीछे चली आ रही आंटी के हाथ से छाता ऐसे उछल कर गिरा,जैसे कि उसका भी मन झमाझम बारिश में भीगने को मचल रहा हो। यह तो शुक्र है कि एक बच्चे ने झट से छाता पकड़कर आंटी को सौंप दिया। अन्यथा छाता झमाझम बारिश का पूरा लुफ्त उठाता। इसी तरह सब्जी वाले की रेहड़ी से आलूटमाटर,टिंडे झमाझम बारिश में भीगने के लिए अपने ऊपर रखी खाली बोरी में से मुँह बाहर निकल रहे थे। इस दौरान एक बच्चे की कश्ती डूबने लगती है। वह अपनी कश्ती को बचाने का पुरजोर प्रयास करता है मगर उसका प्रयास विफल हो जाता है। बच्चा थोड़ी देर तो रोता है,उसके बाद बच्चों के संग नई कश्ती बनाकर धमाचौकड़ी मचाने में मशगूल हो जाता है।
यहाँ से मेरी नज़र एकाएक दीनू काका पर जा टिकती हैं,जो छत से टपकते पानी से उसी तरह परेशान है जिस तरह लोग दिन-ब-दिन बढ़ती महँगाई से परेशान हैं। दीनू काका को इस झमाझम बारिश में छाता नहीं मिल पा रहा है। सीबीआई की तरह घर के सभी सदस्य छाते को ढूंढने में लगे हुए हैं। छाता है कि किसी कुख्यात अपराधी की तरह न जाने कहाँ छुपा हुआ है। घर के बीहड़ इलाके तक में ढूँढ लिया पर छाता हाथ नहीं लग रहा। छाता मिल जाए तो छत का जायजा कर आए। जायजा हो जाए तो कुछ ना कुछ जुगाड़ ही कराए। यहीं से मेरी नजरें उनके पड़ोसी की रसोई पर जा टिकती हैं। भाई साहब झमाझम बारिश में कढ़ाई से गर्मागम पकौड़ी निकाल कर भाभी जी को खिला रहे थे। जिन्हें देखकर कर मेरे मुँह में भी पानी आ गया और पकौड़ी खाने के लिए जी ललचाने लगा। पकौड़ी से हटी नजरें उस लड़की को देखने लगीं जो अपनी बालकनी से हाथ निकालकर झमाझम बारिश के संग झूम रही थी। बौछारे उसके तन-मन को छूकर बेहद प्रफुल्लित हो रही थी। 
खिड़की से दृश्य बदलता है। देख रहा हूँ कि मास्टर आनंदीलाल जी बरामदे में बैठे हुए हैं और अखबार में देश-दुनिया की सैर पर हैं। देश-दुनिया की सैर सपाटे के बीच-बीच में झमाझम बारिश को इस कदर निहार रहे हैं,जैसे की चालान काटते हुए हवलदार ट्रैफिक निहारता है। मास्टरजी के सामने रहने वाली शारदा काकी के घर में भरा बारिश का पानी देश में फैले भ्रष्‍टाचार की तरह निकल नहीं रहा है। वो जेसीबी वालों की तरह भ्रष्‍टाचार रूपी बारिश के पानी को निकालने में लगी हैं। वो जितना पानी निकाल रही है उससे ज्यादा घुस रहा है।
मैं खिड़की से देख रहा हूँ कि झमाझम बारिश थम चुकी है लेकिन बच्चें अब भी धमाचौकड़ी में मशगूल हैं। दीनू काका छत पर आ पहुँचे है। मास्टर जी अखबारी देश-दुनिया की सैर कर पलंग पर खर्राटे भर रहे हैं। पकौड़ी वाले भाई साहब कढ़ाई मांज रहे हैं और भाभी जी छत पर सेल्फी ले रही है। बालकनी वाली लड़की जा चुकी है। शारदा काकी सरपंच को कोस रही है। उसने प्रधानमंत्री आवास का आश्वासन दिया था लेकिन बनवाया नहीं। मैं गर्मागर्म चाय का मजा ले रहा हूँ।


16 Jul 2019

बारिश के बहाने


बारिश का मौसम है। मगर इंद्रदेव की मेहरबानी कि बरखा रानी नानी के घर से छुट्टियां मनाकर लौटी ही नहीं।शायद इसीलिए मानसून लेट है। क्योंकि इसके बिना मानसून दो कदम भी आगे बढ़ता नहीं है। अब से पहले जिन खुशनसीब हिस्सों में हल्की-फुल्की बारिश हुई है। वह गरमी से राहत दिलाने के लिए हुई है। बच्चों द्वारा कागज की कश्ती बनाकर धमाचौकड़ी मचवाने वाली बारिश तो लगता है कि क्रिकेट वर्ल्डकप देखने में व्यस्त हैं। क्रिकेट वर्ल्डकप का क्रेज ही ऐसा है कि बिना देखे बगैर चैन पड़ता नहीं हैं।फिर चाहे बारिश हो या हम।
भारत-पाकिस्तान के वनडे मैच के दौरान भी दो मिनट बिजली गुल हो जाए तो गुस्सा सातवें आसमान पर चढ़ जाता है। जो कि गुस्सा नहीं होता है। बल्कि क्रिकेट के प्रति प्रेम होता है। इस खेल के प्रति देश में प्रेम ही कुछ ऐसा है। लेकिन अब इंद्रदेव को भी अपनी मेहरबानी की बरखा रानी को नानी के घर से बुला लेना चाहिए। अब तो छुट्टियां भी खत्म हो गई है। स्कूल खुल गई हैं। बच्चे नानी से सुनी कहानियां भूलकर अपने पाठ्यक्रम की कहानियां सुनने के लिए स्कूल जाने लग गए हैं। हम तो पलक पावडे भी बिछाए हुए हैं और पकोड़े तलने के लिए कढ़ाही को भी मांजकर चूल्हे के पास ही रख रखे हैं। ताकि बारिश का आगमन होते ही पकोड़े तलने लग जाए।

इंतजार की घड़ी की सुइयां भी इतनी धीमी गति से चलती है कि इंतजार करते-करते बारिश की पुरानी यादों में खो जाते हैं। बचपन के वो दिन याद आने लगते हैं। जब स्कूल की छुट्टी के समय बारिश होती थी तो बारिश में नहाते हुए घर पहुंचते। बैग में रखी कॉपी-किताबें भीग जाती थी तो उनके एक-एक पन्ने को हिला-हिलाकर सुखाते थे। कोई पन्ना फट जाता था तो उसके गोंद लगाकर चिपकाते थे। दो पन्ने आपस में चिपक जाते थे तो उनमें स्केल फंसाकर अलग करते थे। कागज की कश्ती बनाकर बस्ती में तैराते थे। जिसकी कश्ती की नैया पार लग जाती थी,वह इस तरह से उछलता था जैसे कि वर्ल्डकप की ट्रॉफी जीत ली हो। 
मगर अब स्थितियां बदल गई हैं। आजकल बच्चे पैदल नहीं साइकल रिक्शा,ऑटो एवं बाल वाहिनी वाहनों में सवार होकर स्कूल आते-जाते हैं। पर बारिश में भीगने का मन तो इनका भी बहुत करता है। यह यादें जब भी बारिश होती है तो फिर से तरोताजा हो जाती हैं और नहीं हो पाती है तो यादों में ही रह जाती हैं। यह कोई नहीं चाहता कि इस तरह की यादें यादों में ही रहे। सब चाहते हैं कि बरसात हो तो हम भी अपने संस्मरण फेसबुक पर लिखें और पुरानी यादों को ताजा करें। 

30 Jun 2019

किस्मत का खेल और बेचैनी


बचपन में एक ज्योतिषी महाराज ने मुझे बताया था कि तुम्हारी हस्तरेखाओं में भाग्य की रेखा तो बड़ी भाग्यवान हैं। कहीं से भी कटी-फटी हुई नहीं है। न टेढ़ी-मेढ़ी है।बिल्कुल सीधी सट्ट है। हथेली पर आड़ी तिरछी खींची हुई लकीरों में कौन सी लकीर भाग्य वाली है। मुझे तो आज तक पता नहीं लगा है। लेकिन मैंने जब से यह सुना है कि सब किस्मत का खेल है। तभी से किस्मत का खेल खेलने के लिए बेचैन हूँ। बस मौका नहीं मिल रहा है। कैसे भी करके एक बार मौका मिल जाए तो मेरा भी नसीब चमक जाए। क्योंकि मेरी हथेली पर भाग्य की लकीर है।
लोग कहते हैं कि जब किस्मत का ताला खुलता है न तो ऊपरवाला छप्पर फाड़कर देता है। मगर मैंने तो किस्मत पर ताला भी नहीं लगा रखा है। लगाऊंगा कहां से मेरी किस्‍मत के दरवाजे की तो छोड़िए,मेरे तो घर के दरवाजे में ढंग से सांकल नहीं लगी हुई है,जो कि मैं अपनी किस्मत पर ताला लगाऊंगा। वैसे भी ताला तो वे लोग लगाते हैं जिनके पास खजाना होता है। जिसका उन्हें चोरी होने का भय रहता है। मेरा तो वैसे ही कंगाली में आटा गिला हो रहा है। सच पूछिए तो मैंने अपना छप्पर भी फाड़ रखा है। ताकि ऊपरवाले को देने में किसी तरह का कष्ट नहीं हो। फिर भी ऊपरवाला देने में देरी कर रहा है। पता नहीं ऊपरवाले की फेहरिस्त में मेरा नंबर कितने नंबर पर हैंजो कि आ ही नहीं रहा है। या जानबूझकर नंबर नहीं लिया जा रहा हैं। मुझे तो यह भी पता नहीं सूची में मेरा नंबर है भी या नहीं। कहीं मैं वैसे ही तो प्रतीक्षा नहीं कर रहा हूँ। मेरे पास ऊपरवाले के संपर्क सूत्र भी तो नहीं हैं। अन्यथा पूछताछ कर ही लेता। फेसबुक पर भी तो नहीं है। होते तो फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजकर,इनबॉक्स में चैट करके मामला सेट कर लेता।
मेरा पड़ोसी कहता हैं कि भगवान के घर में देर है अंधेर नहीं। मगर मेरे तो घर में बिजली के बावजूद भी अंधेरा छाया हुआ है। मित्र कहता है कि सब्र रख,सब्र का फल मीठा होता है। आज नहीं तो कल तेरी भी किस्मत चमकेगी। मित्र को कैसे बताऊं कि मुझे सब्र के मीठे फल के बजाय बेसब्री फल पसंद है। फिर चाहे वह कड़वा ही क्यों ना होमैं खा लूंगा। खाने के बाद डकार तक नहीं लूंगा।

आप सोच रहे होंगे। भला किस्मत का भी कोई खेल होता है। भाई साहब! चाहे खेल कोई भी हो। उसमें असली खेल ही किस्मत का होता है। जो अपने प्रिय खेल का खिलाड़ी होने के साथ-साथ किस्मत के खेल का भी खिलाड़ी है। उसकी तो हर हाल में जीत ही होती है। भले ही खेल का खिलाड़ी अनाड़ी हो पर किस्मत के खेल का असली खिलाड़ी है तो उसे कोई भी माई का लाल पराजित नहीं कर सकता। विश्वास नहीं है तो कभी किसी किस्मत के खिलाड़ी के साथ अपना भाग्य आजमाकर देख लेना। चारों खाने चित नहीं आओ तो कहना।
ऐसा नहीं है कि मैं हाथ पर हाथ रखकर बैठा हूँ। रोज भाग्य से लड़ रहा हूँ। उससे हाथ जोड़कर विनती करता हूँ। मुझे भी किस्मत का खेल खेलना है। मैं भी किस्मत के खेल का खिलाड़ी बनना चाहता हूँ। लेकिन भाग्य है कि रोज मुझे लताड़कर खदेड़ने में रहता है। जैसे तैसे हिम्मत जुटाकर पूछता हूँ तो बोलता है कि अभी तेरा नसीब साथ नहीं दे रहा है। जिस दिन साथ देगा। उस दिन से तुझे भी खेलने का मौका दूंगा। ऐसा शायद ही कोई दिन गया होगा कि मैं अपने नसीब से यह नहीं पूछता हूँ कि मेरा साथ क्यों नहीं देता है? रोज उसका एक ही जवाब होता है कि मैं मेहनत के बगैर किसी के भी साथ नहीं देता हूँ। यह बात तेरी खोपड़ी में बैठती क्यों नहीं। जो कि रोज-रोज पूछता है। आदत से लाचार है क्यामेहनत से पूछता हूँ तो वह नसीब का ठीकरा मेरे सिर पर फोड़ती है। बोलती है कि तेरा नसीब ही खराब है। मैं तो अपनी तरफ से पूरी कोशिश करती हूँ। तेरे लिए तो जी तोड़ परिश्रम करती हूँ। उसके बावजूद भी तेरा नसीब साथ नहीं देता तो मैं क्या करूं?
समझ में यह नहीं आता है कि नसीब और मेहनत के बीच में ऐसा कौन सा छत्तीस का आंकड़ा फंसा हुआ है। जो कि मेरे भाग्य का ठीकरा एक-दूसरे के सिर पर फोड़ते हैं। मुझे साफ-साफ क्यों नहीं कह देते। यह खामियां हैं। इन्हें पूरी कीजिए। ग्रह नक्षत्रों के कारण बाधा आ रही है। किसी ज्योतिषी से सलाह मशवरा करके निवारण कीजिए। लगता है कि यह तो बताने से रहें। मुझे ही कुछ करना होगा। क्योंकि मैं भी हार मानने वालों में नहीं हूँ। किस्मत का खेल तो खेल कर ही रहूंगा। फिर चाहे अंजाम जो भी हो। देखा जाएगा।

16 Jun 2019

रसातल में रिश्वत भी नहीं चलती


जिसके पनघट पर जमघट लगा रहता था। पनिहारी 'मन की बात’ करती थी। कच्चे चिट्ठे खुलते थे। ब्रेकिंग न्यूज़ बनती थी। लाइव टेलीकास्ट होता था। वह सरकारी हैंडपंप मैं ही हूँ। लेकिन जब से पानी रसातल में गया है। कोई भी मेरी ओर झाकता भी नहीं। उन दिनों मैं तो दिन-रात मोहल्ले वासियों की सेवा में समर्पित रहता था। कभी किसी को पानी के लिए मना नहीं किया। एक बाल्टी की जगह दो बाल्टी भर कर देता था। मैं यह नहीं कह रहा कि मोहल्लेवासी मेरा ख्याल नहीं रखते थे। वे भी पूरा ख्याल रखते थे। जब भी सर्विस का मन होता था तो सर्विस करवा कर मेरी मनोकामना पूर्ण कर देते थे। 

लेकिन इंसान कितना खुदगर्ज हैइसका आभास मुझे तब हुआ,जब इनकी भरपूर जलपूर्ति करता था तो यह लोग प्रशंसा करते नहीं थकते थे और जब से जलपूर्ति बंद हुई है। कोई हालचाल भी पूछने नहीं आता। धरा के अंदर जल ही नहीं है तो मैं कहा से खींचकर लाऊं। जल रसातल में चल गया है। वहाँ तक पहुँच पाना मेरे बस की बात नहीं। रसातल में रिश्वत भी नहीं चलती,जो कि घूस देकर पानी ले आऊं और न ही ऐसा कोई जुगाड़ है,जिससे पानी ले आऊं। जुगाड़़ के मामले में भी भारतीय मानव सबसे आगे हैं। बस इसने तो जल बचाने का ही जुगाड़ नहीं किया। दो की जगह चार बाल्टी उड़ेलकर नहाते धोते थे। पशुओं को रगड़कर नहलाते थे। मोटरसाइकिल धोने में दुनिया भर का पानी व्यर्थ कर देते थे। अब बूंद-बूंद के लिए तरस रहे हैं। सरकार को कोस रहे हैं। जल सरकार की मुट्ठी में थोड़ी है,जो भींच कर बैठी है। देने से मना कर रही है। सरकार तो जल है,तो कल है...तथा जल ही जीवनकी अपील कर सकती है। सूखाग्रस्त इलाकों का जायजा लेने के लिए ज्यादा से ज्यादा जलमंत्री को भेज सकती है। इसमें जल मंत्री जी भी क्या कर सकते हैंसेल्फी लेकर अफसोस जता सकते हैं।
एक दिन एक स्थानीय पत्रकार की मेरे पर नजर क्या पड़ी, उससे  मेरी हालत देखी नहीं गई। अखबार में छाप दिया। मेरी खबर अखबार में क्या छपी,स्थानीय नेताओं में होड़ मच गई। मुझे दुरुस्त करवाकर श्रेय लेने की। इन्होंने खबर का ऐसा मुद्दा बनाया ग्राम पंचायत से पंचायत समिति तक हाहाकार मचा दिया। यह तो शुक्र है कि‍ बीडीओं साहब ने जलदाय विभाग से एक कर्मचारी भेज दिया था। अन्यथा यह तो मुझे लेकर सड़क पर चक्काजाम कर देते। अच्छा इनको भी मेरा ख्याल अखबार में छपने के बाद ही आया।
जलदाय विभाग से जो कर्मचारी आया था। वह मुझे देखकर बुदबुदाया। जो पहले से दुरूस्त है। उसे क्या दुरूस्त करूपर इत्ती दूर से आया हूँ तो कुछ ना कुछ ट्रीटमेंट तो करके ही जाऊंगा। उसने किया क्यादो-चार नये बोल्ट और ग्रीस करके चला गया। उसे भी अच्छी तरह से मालूम है और मुझे भी तथा लोगों को भी। जल जलस्तर तक रहा ही नहीं है। ट्रीटमेंट करना तो एक औपचारिकता है। अब तो मेरे पनघट पर जमघट तभी लगेगा जब जल स्तर ऊपर उठेगा।

14 Jun 2019

गरमी नहीं बरत रही नरमी


प्रचंड बहुमत के बाद गरमी भी प्रचंड पथ पर चल पड़ी है। चाहे इसे ईर्ष्या कहें या प्रतिस्पर्धा। अब तो जब तक बारिश से मुठभेड़ नहीं हो जाती उससे पहले रोकने से भी रुकने वाली नहीं है। चाहे आड़े अंधकार आए या तूफान आए। तब तक आगे बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता। जब तक सूर्यदेव का समर्थन प्राप्त है। इन दिनों सूर्य कुपित है। आग बरसा रहा है। इससे दुश्मनी मोल लेने पर वही हालत होगी। जिनकी इस समय प्रचंड बहुमत न मिलकर चंद मिलने पर हो रही है।

इनका मुखिया गम में डूबा हुआ है। चिंतन कर रहा है।अपना इस्तीफा देने को तैयार बैठा है। लेकिन लेने को कोई तैयार नहीं। अजीज यार भी हार की समीक्षा करने में लगे हुए हैं। आखिर चूक कहां पर हुई है। बादल बने भी थे। गरजे भी थे। बिजली भी चमकी थी। हवा भी चली थी। हल्की-फुल्की बौछार भी आई थी। इसके बावजूद मेघ हम पर मेहरबान न होकर उन पर इतने मेहरबान हो गएवो जलमग्न हो गए और हम सूखाग्रस्त ही रह गए। 
अब इन्हें कौन समझाएक्या इन्हें खुद को पता नहीं है। मेघ हवा का रुख देखकर बरसते हैं। जिधर की हवा चल रही होती है। उधर हो लेते हैं। हवा उसी दिशा में चलती है। जिस दिशा में उसका वेग होता है। बदलती तभी है,जब वेग मंद या तीव्र होता है। उस समय घनघोर काले बादलों को न देखकर हवा का रुख देख लिए होते तो इतनी बुरी स्थिति नहीं होती। खैर,जो हुआ,सो हुआ। मगर ऐसे ही चलता रहा तो आगे अकाल पड़ना निश्चित है। तब हम कहीं के भी नहीं रहेंगे। शायद यही सोचकर साठ पार्षदों ने अपने भविष्य का विकल्प निश्चित किया हो।
लेकिन प्रचंड पथ पर निकल पड़ी गरमी का क्या करेंसीलिंग फैन डिवाइडर पर भी ब्रेक नहीं लगा रही है। कूलर को कुचलती हुई इतनी तीव्र गति से चल रही है कि देखकर,एयर कंडीशनर की पतलून गीली होने को है।समय रहते हुए बारिश से मुठभेड़ नहीं हुई तो गरमी बिल्कुल भी नरमी नहीं बरतने वाली है। फिर तो प्रचंड बहुमत की तरह प्रचंड रिकॉर्ड कायम करके ही रुकेगी। 
कहीं ऐसा तो नहीं बारिश भी समुद्र किनारे बैठकर चिंतन में कर रही हो। अबके वर्ष बरसना है या नहीं बरसना है। बरसना है तो कहां पर बरसना है। इसको लेकर बादलों से मंथन कर रही हो। बादल कह रहे हो कि अभी तो गरमी अपने प्रचंड पथ पर हैं। इसको अबकी बार अपना लक्ष्य प्राप्त करने दे। हर बार हम इसके लक्ष्य में बाधा बन जाते हैं। क्यों ना अबकी बार बाधा न बनकर प्रोत्साहित करें और गरमी से कहीं की तू अपने लक्ष्य की ओर आगे बढ़ती रह। हम तो सांयकाल भी छाया नहीं करेंगे। भरी दोपहरी वाली ही तेज धूप ही बरकरार रखेंगे। अगर संभवतःऐसा संभव हो गया तो गरमी के पंंख लग जाएंगे। फिर यह प्रचंड पथ पर चलेगी नहीं,उड़ेगी। एक बार इसने उड़ान भर ली तो यह समझ ही अपना लक्ष्य पूरा करके ही लैंड करेगी।

12 Jun 2019

चिलचिलाती धूप में जिंदगी की चकमक


मेरी चलती बाइक के बाएं शीशे पर एकाएक चिलचिलाती धूप की ऐसी चमक पड़ी कि शीशा चटक गया,जिसमें से पीछे सरपट दौड़ते वाहनों को निहारना मुश्किल हो गया। समीप चलते वाहन दूर और दूर चलते समीप दिखने लगे। ट्रक बस दिखने लगी और बस ट्रक दिखने लगा। स्पीड सुई रूठकर अस्सी से चालीस की हो गई,जिसके कारण चलती बाइक पर भी चिलचिलाती धूप आलपीन की तरह चुभने लगी।
हेलमेट का शीशा उठाकर देखने लगा तो आंखें चौंधियाने लगी। बगैर शीशे में देखे बिना बाइक चलाना मौत को बुलाना है। यह सड़क किनारे लगे एक बोर्ड पर लिखा था। सड़क किनारे लगे बोर्डों पर लिखे आदर्श वाक्य को पढ़कर चलने वाले इतनी दूर चले जाते हैं कि कभी वापस नहीं आते और पढ़कर पालन करने वाले यही घूमते-फिरते रहते हैं।
दाएं शीशे को पीछे बैठी प्रेयसी के चेहरे पर सेट कर रखा था ताकि गरमी का एहसास नहीं हो। गरमी हैं कि रत्ती भर भी नरमी नहीं बरत रही थी। वह भी मेरी तरह अपने प्रचंड पथ पर तीव्र गति से चल रही थी। और उसकी प्रेयसी लू तो मेघ की छांव में भी पूरी वेग से चल रही थी। जबकि मेरी प्रेयसी चिपक कर बैठने के बजाय मुँह पर दुपट्टा बांधकर मेरी पीठ में मुँह छुपाए बैठी थी।
बाइक रोककर सड़क किनारे किसी पेड़ की छांव में पांव रखने का मन इसलिए नहीं कर रहा था कि धूप धूम मचाने लग गई थी। और बाएं शीशे ने स्पीड कम कराकर बाइक पर रोमांस का जो मजा था,उस पर साइड नहीं मिलने पर हॉर्न बजाकर आगे निकलने वाले वाहनों ने पानी फेर दिया था। उस समय घर पहुंचकर कूलर की गूलर जैसी हवा खाने की स्पीड पर भी बाइक नहीं चल रही थी और प्रेयसी सीलिंग फैन की स्पीड पर चलाने के लिए बार-बार जोर दे रही थी क्योंकि चिलचिलाती धूप उसे भी अपनी गिरफ्त में ले चुकी थी। उसके माथे पर पसीने की बुंदे मोती की तरह चमकने लगी थी। 
शुक्र है कि शीशा चटकर लटका नहीं। लटक जाता तो नीचे गिरता और नीचे गिरता तो पिछले टायर के नीचे आता और टायर के नीचे आता तो टायर पंचर होता। टायर पंचर हो जाता तो प्रेयसी से ब्रेकअप होना  सुनिश्चित था क्योंकि भरी दुपहरी में वह पैदल  चलती नहीं और मेरे अकेले से पंचर बाइक दो कदम भी नहीं चलती। ऐसी स्थिति में इजहार नहीं तकरार होती। तकरार में ब्रेकअप स्वाभाविक है।

9 Jun 2019

पड़ोसी ही पड़ोसी के काम आता है


मैं अपने पड़ोसी से उतना ही दुखी हूँ। जितना की आम आदमी बढ़ती महँगाई से है। गरीब गरीबी से है। बेरोजगार बेरोजगारी से है। उसकी रोज-रोज की उधारी से मुझे ब्लड प्रेशर की बीमारी हो गई है। वह इतना मीठा बोलता है,जैसे कि उसकी वाणी में मिश्री घुली हुई हो। उसके मीठे बोल सुनकर कहीं मुझे शुगर नहीं हो जाए। इस डर से वह जो भी चीज लेने आता हैं,मैं तत्काल दे देता हूँ। लेकिन वह तत्काल को आपातकाल में भी वापस नहीं करता है। कहता है कि मालामाल के क्या मांगे आपातकाल। उसके मुँह से मालामाल शब्द सुनकर मेरे मुँह से भी निकल जाता है कि तेरे मुँह में घी शक्कर। घी शक्कर का नाम सुनते ही उसके मुँह में पानी आ जाता है और वह उसी वक्त घी शक्कर मांग लेता है।
मौके पर चौका मारने में कभी नहीं चूकता है। मौके की तो वाइड गेंद को भी नहीं छोड़ता है। उस पर भी ऐसे घुमाकर मारता है कि गेंद सीधी मौके की बाउंड्री पर जाकर गिरती है। उस पर गुस्सा तो बहुत आता है। लेकिन वह मुझे गुस्सा थूकने वाला पान खिला देता है। जिसको खाने से मेरा सातवें आसमान पर चढ़ा गुस्सा भी उतर आता है और चेहरा चमक जाता है। चेहरे पर चमक देखकर वह नमक तक माँग लेता है। उसे माँगने में कतई शर्म नहीं आती है। शर्म को तो उसने खूँटी के टाँग रखा है। आएगी कहाँ से। बेझिझक आता है और जो चाहिए वह लिया जाता है। कोई मना कर दे तो मनुहार करके उसे खुश कर देता है। फिर वह खुशहाली में थाली भरकर देता है। खाली हाथ तो कभी नहीं लौटा है। बच्चों के गाल सहलाकर दाल तो इतनी ले जा चुका है,चुकाए तो उसके बाल तक बिक जाए। गृहस्थी की सरकार घाटे में चल रही है,ऐसा कहकर आटा तो आए दिन लेने आ जाता है। डाटा की तो पूछिए मत। हॉटस्‍पॉट ऑन करने के लिए सुबह चार बजे से ही  मिस कॉल पर मिस कॉल देने लगता हैं।
आदत से इतना लाचार हैं कि आचार तक नहीं छोड़ता है और विचार-विमर्श इस तरह करता है,जैसे कि बहुत बड़ा विचारक हो। जबकि विचारक कम प्रचारक ज्यादा है। क्योंकि वह गोपनीय बात का भी प्रचार-प्रसार करे बिना नहीं रहता है। सच पूछिए तो,मेरे तो किसी भी काम के लायक नहीं हैफिर भी मांगने पर उसे अपनी बाइक देनी पड़ती है। नहीं दूं तो भय रहता है,पड़ोसी धर्म संकट में नहीं पड़ जाए। क्योंकि मैं धर्म के मामले में बहुत धार्मिक हूँ। वह इसी का फायदा उठाता है। जामन के लिए भी आधी रात में आकर दरवाजा खटखटा देता है। गहरी नींद में सोया हो तो भी जगा देता है। वक्त की नजाकत देखकर भाषा शैली का प्रयोग करता है। डिस्टर्ब करके कहता है कि डिस्टर्ब के लिए क्षमा चाहता हूँ। दरअसल क्या है कि जावन को बिल्ली चाट गई। भले ही रखना भूल ही गया हो,लेकिन कहेगा हमेशा यही कि बिल्ली चाट गई।

इतना चतुर चालाक है कि लोमड़ी तक को अपनी गिरफ्त में कर लेता है। मुझे ही देख लो! मेरी उँगली पकड़ता-पकड़ता पहुँचा पकड़ लिया है। मुझे डर है कि गर्दन नहीं पकड़ ले। किसी दिन गर्दन पकड़ ली तो क्या होगाजो माँगेगा वही देना पड़ेगा। नहीं दिया तो जान से हाथ धोना पड़ेगा। लेकिन मेरी पत्नी को पूरा विश्वास है,वह विश्वासघात तो कभी नहीं करेगा। उसे क्या मालूम नहीं,तुमने कभी उसको आलू के लिए भी मना नहीं किया है। ईमेल बाद में किया है,पहले उसे तेल दिया है। तुम्हें मारकर वह अपनी उधार की दुकान क्यों बंद करेगाबल्कि वह तो तुम्हारी लंबी उम्र की दुआ करता होगा। वह और दुआ। कल ही मना कर दूं तो स्वाहा कर देगा।
मेरा यह पड़ोसी आलू प्याज ही नहींबल्कि ब्याज के नाम पर रुपया तक ले जाता है। लेकिन जब देने आता है तो मूल रकम तो अदा कर देता हैपर ब्याज जीम जाता है। मांगता हूँ तो बहानेबाजी कर जाता है। यह बहानेबाजी में भी अव्वल है। ऐसा बहाना बनाता है कि यकीन नहीं हो तो भी यकीन करना पड़ता है। कभी खुद तो कभी बीबी-बच्चों को बीमार कर देता है। खाँसी जुकाम को भी गंभीर बीमारी का रुप देकर घर बैठे को आईसीयू में भर्ती कर देता है। झूठ की पराकाष्ठा तक को लाँघने में कतई नहीं झिझकता है। आँख मूंदकर छलांग लगा देता है। क्योंकि यह  झूठपाखंड जैसी कलाओं में कलाकार आदमी है। सच कहूं तो यह पड़ोसी नहीं एक बला हैजो कि टालने से भी नहीं टलती है। 
मेरे इस पड़ोसी की एक अहम बात तो बताना भूल ही गया। इसका एक आदर्श वाक्य हैं,जिसका उच्चारण करना कभी नहीं भूलता है। जब भी कुछ लेकर जाएगा तो अपना आदर्श वाक्य 'पड़ोसी ही पड़ोसी के काम आता हैअवश्य बोलकर जाएगा। लेकिन मेरा यह पड़ोसी मेरे तो आज तक किसी काम नहीं आया है। सिर्फ नाम का पड़ोसी है। मेरा तो छोटा सा भी काम हो तो आनाकानी कर जाता है। खुद का काम हो तो थूक के आँसू लगाकर करवा लेता है। इससे कैसे पीछा छुड़ाऊ। समझ में ही नहीं आता है। किसी से राय-मशवरा करता हूँ तो वो भी वहीं सलाह देते हैं,जो कि उसके आदर्श वाक्य में निहित है। बोलते हैं कि आप भी कैसी बात करते होपड़ोसी के प्रीति मन में जो भ्रम है,उसे निकाल दो। एक पड़ोसी ही पड़ोसी के काम आता है। यह सुनकर मैं निरुत्तर हो जाता हूँ।

7 Jun 2019

गरमी के आगे सब फेल

इन दिनों गरमी जमकर कहर बरसा रही है। टेंपरेचर अपने पुराने रिकॉर्ड तोड़ने पर तुला हुआ है। धूप सुबह से ही चुभन भरी धूम मचाने लग रही है। लू मेघ की छांव में भी पूरे वेग से चल रही है। पेड़-पौधे झुलसकर औंधे मुंह हुए पड़े हैं। इनकी छांव में पांव रखने का भी मन नहीं कर रहा है।  टहनियां इतनी गरम हो रही हैं कि बेजुबान पक्षी उन पर बैठ नहीं पा रहे हैं। श्वानों की जीभ अंदर नहीं जा रही है। बाहर ही लटकी हुई लार टपका रही है। इस वजह से वो भौंक भी नहीं पा रहे हैं। हांफ रहे हैं। इनकी हांफ का चोर फायदा उठा रहे हैं। श्वान बाहुल्य क्षेत्र में भी चोरी करते हुए नहीं डर रहे हैं।

कल तक जोर-जोर से चिल्लाने वाले भी चिलचिलाती धूप के आगे चुप बैठे हुए हैं। उन्हें पता है कि चिलाएंगे तो गला सूखेगा। गला सूखेगा तो प्यास लगेगी। प्यास बुझाने के लिए,मटकेेेे तक जाना पड़ेगा। मटका है कि खाली पड़ा हैैं। फ्रिज में बोतल रखी है। लेकिन बिजली मनचली हो रही है। कब आ जाए और कब चल जाए कोई पता नहीं। इसलिए कोल्ड ड्रिंक की ढाई लीटर की बोतल पर बोरी की टांट बांधकर,उसमें पानी भरकर अपनेे सिरहाने रखे हुए हैं। एक घंटे में एक घूंट पीकर फिर वापस रख देते हैं। ताकि बोतल खाली नहीं हो जाए।
लेकिन पक्षियों को कोसों दूर उड़ान भरने के बावजूद भी दो बूंद पीने को पानी नहीं मिल रहा हैं। सूखी पड़ी टोंटियों में अपनी चोंच मार-मारकर चेक कर रहे हैं। इस चक्कर में कईयों की तो चोंच के मोच आ गई है। फिर भी हौसला बुलंद है। हतोत्साहित न होकर, अपनी प्यास बुझाने के लिए
यहां से वहां उड़ान भर रहे हैं। एक हम हैं,जो गरमी से जरा सा भी मुकाबला नहीं कर पा रहे हैं।गरमी को देखते ही सिर पर पांव रखकर सीलिंग फैन के नीचे आराम फरमाने में मशगूल हैं। लेकिन इन दिनों गरमी के आगे सीलिंग फैन भी फेल है। कूलर भी गूलर की हवा खानेेे निकल गया है और पीछे गर्म हवा छोड़ गया है।

5 Jun 2019

फेसबुकिया प्रकृति प्रेमी

उसे प्रकृति से प्रेम है। यह प्रदर्शित करने के लिए,रोज फेसबुक पर लाइव आता है। प्रकृति के बजाय अपने बारे में ज्यादा बताता है। मैंने यह किया। वह किया। एक ही बात को दस बार दोहराता है। फिर भी यह समझ में नहीं आता है कि आखिरकार कहना क्या चाहता है। मगर उसके हर वक्तव्य का एक ही तात्पर्य होता है कि मुझे प्रकृति से प्रेम है।

प्रकृति है कि उसे लाइक तक नहीं करती। प्रकृति का कहना है कि उसने मेरे लिए किया ही क्या है,जो कि उसे अपने लायक समझू। वह तो नालायक है। उसने जिंदगी में कभी एक पौधा तक लगाया नहीं और फेसबुक पर पूरा का पूरा उद्यान दिखा देता है। यह देखिए, मेरे द्वारा लगाया गए उद्यान का मनोरम दृश्य। दूसरों को पेड़-पौधे नहीं काटने की नसीहत देता है और खुद लकड़ियों का व्यापार करता है। फेसबुक पर जल व्यर्थ मत बवाइए का हैशटैग लगाकर जल बचाने की पहल करता है। जबकि खुद ट्यूबवेल चलाकर स्नान करता है। ऐसे प्रेमी से प्रेम करने से अच्छा है कि चारों ओर फैल रहे पर्यावरण प्रदूषण को पीकर अपनी जीवन लीला समाप्त कर लूं। लेकिन मुझे अपने लिए नहीं,इस सृष्टि के लिए जीना है। क्योंकि सृष्टि है तो मैं हूँ और मैं हूँ तो सृष्टि है। इसके जैसे प्रेमी तो न जाने कितने आए और कितने गए। ऐसी प्रवृत्ति के लोग सस्ती लोकप्रियता प्राप्त करने के लिए ही फेसबुक पर लाइव आते हैं। रियल लाइफ में कभी लाइव नहीं आते हैं।
यह प्रेमी को थोड़ी पता है। प्रकृति उसे पसंद नहीं करती है। पता होता तो अब से पहले सोशल मीडिया पर बवाल खड़ा कर देता। मैं प्रकृति को अपने आप से भी ज्यादा चाहता हूँ। फिर भी इग्नोर कर रही है। जबकि मैंने प्रकृति के लिए क्या नहीं किया। धरना दिया। प्रदर्शन किया। ज्ञापन सौंपा। रैलियां निकाली। स्कूल व कॉलेजों में सेमिनार आयोजित किए। अखबारों में प्रेस विज्ञप्ति देकर बिगड़ते पर्यावरण पर चिंता व्यक्त की। अखबार में छपी खबर को फेसबुक पर चिपकाकर आमजन को जागरूक किया। नहीं मैं सम्मान का भूखा हूँ और नहीं ही पुरस्कार का प्यासा हूँ। भारत का वासी हूँ। प्रकृति का ही सच्चा साथी हूँ। कुछ इस तरह से फेसबुक पर लाइव आकर बकवाद करता।

पर्यावरण दिवस की पूर्व संध्या पर तो प्रकृति प्रेमी अपना प्रेम उसी तरह इजहार करता है। जिस तरह एक प्रेमी वैलेंटाइन डे पर करता है। प्रकृति के बजाय फेसबुक लाइव के संग बिताए सुनहरे पलों को याद करते हुए लोगों से फरियाद करता है। प्रकृति संकट में हैं। समय रहते नहीं बचाया गया तो बहुत भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है। नदियों का गला सूख गया है। कुआँ बावड़ी तो कब की ही अपनी जीवन लीला समाप्त कर चुकी हैं। पहाड़ तिल-तिलकर अपनी जान गवा रहे हैं। जल रसातल में डूबकर मरने को तैयार बैठा है। यह फरियाद भी इस तरह से करता है,जैसे कि देश का प्रधानमंत्री देशवासियों को संबोधित कर रहा हो। इस दिन प्रकृति के संग जीने मरने की झूठी कसमें तो इस तरह से खाता है,जैसे कि गाजर मूली खा रहा हो। मगर प्रकृति इसकी रग-रग से वाकिफ है।
भले ही वह खुद के भले के लिए फेसबुक पर लाइव आता हो। मगर हम तो पर्यावरण दिवस के सिवाय प्रकृति के बारे में कभी सोचते भी नहीं है। उससे सुख दुख भी नहीं पूछते हैं। किस हालात में जी रही है। जबकि प्रकृति हमारा पूरा ख्याल रखती है। तो क्यों नहीं  इस पर्यावरण दिवस पर प्रण ले कि हम जब तक जिएंगे, तब तक प्रकृति के खरोंच भी नहीं आने देंगे।

23 May 2019

एग्जिट पोल की नियति


चुनाव संपन्न होने के बाद सबकी निगाहें परिणाम पर उसी तरह टिकी हुई है,जिस तरह से आसमान में उड़ते गिद्ध की निगाहें अपने शिकार पर टिकी हुई होती हैं। किसका परिणाम क्या होगा? यह जानने की उत्कंठा में टीवी के सामने रिमोट लेकर बैठे लोग दूसरा चैनल इसलिए नहीं बदल पा रहे हैं,उन्हें डर है कि दूसरा चैनल बदलते ही कहीं चुनाव परिणाम नहीं बदल जाए।

चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशी भी अपने परिणाम की प्रतीक्षा में उसी तरह बेचैन हैं। जिस तरह से एक विद्यार्थी अपने परीक्षा परिणाम के आने से पूर्व बेचैन हो जाता है। जिस तरह से परिणाम के दो दिन पहले से विद्यार्थी की धड़कन अचानक सामान्य गति से तेज चलने लगती हैं। ठीक उसी तरह से प्रत्याशियों की धड़कन भी तेज होती जा रही हैं। इस चक्कर में कईयों को तो रात्रि में नींद नहीं आ रही हैं। करवटें बदल-बदलकर रात काट रहे हैं। लेकिन आज के बाद करवटें बदलने की जरूरत नहीं पड़ेगी।  जो जीतेगा वह खुशी में और जो हारेगा वह गम में सो नहीं पाएगा
एग्जिट पोल वाले नतीजे उसी तरह बता रहे हैं,जिस तरह अखबार के राशिफल में राशि बताते हैं। जिस तरह हम अपनी राशि पढ़कर,कभी खुशी से झूम उठते हैं तो कभी निराश होकर हतोत्साहित हो जाते हैं। ठीक उसी तरह की स्थिति एग्जिट पोल के नतीजों को देखकर हो रही है। सत्ता पक्ष पुलकित है और विपक्ष खामोश है। एग्जिट पोल के कारण कई प्रत्याशियों का ब्लड प्रेशर स्थिर नहीं हो पा रहा है। जिनका हाई है,उनका लो हो रहा है और जिनका लो है उनका हाई हो रहा है। दोनों ही बीपी की गोलियां गटक रहे हैं। इनके परिजन इन्हें नसीहत दे रहे हैं कि अकेले टीवी के सामने बैठकर परिणाम मत देखिएगा। कहीं परिणाम के चक्कर में प्राण नहीं निकल जाए। आपके प्राण है तो आपको और हमारे को लोगों का प्रणाम मिल रहा हैं। प्राण नहीं रहेंगे तो कोई प्रणाम भी नहीं करेगा। चुनाव का क्या है? चुनाव तो आते-जाते रहते हैं। लेकिन प्राण चले गए तो फिर कभी लौट कर नहीं आएंगे।
लेकिन आज जब ईवीएम से निकलने वाला परिणाम चौंकाने वाला आएगा। तब एग्जिट पोल वालों पर ठीकरा फोड़ने के बजाय ईवीएम पर ठीकरा फोड़ते नजर आएंगे। जबकि ईवीएम का परिणाम अंतिम सत्य है। मगर पराजित इस सत्य को मानने को तैयार ही नहीं होता है। उसे लगता है कि जरूर ईवीएम के साथ छेड़छाड़ की गई है। अन्यथा मैं तो बहुत ज्यादा वोटों से जीत रहा था। 
यह तो आज ही पता चल जाएगा। नतीजे एग्जिट पोल के मुताबिक होंगे या फिर विपरीत होंगे। मगर होंगे दोनों में से किसी एक ही दृष्टि में। इनके अलावा तीसरे और चौथे दृष्टिकोण से तो होने से रहे। क्योंकि एग्जिट पोल वाले जो ढोल बजा रहे हैं। उस पर पड़ने वाली थाप या तो आज एकदम से तेज हो जाएगी या फिर एकदम से बंद हो जाएगी। यही एग्जिट पोल की नियति है। जिसकी जो नियति होती है,उसका उसी तरह से अंत होता है। -- 

13 May 2019

नित्येन्द्र मानव के लिए मानव सेवा ही सर्वोपरि सेवा

थानागाजी गैंगरेप प्रकरण की पीड़िता को न्याय दिलाने के लिए सर्व समाज की एकजुटता वाकई में सराहनीय है। सब यही चाहते हैं कि पीड़ित को  न्याय मिले और आरोपियों को कठोर से कठोर सजा हो और कोताही बरतने वाले उन सभी पुलिस कर्मियों व अधिकारियों पर ऐसी कार्रवाई हो कि भविष्य में फिर कभी कोताही का ऐसा उदाहरण सामने नहीं आए। 
लेकिन इस आंदोलन में शुरुआत से लेकर अब तक एक शख्स ऐसा भी है जो कि सुर्खियां न बटोरकर रोज सुबह अपने निवास स्थान पावटा से 50 किलोमीटर चलकर थानागाजी पीड़िता को न्याय दिलाने के लिए आ ही नहीं रहा है,बल्कि सक्रिय भूमिका निभा रहा है। यह कोई अधिकारी नहीं और ना ही किसी राजनीतिक पार्टी का नेता है। विनम्रता के हिमालय,उदारता के सिंधु, सरलता के सागर, चुम्बकीय आकर्षण वाला व्यक्तित्व, ओजस्वी वक्ता,आमजन की पीड़ा से द्रवित हो उठने वाले एक आदर्श व्यक्तित्व के धनी व सामाजिक संगठन ‘जीवन बचाओ आंदोलन’ के मुख्य संयोजक नित्‍येन्‍द्र मानव है। ऐसा भी कतई ही नहीं है कि मानव इसी आंदोलन में ही अपनी सक्रिय भूमिका निभा रहा है। इससे पूर्व भी सामाजिक सरोकारों में अपनी महती भूमिका निभाते आए हैं। 
                                      


पिछले 18 वर्षों से सामाजिक क्षेत्र में पूर्णकालिक रूप से सक्रिय हैं । पर्यावरण संरक्षण,जल संरक्षण, सड़क सुरक्षा,अनुसूचित जाति व जनजाति के संवैधानिक अधिकार,समता मूलक समाज की स्थापना, घुमन्तु समाज के लिए स्थाई आवास सहित जनहित से जुड़े हुए अनेकोंअनेक मुद्दों को लेकर संघर्ष करते रहते हैं । इनके द्वारा किए गए,जन आंदोलन,धरना-प्रदर्शन,आमरण अनशन,पर एक दृष्टि डालें तो एक ऐसी तस्वीर दिखाई देती है जो वाकई में प्रशंसा लायक है।
पिता बाबूलाल आर्य व माता संतरा देवी के घर में 31 जनवरी 1979 को जन्मे मानव के पुरजोर संघर्ष का ही नतीजा है कि राज्य में चल रहे हजारों अवैध क्रेशर व खानों को बंद करवाया गया । कोटपुतली क्षेत्र में अवैध खनन में लिप्त लोगों पर लगभग 500 करोड़ का जुर्माना लगवाया। जुर्माना राशि जमा नहीं करवाने पर अवैध खनन में लिप्त लोगों के खाते सीज किये गए,उनकी चल-अचल संपत्ति,जमीन,वाहन,व मकान आदि के बेचान पर रोक लगाई गई। बहुत से लोगों की खातेदारी जमीन को सरकारी जमीन घोषित किया गया। इस दौरान खनन माफिया से जुड़ लोगों द्वारा इनको जान से मारने की धमकिया भी दी गई,मगर यह डर नहीं,बल्कि डटकर मुकाबला किया। राज्‍य सरकार ने इनकी सुरक्षा के लिए एक गनमैन पुलिस कर्मी भी लगा रखा । ताकि इनके साथ कोई अनहोनी घटित नहीं हो । 
जिन गांवों में दबंग लोग दलितों को घोड़ी पर बैठ कर बिंदोरी ,निकासी नहीं निकलने देते थे। ऐसे दर्जनों गांवों में मानव के प्रयासों से दलित दुल्हों को घोड़ी पर बिठाकर बिंदोरी व निकासी निकलवाई गई और भविष्य में घोड़ी पर बैठना संभव हो पाया। सच पूछिए तो इनके प्रयासों से आसपास के क्षेत्र में दलितों पर होने वाले अत्याचारों पर भारी गिरावट आई है । 
हाल ही में तरुण भारत पर्यावरण संरक्षण अवार्ड 2019 से सम्मानित हुए,नित्‍येन्‍द्र मानव ने उन सैकड़ों घुमन्तु समाज के लोगों को नि:शुल्क रूप से भूमि आवंटित करवाई हैं। जिनके पास रहने के लिए अपना स्थायी आशियाना नहीं था और बहुत से लोगों को आवास हेतु अनुदान राशि स्वीकृत करवाई हैं। ताकि घुमंतू समाज के लोग भी समाज की मुख्यधारा से जुड़ पाए। इनके द्वारा अनेकों बार नि:शुल्क चिकित्सा शिविर लगाए गए । समाज कल्याण से सम्बंधित विकलांग विधाओं व वृद्धाओं  को लेकर राजकीय एजेंसियों को साथ मिलकर अनेकों बार शिविर लगाए गए ।

नित्‍येन्‍द्र मानव का कहना है कि जो हमें यह जो मानव जीवन मिला है । वह मानव के कल्याण में ही काम नहीं आए तो यह मानव जीवन जीना व्यर्थ है। कभी भी कहीं पर भी किसी भी मानव पर अगर  मानवता को शर्मसार करने वाला अत्याचार हो रहा है और आप मूकदर्शक हो कर देख रहे हैं तो सबसे बड़े गुनहगार आप हैं। अपने हक की लड़ाई लड़ने के लिए व्यक्ति को हमेशा तत्पर रहना चाहिए ।


वैसे तो मानव अनेक पुरस्कारों से नवाजा जा चुके हैं। लेकिन अहम पुरस्कारों की बात की जाए तो 2006 में  जिला प्रशासन द्वारा सम्मानित किया गया। 2010 में नेशनल गोडफ्रे फिलिप्स सोशियल ब्रेवरी अवार्ड मिला। 2011 में दैनिक भास्कर जल स्टार अवार्ड देकर सम्मानित किया गया। 2018 में बी टी एस गौरव अवार्ड व 2019 में तरुण भारत पर्यावरण संरक्षण अवार्ड से नवाजे जा चुके हैं। नित्‍येन्‍द्र मानव के द्वारा पावटा कस्बे में गत 5 वर्षों से बाबा साहब बी आर अंबेडकर की जयंती के उपलक्ष्य पर भीम भोज का आयोजन किया जा रहा है । इस दिन सभी समाज के लोग भोजन करते हैं,जो कि सामाजिक समरसता का बहुत बड़ा उदाहरण है। मोहनलाल मौर्य

9 May 2019

आखिर महिलाओं के साथ उत्पीडऩ कब तक?


थानागाजी गैंगरेप की घटना निर्भया कांड से भी बड़ी है। इस घटना ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया है। हर कोई स्तब्ध है घर से बाइक पर सवार होकर निकले दंपत्ति को घर से थोड़ी दूर आगे ही दुहार चौगान मार्ग पर दो बाइकों पर सवार पांच युवकों ने उनके आगे बाइक लगाकर पहले तो उनके साथ मारपीट की बाद में सड़क से दूर रेत के ऊंचे टीलों के बीच में ले जाकर दोनों के कपड़े उतार दिए। फिर पति को बंधक बनाकर उसकी आंखों के सामने ही पत्नी के साथ बारी-बारी से 6 बार बलात्कार करके अपनी दरिंदगी का मोबाइल से वीडियो तक बना लिया। उस समय दंपत्ति खूब चीखें,पुकारे भी,मगर दरिंदे बहुत ही शातिर थे, उनको ऐसे ऊंचे रेत के टीलों बीच में ले गए थे, जहां से उनकी चीख-पुकार टीलों से बाहर निकली नहीं पाई। दरिंदों ने  ढाई घंटे तक दरिंदगी की।
26 अप्रैल की घटना का मामला 2 मई को दर्ज होता है। वो तब,जब पीड़ित 30 अप्रैल को  पुलिस अधीक्षक के समक्ष पेश होते हैं और आपबीती बताते हैं। पुलिस अधीक्षक के निर्देश पर थानागाजी की पुलिस गुपचुप में मामला तो दर्ज कर लेती है,लेकिन चुनाव का हवाला देकर मामले को 5 दिन तक दबाए रखती है। यहाँ पर कई सवाल खड़े होते हैं। आखिरकार पुलिस मामले को 5 दिन तक क्यों दबाए रखी? तत्परता से अपेक्षित कार्रवाई क्यों नहीं की गई? इस घटना का चुनाव से क्या संबंध था? क्या किसी राजनीतिक षड्यंत्र के तहत मामले को दबाया गया था? अच्छा पुलिस तो नींद से तब जगी,जब दरिंदों ने अपनी दरिंदगी का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया था। जनता के आक्रोश के बाद आनन-फानन में पुलिस की 14 टीम गठित की जाती हैं। अभी तक तीन आरोपी गिरफ्तार हुए हैं। जबकि मुख्य आरोपी अभी तक पुलिस के हाथ नहीं लगे हैं।
इसी क्षेत्र में इससे पूर्व भी इस तरह की घटनाएं हो चुकी हैं। इस गैंगरेप के दूसरे दिन ही एक और गैंगरेप का मामला सामने आया है। यह भी थाना अधिकारी के पास 2 दिन पहले आ गया था। लेकिन इस मामले को भी दबा दिया गया। हालांकि इसके मुख्य आरोपी को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। यहां पर पुलिस की कार्य प्रणाली पर प्रश्न उठते हैं और सरकार भी सवालों के घेरे में घिरती है। हालांकि थानागाजी गैंगरेप मामले में एसपी ने थाना अधिकारी को निलंबित कर दिया और एसपी को सरकार ने एपीओ कर दिया है। लेकिन क्या थाना अधिकारी को निलंबित और एसपी को एपीओ करने से पुलिस की कार्यप्रणाली पर प्रभाव पड़ेगा।
इस घटना को लेकर जनता में इतना आक्रोश है कि मुख्य आरोपी अतिशीघ्र गिरफ्तार नहीं किए गए तो देश में जगह-जगह आंदोलन होने की पूरी आशंका है। लेकिन एक अहम सवाल खड़ा होता है कि इस तरह गैंगरेप की घटनाएं आखिर कब तक होती रहेगी। कब तक ऐसे वहशी दरिंदे हमारी बहन-बेटियों को नोचते रहेंगे। आखिर कठोर कानून के बावजूद भी इस तरह के अपराधियों के हौसले बुलंद क्यों हैं? क्यों आए दिन मासूम बच्चियों के साथ दुष्कर्म होते हैं? इन सब के पीछ आखिरकार जिम्मेदार कौन है? आखिर महिलाओं की सुरक्षा किसके भरोसे हैं। 


आज समूचे देश में ऐसी कोई जगह नहीं बची होगी। जहां छेड़छाड़,लूटपाट,दुष्कर्म व हत्या की घटना घटित नहीं हुई हो। विकृत प्रवृत्ति के भेडि़ए अपनी हवस पूरी करने के लिए,मासूमों को भी नहीं छोड़ते। शायद ही ऐसा कोई दिन होगा। जिस दिन देश के किसी कोने से यौन हिंसा की खबरें अखबारों में नहीं आई हो। अखबारों में तो वे ही हेडलाइन होती है। जिनका मामला पुलिस में दर्ज हो जाता है या फिर सोशल मीडिया पर वायरल हो जाती हैं। महिलाओं से जुड़ी बहुत सी जघन्य घटनाएं तो सामाजिक प्रतिष्ठा के कारण उजागर ही नहीं हो पाती है। परिजन मामले को इसलिए दबा लेते हैं कि समाज में हमारी प्रतिष्ठा पर प्रश्नवाचक नहीं लग जाए। या फिर समाज के रसूखदार कोर्ट कचहरी में जाने से पहले ही मामले को दबा देते हैं। कई बार बलात्कार जैसी वीभत्स घटनाएं अपराधियों के भय के कारण भी उजागर नहीं हो पाती है। क्योंकि अपराधी अपराध करके इस तरह से डराते धमकाते हैं कि पीड़ित सहम जाते हैं।
सच पूछिए तो आज महिलाओं का घर से निकलना दुश्वर हो गया है। स्वयं या घर के कामकाज के लिए,महिलाएं घर बाहर निकलती ही हैं पर, महिलाओं को घर से बाहर निकलते ही,यही भय रहता हैं। कहीं उनके साथ कोई विकृत अनहोनी नहीं हो जाएं। यह खौफ तब तक बना रहता है। जब तक वे घर वापस नहीं आ जाएं। परिजन भी चिंतित रहते हैं। अपनी बेटी,बहु सही सलामत घर पहुंच जाती हैं। तब जाकर परिजन राहत की सांस लेते हैं। अगले दिन फिर यह प्रक्रिया रहती है। महिलाओं का अकेले बाहर निकलना किसी खतरे से कम नहीं। वहशी इसी फिराक में रहते हैं। वे कभी भी और कहीं भी हमला कर सकते हैं। रात सुरक्षित है नहीं। लेकिन दिन का भी कोई भरोसा नहीं।
यदि राजस्थान में अपराधों की घटनाओं के आंकड़ो पर बात की जाए तो राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की वर्ष 2016 की रिपोर्ट के अनुसार राजस्थान में दुष्कर्म के 3656 मामले दर्ज किए गए। इन आंकड़ों के साथ राजस्थान का स्थान देश में चौथे नंबर पर रहा। यदि नाबालिक बच्चियों के यौन शोषण के आंकड़ों पर प्रकाश डाला जाए तो यह आंकड़े चौंका देने वाले हैं। वर्ष 2015 से 2017 के बीच 3 वर्षों में राजस्थान में 3897 बच्चियों के साथ रेप की वारदातें हुईं। इन आंकड़ों के मान से प्रतिदिन तीन नाबालिक बच्चियां यौन अपराध की पीड़ा को सह रहीं हैं। बलात्कार के उम्रवार उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक करीब चालीस प्रतिशत बच्चियां 14 साल तक की उम्र में बलात्कार का दंश झेल रही हैं। वहीं 1877 घटनाएं शारीरिक शोषण की भी दर्ज हुई हैं। 18 फीसदी मामलें ऐसे भी हैं जिनमें पुलिस अपराधियों को न पकड़ पाने के कारण चालान पेश ही नहीं कर पाई,जिसके चलते वे अपराध के बाद भी मुक्त हैं। समाज में महिलाओं के साथ अपराध होना चिंता का विषय है लेकिन अपराध होने के पश्चात पुलिस की कार्यप्रणाली तथा सजा मिलने में देरी उससे भी बड़ी चिंता की बात हैं। जब तक पुलिस की कार्यप्रणाली में तेजी नहीं आएगी अपराधियों में कानून व्यवस्था का भय नहीं बन पाएगा, आवश्यकता तो कानूनी प्रक्रिया में तेजी की भी हैं। 
प्रत्येक चुनाव में महिला सुरक्षा को लेकर बड़ी-बड़ी बातें की जाती है। मगर वे बातें चुनावी शोरगुल में ही घुल मिलकर रह जाती हैं। सरकार महिला सुरक्षा की मुनादी तो खूब करती है। लेकिन जब किसी महिला पर अत्याचार होता है तो चुप्पी साध लेती है। देश में कानून हैं। मगर कानून के रखवाले गहरी नींद में सोए रहते हैं।
दिल्ली के निर्भया कांड के बाद उम्मीद की किरण निकली थी। लेकिन वह भी धीरे-धीरे विलुप्त हो गई। सरकार महिलाओं के संदर्भ में कानून बनाती रहती हैं। लेकिन जिस कानून की महती आवश्कता है। शायद वह आज तक बना ही नहीं। अगर देश में सख्त कानूनी प्रक्रिया होती तो निर्भया कांड ही नहीं होता। अपराधियों का दुस्साहस प्रतिदिन बढ़ता जा रहा। इस दुस्साहस की प्रवृत्ति को रोकना ही होगा। आखिरकार महिलाएं ही अत्याचार की शिकार क्यों होती हैं? जिस पुरूष प्रधान की जन्म जननी नारी है,वहीं पुरूष नारी के साथ उत्पीडऩ क्यों करता है?
महिला सशक्तिकरण की पहल तब सार्थक होगी। जब देश में महिलाओं पर किसी भी तरह का उत्पीडऩ नहीं होगा। नारी के पिछे चलने वाला अपराध बोध। पीछा करना छोड़ देगा। तब सही मायने में महिला सशक्तिकरण चरितार्थ होगी। दकियानूसी जंजीरों से तो महिलाएं स्वतंत्र हो गई। मगर पुरूषों की संशय दृष्टि से स्वतंत्र नहीं हुई। समाज के कई  ठेकेदार महिलाओं के पहनावे पर किचड़ उछालते हैं। पहनावे को जिम्मेदार ठहराना कतई उचित नहीं है। प्राचीन काल में तो कपड़े ही नहीं थे। पेड़ पत्तों की छाल बांधकर अपने शरीर की हिफाजत करती थी। तब महिलाएं सुरक्षित थी। आज सुरक्षित क्यों नहीं? यह बुनियादी सवाल आज भी कायम है। इस तकनीकी युग में ही नारी सुरक्षित नहीं,फिर कब होंगी?अब वक्त आ गया है नारी की सुरक्षा करने का। नारी भावनात्मक पहलुओं की कोमल अभिव्यक्ति है, जिसमें उसका स्वतंत्र भाव समर्पित रूप से समाया हुआ है। 
- मोहनलाल मौर्य