25 May 2020

लॉकडाउन में बुजुर्ग दंपति की व्‍यथा

हमारे मोहल्ले में एक खंडहर नुमा हवेली में रहने वाले नि:संतान बुजुर्ग दंपति हवेली के सामने से गुजरने वाले से दूर से ही यही पूछते हैं कि यह लॉकडाउन कब खुलेगा। गुजरने वाले यही कहते हैं कि जल्दी ही खुलेगा।जब दंपति द्वारा आगे तो नहीं बढ़ेगा पूछने पर बगैर कुछ बताए,वहां से खुद आगे बढ़ जाते हैं। तब आगे बढ़ते को देखकर उनके चेहरे पर चिंता की लकीरें साफ दिख जाती हैं। उनकी खोपड़ी में कोरोना काल के चलचित्र चलने लगते हैं। 
इनको तो कोरोना वायरस के बारे में भी तब पता चला था जब एक संस्था के लोग उन्हें राशन देने आए थे और  समझाकर गए थे कि भूलकर भी हवेली की चौखट मत लांघना। लांघ गए तो हवेली के दरवाजे हमेशा के लिए बंद हो जाएंगे। साथ में कईयों के सिर पर से बाप का साया उठ जाएगा और न जाने कितने ही विधवा व विधुर हो जाएंगे। उस दिन से कोरोना क्या बला है। यह अच्छी तरह से समझ गए थे।
दरअसल में क्या है कि खंडहर नुमा हवेली में इनका दिन में दम घुटता है। दिन में दम इसलिए घुटता है कि खट-खट करते हुए चलने वाला सीलिंग फैन तो है,लेकिन उसे चलाने के लिए बिजली नहीं है। कोरोना काल से पहले लाइनमैन ने बिजली का बिल जमा नहीं कराने के कारण उनका कनेक्शन काट दिया था। बिल इसलिए जमा नहीं करा पाए थे कि बिल की राशि उनको मिलने वाली वृद्धा पेंशन से कहीं ज्यादा आई थी। दोनों को वृद्धा पेंशन इतनी ही मिलती है,जो कि लून,तेल व लकड़ी में ही खर्च हो जाती है। यह तो शुक्र है कि कोटे के गेहूं समय पर मिल गए हैं। वरना खाने के लाले पड़ जाते।

आम दिनों में तो दोनों का दिन कभी इसके तो कभी उसके पास उठने बैठने से आराम से कट जाता था। पर अब काटना मुश्किल हो रहा है। सब घरों के अंदर कैद है। आवाज मारने पर भी बाहर नहीं निकलते हैं। कोई निकल भी आता है तो अपनी शक्ल नहीं दिखाता है। मुंह पर मास्क लगाए रहता है। जिससे पहचानना मुश्किल हो जाता है। यह कौन है? मोहन या सोहन। दिनभर दीवार पर चढ़ती छिपकलियों को देखते रहते हैं। चिड़िया के घोंसले से चू-चू करते बच्चों को निहारते रहते हैं। चहुँओर पसरे सन्नाटे के बीच कभी-कभार कबूतरों की गुटरगू और नीम के पेड़ पर बैठी कोयल की कू-कू की आवाज कानों में पड़ती है,तो उनकी ओर टकटकी लगाकर देखने लग जाते हैं। 
सुबह-शाम हवेली की चौखट पर मुंह पर हस्तनिर्मित मास्क लगाकर बैठ जाते हैं और सूने पड़े रास्ते पर कुत्तिया के पिल्लों की अठखेलियां देखकर थोड़ा बहुत हंस लेते हैं। जब पिल्ले दिखाई नहीं देते हैं,तो नीले गगन के तले उड़ते पक्षियों को गिनने लग जाते हैं। पर किसी से भी मिलने-जुलने नहीं जाते हैं। यहां तक कि चौखट लांघकर पड़ोसी की देहरी तक भी नहीं जाते हैं। जबकि पड़ोसी की देहरी हवेली से पचास फुट दूर भी नहीं है।उन दोनों का कहना है कि चौखट लांघना कोरोना को न्योता देना है।
 मो‍हनलाल मौर्य

17 May 2020

एक व्हाट्सएप ग्रुप की कहानी


मैं एक ऐसे साहित्यिक व्हाट्सएप समूह का सदस्य हूँ,जिसके सदस्यों की सदाशयता देखने लायक है। वे संसद के सदस्यों की तरह साहित्य पर चर्चा करते हैं। चर्चा के दौरान जो सदस्य विषय से हटकर चर्चा करता है, तो उसे ग्रुप के संविधान रिमूव अनुच्छेद के तहत  बाहर निकाल दिया जाता है। 
उसके बाहर जाने के बाद अंदर वाला कोई भी माननीय सदस्य उसे फिर से वापस लाने के लिए  ‘प्रत्यावर्तन विधेयक ग्रुप में पेश कर देता है,तो संसद की तरह उस पर विचार-विमर्श होता है। पक्ष-विपक्ष में उसके साहित्यिक योगदान पर बहस होती है। बहुमत प्राप्त होने के पश्चात विधेयक को ग्रुपपति के पास भेजा जाता है। ग्रुपपति के हस्ताक्षर होने के बाद उस माननीय सदस्य को ससम्मान ऐड पार्टिसपेंटअनुच्छेद के तहत वापस सम्मिलित कर लिया जाता है।ग्रुपपति महोदय अपने विचार विषम परिस्थितियों में ही रखते हैं,क्योंकि सामान्य परिस्थिति में वो विचार रखने की स्थिति में नहीं रहते हैं,साहित्य साधना में तल्लीन रहते हैं। 
ग्रुप में दो माननीय सदस्य को अन्य सदस्यों की प्रकाशित रचनाओं को अलसुबह ही ग्रुप में डालने का गौरव प्राप्त है। यह दोनों सुबह उठते ही सबसे पहले अखबारों के ई-पेपर देखते हैं। अपने ग्रुप सदस्य की रचना दिखते ही क्रॉप करके सीधे ग्रुप में डाल देते हैं। साथ में बगैर पढ़े ही बधाई भी चेप देते हैं। इनकी बधाई के बाद बधाई का सिलसिला देर रात तक जारी रहता है।
कई बार बधाईयों पर प्रतिबंधविधेयक पेश किया गया है और पूर्ण बहुमत से पास भी हुआ है,लेकिन इनका सिलसिला पूर्व की भांति सुचारू रूप से प्रारंभ हो जाता है। इस संदर्भ में ग्रुप का संविधान लचीला है,जिसे कठोर बनाने के लिए एक कोर कमेटी गठित की गई है। 
ग्रुप में एकमात्र वरिष्ठ माननीय सदस्य हैं,जो प्रकाशित रचना पर अपनी आलोचनात्मक टिप्पणी के साथ ही अपने विचार रखते हैं,अन्यथा फिर वह रखते ही नहीं है। यह बधाई में विश्वास नहीं रखते हैं। ऐसा भी नहीं है कि वह बधाई विरोधी है,लेकिन यह रचना का आलोचनात्मक पोस्टमार्टम करना अपना धर्म समझते हैं। वह अपने के प्रति सदैव सजग रहते हैं। थोड़ी सी भी आंच नहीं आने देते हैं। आ जाए तो डिबेट के लिए तैयार रहते हैं।
ग्रुप में तीन-चार माननीय वरिष्ठ सदस्य ऐसे भी हैं,जो सदैव कनिष्ठ सदस्यों की रचनाओं में खामियां निकालकर वाहवाही लूटने में रहते हैं।  गिद्ध की तरह अशुद्ध शब्द पर नजर गड़ाए रखते हैं। दिखते ही पकड़कर रख देते हैं। चाहे शब्द टाइपिंग मिस्टेक की वजह से अशुद्ध हुआ हो,लेकिन ये लोग मानते हैं कि लेखक को शुद्ध शब्द लिखना नहीं आता है।
दो माननीय सदस्य ऐसे हैं,जो कि घटिया से घटिया प्रकाशित लेख को भी प्रशंसा प्रमाण पत्र देकर सम्मानित किए बगैर नहीं रहते हैं। इनकी दृष्टि में प्रकाशित होना भी अपने आप में बहुत बड़ी उपलब्धि है,चाहे उस अखबार का एक भी पाठक नहीं हो। एक लेखक के लिए प्रकाशित का परम सुख ही काफी है। इनके पास ग्रुप के सभी सदस्यों के प्रशंसा प्रमाण पत्र  रखे हुए हैं। बस निकालकर देना ही रहता है। दोनों देने में सदैव अग्रणी रहते हैं। दोनों देते भी अलग-अलग हैं।

कुछेक सदस्य ऐसे हैं,जो कि ग्रुप की हर गतिविधि देखते रहते हैं। लेकिन चुप रहते हैं, कभी भी कुछ भी साझा नहीं करते हैं। ऑनलाइन उपस्थित होने के बावजूद भी अपनी हाजिरी तक नहीं बोलते हैं। जब कभी एडमिन या किसी वरिष्ठ सदस्य द्वारा कार्यवाही करने की धमकी दी जाती है,तब भले ही इमोजी डालकर अपनी उपस्थिति प्रस्तुत कर देते हैं।
इस साहित्यिक ग्रुप में सात-आठ नवांकुर लेखक हैं, जिन्हें कुछेक वरिष्ठ तो सदैव सींचने में रहते हैं और कुछेक टांग पकड़कर खींचने में लगे रहते हैं। ज्यादातर हम नवांकुरों को देश के किसी भी प्रमुख अखबार में लहलाते देखकर हतप्रभ रह जाते हैं।
ग्रुप में दो एडमिन है। एक कनिष्ठ और दूसरा वरिष्ठ हैं। दोनों में से एक भी बगैर बीन बजाए नहीं आते। आने के बाद सबको अपने ज्ञान का लिफाफा देकर ही जाते हैं। इनके लिफाफे को देखकर कई सदस्‍य तो कई दिनों तक संशय में रहते हैं।

14 May 2020

कोरोना काल में कहानी घर-घर की


वाह रे कोरोना तूने तो अदृश्यमान हो वो कमाल कर दिया जो आजतक कोई नहीं कर पाया। तूने एक ही झटके में बाहुबली कद्दावर मुल्कों को आसमान दिखा दिया। सबको घर के अंदर बैठा दिया। दिनभर बंदर की तरह उत्पात मचाने वाले भी चारदीवारी के भीतर जिगर थामे चुपचाप बैठे हैं। एक घंटे भी चैन से नहीं बैठने वाले भी महीनों से आराम से बैठे हुए हैं। तेरा इतना खौफ है कि जो किसी से भी नहीं डरते थे,वो म्याऊं बने बैठे हैं। चोर,उचक्के,गुंडे व मवाली भी सहमे हुए हैं। बाहर निकलने से कतराते हैं। जेब कतरे भी तुझे खतरा समझकर खुद की जेबों में ही हाथ दिए टहलते  हैं। उन्हें पता है कि लोगों की जरखेज जेबे तो खूंटी या हैंगर के टकी हुई हैं। बाहर इंसान तो क्याउसकी छाया भी दिखाई नहीं पड़ती है। माया-मोह में फंसे हुए भी अपनी काया पर तेरा साया नहीं पड़ जाएइसलिए सोच-विचार में डूबे हुए हैं। जो कभी चिंतित नहीं हुए,वो भी चिंता के दरिया में गोते लगा रहे हैं।
जिसे देखों,वहीं एक-दूसरे को समझा रहा है और तेरे से बचने के कारगर उपाय बता रहा हैं। ताज्जुब की बात है कि नासमझ भी समझ रहा है और बचाव के तमाम उपाय अपना रहा है। अक्सर हाथ मिलाकर अभिवादन करने वाले हाथ जोड़कर आदर सत्कार कर रहे हैं। जिसने कभी धूप से बचने के लिए भी मुंह पर रूमाल तक नहीं बांधी , वह भी मास्क लगाए रहता है। जो बाथरूम जाने के बाद सादा पानी से भी हाथ नहीं धोते थे। वे भी बीस सेकंड से भी ज्यादा समय तक साबुन लगाकर हाथ धो रहे हैं। सिर्फ धोते ही नहीं उसे निचोड़ते भी हैं. बहुतायत में मच्छर होने के बावजूद भी उन्हें मारने की दवा का कभी स्प्रे नहीं किया। पर तेरे विषाणु के कारण तमाम तरीके के रसायनों का जर्रे जर्रे में छिडकाव कर रहे हैं।
तेरे डर के मारे अपने भी अपनों से दूरी बनाकर रह रहे हैं। लापरवाह भी पूरी एहतियात बरत रहे हैं। जो अपने बाप की मृत्यु पर भी सिर नहीं मुंडवाए थे,वो तेरे कारण लगे लॉकडाउन में अपना सिर मुंडवा रहे हैं। जिसने कभी इधर का तिनका उधर नहीं किया,वो भी घर के सारे कामकाज कर रहे हैं। जिन्हें यह नहीं पता था कि चाय में पहले दूध पड़ता है या पानी,वे रसोई संभाल रहे हैं। दफ्तर में अपने अधीनस्थों पर हुक्म चलाने वाले चुपचाप झाड़ू पोंछा लगा रहे हैं। हमेशा हवा में उड़ान भरने घरेलू टाइप के हलवाई बने हुए हैं और बेचारे पेशेवर हलवाई हाथ पर हाथ धरे  मायूस बैठे हैं।
कोरोना तेरे भय से कई तो इतने भयभीत हो चुके हैं कि अपने सगे बाप की साधारण मौत पर उसे कंधा देना तो दूर उसके अंतिम संस्कार में सम्मिलित नहीं हो रही हैं। जो मृतक के घर जाकर श्रद्धांजलि अर्पित करने में सदैव अग्रणी रहते थे,वो पड़ोसी के स्वर्ग सिधारने पर भी उनके घर पर सांत्वना देने भी नहीं पधार रहे हैं। दिन में दस बार हाल-चाल पूछने वाले भी कहीं नहीं जा रहे हैं। उन्हें भी डर है कि हाल-चाल पूछने के चक्कर में कहीं मैं चपेट में नहीं आ जाऊं। ताश पत्ती खेलकर अपना टाइम पास करने वाले दिनभर मोबाइल में टाइम देखकर ही टाइम पास कर रहे हैं। मगर खेलने से डर रहे हैं। उन्हें पता है कि खेलने गए तो सेहत का खेल बिगड़ सकता है। इन दिनों सेहत बिगड़ गई और वह एंबुलेंस में बैठकर हॉस्पिटल चला गया,तो उसको कोरोना दृष्टि से देखते हैं।
कल तक डेंगू,मलेरियाचिकनगुनिया के मरीज की खबर पड़ोसी को भी नहीं लगती थी। कोरोना तेरे पॉजिटिव के मरीज की खबर पूरे शहर को मालूम हो जाती है कि फला कॉलोनी में एक और पॉजिटिव मिल गया है। आजकल पॉजिटिव सुनकर इतना डर लगता है कि सब सुन्न हो जाते हैं। अपने इलाके का पॉजिटिव से नेगेटिव आ जाता है न तब कहीं जाकर राहत की सांस लेते हैं। उससे पहले तो सांसे फूली ही रहती हैं।
कोरोना तूने कईयों को मालामाल तो कईयों को कंगाल कर दिया हैं। सदैव गुलजार रहने वाले बाजार बंद और कालाबाजार शुरू करवा दिया। शटर के नीचे से शराब बिकती देखी थी। मगर तूने तो गुटका,पानमसाला,तंबाकू,बीड़ी-सिगरेट भी शटर के नीचे से खरीदनेे पर मजबूर कर दिया है। 
कल तक नशेड़ियों का जो नशा दस रुपए में मिलता था। आज वह सौ रुपए में मिल रहा है।
फिर भी नशेड़ी खरीदे बगैर नहीं रह रहे हैं। माना कि तेरे कारण अपराध का ग्राफ घटा है और जल व वायु शुद्ध हुई है। लेकिन तेरे से लड़ने के लिए,समूचे विश्व में न जाने कितने योद्धा युद्ध लड़ रहे हैं। फिर भी तू पस्त नहीं हो रहा है। आखिर तू चाहता क्या हैतेरी मंशा क्या हैअब बहुत हो गया है। रहम कर। अपनी दृष्टि इस सृष्टि पर मत पटक। किसी अन्य ग्रह में जाकर अपनी भड़ास निकाल ले।

24 Mar 2020

वरना यह हाथ धोकर पीछे पडे़गा


सोशल मीडिया से पता लगा है कि कोरोना वायरस कोई ऐरा-गैरा नत्थू-खैरा नहीं है। न बेशर्म है, न आदत से लाचार। स्वाभिमानी और आत्मसम्मान वाला वायरस है। जब तक आप घर से बाहर नहीं निकलेंगे, वह घर के अंदर नहीं आएगा। घर से निकल गए, तो बंदर की तरह उछलकर घर के अंदर आ जाएगा और बंदर की तरह ही उत्पात मचाएगा। एक मित्र का सुझाव है कि भविष्य में अपनों के पास रहना है, तो कुछ समय के लिए दूरियां बनाकर रहिए। अगर दूरी बनाकर नहीं रहेंगे, तो कोरोना नजदीकी का फायदा उठा लेगा। यह फायदा उठाने में बहुत ही उस्ताद है।
सरकार की गाइडलाइन फॉलो करें, अन्यथा कोरोना आपकी सेहत को अनफॉलो कर देगा। बचाव ही उपाय बताया जा रहा है। बचाव न किया, तो कोरोना का बर्ताव बहुत बुरा है। खांसी या छींक आए, तो मुंह पर तुरंत रूमाल लगाइए, नहीं लगाएंगे, तो कोरोना अपना कमाल दिखाए बगैर नहीं रहेगा। मुंह पर मास्क लगाकर रहिए, वरना कोरोना माफ नहीं करेगा। किसी से भूलकर भी हाथ मत मिलाइए, वरना कोरोना हाथ पकड़कर खींच लेगा। बार-बार साबुन या हैंडवॉश से हाथ धोते रहिए। अगर हाथ धोने में जरा सी भी कोताही बरती, तो कोरोना हाथ धोकर पीछे पड़ जाएगा। पीछे पड़ गया, तो कहीं भी चले जाइए या छिप जाइए, यह पीछा नहीं छोडे़गा। पकड़कर ही रहेगा। इसने पकड़ लिया, तो उससे छुड़वाना बहुत ही मुश्किल है। लॉकडाउन में लोकगीत गाकर टाइम पास कर लीजिए, मगर घर से बाहर मत निकलिए। निकले, तो खुद के लिए और घरवालों के लिए खतरा साबित हो सकता है। खतरे का तो कतरा भी खतरनाक ही होता है।
जिस तरह जनता कर्फ्यू के दिन घरों में कैद रहे थे। ठीक उसी तरह से कुछ दिन और घर के अंदर कैद रह लीजिए। जहन्नुम में जाने से बच जाएंगे। इस खाली समय में कुछ भी नहीं कर सकते, तो जनता कर्फ्यू की शाम की तरह थाली और ताली बजाते रहिए। हो सकता है कि कोरोना को रोना आ जाए और हमारे देश से भाग जाए।

बुढ़ापे की लाठी


कई दिनों से देख रहा हूँ। भाटी जी लाठी को जमकर तेल पिला रहा हैं। लाठी भी तेल पीकर अंबुजा सीमेंट से बनी दीवार की मानिंद इतनी मजबूत हो गई है कि तोड़ने से भी नहीं टूटे। जिसके हाथ में इतनी मजबूत लाठी हो। उसकी भैंस की ओर कोई आँख उठाकर देख ले। किसी की मजाल है। आँख उठाकर देखने की तो छोड़िए,कोई आँखें झुकाकर भी नहीं देख सकता। ऐसी मजबूत लाठी को देखकर तो पानी में गई हुई,भैंस वापस आ जाए।
लेकिन भाटी जी के पास तो बकरी का बच्चा भी नहीं है। फिर लाठी को इतनी ठोस करके क्या करेगायह प्रश्न मेरे मन में कौंधा। सोचा कुत्ता-बिल्ली को भगाने के लिए या चोर-उचक्को को डराने के लिए ठोस किया होगा। क्योंकि हाथ में मजबूत लाठी होती है तो मरियल में भी हिम्मत आ जाती है। वह भी अकड़ कर चलता है। लाठीधारी से पहलवान भी डरता है। कहते हैं कि लाठी के आगे तो भूत भी काँपता है। दुम दबाकर भाग जाता है। इस रहस्य का राज जानने के लिए,मैंने भाटी जी से पूछा। पहले तो हंसकर टाल गए। फिर से पूछा तो बताया। यह आम लाठी नहीं। खास लाठी है। इसकी ख़ासियत अभी नहीं। कुछ दिनों पश्चात दिखाई देने लगेंगी। बहरहाल तो परवरिश का तेल पिला रहा हूँ। संस्कार का तेल पिलाना शेष है। अब मैं इसकी सेवा कर रहा हूँ। बाद में यह मेरी करेगी। यही सेवा की मेवा है। 
मैं समझ गया था। यह बुढ़ापे की लाठी है। बुढ़ापे की लाठी जितनी मजबूत होती है। बुढ़ापा उतना ही आसानी से कटता है। इसीलिए तो व्यक्ति बुढ़ापे की लाठी से अथाह प्यार-प्रेम करता है। ताकि लाठी को किसी घाटी पर भी साथ लेकर चढ़ने को कहें तो आनाकानी नहीं करें। बल्कि तत्काल चढ़ने के लिए कहे। चलिए चलते हैं।
भाटी जी की उम्र ढल रही थी और लाठी जवानी के मजे ले रही थी। भाटी जी ने सोचा लाठी कहीं किसी के प्रेम प्रसंग में नहीं पड़ जाए। प्रेम-प्रसंग में पड़ गई तो बाहर नहीं निकल पाएगी। बाहर नहीं निकली तो बुढ़ापा बिना लाठी के सहारे ही काटना पड़ेगा।यही सोचकर पाणिग्रहण संस्कार कर दिया। शादी के कुछ माह बाद भाटी जी द्वारा पिलाया गया तेल सूखने लगा और नई नवेली द्वारा लगाया गया तेल रमने लगा। देखते ही देखते लाठी गिरगिट की तरह रंग बदलने लगी। आँखें चुराने वाली आँखे बात-बात में आँख दिखाने लगी। कल तक जुबान नहीं उपड़ती थी। आज कतरनी से भी तेज चलने लगी है। मिमियाने की जगह गरयाने लगी। 
हद तो तब हो गई। जब उसने एक दिन भाटी जी पर लाठी उठा ली। यह देखकर मैं भी आश्चर्यचकित रह गया। सोचने लगा कैसा घोर कलि‍युग आ गया है। जिस पर बचपन से लेकर जवानी तक। किसी तरह की कोई आँच नहीं आने दी। आज वही आग बबूला हो रही है। कल तक जिसके मुखमंडल से सभ्य व संस्कारी बोल प्रस्फुटित होते थे। अब उसी मुखमंडल से बुरे-भले बोल मुखर होने लगे हैं। ऐसी बुढ़ापे की लाठी से तो लाख गुना अच्छा है। छोटे-मोटे डंडों के सहारे ही बुढ़ापा काट लिया जाए।

21 Mar 2020

नाक का सवाल और मूँछ का बाल


उसकी भी वहीं नाक है,जो कि एक आम भारतीय की होती है। मूँछ भी कोई खास नहीं पर वह मूँछों पर हाथ ऐसे फेरता है,जैसे राउडी राठौर फिल्म में अक्षय कुमार फेरता है। सच पूछिए तो उँगली और अँगूठे के बीच में चार बाल भी नहीं आते होंगे। लेकिन वह छोटी सी बात को भी मूँछ का बाल तथा नाक का सवाल बना लेता है। एक बार बना लिया तो बना ही लिया। फिर पीछे नहीं हटता। पक्का हठधर्मी है। नाक के सवाल पर तो घरवालों की ही नहीं अगल-बगल वालों की भी नाक में दम कर देता हैं। और जब तक नाक के सवाल का जवाब नहीं मिल जाता। तब तक नासिका पर मक्खी भी नहीं बैठने देता है। इसी तरह मूँछ के बाल पर जब तक बाल में से खाल नहीं निकाल लेता। तब तक बाल को खाल से अलग नहीं होने देता हैं। 
अगर किसी ने हँसी-मजाक में भी कह दिया फलाने सिंह ने ढिमका काम क्या कर दियाउसका नाम हो गया। इतना सुनते ही फलाने सिंह का काम तमाम करने में और खुद का नाम करने में जुट जाता है। चाहे परिणाम शून्य ही निकले पर जोर सैकड़ा का लगा देता है। खर्चा-पानी की भी परवाह नहीं करता। नाक का सवाल और मूँछ के बाल पर तो पानी की तरह पैसा बहा देता है। वैसे एक रुपया नाली में गिर जाए तो उसे भी निकालने लग जाता है। एक नंबर का मक्खीचूस है।
पड़ोसी के लाल से अपना लाल क्रिकेट मैच हार गया तो समझता है कि नाक कट गई। हर जगह अपनी नाक ऊँची रहे। इसलिए अपने बेटे पर भी बाजी लगा देता है। उसकी हार को जीत में बदलने के लिए। जीत गया तो इस तरह ढिंढोरा पीटता है,जैसे कि पुत्र वर्ल्ड कप जीत गया हो। चुनावी मौसम में कोई यूं ही कह दे कि तुम्हारे प्रत्याशी चुन्नीलाल के तो चुनाव में चूना लगेगा। फिर भले ही चुनाव वार्ड पंच का ही क्यों ना हो?अपने उम्मीदवार को जिताने का मिशन ही मूँछ का बाल होता  है।
उसकी नाक और मूँछ का दायरा खुद तक ही सीमित नहीं है। घर-परिवार,गली-मोहल्ला,गाँव- देहात,कस्बा,शहर,राजधानी से लेकर सोशल मीडिया तक विस्तृत है। जब मोहल्ले की खुशी किसी खुशीराम के साथ भाग गई थी। तब नाक अपनी न होकर मोहल्ले की हो गई थी। उसकी खोजखबर में चिरपरिचित से लेकर अपरिचित तक से पूछताछ कर डाली और  तीन दिन में ही ढूँढ़ निकाली थी। इसी तरह फेसबुक मित्र के चित्र पर मित्र चतरसिंह की लड़की चित्रकला फिदा हो गई तो समझा कि मित्र की नाक ही मेरी नाक है। इसलिए जुदाई का कमेंट लिखकर दूर रहने की चेतावनी दे डाला। नहीं माना तो पिटाई की चटनी चटा दी। पिटाई की चटनी ऐसी होती है कि एक बार जिसने चाट ली। फिर वह भूलकर भी इश्क चाट भंडार की ओर नहीं देखता। 
ऐसी प्रवृत्ति का व्यक्ति अकेला यही ही नहीं है। आपके भी आसपास में कोई ना कोई जरुर होगा। अगर नहीं है तो आप स्वयं होंगे। चौंकिए मत। अपनी मूँछों पर हाथ फेरकर देखिए और उस बाल को पकड़िए जो मूँछ के बालों का बाप है। मूँछ नहीं है तो कतई शर्मिंदा मत होइए। ऐसा नहीं है कि बिना पूछ की घोड़ी अच्छी नहीं लगती है तो बिना मूँछ का मर्द भी अच्छा नहीं लगता है। आज के दौर में तो बिना मूँछ वाला ही अच्छा लगता है। यकीन नहीं हो तो अपनी घरवाली या प्रेमिका से पूछ लीजिए। खैर छोड़िए,मूँछ नहीं है तो क्या हुआनाक तो है। नाक को तो कोई भी मूँछों की तरह कतरनी से नहीं काटता है। इसलिए नाक को निहार लीजिए। उसका अक्‍स दिख ही जाएगा।

20 Mar 2020

कोरोना की करनी और चाइनीज करतूत


कहते हैं कि चाइना का माल चले तो चांद तक और नहीं चले तो शाम तक भी नहीं। लेकिन चाइना का वायरस कोरोना तो कुछ ज्यादा ही चल पड़ा है। हर तरफ इसके ही किस्से सुनने को मिल रहे हैं। हर कोई इसके बचाव के उपाय वाली पोस्ट की कॉपी पेस्ट कर रहा है। यह सोशल मीडिया पर जितना फॉरवर्ड हो रहा है उतना तो देश में नहीं फैला है। अखबार का ऐसा कोई पन्ना नहीं जिसमें कोरोना की खबर नहीं। मगर खबर का असर नहीं पड़ रहा है। शीर्षक पढ़कर ही आगे बढ़ रहे हैं और सनसनीखेज खबरें ढूंढ रहे हैं। नहीं मिलने पर अखबार छोड़कर टीवी में देख रहे हैं। पर उसमें भी कोरोना की ही खबरें चल रही हैं। डिबेट हो रही है। कोरोनो से लड़ने के बजाय खुद लड़ रहे हैं।
रोज सरकार इश्तहार के माध्यम से सतर्क रहने की सलाह दे रही है। हाथ न मिलाए। नमस्ते से काम चलाइए। मास्क लगाइए। भीड़ का हिस्सा न बने। दिन में कई बार साबुन से हाथ धोए। पर कई लोगों का कहना है कि हम हाथ न मिलाएं तो हमारे घर का चूल्हा न जले। मास्क क्या खाक लगाएं। बाजार में 20 पैसे का मास्क 20 रुपए में मिल रहा है। रही बात भीड़ की तो ब्याह शादी में भीड़ तो होती ही है। साले की शादी में जीजा नहीं जाए तो साला घोड़ी पर कैसे बैठे। उसे घोड़ी पर बिठाने के लिए,भीड़ का हिस्सा बनना ही पड़ता हैं। हाथ जोड़कर नमस्ते करते हैं तो कोई समझता ही नहीं है कि अभिवादन कर रहा है। जहां पर पीने के लिए पानी नहीं,वो लोग कह रहे हैं कि हाथ धोने के लिए पानी कहां से लाएं।
टेलीकॉम कंपनियों की कोरोना कॉलर ट्यून लोगों में जागरूकता लाने के लिए खांसकर बता रही है। लेकिन सोशल मीडिया पर लोग मजाक बना रहे हैं कि कोरोना वायरस से लोग मरे या ना मरे,पर खांसने वाला कॉलर ट्यून जरूर लोगों को मार डालेगा।
सोशल मीडिया पर कोरोना वायरस को लेकर एक से बढ़कर एक चुटकुले वायरल हो रहे हैं। कल जैसे ही मैंने अपनी फेसबुक खोली तो पहला कोरोना चुटकुला कुछ इस तरह से था,गुस्सा तो तब आता है। जब कोरोना की पूरी कॉलर ट्यून सुनने के बाद भी अगला फोन नहीं उठाता है। यहां से आगे बढ़ा दो एक छोड़कर दूसरी पोस्ट पर इससे भी मजेदार थी,स्कूल-कॉलेज व कोचिंग सेंटरो में तो कोरोना आ जाएगा और ऑफिस वाले क्या डेटोल से धुले हुए हैं,जिनमें नहीं आएगा। इतने में ही व्हाट्सएप पर एक मित्र ने यह वाला भेज दिया,कोरोना वायरस इसलिए नाराज है कि चेचक माता की उपाधि से अलंकृत हैं,तो मुझे फूफा की उपाधि से अलंकृत क्यों नहींव्हाट्सएप से बाहर निकला ही था कि इंस्टाग्राम पर एक निराला ही मिला। देशवासी तब तक कोरोना को सीरियसली नहीं लेंगेजब तक जागरूकता के लिए तारक मेहता का एक पूरा एपिसोड नहीं आ आता। सोशल मीडिया पर कोरोना वायरस का मजाक भी खूब उड़ाया जा रहा है। फिर भी इतना बेशर्म है कि देश से बाहर नहीं निकल रहा है। चुटकुलों से भी बाज नहीं आ रहा है।मोहनलाल मौर्य

मोबाइल पर खांसने का संक्रमण


इन दिनों मैं जब भी किसी के पास फोन लगाता हूं, मेरे मोबाइल में बुजुर्ग व्यक्ति की तरह पहले तो कोई खांसता है, उसके बाद में एक युवती कोरोना वायरस के बचाव के उपाय बताती है। आजकल तो नॉर्मल खांसी भी कोरोना वाली लगती है। इसलिए मोबाइल के खांसने पर एक बार तो डर सा लगता है। कहीं मुझे भी कोरोना अपनी गिरफ्त में न ले ले। मोबाइल के खांसते ही युवती के बताए निर्देशानुसार उसे एक मीटर दूर कर देता हूं और जेब से रूमाल निकालकर अपने मुंह पर लगा लेता हूं। जब तक अगला फोन उठा नहीं लेता, तब तक मोबाइल को कान नहीं लगाता हूं। रूमाल तो फोन कटने के बाद ही मुंह से हटाता हूं। वैसे तो फोन के भीतर वाली युवती की बताई एक-एक बात गांठ बांधने वाली है। जिसने नहीं बांधा, उसकी जिम्मेदारी खुद की है।
जब सामने वाला फोन उठाते ही खांसने लगता है, तब और ज्यादा डर लगता है। कहीं कोरोना मोबाइल में घुसकर न आ जाए। अब तो किसी के पास फोन भी लगाता हूं, तो डरते-डरते लगाता हूं। फोन उठाते हेलो की जगह भैया खांसी आए, तब भी खांसना मत बोले बगैर नहीं रहता। यह सुनकर कई तो इतने नाराज हो गए हैं कि उनकी नाराजगी दूरभाष पर दूर नहीं होगी। उनके पास ही जाना पड़ेगा, मगर इन दिनों पास जाना खतरे से कम नहीं है।
कल ही एक जिगरी दोस्त के पास गया, तो वह मुंह फुलाए बैठा था। कारण पूछा, तो बगैर मुंह पर रूमाल रखे जोर-जोर से खांसने लगा। उसके खांसते ही कारण जाने बगैर, जरूरी काम का हवाला देकर वहां से चला आया। उसने तुरंत मुझे फोन लगाया, लेकिन मैं जान-बूझकर नहीं उठाया, क्योंकि वह फोन पर भी खांसे बगैर नहीं रहता। आजकल मुझे जितना डर खांसी से लगता है, उतना फांसी से भी नहीं लगता।
एक वह दौर भी था। खांसकर घर में प्रवेश करने पर घर की बहुएं बिना बताए समझ जाती थीं कि कोई घूंघट वाला ही आया है। आजकल खांसने से लोग भाग निकलते हैं। मोहनलाल मौर्य

18 Mar 2020

हाथों हा‍थ कमल का कमाल


देश के मध्य में प्रदेश के एक युवा नेता के बरसों से हाथ में हाथ था और अब उनके हाथ में कमल है। उनको हाथ वाला कमल साथ लेकर नहीं चला,तो वो अपनी दादी और बुआये के वाले कमल की गोद में जाकर बैठ गए। गोद में बैठते ही उनको राज्यसभा का टिकट दे दिया।
क्या यही कारण थाहोली के मौके पर भगवा रंग में रंग जाने का या फिर नेपथ्य में और ही कुछ है। खैर,यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा। उन पर भगवा रंग परवान चढ़ता है या नहीं। लेकिन जिनका रंग बदरंग करके गए हैं। वो बंद कमरे में बैठकर मंत्रणा कर रहे होंगे। महाराज के खेमे वाले भी उनके साथ चले गए तो क्या होगा। कैसे भी करके खेमे वालों को लाना होगा। अन्यथा खेमे वाले सरकार गिरा देंगे। सरकार गिर गई तो जल्दी सी उठेगी नहीं। उठ भी गई तो यह जरूरी नहीं है कि हमारी ही हो जाएगी। गिराने वालों की गोद में जाकर बैठ जाए। बस इसे तो बहुमत का सहारा चाहिए। फिर चाहे गठबंधन के द्वारा सहारा दिया जाए या फिर अकेले दिया जाए।
वैसे तो उन्होंने सरकार को गिरने से बचाने के लिए  अपने विधायकों को होली भी नहीं खेलने दिया। जिस स्थिति में थे उसी स्थिति में विशेष विमान में बिठाकर रिसोर्ट में पहुंचा दिया है। रिसोर्ट में ठहरे विधायक कड़ी निगरानी में है। निगरानी में इसलिए है कि एक भी विधायक इधर-उधर नहीं हो जाए। इधर से उधर हो गया तो उधर से फिर इधर लाना मुश्किल हो जाता है। मुश्किल होने के बाद फ्लोर टेस्ट का मैच खेलना भारी हो जाता है। जीते हुए भी हारे के बराबर हो जाते हैं। 
रिसोर्ट से कई विधायक इधर से उधर जाने में रहते हैं। मौका मिलते ही चले भी जाते हैं। सियासत में मौका कोई नहीं छोड़ना चाहता है। सब के सब मौके पर चौका मारने में रहते हैं। लेकिन चौका उसी का लगता है,जो राजनीति का मंझा हुआ खिलाड़ी होता है। दल बदलने में देरी नहीं करता है। ऑफर मिलते ही हाथ मिला लेता है। गिरगिट की तरह रंग बदलने में अग्रणी रहता है।
अब विधायक गायब होने लगे हैं। गायब वाले नायाब होते हैं। ऐन मौके पर आते हैं और आते ही  मलाईदार विभाग हथिया लेते हैं। मुझे तो लगता है कि यह मलाई खाने के लिए ही गायब होते होंगे हैं। यह गायब होते हैं तो इनके परिजन बिल्कुल भी चिंतित नहीं होते हैं और नहीं पुलिस को इत्तला करते हैं। माननीय जी गायब हो गए या किसी ने अपहरण कर लिया है। क्योंकि उन्हें भी पता है कि गायब हुए हैं तो,प्रमोशन होकर ही आएंगे। प्रमोशन नहीं भी होकर आए तो सूटकेस भरकर लेकर आएंगे।
ऐसे अवसर पर हॉर्स ट्रेंडिंग भी होती है। बिकने वाली बिक जाते हैं और नहीं बिकने वाले रह जाते हैं। कहते हैं कि बिकता हर कोई है,बस उसकी कीमत लगाने वाला चाहिए। सबकी अपनी अलग-अलग कीमत होती हैं। कई तो हिनाहिना कर अपनी कीमत बता देते हैं और कईयों की कीमत खरीदार को ही आकलन करनी होती है। सियासत के खरीददार सबसे पहले उन घोड़ों को खरीदते हैं,जो पंचवर्षीय रेस में बीच में रह नहीं जाए। मोहनलाल मौर्य

9 Mar 2020

अब न होली की लपटें न ढफ की थाप पर नागिन डांस


पहले जैसी होली का उत्सव अब कहां बचा है। होली डांडा रोपण के दिन से ही फाग का राग शुरू हो जाता था और होली दहन तक चलता था। पूरी रात नाचते गाते थे। डफ की थाप पर नागिन डांस करते थे। महिलाएं होली के गीत गाया करती थी। अब न तो होली का डांडा गड़ता है न कोई फाग का राग गाता है और न कोई नृत्य करता है। बस होली के दिन डीजे बजा लेते हैं और नाच लेते हैं। डीजे पर भी सिर्फ छोरे-छापरे थिरक लेते हैं।  
पहले मोहल्ले के सारे टाबर दिन ढलते ही एक जगह इकट्ठे हो जाते थे और स्वाँग निकालने का कार्यक्रम बनाते थे। रोज घर-घर जाकर स्वाँग दिखाते थे। बड़े-बुजुर्ग एक-दो रुपया देकर आशीर्वाद देते थे। उन रुपयों की मिठाइयां खाते थे। आज के टाबर स्वाँग जानते ही नहीं। यह तो रंग-गुलाल लगाने का अभिप्राय भी नहीं जानते हैं। बस एक-दूसरे की देखा देखी को देखकर लगा देते हैं। अपने स्मार्टफोन से सेल्फी ले लेते हैं और सोशल मीडिया पर टांक देते हैं।
लोग रात्रि को लुकाछिपी का खेल खेलते थे और लोगों की बाड़ उठा लाते थे होलिका टिब्बा लाकर पटक देते थे। लेकिन बाड़ का मालिक चू नहीं करता था। अब यह सब बीते दिनों की बात  हो गई। तभी आज होली की लपटें ज्यादा ऊपर नहीं उठती हैं। जबकि पहले एक गांव कि होली की लपटें दूसरे गांव में दिख जाती थी। क्योंकि भर भोलिए और लकड़ियों का ढेर लग जाता था। अब ढेर तो लगता नहीं हैं और लपटें उठती नहीं है। पहले पूरे गांव की एक ही जगह होली होती थी और अब ढाणी-ढाणी में होली मंगलने लगी है।
होली दहन के बाद बच्चे बड़े बुजुर्ग सब घर-घर जाकर एक-दूसरे के गले मिलते थे। शिकवे-गिले दूर भगाते थे। अपनों से बड़ों के चरण स्पर्श करके आशीर्वाद लेते थे। अब तो पड़ोसी के नहीं जाते हैं। बस व्हाट्सएप पर ही आशीर्वाद आदान-प्रदान कर लेते हैं। धुलेंडी के दिन रंग ही नहीं लगाते थे। बल्कि कीचड़ तक उड़ेल देते थे। देवर-भाभी और जीजा-साली तो एक-दूसरे के मुंह में रंग ठुस देते थे और चेहरे पर कालिख पोत देते थे। आज कालिख पोत दे तो कलह हो जाए। मोहनलाल मौर्य                                                   


1 Mar 2020

एक लेखक की दिनचर्या


आपने अपने पसंदीदा अभिनेता या नेता की दिनचर्या के बारे में तो खूब पढ़ा होगा। लेकिन,क्या आपने कभी किसी लेखक की दिनचर्या के संदर्भ में पढ़ा हैअगर नहीं पढ़ा है तो पढ़िए अधुनातन युग के एक लेखक की दिलचस्प दिनचर्या। जिसका नाम छोटे लाल 'छोटू' है। छोटू उसका तख़ल्लुस है। साहित्य में तख़ल्लुस बहुत मायने रखता है। तख़ल्लुस से वह तकलीफ दूर हो जाती है,जो कि साहित्यिक पथ पर चलने के दौरान आती है।
छोटू के मोबाइल में जैसे ही सुबह पाँच बजे की अलार्म बजती है। उसका हाथ उसी तरह से सिरहाने रखें मोबाइल पर पहुँच जाता है। जिस तरह से खुजली चलने पर पहुँच जाता है। क्या है कि वह अपने सुख-दुख के संगी साथी मोबाइल को हमेशा सिरहाने रखकर ही सोता है। पता नहीं कब किसकी घंटी बज जाए। रिसीव करने से पहले ही घंटी मिसकॉल की नहीं हो जाए। यह उसे कतई पसंद नहीं है। इसी तरह से अलार्म के समय पड़ोसी का मुर्गा बांग नहीं मार दे। इंटरनेट के युग में मुर्गे की बांग सुनकर जगना वह अपनी तौहीन समझता है।इसलिए नींद में ही अलार्म बंद करके मोबाइल को रजाई में ले लेता है। फिर रजाई के अंदर ही आँखें मसलते हुए सबसे पहले उन अखबारों का ईपेपर देखता है। जिन्हें अपनी रचना भेज रखी है। जब किसी भी अखबार में अपनी रचना के दर्शन नहीं होते हैं तो अन्य लेखकों की रचना के दर्शन करके उन्हें सेव कर लेता है। 
खुद बाद में पढ़ता हैं। पहले लेखक को हार्दिक बधाई के साथ व्हाट्सएप करता है। क्योंकि छोटू लेखकों के कई व्हाट्सएप ग्रुपों से जुड़ा है। वहीं से नंबर सर्च करके प्रेषित कर देता है। प्रेषित करने से भी प्रसिद्धि प्राप्त होती है। ऐसा उसे लगता है। जो अपरिचित है,उसे बगैर पूछे ही अपना लेखकीय परिचय भेजकर परिचित कर लेता है। परिचित होने के बाद आए दिन परिचर्चा करता रहता है। परिचर्चा से चर्चित होता है। ऐसा उसका मानना है। उस लेखक की फेसबुक वॉल पर अपना नाम सूचनार्थ के रूप में देखकर फूले नहीं समाता है। फुले नहीं समाने का कोई रहस्य पूछता है तो उसे भानगढ़ के भूतहा किला की कहानी सुनाने लग जाता है। जिसे सुनने पर रूह कांपने लगती है।
बिस्तर बाद में छोड़ता है पहले सेव की हुई रचनाओं का आनंद लेता है। आनंद के बाद नित्यकर्म के लिए जाता है। नित्यकर्म के दौरान आज किस विषय पर लिखना है के संदर्भ में सोचता है। वहाँ पर विषय मिल गया तो खिलखिलाता हुआ बाहर निकलता है। नहीं मिला तो मुरझाया हुआ नहीं। गेट को जोर से बंद करके निकलता है। इसके बाद टूथब्रश एवं स्नान के समय खोजता है। इस समय मिल गया तो फिर चाय सुड़कते-सुड़कते ही प्रस्तावना तो लिख डालता है। उसके बाद पूरी दोपहरी विस्तार में लगा रहता है। संध्याकालीन तक भी लेख पूरा नहीं होता है तो कार्य मध्यरात्रि तक प्रगति पर रहता है। जब तक कार्य प्रगति पर रहता है। घर-बाहर के किसी भी कार्य में हाथ नहीं बट आता है। चाहे घरवालों से खरी खोटी ही क्यूँ नहीं सुननी पड़े। लेकिन पहले अपने लेखन कार्य को ही प्राथमिकता देता है।
वैसे तो वह जब चाहे तभी पूर्ण कर सकता है। लेकिन क्या है कि बीच-बीच में फेसबुक तथा व्हाट्सएप की शरण में भी जाना होता है। इसलिए पूरा होने में मध्यरात्रि तक लग जाती है। क्योंकि फेसबुक और व्हाट्सएप इतने रमणीय स्थल हैं कि एक बार वहाँ पर जाने के बाद  जल्दी सी वापस आने का मन ही नहीं करता है। जिस दिन लिखने लायक विषय नहीं मिलता है। उस दिन दिनभर फेसबुक से व्हाट्सएप पर व्हाट्सएप से इंस्टाग्राम पर इंस्टाग्राम से ट्विटर पर यह देखता रहता है कि देश-दुनिया में क्या घटित हो रहा हैकौन सुर्खियां बटोर रहा हैसाथी लेखक का हाथी पर लिखा व्यंग्य देश के प्रमुख अखबार में कैसे छप गयाउस दिन इसी खोज खबर के चक्कर में घर पर आने वाला अखबार भी नहीं पढ़ता है। बेचारा अखबार दिनभर दालान में ही पड़ा-पड़ा फड़फड़ाता रहता था। कई बार तो उसके अपने पन्ने भी जुदा होकर गुमशुदा हो जाते हैं।
जिस दिन खुद की रचना प्रकाशित हो जाती है। उस दिन नित्यकर्म बाद में करता है। पहले प्रकाशित के प्रकाश को अपनी फेसबुक वॉल पर पहुँचाता है। उसके बाद में व्हाट्सएप वाया इंस्टाग्राम होते हुए ट्विटर पर ले जाता है। उस दिन लिखता-विकता नहीं है। बस दिनभर लाइक और कमेंट पर आँखें गड़ाए रखता है। कमेंट आते ही तुरंत रिप्लाई देता है। उस दिन उसके आभार का द्वार खुला ही रहता है। पोस्ट पर आने वाले कमेंटार्थियों को थैंक यू,धन्यवाद व शुक्रिया के दर्शन करवाए बगैर जाने नहीं देता है। जबकि बाकी दिन आभार के द्वार खोलता ही नहीं है। उस रोज अपनी प्रकाशित रचना के सिवाय किसी अन्य लेखक की रचना नहीं पढ़ता है और नहीं ही किसी को लाइक व कमेंट की घास डालता हैं। बस खुद की प्रकाशित रचना का ही राग अलपाता रहता है। बस यही उसकी दिलचस्प दिनचर्या है।

27 Feb 2020

आरोप-प्रत्यारोप


मेरे अड़ोस में अतिभाषी और पड़ोस में कटुभाषी रहता है। दोनों के आचार-विचार कभी मेल नहीं खाते हैं। अकेले में ही नहीं,मेले में भी मेल नहीं खाते हैं। एक रोज भूल से खा गए। लेकिन खाने के थोड़ी देर बाद ही दोनों को कजबहस की उल्टी होने लगी। उल्टी भी इतनी बार हुई,जिसकी कोई गिनती नहीं। दोनों की उल्टी से कुभाषाई दुर्गंध इतनी आ रही थी कि उनके समीप जाने का मन नहीं कर रहा था। दूर से ही समझाइश के पानी का ग्लास लिए खड़ा था। मगर वो ग्लास को पकड़ नहीं रहे थे।
मैं दुविधा में पड़ गया। दुविधा में सुविधा भी नहीं सूझती है। क्या किया जाएअंततोगत्वा मुझे उनके समीप जाना ही पड़ा। नहीं जाता तो दोनों हाथापाई की दवाई खाकर मर जाते। मर जाते तो मुझे गवाही देनी पड़ती। मैं किसकी गवाही देता। अतिभाषी की देता,तो कटुभाषी के परिजन कड़वे वचन सुनाते और कटुभाषी की देता,तो अतिभाषी के परिजन खरी-खोटी सुनाते। जिन्हें सुनकर मेरे परिजन कुपित हो जाते हैं।  कुपित होने के बाद कुछ भी घटित हो सकता है। घटित होने के बाद अफसोस के सिवाय कुछ कर नहीं सकते। कुछ करें,तो करनी की भरनी भुगतनी पड़ती है। जिसके लिए मैं कभी अग्रणी नहीं रहता।
जाते ही दोनों को संभालने लगा,पर संभलने में आए नहीं। संभलने में नहीं आए तो मैंने अपने मित्र मितभाषी को बुलाया। जिसने कटुभाषी को और मैंने अतिभाषी को संभाला। जब दोनों कि कजबहस की उल्टियां बंद हुई। तब मैंने दोनों से पूछा,‘क्या खाए थे,जो कि कजबहस की उल्टी हो गई।’ दोनों एक साथ बोले,‘आचार-विचार खाए थे।’ मैं बोला,‘आचार-विचार खाने से भी भला कभी किसी के उल्टी हुई है।’
यह सुनकर अतिभाषी बोला,‘इस कटुभाषी का आचार दूषित था।’ कटुभाषी बोला,‘ मेरा आचार नहीं,इस अतिभाषी का विचार दूषित था।’ 
दोनों एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाने लगे। मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि आचार दूषित था या विचार। आचार-विचार में से थोड़ा बहुत बचा-खुचा भी नहीं था। जिन्हें सूँघ कर पता लगा लेते कि आचार दूषित है या विचार। 
मैंने अतिभाषी से पूछा,‘तेरा विचार कब का था।’
वह तपाक से बोला,‘ मेरा विचार तो एकदम ताजा था। इसका ही कई दिनों का आचार था।’
‘मेरे आचार को कई दिनों का बताने वाले सच-सच क्यों नहीं बताता है। मेरा विचार कई दिनों का था। तेरे विचार का एक ग्रास खाते मुझे आभास हो गया था कि दूषित है। पर मैं मन मसोसकर इसलिए खाने लग गया था कि किसी के खाने में मीनमेख निकालना शोभा नहीं देता है। अगला बुरा मान जाता है।’
यह कटुभाषी ने कहा,तो अतिभाषी से बगैर बोले रहा नहीं गया और बोला,‘सच तो यह है कि तेरे आचार में न सभ्यता का नमक था,न संस्कृति की मिर्च-हल्दी और न संस्कार का तेल था। न जाने कब से तूने अपने दिमाग़ी डिब्बे में बंद कर रखा था। मैं तो डिब्बे का ढक्कन खोलते ही समझ गया था यह तो बहुत पुराना है। पर मैं तो इसलिए खा लिया था कि तू मेरा विचार बड़े चाव से खा रहा था।’
कटुभाषी बोला,‘मैं और तेरा विचार...। और वह भी बड़े चाव से। कदाचित नहीं। अभी बताया नहीं मन मसोसकर खाया था। तेरे विचार में सुविचार का मसाला तो रत्ती भर भी नहीं था।’ 
दोनों के आरोप-प्रत्यारोप से मुझे प्रतीत हो गया था कि दोनों के ही आचार और विचार दूषित थे। जिन्हें खाने से दोनों को कजबहस की उल्टी हुई थी। मैंने दोनों को समझाया और कहा,‘एक-दूसरे का खाना खाने से पहले अच्छी तरह से देख लेना चाहिए। खाना शुद्ध है या नहीं।’
                                                                मोहनलाल मौर्य

21 Feb 2020

व्यंग्य जगत का चमकता सितारा मोहन लाल मौर्य


मनुष्य अपने भावों को शब्दों के जरिए प्रस्तुत करता है। शब्द को हिंदी काव्यशास्त्र में शक्ति मानकर तीन भागों में विभाजित व स्वीकृत किया गया है। इन तीन में व्यंजना शब्द शक्ति भी शामिल है। व्यंजना में किसी शब्द के अभिप्रेत अर्थ का बोध न तो मुख्यार्थ से होता है और न ही लक्ष्यार्थ से, अपितु कथन के संदर्भ के अनुसार अलग-अलग अर्थ से या व्यंग्यार्थ से प्रकट होता है। व्यंजना को हम सामान्य तौर पर व्यंग्य के रूप में जानते-पहचानते हैं। व्यंजक शब्दों के माध्यम से व्यंग्यकार विसंगतियों, मिथ्याचारों और पाखंडों का पर्दाफाश करता है। व्यंग्य का वास्तविक उद्देश्य समाज की बुराइयों और कमजोरियों की हंसी उड़ाकर पेश करना होता है। प्रसिद्ध व्यंग्यकार और आलोचक सुभाष चंदर के शब्दों में - व्यंग्य वह गंभीर रचना है जिसमें व्यंग्यकार विसंगति की तह में जाकर उस पर वक्रोक्ति, वाग्वैदग्ध आदि भाषिक शक्तियों के माध्यम से तीखा प्रहार करता है उसका लक्ष्य पाठक को गुदगुदाना न होकर उससे करुणा, खीज अथवा आक्रोश की पावती लेना होता है। अतः व्यंग्य लेखन तलवार की धार पर चलने जैसा है। इसके लिए साहस, समझ और हौसला चाहिए होता है।

व्यंग्य विधा के एक ऐसे ही हस्ताक्षर हैं मोहन लाल मौर्य। राजस्थान के अलवर जिले के चतरपुरा गांव में रहने वाले मोहन लाल मौर्य एक दशक से अपने सामाजिक व राजनीतिक विषयों पर रचे व्यंग्यों के माध्यम से समाज में जागरूकता ला रहे हैं। साथ ही ग्रामीण समस्याओं के प्रति भी गंभीर होकर अपने दायित्वों का निर्वहन कर रहे हैं। अपनी लेखन यात्रा के बारे में बात करते हुए मौर्य कहते हैं - मेरे लेखन की शुरुआत तब से हुई जब मैं ग्यारहवीं में पढ़ता था। तब मैंने अपने समाज के एक पाक्षिक अखबार में 'राजनीति का भंवरा' शीर्षक से कविता भेजी थी। लेकिन वह तो छपी नहीं और किसी और की कविता मेरे नाम से प्रकाशित हो गई। मुझे बधाई भी प्राप्त हुई। वह कविता भी छपी। लेकिन काफी दिनों के बाद में। इसके बाद लंबे अंतराल तक कुछ भी नहीं लिखा। अक्टूबर 2011 से मैंने समाज के ही पाक्षिक अखबार रघुवंशी रक्षक पत्रिका के लिए सामाजिक खबरें, सामाजिक उत्थान एवं सामाजिक कुरीतियों पर आलेख लिखने लगा। इन्हें दिनों से यदा-कदा स्थानीय समाचार पत्रों के पाठक पीठ में भी छपने लगा। 10 फरवरी, 2015 को एक समाचार पत्र में मेरी पहली व्यंग्य रचना 'सम्मान समारोह में शिरकत' प्रकाशित हुई और इसके बाद में साल भर के लिए अंतराल का ताला लग गया। मैं अनवरत व्यंग्य लिखता रहा। न छपने पर कभी भी हताश नहीं हुआ। इस दौरान फेसबुक के जरिए मेरी मित्रता निर्मल गुप्त सर से हुई और उन्होंने मेरा मार्गदर्शन किया। जिनकों मैं अपना व्यंग्य गुरु मानता हूं।

14 Feb 2020

जहां धन,वहीं प्रेम


आज वैलेंटाइन डे है। प्रेमियों की जेब ढीली करने का उत्सव हैं। अपनी महबूबा पर जी भर के खर्च करेंगे। जितना खर्चा करेंगे,उतना ही प्यार पाएंगे। क्योंकि आजकल प्यार मन से कम,मनी से ज्यादा होने लगा है। जिसके पास मनी है,वह रेस्तरां एवं होटल में सेलिब्रेट करेगा और जिसके पास मनी नहीं है,वह किसी गार्डन में झाड़ी के पीछे बैठकर प्यार भरी बातें करने की कोशिश करेगा। क्योंकि बीच-बीच में प्रेम विरोधियों को भी देखना पड़ता है। भय रहता कहीं कोई विरोधी आकर दबोच नहीं ले। दबोच लिया तो हाथ साफ करके ही जाएंगा।
पता नहीं इनके हाथों में क्यूँ खुजली चलती है,जो कि वैलेंटाइन डे पर ही मिटती है। मुझे तो लगता है कि यह नित्यकर्म के बाद साबुन से हाथ नहीं धोते होंगे। इसलिए इनके हाथों में खुजली चलती है और यह वैलेंटाइन डे पर अपनी खुजली मिटाने के लिए गार्डन दर गार्डन घूमते फिरते रहते हैं। कोई प्रेमी जोड़ा गिरफ्त में आ गया तो सालभर का कोटा एक ही दिन में पूरा करने की कोशिश में रहते हैं। लेकिन इनको सौगात में जो भाँति-भाँति बददुआएं मिलती हैं। उन्हें पाकर जहन्नुम जाने जैसा महसूस करते होंगे।
अच्छा यह प्रेम विरोधी सिर्फ और सिर्फ वैलेंटाइन डे पर्व पर ही विरोध करते हैं। बाकी दिन चाहे इनके सामने खुलेआम प्यार का इजहार कीजिए। बिल्कुल भी रोक-टोक नहीं करेंगे,बल्कि समर्थन करेंगे। कहेंगे कि लगे रहिए,एक दिन कामयाबी अवश्य मिलेगी। इनमें भी एकाध ही होते हैं जो नेतृत्वकर्ता होते हैं। बाकी तो वैलेंटाइन पर भी दिल से विरोध नहीं करते हैं। जबान से करते हैं। जबान पर दबाव रहता है। अपने दल को सुर्खियों में लाने के लिए विरोध का नाटक रचना पड़ता है। नाटक नहीं रचे तो सुबह अखबार में बांचने के लिए अपना नाम नहीं मिलता है। व्यक्ति नाम के लिए क्या नहीं करता है। विरोध ही नहीं,बल्कि अनुरोध भी करता है। पर ऐसे लोग समय के अनुकूल चलते हैं। जिधर नाम होने लगता है,उधर ही हो लेते हैं। इसलिए ऐसी प्रवृत्ति के लोग इधर-उधर ताक-झांक करते रहते हैं।
ऐसा कदाचित भी नहीं है कि वैलेंटाइन के विरोधी प्यार नहीं करते हैं। यह लोग प्यार तो बहुत करते हैं, मगर दिखावा नहीं करते हैं। बस इनके नयन दूसरों के नैन-मटक्का देख नहीं सकते। जबकि खुद पलके भी नहीं झपकाते हैं। एक बार देखने लग गए तो टकटकी लगाए रहते हैं।
प्रेम के पंछियों को माता-पिता,यार-दोस्त व रिश्तेदार उड़ान के लिए प्रोत्साहित करें या नहीं करें,पर रेस्तरां तथा होटल वाले अवश्य करते होंगे। चूंकि वो अपना कारोबार चलाने के लिए शुभाशीष देने में कभी पीछे नहीं रहते हैं। क्योंकि इनके द्वारा एक बार दिया शुभाशीष न जाने कितनी बार फिर से वापस बुलाता है। जब प्रेमी कस्टमर बार-बार आता है तो कारोबार में बढ़ोतरी होती है। बढ़ोतरी होती है तो बढ़ावा देने में इनके होटल से क्या जा रहा है। थोड़ी-सी चीनी और सूप। जिनके बदले में प्रेम और धन आ रहा है। अधुनातन में जहाँ धन है,वहाँ प्रेम है। जहाँ पर धन और प्रेम हैं,वहाँ पर रतन तो दौड़कर चला आता है। रतन आने के बाद होटल में जाना स्वाभाविक है।


वैलेंटाइन डे और सरप्राइज गिफ्ट



प्रेमियों के आदर्श संत वैलेंटाइन को शत-शत नमन,जिन्होंने प्यार का जश्न मनाने के लिए वर्ष का एक दिन प्रेमियों के नाम किया। साथ ही रेस्तरां और होटलों को एक दिन अतिरिक्त रोजगार दिया। गिफ्ट्स और  पुष्प विक्रेताओं की आमदनी में एक सप्ताह के लिए बढ़ोतरी की। इनके लिए यही तो एक ऐसा सप्ताह है,जिसमें उनके लूट-खसोट करने पर कोई प्रतिबंध नहीं। माथापच्ची नहीं। जो प्राइस बता दी,वही मिल जाती है। क्योंकि सरप्राइज़ गिफ्ट की प्राइस कम कराना प्यार पर प्रश्नवाचक लगाना है। प्रश्नवाचक लगने का अभिप्राय ब्रेकअप भी हो सकता है। दमड़ी के चक्कर में ब्रेकअप कोई नहीं चाहता है। इसलिए प्राइस की जो वॉइस कानों में पड़ी,उसे कर्णप्रिय समझकर तुरंत भुगतान इस अनुष्ठान का पहला नियम है।
यह विक्रेता वैलेंटाइन सप्ताह में अपने इष्ट देव की पूजा अर्चना करते हैं या नहीं करते हैं,यह तो इल्‍म नहीं है। लेकिन संत वैलेंटाइन की तो अवश्य करते होंगे। इसी के नाम की अगरबत्ती लगाते होंगे। माला जपते होंगे। ‘ संत वैलेंटाइन महाराज तेरी जय होके उच्चारण से ही उनकी सुबह शुरू होती होगी।
प्यार में कीमत कीमती नहीं होती हैं। प्यार कीमती होता है। प्यार पाने के लिए कीमती से कीमती चीज भी न्योछावर करनी पड़े तो पीछे नहीं हटते हैं,बल्कि उसके लिए यार-दोस्त से पैसे उधार लेकर समर्पित कर देते हैं। जहाँ त्याग है,वहाँ प्यार है। प्यार में सब कुछ जायज है। अपनी जायदाद भी मांगे तो देने में कोई बुराई नहीं है। जब दिल दे ही बैठे हैं तो जमीन जायदाद देने में क्या हर्ज है। बल्कि यह तो प्यार का फर्ज है। जिसको निभाना प्रेमियों का कर्तव्य है। जो अपने कर्तव्यों को भूल जाता है। उससे उसके अधिकार स्वत:ही ब्रेकअप में रूपांतरण हो जाते हैं।
लेकिन आजकल ब्रेकअप होने के बाद दुखों का पहाड़ नहीं टूटता है। बल्कि दूसरे ही दिन किसी और के साथ प्रेम की पहाड़ी की सैर पर निकल पड़ते हैं। हाँ,जो सॉरी का मैसेज करके,कॉल प्राप्त करने के लिए राजी कर ले और कॉल प्राप्त करते ही रोने का नाटक कर ले उसका तो ब्रेकअप बच सकता है। अन्यथा नहीं। क्योंकि प्रेमी जुदाई सह लेते हैं,पर रुलाई नहीं। वैसे भी रुदन किसी को भी अच्छा नहीं लगता है।
वैसे आजकल प्यार करना जितना आसान है। उतना ही उसके खर्चे उठाना मुश्किल है। आँखें चार होते ही चार हजार की शॉपिंग तय हो जाती है। भले ही बंदे के पास भुगतान करने के लिए पॉकेट में मनी नहीं हो और मन मसोसकर गूगल पे या पेटीएम के जरिए भुगतान करना ही पड़े। नहीं किया,तो जो आँखें चार हुई थी, दो ही रह जाती हैं। 
मोबाइल रिचार्ज करवाना पहली प्राथमिकता होती है। अगर पहली प्राथमिकता को तुरंत प्रभाव से पूरा नहीं किया,तो प्रेमिका रूठ जाती है। एक बार रूठी,तो रिचार्ज करवाने के बाद भी नहीं मानेगी। फिर कई दिनों तक मान-मनुहार का दौर चलता है,जो कि भोर से लेकर अर्धरात्रि तक जारी रहता है। यह प्रेम का ऐसा दौर होता है,जिसमें सोना,बाबू,जानू जैसे प्रियतम शब्दों का सर्वाधिक उपयोग होता है।
संत वैलेंटाइन के अनुयायी का प्यार या तो परवान चढ़ता नहीं है या चढ़ता है, तो फिर उतरता नहीं। यह इश्क के सागर में गोते नहीं लगाते हैं,बल्कि उसमें डूबे रहते हैं। कई बार तो सांस लेना भी भूल जाते हैं। जिससे कईयों की तो हृदय गति भी रुक जाती है।